Sunday, October 27, 2024

हताशा

 

 

झुकी हुई गर्दन
सिकुडे पेट!
फाल्गुन हो
सावन या जेठ!!

टुटी झोपडी
टपके पानी!
चौमासा सुनो
करे मनमानी!!

मक्खी मच्छर
अबाध विचरण!
बिमारियो का
हर मौसम ग्रहण!!

बात व्यर्थ की
साफ सफाई !
चोंचले ये सब
अन्य समझाई!!

भूख प्यास जब
बेदर्द सताती!
ऐसी बातें सुनो
मन में आती!!

हताश कुंठित
माने क्या इनको!
आग पेट की
जलाती जिनको!!

व्यवस्था देश
किया है बर्बाद!
बीस प्रतिशत ही
बस है आबाद!!

व्यवस्था आज भी
गुलामों वाली है!
1300
साल से जो
देखी - भाली है!!

सत्तर करोड किसान
विदेशी दया पर!
उन्हीं की नीतियों
पर हैं निर्भर!!

खुद का ही जब
सम्मान नहीं है!
नियमविहिन होना
गरीब का सही है!!

क्या नीति नियम
क्या राष्ट्रभक्ति!
पेटाग्नि बुझाने
व्यय सब शक्ति!!

क्या मिलेगा यहां
शिक्षित होकर!
बेरोजगारी के
बीजों को बोकर!!

सिफिरिस रिश्वत
काम की कसौटी!
प्रतिभा की यहां
होती बोटी बोटी!!

मंचों की बोलियां
बस कहने को हैं!
गरीब किसान
हताशा सहने को हैं!!

कोई दल आए
फर्क पडता!
सम्मान भारत का
जाता सिकुडता!!

रहना; खाना
बिजली पानी!
शिक्षा विदेशी ये
दे रहे मनमानी!!
प्राकृतिक रुप से
सबसे धनी देश!
बदहाल ;गुलाम
दिया उसको भेष!!
धोखे दे रहे बस
सत्तर साल से!
संपन्न होते जाते
खुद हर राल से!!

बुरा हो रहा है
व्यवस्था कारण!
समस्त धरा पर
ऐसा उदाहरण!!

पिछलग्गू बने हैं
लोग अधिकांश!
तर्क विवेक का
भूल गए सारांश!!

विश्वगुरु भारत
बनाया बदहाल!
चरित्र बिगडा है
बिगडी है चाल!!

सुधारक ही सुनो
विकृतिग्रस्त हैं !
व्यापारी बाबाओं से
भारतीय त्रस्त हैं!!

जागो भारतीय
खुद सुधरो पहले!
कोई विकृति फिर
हममें क्यों रह ले!!

व्यवस्था परिवर्तन का
दबाव बनाओ!
आओ भारतीय सब
मिलकर के आओ!!

आचार्य शीलक राम

Friday, October 18, 2024

अपनी भाषा- सबकी भाषा संस्कृत और भारती हिंदी (Our language – everyone's language Sanskrit and Bharti Hindi)

प्रसिद्ध भाषाविद् और इतिहासकार पंडित भगवद्दत्त ने मनुष्य के लिये भाषा की उत्पत्ति और फिर उस मूल भाषा से संसार की अन्य भाषाओं की उत्पत्ति होने के संबंध में कहा है कि भारतीय लोग सनातन से दो प्रकार की वाक् मानते आये हैं- दैवी वाक् और आसुरी वाक्! दैवी वाक् मंत्रमयी है! दैवी इसलिये कि मंत्र द्युलोक अथवा अंतरिक्ष में देवों द्वारा उच्चरित हुये! मानुषी वाक् अथवा मनुष्यों से व्यवहृत वाक्! इसमें पद लगभग वही हैं जो दैवी वाक् में थे, पर वाक्य रचना और आनुपूर्वी के हेरफेर के कारण यह एक नया रूप धारण करती है! मूल इसका दैवी वाक् ही है! मानुषी वाक् आगे चलकर अतिभाषा, आर्यभाषा, महाभारत कालीन लोकभाषा संस्कृत तथा पाणिनि के उत्तरकालीन संस्कृत!संस्कृत भाषा से ही संसार की सभी भाषाओं की उत्पत्ति के संबंध में प्रसिद्ध इतिहासकार नरेंद्र पिपलानी के अनुसार विश्व की समस्त प्राचीन भाषाएं संस्कृत से लैटिन तथा ग्रीक व अरामाईक द्वारा उत्पन्न हुई हैं! भाषाओं में जलवायु , मानवता परिस्थितियों, युद्ध तथा तकनीकी विकास व व्यापार का प्रभाव पड़ता है! जिसके कारण भाषा में परिवर्तन होना प्रारंभ हो जाता है! परंतु मूल धातु में परिवर्तन नहीं होता है! आज युरोपीय और भारतीय भाषाओं में इतना अधिक अंतर है कि कोई विद्वान भी सोच नहीं सकता कि ये सभी भाषाएं संस्कृत से निकली हैं!

बाईबल ने भाषाओं की उत्पत्ति अपने  निराधार, अबोध बालवत् और गंवारु मीनार सिद्धांत को प्रस्तुत करते हुये कहा है कि शुरू में सारी धरती की एक ही भाषा थी! लोगों को एक गगनचुम्बी मीनार बनाते देखकर यहोवा ने उनमें भाषा भेद पैदा करके समस्त धरा पर फैला दिया! उस मीनार का नाम बाबेल था!

लौकिक संस्कृत, जेंद, ग्रीक, लैटिन आदि भाषाओं का एक ही उद्गम 'देववाणी वैदिक संस्कृत' है! इन्हीं से आगे चलकर प्राकृत, अपभ्रंश, भारती हिंदी, पंजाबी, कश्मीरी, असमी, सिंधी, तमिल, तेलगु, इटालियन, फ्रैंच, अंग्रेजी, जर्मन,स्पेनिश, केल्टिक,पर्शियन, पश्तो, बलूच, कूर्द आदि भाषाओं का निर्माण हुआ है! प्रसिद्ध वैदिक विद्वान स्वामी विद्यानंद के अनुसार जिस प्रकार गुजराती, मराठी, बांग्ला आदि विविध भारतीय भाषाओं का उद्भव प्राचीन संस्कृत से हुआ है, वैसे ही यूरोप और एशिया विभिन्न भाषाओं का स्रोत भी संस्कृत है!इसलिये आज इन भाषाओं को बोलने वाले सभी लोग एक समय पर जरुर भारतभूमि में ही रहते होंगे! इसी भूमि से वो धरती के विभिन्न हिस्सों में जाकर बस गये थे! मैक्समूलर ने तो यहाँ तक कहा है कि वो सभी भारतीय, ईरानी, यूनानी, रोमन, रुसी, केल्ट और जर्मनों के पूर्वज एक चारदीवारी में ही नहीं अपितु एक ही छत के नीचे रहते थे!संस्कृत भाषा सभी भाषाओं की जननी है, इसके लिये स्वामी विद्यानंद सरस्वती के द्वारा दिये गये कुछ शब्दों के उदाहरण देखिये - पितृ शब्द ईरानी में पिदर तथा अंग्रेजी में फादर हो गया! असुर शब्द जेंद में अहुर हो गया! अंगुष्ठ शब्द फारसी में अंगुस्त हो गया! मनु शब्द अंग्रेजी में मैन हो गया! अंतकाल शब्द अरबी में इंतकाल हो गया! होम शब्द चीनी में घोम हो गया! अहिफेन शब्द जापानी में आहेन हो गया! भ्राता शब्द ग्रीक में फ्राता हो गया! त्रय शब्द लेटिन में त्रे हो गया! मृत्यु शब्द फ्रैंच में मौर्त हो गया! विधवा शब्द जर्मन में विदवे हो गया! अग्नि शब्द रसियन में ओग्न हो गया! माता शब्द पुर्तगाली में माइ हो गया!

