धर्म नियम सर्व सृष्टि
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यहां क्या नहीं धंधा
हर कोई बना अंधा।
सब धंधा कर रहे हैं
भ्रष्टाचरण दे कंधा।।
बड़ा धंधा काव्य है
अनर्गल संभाव्य है।
बेचने को उत्सुक
हवा हवाई वायव्य है।।
यहां बिक रही शिक्षा
धंधा हो चुकी परीक्षा।
शोध सरेआम बिकता
लुप्तप्राय है अन्वीक्षा।।
धंधा थिसिस लिखना
बिना किसी परखना।
उच्च-शिक्षित बिक रहे
कहीं भी नहीं है मना।।
प्यार प्रेम भी बिक रहे
बस धोखेबाज टिक रहे।
लिव-इन रिलेशनशिप
समलिंगी भी ठीक रहे।।
यहां क्या नहीं बिकाऊ
कोई संबंध नहीं टिकाऊ।
दोस्ती बिकती हर कदम
अधिकांश बने हुये खाऊ।।
हर कोने में दुकान है
बिक रहा श्मशान है।
कफ़न भी बना धंधा
सम्मान भी सामान है।।
राजनीति धंधा बनी
सबसे बड़े यही धनी।
सरेआम खरीदारी हो
खरीद लो देकर मनी।।
बिक रहे न्यायाधीश
न्याय मिले बख्शीश।
बोली लगती सरेआम
धन दौलत परवरिश।।
यौवन बिकता बाजार
पूरी मददगार सरकार।
जो चाहो वही मिलेगा
काला गौरा हर प्रकार।।
रिश्ते-नाते भी धंधा बने
रहें नजदीकी जले-भुने।
कौन नहीं बिका लालच
अहंकार भरे हुये अपने।।
धंधा बनी योग-साधना
भगवान् बन आराधना।
लेकिन 'योग' नहीं धंधा
विवेक होश जब जागना।।
गुण-दोष न्याय करना
तर्क प्रमाण पथ गुजरना।
सबको एक लाठी हांककर
मतना पाप का घट भरना।।
धर्म कभी धंधा न होता
सार्वभौमिक ऋत गोता।
धर्म की आड़ ले मजहब
पंथ, रिलीजन को ढोता।।
धर्म नियम सर्व -सृष्टि
न्यायपूर्णता की दृष्टि।
वाद,मत की कट्टरता
धंधा बांध निज मुष्टि।।
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डॉ. शीलक राम आचार्य
वैदिक योगशाला
आर्यावर्त चिंतन भारतीय दर्शन, सांस्कृतिक विमर्श और राष्ट्रचेतना पर केंद्रित एक वैचारिक एवं शोधपरक डिजिटल मंच है। यह मंच आचार्य शीलक राम जी के वैदिक-दार्शनिक चिंतन, सांस्कृतिक विश्लेषण और समकालीन सामाजिक-राजनीतिक प्रश्नों पर आधारित दृष्टिकोण को सुव्यवस्थित रूप में प्रस्तुत करता है। यहाँ प्रस्तुत सामग्री में — * भारतीय दार्शनिक परंपराओं का विश्लेषणात्मक अध्ययन * आधुनिक शिक्षा और नैतिक विमर्श का आलोचनात्मक परीक्षण * राष्ट्र और समाज से संबंधित जटिल प्रश्नों का तर्कसंगत विवेचन * परंपरा और आधुनिकता
Monday, July 6, 2026
धर्म नियम सर्व सृष्टि
तर्क, विचार, चिंतन पर हावी होते हुये अंधविश्वास और अंधभक्ति (Superstition and blind devotion overpowering logic, thought and thinking.)
