Monday, July 6, 2026

धर्म नियम सर्व सृष्टि

 धर्म नियम सर्व सृष्टि 
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यहां क्या नहीं धंधा
हर  कोई बना अंधा।
सब धंधा कर रहे हैं 
भ्रष्टाचरण  दे कंधा।।

 बड़ा धंधा काव्य है 
अनर्गल संभाव्य है।
बेचने  को   उत्सुक 
हवा हवाई वायव्य है।।

यहां बिक रही शिक्षा 
धंधा हो चुकी परीक्षा।
शोध सरेआम बिकता 
लुप्तप्राय है अन्वीक्षा।।

धंधा थिसिस लिखना 
बिना  किसी परखना।
उच्च-शिक्षित बिक रहे
कहीं  भी  नहीं है मना।।

प्यार प्रेम भी बिक रहे
बस धोखेबाज टिक रहे।
लिव-इन रिलेशनशिप 
समलिंगी भी ठीक रहे।।

यहां क्या नहीं बिकाऊ
कोई संबंध नहीं टिकाऊ।
दोस्ती बिकती हर कदम
अधिकांश बने हुये खाऊ।।


हर कोने में दुकान है
बिक रहा श्मशान है।
कफ़न भी बना धंधा 
सम्मान भी सामान है।।

राजनीति धंधा बनी 
सबसे बड़े यही धनी।
सरेआम खरीदारी हो
खरीद लो देकर मनी।।

बिक रहे न्यायाधीश 
न्याय मिले बख्शीश।
बोली लगती सरेआम 
धन दौलत परवरिश।।

यौवन बिकता बाजार 
पूरी मददगार सरकार।
जो चाहो वही मिलेगा 
काला गौरा हर प्रकार।।

रिश्ते-नाते भी धंधा बने
रहें नजदीकी जले-भुने।
कौन नहीं बिका लालच 
अहंकार भरे हुये अपने।।

धंधा बनी योग-साधना 
भगवान् बन आराधना।
लेकिन 'योग' नहीं धंधा 
विवेक होश जब जागना।।

गुण-दोष  न्याय  करना 
तर्क प्रमाण पथ गुजरना।
सबको एक लाठी हांककर 
मतना पाप का घट भरना।।

 धर्म कभी धंधा न होता 
सार्वभौमिक ऋत गोता।
धर्म की आड़ ले मजहब 
पंथ, रिलीजन को ढोता।।

धर्म नियम सर्व -सृष्टि 
न्यायपूर्णता की दृष्टि।
वाद,मत की कट्टरता 
धंधा बांध निज मुष्टि।।
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डॉ. शीलक राम आचार्य 
वैदिक योगशाला

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