जिस रुप में वैदिक ऋचाएं अंतरिक्ष में उच्चरित हुई, उनका क्रम  वैसे ही रखा गया है! बाद में वैदिक शाखा ग्रंथों में वर्णानुपूर्वी में बदलाव हुआ है! यज्ञ में या अन्यत्र इस वर्णानुपूर्वी को बदलने का किसी को भी अधिकार नहीं है! पाश्चात्य विचारकों और भाषाविज्ञानियों को तथा इनकी पुस्तकों में इस रहस्य का मामूली अहसास भी नहीं है! इसीलिये तथा अन्य कुछ कारणों की वजह से वर्तमान व्याकरण वेद की व्याख्या में अधिक दूर तक सहायता नहीं कर सकता! इसके लिये योग साधना एकमात्र मददगार है! वैदिक ऋचाओं में शब्द अर्थ संबंध नित्य है! यह निर्वचन विद्या से प्राप्त होता है! शब्दार्थ तथा उनके संबंध की नित्यता को जानकर ही ऋषियों ने धातुओं का आकर्षण किया था! प्रसिद्ध वैदिक विद्वान स्वामी दर्शनानंद सरस्वती के अनुसार देववाणी वैदिक संस्कृत कभी बोलचाल की भाषा नहीं रही!इसका अपभ्रंश लौकिक संस्कृत बोलचाल की भाषा रही है! इससे परमात्मा पर क्षेत्रवाद का यह आरोप नहीं लग सकता कि  भारत में जन्मी लौकिक संस्कृत सभी भाषाओं की जननी है!अपितु परमात्मा ने तो समस्त सृष्टि के हितार्थ देववाणी वैदिक संस्कृत में वेद ज्ञान प्रदान किया! इसी से भाषाओं और विविध ज्ञान का प्रचार -प्रसार समस्त सृष्टि में हुआ! वेद में सभी नाम यौगिक हैं! रूढि नाम पदार्थों के बनने पर दिये गये! वैदिक संस्कृत परमात्मा ने ऋषियों को प्रदान की तथा उसके अपभ्रंश लौकिक संस्कृत में शुरू से ही बदलाव शुरू होकर सृष्टि की विविध भाषाओं का निर्माण हुआ!

लौकिक संस्कृत से प्राकृत, अपभ्रंश,भारती हिंदी, हरियाणी,कश्मीरी, असमी, गुजराती, तमिल, कन्नड़ आदि भाषाओं का जो इतिहास बतलाया जा रहा है,उसे छोटा करके बतलाया जा रहा है! इनका इतिहास काफी पुराना है!  बलौच,परसियन,हिब्रू, फ्रैंच, ग्रीक, लैटिन, चीनी,अंग्रेजी, आदि भाषाओं की अपेक्षा भारतीय भाषाओं में अपभ्रंश अधिक हुआ है! नरेंद्र पिपलानी के अनुसार विश्व की समस्त भाषाएं संस्कृत से लैटिन तथा ग्रीक व अरामाईक द्वारा उत्पन्न हुईं! भाषाओं पर जलवायु, माननीय परिस्थितियों, युद्ध तथा तकनीकी विकास व व्यापार का प्रभाव पडता है! जिसके कारण भाषा में परिवर्तन होना प्रारंभ हो जाता है! परंतु मूल धातु में परिवर्तन नहीं होता है!...... साधुवाद के पात्र योरोपवासियों ने अपनी भाषा में वैदिक संस्कृत के शब्दों को भारतीयों से अधिक सहेज कर रखा है! जबकि भारतीयों ने पर्याय शब्दों का सृजन कर आदिकालीन संस्कृत शब्दों को विस्मृत ही कर दिया है! अंग्रेजी का शर्ट संस्कृत के शब्द श्रित से बना है! अंग्रेजी का टूंड्रा शब्द संस्कृत शब्द तंद्रा से बना है! अंग्रेजी का अबोरिजन शब्द संस्कृत शब्द आभीरजन  से बना है!लैटिन का ओमेन संस्कृत शब्द ओम् से बना है! अंग्रेजी का गाईज शब्द संस्कृत के गाय ज से बना है! गाड शब्द गौदेव से बना है! एशिया, यूरोप तथा अफ्रीका में राम के नाम से अनेकों शहर बसे हुये हैं!जीसस क्राईस्ट ईशसकृष्ण से बना है! चर्चा से चर्च, वाटिका से वैटिकन तथा मक्का-मदीना  संस्कृत मख- मेदिन( यज्ञ वेदी) से बने हैं!

वाक्,भाषाओं,बोलियों तथा इनके पीछे निहित रहस्य एवं दर्शनशास्त्र के सभी गूढ रहस्यों का उद्घाटन पुरातन काल में  आर्यावर्त भारतभूमि पर ही हुआ था!लेकिन लाखों से इतनी समृद्ध, वैभवशाली और पुरातन धरोहर होने के बावजूद, हम भारतीयों पर विदेशी भाषा अंग्रेजी का प्रेत सवार है! हमारे नेता, राजनीतिक दल, उच्च- अधिकारी,सिविल सर्विस परीक्षाओं के स्वंयभू अधिकारी, न्यायविद्, एलोपैथिक चिकित्सक, वरिष्ठ प्रोफेसर तथा उच्च शिक्षा -संस्थानों के शीर्ष पर विराजमान कुलपति महोदय आदि उच्च पदों पर अपना मनमाना एकाधिकार बनाये रखने के लिये अधिकांशतः भारतीय भाषाओं की उपेक्षा करके अंग्रेजी को थोपते आ रहे हैं! भारत की किसी भी भाषा में कोई भी सरकारी पत्र, सूचना, जानकारी,अधिसूचना, प्रश्न- पत्र आदि हों- लेकिन केवल अंग्रेजी प्रारूप को ही वैध माना जाता है!आजादी के पचहत्तर वर्षों बाद भी भारतीय भाषाओं की इस दयनीय स्थिति पर रोना आता है! स्वार्थी नेताओं द्वारा जनमानस का माईंडवाश किये जाने की वजह से ही दक्षिण भारतीय लोग संपर्क भाषा के रूप में गुलामी की प्रतीक और बेरोजगारी की माँ अंग्रेजी को सहर्ष स्वीकार किये हुये हैं!भारती हिंदी का नाम आते ही दंगे शुरू हो जाते हैं! जितने पढ़े -लिखे, उतने बडे मूर्ख और मूढ!मैकाले, मैक्समूलर,मैक्डोनाल्ड के मानसपूत्रों ने कैसी विषम स्थिति पैदा कर दी है?
भारती हिंदी की इतनी उपेक्षा के बावजूद आज यह भाषा दुनिया की सबसे अधिक लोगों द्वारा बोले जाने, समझे तथा लिखे जाने  जानेवाली पुस्तक है!