1).सबको प्रथम स्थान प्राप्त आने या होने की पागल सनक सवार है। मजहब, संप्रदाय,मत, रिलीजन, राजनीति, व्यापार, शिक्षा, परीक्षा, प्रतियोगिता परीक्षा आदि सभी में प्रथम आने की होड़ लगी हुई है। कैसे भी करके प्रथम स्थान प्राप्त करना है।साम, दाम,दण्ड,भेद आदि कुछ भी करके प्रथम स्थान पर खड़ा होना है।इस प्रथम आने के पागलपन में बेशक चाहे जीवन की शांति, संतुष्टि, तृप्ति और सुख गायब हो जायें। प्रथम स्थान पर कुछ ही गिने चुने व्यक्ति हो सकते हैं। सभी तो प्रथम स्थान पर नहीं आ सकते। यदि सभी को प्रथम स्थान पर घोषित कर दिया जाये तो प्रथम होने का मजा ही किरकिरा हो जायेगा। किसी क्षेत्र में प्रथम स्थान पर खड़े होने का कोई मजा नहीं है,मजा है दूसरों का आपसे नीचे होना। किसी को इस नीचे होने या नीचे करने में ही सारा रहस्य छिपा हुआ है। यदि आपके सभी प्रतियोगी आपके साथ ही खडे हो जायें तो आपका मजा लुप्त ओ जायेगा। किसी को नीचे धकेलने, नीचे करने, नीचे की ओर टांग खींचने में ही सारा मजा निहित है। प्रथम आने का मजा प्रथम आने में नहीं अपितु किन्हीं हजारों लोगों को आपसे नीच कर देना है।हरेक क्षेत्र में यही चल रहा है। दक्षिण भारत की एक पत्रिका 'बसव मार्ग ' पढ़ रहा था। उसमें एक आलेख का शीर्षक है 'विश्व के प्रथम स्वतंत्र चिंतक बसवण्णा '। मुझे इस शीर्षक को पढ़कर लेखक की सोच पर करुणा आई कि किस किस तरह से अनुयायियों का माईंड वाश किया जा चुका है।इनको भारत के पूरे इतिहास में कोई स्वतंत्र चिंतक ही नहीं मिला और अपने आराध्य बसवण्णा को ही प्रथम स्वतंत्र चिंतक घोषित कर दिया।
2). इनके सिवाय सभी अज्ञानी,भटके हुये, पथभ्रष्ट और पशु समान हैं। इनसे पहले के सभी संत, मुनि,गुरु, संन्यासी, स्वामी और मार्गदर्शक संकीर्ण विचारधारा के थे, पूर्वाग्रहग्रस्त थे और एकपक्षीय थे।बस पहली बार इनके गुरु ही धरती पर स्वतंत्र चिंतक हुये हैं।हर मत,वाद,पंथ, संप्रदाय, मजहब, संगठन, राजनीतिक दल और विश्वास का व्यक्ति इसी तरह से सोच रहा है। स्वयं वह और उसके गुरु, नेता , आराध्य ही सब कुछ हैं; बाकी सभी नर्क के कीड़े मकोड़े हैं। भारत और भारत से बाहर मौजूद धार्मिक संप्रदायों में यही प्रतियोगिता लगी हुई है। उनके गुरु ही सबसे बडे पहुंचे हुये सिद्ध हैं, बाकी सभी के गुरु भटके हुये, अज्ञानी और बेहोश हैं।बात यही नहीं रुक जाती है, अपितु इससे आगे बढ़कर वो यह भी कहने लगते हैं कि जो किसी अन्य को गुरु बनायेगा,वह पाप का हिस्सेदार बनेगा।उसको हम जबरदस्ती करके अपने गुरु के सानिध्य में लेकर आयेंगे ताकि उसे भी मुक्ति मिल सके।इस कार्य के लिये अमीर घरानों और सत्ताधारी नेताओं से संपर्क साधकर उनसे करोड़ों अरबों रुपए का अनुदान, जमीन लिये जाते हैं, टैक्स माफ करवाये जाते हैं तथा गैरकानूनी धंधा करने की छूट मांगी जाती है। नेताओं को वोट चाहियें और गुरुओं को गैरकानूनी कुकृत्य करने पर कानूनी कार्रवाई करने से छूट चाहिये। रुपया इन्वेस्ट करने के लिये अमीर लोग आ जाते हैं। धुंआधार दुष्प्रचार करने के लिये बिकाऊ प्रैस आ जाती है। नेताओं की कुर्सी बची रहती है,अमीर घरानों और गुरुओं के गैर-कानूनी धंधे चलते रहते हैं।पिसता है जनमानस।मरता -पिटता है मेहनतकश वर्ग।पतन के गड्ढों में गिरती है जनता जनार्दन। चारों तरफ यही तो चल रहा है। 3.)अद्वैतवादी,द्वैतवादी,त्रैतवादी,