दुनिया के अधिकांश व्यापार,प्रबंधन,उद्योग-धंधों,बहुराष्ट्रीय कंपनियों,तकनीक,हथियार निर्माण,उपभोक्ता सामान निर्माण, पूंजी, आर्थिक नीति निर्माण, राजनीतिक गतिविधियों, वैश्विक संगठनों पर यूरोपियन देशों, अमरीका, आस्ट्रेलिया, चीन आदि का एकाधिकार है! जिसकी लाठी, उसी की भैंस! जिनके हाथों में ताकत है, वो देश आज भी हरेक क्षेत्र में अपनी मनमानी कर रहे हैं! उपरोक्त एकाधिकार के साथ ये देश अपनी भाषा, अपने मजहब तथा अपने राजनीतिक वर्चस्व को भी भारत तथा भारत जैसे गरीब और विकासशील देशों पर जबरदस्ती से थोपते आ रहे हैं! भारती हिंदी जिसे स्वामी दयानंद सरस्वती ने 'आर्यभाषा' कहा था,को भारत के गरीब और मध्यम वर्ग ने अवश्य खुले दिल से स्वीकार किया है!लेकिन भारतीय प्रशासनिक सेवा,राज्य प्रशासनिक सेवा,भारतीय सुरक्षा सेनाओं,न्याय सेवा, डाक सेवा,रेलवे परिवहन,हवाई परिवहन,उद्योग धंधों, व्यापार, प्रबंधन, चिकित्सा,राजनीति, सरकारी मंत्रालयों, शिक्षा, शोध, विभिन्न प्रतियोगिता परीक्षाओं आदि सभी क्षेत्रों में नीति -निर्माण, क्रियान्वयन तथा परिणाम में बहुसंख्यक भारतीय जनमानस से कोसों दूर गुलामी की प्रतीक अंग्रेजी भाषा राज कर रही है!हमारा सिस्टम भारती हिंदी को आज भी ज्ञान,विज्ञान और बुद्धिमान भारतीयों की भाषा मानने से परहेज कर रहा है! 800 करोड की आबादी में से 135 करोड़ लोगों द्वारा प्रयोग की जाने वाली भाषा की यह बुरी स्थिति राष्ट्रप्रेमी भारतीयों द्वारा स्वीकार्य नहीं हो सकती है!भारती हिंदी की इस दयनीय स्थिति के लिये हमारी राजनीति,हमारे राजनेता,हमारे अंग्रेजीभाषी नीति-निर्माता,शिक्षक तथा भारती हिंदी भाषा के साहित्यकार सर्वाधिक जिम्मेदार हैं! जनता- जनार्दन तो आज भी भारती हिंदी को बोलचाल तथा भावाभिव्यक्ति की  भाषा मानता, जानता और प्रयोग करता आ रहा है!
स्वतंत्रता सेनानियों के लिये वेदव्यास रचित श्रीमद्भगवद्गीता तथा स्वामी दयानंद सरस्वती लिखित सत्यार्थ प्रकाश प्रेरणा के प्रमुख स्रोत रहे हैं! उस गुलामी के दौर में आर्यभाषा भारती हिंदी में स्वामी दयानंद सरस्वती लिखित 'सत्यार्थ प्रकाश' ग्रंथ ने सनातन भारतीय सभ्यता,संस्कृति,धर्म,दर्शनशास्त्र,जीवन मूल्यों,राष्ट्रभक्ति,स्वदेशी, राष्ट्रभाषा की आवश्यकता को सर्वप्रथम भारतीयों के सम्मुख रखा था!लेकिन स्वतंत्रता के पश्चात् आर्यसमाजियों को छोडकर  भारतीयों ने स्वामी दयानंद सरस्वती के इस महत्वपूर्ण योगदान को स्वीकार करने के लिये हिम्मत नहीं दिखलाई!

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आचार्य शीलक राम
दर्शनशास्त्र -विभाग
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय
कुरुक्षेत्र- 136119

शोध और अनुसंधान की तर्कपूर्ण प्रस्तुति : ‘प्रमाण अन्तरराष्ट्रीय शोध पत्रिका’ (Logical presentation of research and research: ‘Praman International Research Magazine’) (ISSN :2249-2976)

 शोध और अनुसंधान की तर्कपूर्ण प्रस्तुति : ‘प्रमाण अन्तरराष्ट्रीय शोध पत्रिका’

डॉ. सुरेश कुमार
असिस्टेंट प्रोफेसर (हिन्दी)
राजकीय महाविद्यालय सांपला
रोहतक (हरियाणा)

वर्तमान सदी के परिदृश्य में जो विसंगतियां एवं विद्रूपताएं हमारे समक्ष हैं वे हमारी शिक्षा व्यवस्था की कमियों के कारण ही पैदा हुई हैं। वास्तव में यदि देखा जाए तो हम साक्षर तो हुए हैं लेकिन शिक्षित नहीं। हमारी शिक्षा में नैतिक मूल्यों के अभाव ने ने केवल हमारे वर्तमान को संकट ग्रस्त किया है बल्कि हमारे भविष्य को भी मुसीबत में डाल दिया है। शिक्षा से भावी पीढ़ी के व्यवसायिक हितों के साथ-साथ उनके चहुंमुखी विकास को सुनिश्चित करने हेतु जिस एक अति आवश्यक पक्ष को हमारे शिक्षाविदों ने रेखांकित किया है, वह हमारी शिक्षा प्रणाली में अनुसंधान पर बल देने की बात है। अनुसंधान के प्रति हमारी शिक्षा संस्थाओं की संवेदनशीलता में वृद्धि का यही कारण है। शोध के क्षेत्र में गुणात्मक तथा परिमाणात्मक सुधारों को ध्यान में रखते हुए महाविद्यालायें में स्नातक व स्नातकोतर पर प्रोजेक्ट के रूप में तथा पीएच॰डी॰ के लिए पंजीकृत किए जाने वाले शोधार्थियों के लिए लिखित एवं मौखिक परीक्षा की व्यवस्था की गई है। वह एक सराहनीय कदम है। दूसरी ओर पीएच॰डी॰ में पंजीकृत हो चुके शोधार्थियों के लिए भी न्यूनतम दो शोधपत्रों के प्रकाशन की अनिवार्यता शोध की गुणवता में सुधार करने के लिए उठाया गया कदम है । इसी के अन्तर्गत शोध गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए यू॰जी॰सी॰ द्वारा विश्वविद्यालयों में प्रकाशन की व्यवस्था के साथ-साथ सेमिनारों, कार्यशालाओं व अन्य प्रकार की शोध सहायक गतिविधियों का भी आयोजन किया जाता रहा है। इस संबंध में कुछ साहित्यिक एवं शैक्षणिक संस्थाओं द्वारा शोध-पत्रिकाओं का प्रकाशन मुख्य स्थान रखता है! शोध के स्तर व गरिमा से समझौता करके केवल धन लेकर शोध-पत्रों का प्रकाशन कर रही । जबकि ऐसी शोध-पत्रिकाओं का भी अभाव नहीं है जो स्वच्छ तथा प्रामाणिक अनुसंधान गतिविधियों में लगी है। आचार्य अकादमी चुलियाणा रोहज, रोहतक (हरियाणा) द्वारा प्रकाशित अंतरराष्ट्रीय त्रैमासिक शोध-पत्रिका ‘प्रमाण’ (आईएसएसएन: 2249-2976)  इस संदर्भ में उल्लेखनीय है! यह एक अन्तरराष्ट्रीय पीयर रिव्यूड एवं रेफर्ड शोध पत्रिका है, जो शोध- पत्रिकाओं में महत्वपूर्ण स्थान रखती है!  इसके अतिरिक्त भी इसमें हिन्दी, अंग्रेजी, पंजाबी, संस्कृत आदि भाषाओं के शोध-पत्रों का प्रकाशन होता है। पत्रिका सभी विषयों के शोध-पत्रों के माध्यम से नए-नए विचार सामने लाने के लिए प्रयासरत रही है। यह शोध-पत्रिका शिक्षा व अनुसंधान के प्रति समर्पित है। अतः बिना किसी व्यावसायिक उद्देश्य के इस पत्रिका में केवल उन्हीं शोध-पत्रों को स्थान दिया जाता है, जो मौलिक चिन्तन, प्रमाणिक तथ्यों पर आधारित तथा प्रासांगिक विषयों पर लिखे होते हैं और ज्ञान-विज्ञान में किसी नई अवधारणा को प्रस्तुत करते हैं!
यह यह शोध-पत्रिका शोधार्थियों के साथ-साथ प्राध्यापकों के लिए भी काफी उपयोगी है। स्तरीय शोध-विषय चयन, वस्तु चयन, उत्कृष्ट प्रस्तुतीकरण और शोधपरक सामग्री से युक्त यह शोध - पत्रिका पिछले दो दशक से शोध मानकों पर खरी उतरने के साथ-साथ शोध-क्षेत्र में एक बड़ी कमी को पूरा करती है। शोध-पत्रों के प्रस्तुतीकरण में शोध-पत्र का सारांश एवं मुख्य शब्द पहले दिए जाते है, जो पाठकों की सुविधा की दृष्टि में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण    है ।
इस शोध- पत्रिका को भारतीय व विदेशी विश्वविद्यालयों में कार्यरत लगभग 60 विद्वानों की टीम के साथ आचार्य ‘शीलक राम’ अपने कुशल संपादन के साथ राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठा व सम्मान दिलवाने के संकल्प के साथ प्रयत्नशील हैं। अतः शोध रूपी यज्ञ में जुटी संस्था आचार्य अकादमी चुलियाणा, रोहतक (हरियाणा) में अपनी आहुति देकर शिक्षा व अनुसंधान जैसे राष्ट्रीय महत्त्व के इस पुनीत कार्य में सहभागी बनें

Monday, October 14, 2024

समृद्ध भारतीय सनातन ज्ञान परंपरा (Rich Indian Sanatan Gyan Tradition)

                   किसी भी समाज, सभ्यता, संस्कृति,संप्रदाय,राष्ट्र आदि को भलि तरह से समझने के लिये सर्वप्रथम उसकी फिलासफी को समझना बेहद आवश्यक है! युनानी फिलासफी का जन्म अक्सर वहाँ पर जाने वाले भारतीय धार्मिक,नैतिक, सांस्कृतिक और व्यापारियों के माध्यम से अधकचरे रुप में हुआ था!स्वयं युनान तथा युनान के आसपास के क्षेत्र में फिलासफी के बीज अंकुरित होने के लिये कोई भी प्रमाण या संकेत या संभावना या योग्यता मौजूद नहीं  हैं!'नहीं' से एकदम 'हां' उत्पन्न नहीं होती है! जिस वृक्ष के जहाँ पर बीज मौजूद नहीं हैं, वहाँ पर उस  वृक्ष के होने की संभावना शून्य है!पश्चिमी फिलासफी का जन्म युनान में  हुआ था!टूटे फूटे जो विचार युनानियों को सीधे भारतवर्ष से या फिर अरब और मिश्र आदि भूमियों के माध्यम से मिले थे, सुकरात प्लेटो अरस्तू तक उन्हीं पर फिलासफी के भवन खड़े किये जाने के प्रयास होते रहे! लेकिन वो सारे प्रयास सिर्फ फिलासफी तक ही सीमित रहे! वो कभी 'दर्शन' नहीं बन सके! क्योंकि युनानियों और उससे प्रभावित देशों के रक्त में ही उन्मुक्त एकतरफा भोगवाद, उपयोगितावाद,भौतिकतावाद आदि रहे हैं, इसलिये भारतीय दर्शन और दर्शनशास्त्र के मीमांसा, वैशेषिक और न्याय से तो बहुत अधिक प्रभावित रहे! लेकिन सांख्य, योग और वेदांत को वो कभी भी स्वीकार नहीं कर पाये! 5000 वर्षों से भी अधिक पुरातन भारतीय षड्दर्शनशास्त्र के पहले तीन यानि मीमांसा, वैशेषिक और न्याय स्थूल दर्शनशास्त्र माने जाते हैं! जबकि सांख्य, योग और वेदांत प्रायोगिक आध्यात्मिक दर्शनशास्त्र माने और जाने जाते हैं! अरबियों,मिस्रियों, युनानियों और उनसे प्रभावित युरोपियन ने भारतीय षड्दर्शनशास्त्र के भौतिक भाग को ही अधिकांशतः अंगीकार किया है! आध्यात्मिक भाग उनको कभी अनुकूल पडा ही नहीं,इसलिये उसे छोड दिया!मीमांसा, वैशेषिक और न्याय में मौजूद कर्म- धर्म, पदार्थ -धर्म तथा प्रमाण -धर्म को थैलिज से लेकर अरस्तू तक ने बहुतायत से अंगीकार करके तोतली जबान में उसका वर्णन किया है! बाद के लेखकों ने उसमें सुधार परिष्कार करके उसे सुघडता प्रदान की है! भारतीय दर्शनशास्त्र के अन्तर्गत मीमांसा, वैशेषिक और न्याय के अधिकांश विचारों का युनानी फिलासफर ने अनुकरण किया है! यदि सांख्य, योग और वेदांत को वो स्वीकार कर पाते तो न तो वहाँ पर एकतरफा सोफिस्ट पैदा होते, न एकतरफा एपिकूरियन आदि पैदा होते तथा न ही वैचारिक आजादी का गला दबाकर सुकरात आदि को विष देकर मारा जाता!

                  वेदों से लेकर समकालीन दार्शनिक ओशो,कृष्णमूर्ति तक सभी भारतीय दार्शनिकों ने परमात्मा, आत्मा, प्रकृति तथा प्रकृति के विकार प्राण, काल,ध्वनि,महत्,अहंकार, त्रिगुण,मन,पंचज्ञानेंद्रियों, पंचकर्मेंद्रियों, पंचतन्मात्राओं तथा पंचमहाभूतों पृथ्वी,जल,अग्नि,वायु और आकाश को स्वीकार किया है!भारतीय सनातन दर्शनशास्त्र में विकासवाद नहीं अपितु सृष्टिवाद को माना और जाना है!इसके अंतर्गत सृष्टि एकरेखीकीय की अपेक्षा वृताकार गतिमान है!भारतीय दर्शनशास्त्र के कुछ विचारों को लेकर युनानी फिलासफी में उनको टुकडों में कहने का आधा अधूरा प्रयास है! भारतीय दर्शनशास्त्र ऐसा जैसेकि समुद्र में गोता मारकर उसकी गहराइयों से रत्नों को खोजकर बाहर लाना! जबकि युनानी फिलासफी ऐसी कि जैसे किसी उथले तालाब के किनारे डरे -डरे हुये बैठकर उसके किनारे के कीचड से ही सीपियों, घोंघों और काई को एकत्र करना!'जल' तत्व को थैलिज ने एकमात्र मूलतत्व माना है! अबोध बालक भी बतला सकते हैं कि अकेले जल तत्व से समस्त सृष्टि के विकास का समाधान कैसे हो सकता है?खुद जल तत्व में भी पृथ्वी, अग्नि, वायु, आकाश आदि तत्व भी मौजूद होते हैं! लेकिन थैलिज ने उनके देश में प्रचारार्थ या व्यापारार्थ गये  भारतीयों से पंचमहाभूतों के संबंध में सुन लिया होगा! बंदर को हल्दी की गांठ मिल गई और वह पंसारी बनने की सोचने लगा! यही हाल थैलिज और उनके अन्य साथियों का है! जल को वेद, उपनिषद्, दर्शनशास्त्र आदि में 'आप:' कहा गया है!इसी आप: से अवेस्ता में आपो बना तथा फारसी में आब बना! पंजाब, गुलाब, शराब आदि शब्द इसी से बने हैं!ऋग्वेद में 'आप:' के लिये एक अलग सूक्त 10/9 दिया गया है! इसी तरह से सृष्टि के हरेक तत्व की व्याख्या के लिये सूक्त वेदों में उपलब्ध हैं!वेद की ऋचाओं को साक्षात् करने वाले मंत्रद्रष्टा ऋषि कोई अंधेरे में तीर मारने की अपेक्षा सृष्टि में मौजूद विभिन्न तत्वों से जड चेतन संसार को संतुलित समृद्ध बनाने की प्रार्थना कर रहे हैं! उन्होंने सृष्टि के मूल तत्वों को सूत्ररूप में बतला दिया है! उन्होंने 'ऋत' के माध्यम से अखिल ब्रह्मांड व्यवस्था तथा मानव प्राणी के लिये 'नैतिक' मर्यादाओं का रहस्योद्घाटन कर दिया है! 

            सुकरात से 200 वर्ष पहले भारत में 1300 से भी अधिक मत प्रचलित थे! शंकराचार्य ने उस समय प्रचलित उन सभी से सौहार्दपूर्ण ढंग से शास्त्रार्थ करके अधिकांश को सनातन धर्म में दीक्षित किया! जो लोग सौहार्दपूर्ण चर्चा से सहमत नहीं होकर राजनीतिक रुप से विदेशी शत्रुओं की मदद से भारत को नुकसान पहुंचाने की कोशिशें कर रहे थे,उनको समय -समय पर पुष्यमित्र जैसे सम्राटों ने तलवार के बल पर सबक भी सिखाया था!लेकिन सुकरात की तरह निर्ममता से हत्या करके वैचारिक आजादी का भारत में कभी गला नहीं दबाया गया! भारत में तो लोकायत, चार्वाक, प्रबुद्ध कात्यायन, संजय वेलट्टिपुतु, अजित केशकंबल,तंत्र परंपरा आदि को भी फलने फुलने का पूरा अवसर दिया गया था! राजा भोज ने भी उन उच्छृंखल तांत्रिकों को मौत के घाट उतारा था, जो नैतिक मर्यादाओं को तोडकर भारत को खोखला कर रहे थे!
मानव इतिहास में सुकरात निर्दोष होते हुये वैचारिक आजादी का शिकार हुआ पहला व्यक्ति था!असल में सुकरात बेचारा गरीब था! सच बोलने पर उसे मार दिया गया! और किसी ने इस क्रूरता का विरोध नहीं किया! प्लेटो उच्च कुल का था! अतः उसे प्रताड़ित नहीं किया गया!स्वयं उनके अनुसार प्लेटो की फिलासफी वैसे भी संकीर्ण जातिवाद और ऊंच नीच से सनी हुई केवल उच्च वर्ग के लोगों के लिये है!
'धरती हमारी माता है', 'जल ही जीवन है', 'अग्नि प्रज्वलित करके यज्ञ करना', 'वायु की शुद्धि हेतु गुणकारी पेड-पौधों की पूजा करना' तथा 'आकाश को पिता का सम्मान देना' आदि को भारत के गाँव देहात के अनपढ़ व्यक्ति भी भलि भांति जानते पहचानते हैं!थैलिज का जल तत्व-धरती का गोल होना- ग्रहण की भविष्यवाणी, हेराक्लाईट्स का परिवर्तन,एनेक्सीमेंडर का असीमित तत्व,एनैक्सीमेनीज का वायु तत्व,पारमेनाईडिज का स्थायित्व, डेमोक्रिट्स का परमाणु, पाईथोगोरस द्वारा संख्या तत्व को मानना आदि बेबीलोनिया, मिस्र के माध्यम से पाया गया उथली और सतही आधी -अधूरी जानकारियों के आधार पर तैयार की गई फिलासफी है! इसमें किसी भी प्रकार की गहनता,प्रौढता,प्रतिभा और बुद्धिमत्ता नहीं दिखाई दी है!हजारों वर्ष पुरातन  भारत के समृद्ध दर्शनशास्त्र को छोडिये, हरियाणा राज्य के अनपढ़ लोककवियों बाजेभगत, लखमीचंद, मांगेराम,धनपत सिंह, खीमा, चतरु आदि की रागनियों में भी युनानी फिलासफर से सैकड़ों गुना समृद्ध दर्शनशास्त्र मिल जायेगा! ब्रह्म,आत्मा, प्रकृति, महत्, अहंकार, मन तथा इनसे भौतिक सृष्टि के निर्माण की जो बारीकियाँ हरियाणा के लोकसाहित्य में मिलती हैं, वो युनानी फिलासफी में नदारद हैं!बंधन,मोक्ष,कर्मफल,चार आश्रम,  वर्णव्यवस्था,योग साधना, राजधर्म आदि के जो गूढ विवरण अनपढ़ लोककवियों के सांगों और रागनियों में उपलब्ध हैं, वो युनानी फिलासफी में देखने को नहीं मिलेंगे! वैसे भी पाश्चात्य फिलासफी के बारे में कहा जाता है कि फिलासफी किसी अंधेरे कमरे में अंधे व्यक्ति द्वारा उस काली बिल्ली की तलाश करना है, जो वहाँ पर मौजूद ही नहीं है!

                     प्रसिद्ध भारतीय दर्शनशास्त्र के विद्वान चंद्रधर शर्मा दबी आवाज में स्वीकार करते हैं कि बीसवीं सदी के कुछ अन्वेषणों से, विशेषत: भूगर्भ की खुदाई में प्राप्त महत्वपूर्ण वस्तुओं से, यह सिद्ध हो गया है कि प्राचीन ग्रीस पर मिस्र और बेबीलोनिया का प्रभाव निस्संदेह पडा है! यह भी बहुत संभव है कि भारतीय विचारधारा भी, ईरान, मिस्र और बेबीलोनिया होती हुई, ग्रीस के उपनिवेशों में और वहां से ग्रीस में पहुंची हो!ग्रीस फिलासफी के सप्तर्षि की कल्पना भारतीय संस्कृति में वर्णित सातवें मन्वन्तर के आदरणीय सप्तर्षि वशिष्ठ,भारद्वाज,कश्यप, अत्रि,जमदग्नि, विश्वामित्र,गौतम आदि की नकल मात्र है!प्रथम युनानी फिलासफर थैलिज, एलेक्जेंडर,एनेक्जीमेनिज   आदि की गिनती भी सप्तर्षियों में की जाती है!दावा किया जाता है कि इनमें से एनेक्जीमेनिज की पुस्तक 'आन दी नेचर' के कुछ अंश मिलते हैं!बाकी सबके संबंध में हवा हवाई बातें प्रचलित हैं! इनको फिलासफी की श्रेणी में रखना भी मजाक ही कहा जा सकता है!

                एंपीडोक्लीज पर न्याय और वैशेषिक दर्शनशास्त्र का पूरा प्रभाव प्रतीत होता है, जब वो पृथ्वी, जल, अग्नि,वायु को स्वीकार करते हैं!न्यायसूत्र  और वैशेषिकसूत्र दर्शनशास्त्र के भारतीय लेखकों  गौतम और कणाद का काल युनानी एंमीडोक्लीज से लगभग 3000 वर्ष पहले  का है!लेकिन इसके बावजूद भी ये जडवादी के जडवादी ही बने रहे!सोफिस्ट फिलासफी पर आन्वीक्षिकी के दृष्टिगत चार्वाक और  कौटिल्य का प्रभाव दिखाई पडता है!हालांकि चार्वाक और कौटिल्य का समय सोफिस्ट से 1000 वर्ष पहले का है!सुकरात के फक्कड़ जीवन पर भारतीय संन्यासियों का प्रभाव था!कभी कभी सुकरात को अंतरात्मा की आवाज यानि अनाहत नाद भी सुनाई पड़ता था!निरे भौतिकवादी युनानी इन रहस्यवादी बातों को कैसे समझ पाते?सत्य बोलने के फलस्वरूप उनकी हत्या कर दी गई!सुकरात यदि भारत में पैदा होते तो अपनी साधना को पूरा करके ऋषि पदवी को प्राप्त करते!
               युनान ने अपने सबसे बडे ज्ञानी, सबसे बडे चरित्रवान तथा सर्वश्रेष्ठ निर्दोष महापुरुष को मौत के मुंह में सुला दिया! सुकरात की हत्या के बाद युनान, रोम आदि देशों में विचारक जरूर पैदा हुये, लेकिन सभी डरे -डरे जीवन यापन करने को विवश रहे! सुकरात, प्लेटो, अरस्तू के पश्चात् 1500 वर्षों तक किसी ने भी स्वतंत्र चिंतन करने की कोशिश नहीं की! युरोप में लगभग तेरहवीं चौदहवीं सदी में फिर से स्वतंत्र चिंतन की सुगबुगाहट हुई! लेकिन 200 वर्षों के दौरान अनेकों विचारकों को ईशनिंदा के दंडस्वरूप जिंदा जला दिया गया,फांसी दे दी गई या अन्य तरीकों से उनकी हत्या कर दी गई!
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आचार्य शीलक राम
दर्शनशास्त्र- विभाग
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय
कुरुक्षेत्र -136119

पांचवीं अखिल भारतीय हिंदी साहित्य पुरस्कार प्रतियोगिता हेतु रचनाएं आमंत्रित (Compositions invited for the fifth All India Hindi Literature Award competition)

                                              आचार्य अकादमी चुलियाणा, रोहतक (हरियाणा) (पंजीकृत)

                                        पांचवीं अखिल भारतीय हिंदी साहित्य पुरस्कार प्रतियोगिता हेतु रचनाएं आमंत्रित
भारती हिन्दी साहित्य, दर्शनशास्त्र, योग, अध्यात्म, स्वदेशी, राष्ट्रवाद, इतिहास व हरियाणवीं साहित्य को समर्पित व प्रमाण अन्तरराष्ट्रीय मुल्यांकित त्रैमासिक शोध पत्रिका (आईएसएसएन 2249-2976), चिन्तन अन्तरराष्ट्रीय मुल्यांकित त्रैमासिक शोध पत्रिका (आईएसएसएन 2229-7227), आर्य अन्तरराष्ट्रीय मुल्यांकित त्रैमासिक शोध पत्रिका (आईएसएसएन 2348-876X), द्रष्टा अन्तरराष्ट्रीय मुल्यांकित त्रैमासिक शोध पत्रिका (आईएसएसएन 2277-2480), हिन्दू अन्तरराष्ट्रीय मुल्यांकित त्रैमासिक शोध पत्रिका (आईएसएसएन 2348-0114) जैसी अन्य कई शोध पत्रिकाएं प्रकाशित करने वाली संस्था आचार्य अकादमी’, चुलियाणा रोहतक (हरियाणा), तथा योग को समर्पित संस्था वैदिक योगशाला कुरुक्षेत्र (हरियाणा) द्वारा राष्ट्रभाषा हिन्दी में लिखित अग्रलिखित विषयों/संकायों की मौलिक पुस्तकें विभिन्न वार्षिक पुरस्कारों हेतु आमन्त्रित की जाती हैं-
1. श्रीमती हेमलता हिन्दी साहित्य (गद्य, पद्यादि) पुरस्कार
2. स्वामी दयानन्द सरस्वती दर्शनशास्त्र पुरस्कार, स्वदेशी, राष्ट्रवाद, सनातन वैदिक धर्म व संस्कृति पुरस्कार
3. राजीव भाई दीक्षित भारतीय इतिहास, आयुर्वेद, स्वदेशी व राष्ट्रभक्ति पुरस्कार
4. पत्रकार किरण भूषण सम्मान
 नियम व शर्तें :
1.     पुरस्कार हेतु अपनी प्रकाशित पुस्तक की दो प्रतियां अवश्य भेजें।
2.     विभिन्न विषयों/ संकायों की पुरस्कार हेतु भेजी जाने वाली पुस्तकें राष्ट्रभाषा हिन्दी में ही लिखी हुई होनी चाहिए।
3.     पुरस्कार प्रदान करने हेतु ‘आचार्य अकादमी’ का निर्णय अन्तिम होगा।
4.     पुस्तकें आचार्य शीलक राम, आचार्य अकादमी, चुलियाणा, रोहज (रोहतक) हरियाणा-124501 के
       पते पर 30 नवंबर 2024 तक registered/speed post द्वारा पहुंच जानी चाहिए।
5.     पुरस्कृत रचनाओं के लेखकों को तीनों विधाओं में प्रथम पुरस्कार 2100/-, द्वितीय पुरस्कार 1500/-, तृतीय पुरस्कार 1100/- प्रमाण-पत्र व स्मृति चिन्ह प्रदान किए जाएंगे ।
6.     पत्रकार किरण भूषण सम्मान अल्पसंख्यक वर्ग के किसी एक निर्भिक पत्रकार को दिया जाएगा, जिसके अंतर्गत पुरस्कार स्वरुप 5100/-, स्मृति चिन्ह, प्रमाण-पत्र व अंगवस्त्र प्रदान किए जाएंगे।  पत्रकारों को अपना टाईप किया हुआ पूरा जीवन परिचय उपरोक्त पते पर भेजना होगा।
7.     अस्वीकृत रचनाएं वापिस नहीं भेजी जाएंगी।
8.     लेखकों द्वारा लिखित व किसी भी राष्ट्रीय प्रकाशक से प्रकाशित (ISBN सहित) पुस्तकें विवरणात्मक न होकर मौलिक, तार्किक, आलोचनात्मक, समीक्षात्मक व राष्ट्रवादी भावनाओं से ओतप्रोत होनी चाहिए।
9.     पुस्तकें वर्ष 2021 से 2023 के बीच प्रकाशित होनी चाहिए।
10.     किसी भी तरह के शंका समाधान हेतु आचार्य शीलक राम, आचार्य अकादमी चुलियाणा रोहज,
       (रोहतक) हरियाणा-124501, मोबाईल 9813013065 पर संपर्क करें या e mail i d shilakram9@gmail.com पर संपर्क करें। तथा वाट्सअप ग्रुप :    https://chat.whatsapp.com/F2Ead3OwBoYBGWHkxenxQw
11.    प्रतियोगिता निशूल्क है।
                     विनीत :
        आचार्य शीलक राम
        अध्यक्ष, आचार्य अकादमी
        चुलियाणा, रोहतक (हरियाणा)

नवरात्रि पर्व का आध्यात्मिक महत्व (Spiritual importance of Navratri festival)

विज्ञान जगत् के लोग  प्रकृति के विभिन्न रहस्यों को उजागर करके विभिन्न प्रकार की तकनीक का विकास करके मानव जीवन के भौतिक पक्ष को सुख -सुविधाओं से संपन्न करते हैं! वहीं पर आध्यात्मिक जगत् के लोग विभिन्न कर्मकांडों के माध्यम से जहाँ पर भौतिक जीवन को जीओ और जीने दो के लायक बनाते हैं वहीं पर व्यष्टि और समष्टि ब्रह्माण्ड में व्यापक चेतना पर कार्य करके जड़ -चेतन जगत् को सहज, सरल, सौहार्दपूर्ण, करुणामय बनाकर जहाँ भौतिक जीवन को सुख सुविधापूर्ण बनाते हैं वहीं पर प्राणिक, वैचारिक, भावनात्मक, आत्मिक तलों का साक्षात्कार करते हुये इहलौकिक और पारलौकिक जीवन को समृद्ध बनाने का काम करते हैं!सनातन धर्म में वर्ष भर में ऐसे पर्वों की भरमार है जो हमें प्रकृति, प्रकृति से बने संसार तथा चेतना के मध्य संतुलन साधने की व्यावहारिक प्रायोगिक सीख देते हैं! स्वार्थी पंडितों, पुरोहितों ने इस अखिल ब्रह्मण्डीय व्यवस्था को विकृत कर दिया है, यह एक अलग चिंतनीय विषय है! सनातन धर्मियों द्वारा मनाया जाने वाला नवरात्रि पर्व एक ऐसा ही पर्व है! यह पर्व किसी एक मजहब का न होकर सृष्टि के समस्त प्राणियों के हितार्थ है!प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर जीवन जीने को कौनसे मजहब के लोग मना कर सकते हैं? प्रकृति के संग -संग संतुलन बनाकर जीवन जीते हुये  मानव प्राणी सहित समस्त प्राणियों के जीवन को निरोगता और स्वास्थ्य को प्राप्त होने से किस संप्रदाय के लोगों को आपत्ति हो सकती है? और यदि किसी मजहब को इस पर आपत्ति है तो वह चौरासी लाख योनियों के जीवन को बर्बाद करने का अपराधी है!
मानव प्राणी में मन, बुद्धि, चित्त का विकास सर्वाधिक है! इसका प्रयोग करके मानव प्राणी भौतिक जगत् के साथ आध्यात्मिक जगत् के रहस्यों को उजागर करके इस संसार को खुशहाल, समृद्ध, संतुलित और अनुशासित बना सकते हैं!सनातन धर्म के सभी पर्व इसी भावना से ओतप्रोत हैं!
लेकिन इस संसार की यह विडम्बना रही है कि यहाँ जो भी अच्छा या क्रांतिकारी या सृजनात्मक होता है, उस पर धूर्त व्यापारी अपराधी किस्म के लोग कब्जा कर लेते हैं! विज्ञान की चमत्कारी खोजों पर पिछले 200 वर्षों से स्वार्थी पूंजीपतियों,बहुराष्ट्रीय कंपनियों,उद्योगपतियों का कब्जा रहा है! नया नया उदाहरण योग और आयुर्वेद का हमारे सामने है! शरीर की निरोगता और चेतना के रुपांतरण का इनसे कोई नाता नहीं रह गया है! इसीलिये लोगों के जीवन में  आरोग्यता,धैर्य, शांति, सौहार्द, करुणा का कोई चिन्ह देखने को नहीं मिल रहा है! आज आयुर्वेद और योगाभ्यास करने और करवाने वालों की भीड मौजूद है लेकिन दृष्टिकोण स्वार्थी होने से न तो योगाचार्य साधना से संपन्न हैउ तथा न ही योगाभ्यास करने वालों के व्यवहार में कोई बदलाव देखने को मिलता है!
ऋतु परिवर्तन से केवल ऋतु में ही परिवर्तन नहीं होता है, अपितु इससे मानव सहित संपूर्ण प्राणियों की देह में परिवर्तन होता है! ऋतु में परिवर्तन से मानव शरीर में एकत्र विभिन्न प्रकार के विकार, मल और अशुद्धियों का शोधन होने की गति तीव्र हो जाती है! इसके दृष्टिगत हमें शरीर का सहयोग करना चाहिये! यदि सहयोग करेंगे तो शरीर शोधन का काम भलि तरह से हो पायेगा! यदि सहयोग नहीं किया तो शरीर में मल, विकार एकत्र होकर इसी दौरान मलेरिया, चिकनगुनिया, डेंगू, टाईफाईड, खुजली, एलर्जी,खांसी, जुकाम, नजला, अस्थमा,कब्ज,मंदाग्नि, सिरदर्द, आलस्य आदि बिमारियों का प्रकोप हो जाना स्वाभाविक है
सनातन धर्म के अनुसार जो अंड में है, वह ब्रह्मांड में है!सृष्टि का हरे एक कण समस्त ब्रह्माण्ड का प्रतिरुप है! एक एक व्यक्ति का शरीर भी पूरे ब्रह्माण्ड का प्रतिरुप है!ब्रह्माण्ड में किसी भी परिवर्तन से एक एक व्यक्ति के शरीर पर प्रभाव पडता है! समस्त ब्रह्माण्ड कणों और तरंगों का एक खेल है! यहाँ सब कुछ परस्पर जुड़ा हुआ है! कोई किसी से अलग नहीं है! यहाँ पर एक घास का तिनका भी उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना महत्वपूर्ण हिमालय पर्वत है! सनातन धर्म का हरेक कर्मकांड, पर्व, त्यौहार, उत्सव इसी भावना से प्रेरित है! इसे यज्ञ कहा जाता है! इस यज्ञ की महिमा वेद ने अनेक ऋचाओं में बतलाई है! जब किसी व्यक्ति के शरीर में किसी व्याधि या आरोग्यता आती है तो उसकी प्रतिध्वनि समस्त ब्रह्माण्ड तक पहुंचती है! यदि ब्रह्माण्ड में कोई उथल पुथल होती है, तो उससे धरती का हरेक प्राणी प्रभावित होता है! सनातन धर्म का हरेक पर्व व्यक्ति का समस्त ब्रह्माण्ड से सामंजस्य साधने की साधना है! व्यष्टि और समष्टि के मध्य संतुलन साधना ही सनातन धर्म है! इस संतुलन से लौकिक सुखों में वृद्धि तथा पारलौकिक आनंद की अनुभूति होती है! मानव जीवन का यही लक्ष्य है! इस रहस्य को समझना अति आवश्यक है!
लेकिन सनातन धर्मी लोग अपने पर्वों, त्यौहारों, उत्सवों की पीछे निहित कारण -कार्य की वैज्ञानिकता को भूलाकर या तो कोरे कर्मकांड में उलझे हुये हैं या फिर पाश्चात्य उन्मुक्त भोगवादी उपयोगितावाद में डूबे हुये हैं! इसमें सर्वाधिक गलती हमारे धर्माचार्यों, गुरुओं, योगियों, संतों, स्वामियों, संन्यासियों और नेताओं की है! अपने तुच्छ स्वार्थों की पूर्ति के लिये इन्होंने अपने सनातनी कर्तव्यों को पूरी तरह से भूला दिया है! सनातन धर्म के पर्वों का थोथे कर्मकांड में उलझ जाने तथा पंडित पुरोहितों की आजीविका और नेताओं का वोट बैंक बन जाने के कारण सनातन धर्मी लोग अपने सनातनी जीवन मूल्यों से दूर होकर पाश्चात्य रंग में रंगे जा रहे हैं!
मानव के शरीर की आरोग्यता के लिये आयुर्वेद की दिनचर्या तथा आत्मा के लिये वेद ,उपनिषद् ,योगसूत्र आदि में निहित योगाभ्यास की उपादेयता अति आवश्यक है! व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक, शारीरिक, प्राणिक, मानसिक, वैचारिक, बौद्धिक, भावनात्मक संतुलन साधकर समस्त ब्रह्माण्ड और अस्तित्व से संतुलन साधना सनातन धर्म और संस्कृति का सनातन उपदेश है! इसके लिये यह आवश्यक है कि नवरात्रि पर्व के विविध कर्मकांडों के पीछे निहित आध्यात्मिक रहस्यों को भलि तरह से समझ लिया जाये!
केवल कर्मकांडों को संपन्न करना ही काफी नहीं है! अपितु इन कर्मकांडों और  प्रतीकों के पीछे मौजूद रहस्य को जानकर अपने नित्यप्रति के जीवन में इनको स्थान दिया जाये! अपने चरित्र, आचरण, व्यक्तित्व और दिनचर्या में कर्मकांडों के पीछे निहित शिक्षाओं को उतारना आवश्यक है! केवल कथनी से काम नहीं चलेगा! हमें इनके अनुकूल अपने आचरण को भी ढालना होगा! शरीर तो आत्मा का बाहरी खौल है!आत्मा परमात्मा की प्राप्ति के लिये प्यासी है! ये विभिन्न कर्मकांड धर्म का बाहरी आवरण मात्र हैं!धर्म की आत्मा तो आचरण है! आचरण में उतारे बिना कोरे कर्मकांड केवल जनमानस के शोषण और पाखंड का कारण बन जाते हैं!
'नवरात्रि पर्व' शारीरिक आरोग्यता और आत्म साक्षात्कार के लिये सुनहरा अवसर है!ऋतु परिवर्तन के समय शरीर के शोधन के लिये सात्विक आहार के साथ उपवास करना अति लाभकारी है! लेकिन असमय ठूंस-ठूंसकर फल,सब्जी,कुट्टू, सिंघाड़े, सामकिया,अलसी के लड्डू,बिस्किट,दूध, खीर, हलुआ, पूरी, मालपुवे आदि  खाते रहना उपवास नहीं होता है!कर्मकांड की आड में आम,जामुन, नीम, पीपल, वट, तुलसी के वृक्षों को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहिये!कभी कोई पेड नहीं लगाना तथा पेड़ों को काटते रहने से प्राकृतिक संतुलन बिगडता है! कर्मकांड की आड में अपने व्यक्तिगत लाभ के लिये आम, पीपल आदि पेड़ों को नुकसान पहुंचाना सनातन धर्म की मर्यादा के अनुकूल नहीं है! कर्मकांड भौतिक जीवन को सुंदरता प्रदान करते हैं लेकिन जहाँ पर ये पाखंड और ढोंग का कारण बन जायें तो इनको छोड देना ही ठीक रहता है!
ऋतु परिवर्तन के काल में जहाँ पर शरीर शोधन का का अवसर मिलता है, वहीं पर चेतना में रुपांतरण का भी अभूतपूर्व अवसर होता है!यदि कोई व्यक्ति उत्सुक हो, जिज्ञासु हो, मुमुक्षु हो, तो नवरात्रि पर्व की पावन वेला का लाभ उठाया जा सकता है! 'उपवास' का अर्थ भी यही है अर्थात् उप और वास! यानि स्वयं के समीप वास करना! यानि खुद के समीप होना! स्वयं के समीप होना भी एक साधना है!इसमें आहार और विहार दोनों की शुद्धि और संतुलन आवश्यक हैं!उपवास में हल्के भोजन या बिलकुल निराहार रहने से भोजन के प्रति लालसा बढती है! यदि संकल्प को दृढ रखकर साधना की जाये तो उपवास के काल में अपनी एकाग्रता और सजगता के तीर को बाहर से भीतर की तरफ मोड़ा जा सकता है!लेकिन जिन भी नर और नारियों, विशेषकर युवक और युवतियों द्वारा आज इस नवरात्रि पर्व को उपहास का विषय बना दिया गया है, वह सनातन धर्म के लिये खतरे की घंटी है! इस नवरात्रि पर्व से न तो हमारे सनातन धर्म और संस्कृति की रक्षा हो रही है, न लोगों के शरीरों का शोधन हो रहा है तथा न ही आध्यात्मिक रुप से कोई लाभ हो रहा है! इसके प्रति जागरुकता को फैलाया जाना अति आवश्यक है! इस नवरात्रि पर्व की आड में फैलते हुये उन्मुक्त भोगवाद, पाश्चात्यवाद, उपयोगितावाद, पाखंड, ढोंग आदि पर रोक लगना चाहिये!
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