बहुत्ववादी, हिंदू ,पारसी, यहुदी, ईसाई, इस्लाम,जैन,बौद्ध,सिख,शैव, वैष्णव,सौर,शाक्त,कबीरपंथी, दादूपंथी,नित्यानंदपंथी,मीरापंथी,रविदासपंथी, राधास्वामी,इस्कान,ब्रह्माकुमारीज,
योगानंदपंथी,साईंपंथी,गुरमीतपंथी, रामपाली, धीरेंद्र शास्त्री आदि तथा इनके लाखों लाखों अनुयायी खुद के गुरु को सही और बाकी सबको गलत मानते हैं।जिसको हमने गुरु माना है,वही सही है तथा बाकी अन्यों के गुरु पथभ्रष्ट हैं।यह सोच सर्वत्र कायम है।नेताओं के अंधभक्तों का भी यही हाल है। उनके नेता सही हैं तथा बाकी जनता के नेता भ्रष्ट हैं।केवल उनके नेता राष्ट्रभक्त हैं तथा अन्यों के नेता भ्रष्ट, राष्ट्रविरोधी और नाकारा हैं।
4.)और आजकल तो आर्यसमाजी भी इस अंधभक्ति का शिकार हो चुके हैं।वो केवल खंडन में ही अपना प्रचार तलाश कर रहे हैं।वो कहीं भी समझौते के मूढ में नहीं दिखते हैं। हालांकि वो खुद महर्षि दयानंद सरस्वती की शिक्षाओं से बहुत दूर जा चुके हैं। इनके अनुसार महर्षि दयानंद सरस्वती ठीक हैं और बाकी सब गलत हैं। महर्षि दयानंद सरस्वती ने यह शैली कभी नहीं अपनाई थे।वो सर्वप्रथम खुद के आचरण सुधार पर जोर देते थे। उसके बाद में दूसरों के आचरण सुधार की बात करना उनके लिये सम्मत था। लेकिन आजकल तो गौमांसभक्षी, भ्रष्ट, निकम्मे और पदाकांक्षी ही सबसे अधिक समाज सुधार और प्रचार का शोर मचाते हैं। पिछले 200 वर्षो के दौरान सबसे क्रांतिकारी और राष्ट्रभक्त संगठन आज पतन के गर्त में जा चुका है। लेकिन अंधभक्त तो अंधभक्त होते हैं।वो किसी की भी नहीं सुनते हैं। उन्हें तो महाभ्रष्ट होकर भी समाज को आदर्शवादी बनाना है। आधुनिक युग में गौमाता को बचाने के लिये सर्वप्रथम प्रयास महर्षि दयानंद सरस्वती ने गौकरुणानिधि पुस्तक लिखकर,गोकृष्यादिरक्षिणी सभा बनाकर तथा उस समय की महारानी विक्टोरिया को लाखों गौभक्तों के गौहत्या रोकने के समर्थन में हस्ताक्षर करवाकर उनके पास भेजने के रुप किये थे।आज जब मुस्लिम वर्ग भी गौमाता को राष्ट्रीय पशु तथा शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद द्वारा गौमाता घोषित करने की आवाजें उठ रही हैं, ऐसे समय में एक राष्ट्रभक्त संगठन का चुप्पी साधकर बैठ जाना उनके महापतन की ओर संकेत करता है।
5.)ध्यान रहे कि जब कोई व्यक्ति यह कहता फिरता है कि मेरा गुरु,मेरा नेता,मेरा मजहब और मेरा संगठन ठीक है और बाकी सभी भटके हुये हैं तो सावधान हो जाना। ऐसे अंधभक्त लोग अप्रत्यक्ष रूप से यह घोषणा कर रहे होते हैं कि जिस गुरु, नेता, मजहब, संप्रदाय, संगठन को हमने स्वीकार किया हुआ है,वो सभी हमारे कारण सही,बड़े, महान या सर्वश्रेष्ठ हैं।वो खुद अपनी महानता की घोषणा कर रहे हैं।उनका अहंकार बोल रहा है। बड़प्पन की यह घोषणा उनके स्वयं के बड़प्पन की घोषणा है।कल को वो गुरु, नेता, राजनीतिक दल, संप्रदाय, मजहब आदि को बदल लेंगे तो फिर बाद वाले गुरु, नेता, राजनीतिक दल, संप्रदाय, मजहब आदि सही हो जायेंगे। यानी कहने का आशय यह है कि उनके कहीं पर होने या नहीं होने से कोई महान या भ्रष्ट बनता है। अंधभक्तों का मनोविज्ञान में विचित्र है। सच तो यह है कि अंधभक्तों से अधिक गिरा हुआ,पतित, निकृष्ट, घटिया,दोगला, भयभीत और स्वार्थी प्राणी अन्य कोई नहीं हो सकता।
6.) जब न्याय की सर्वोच्च संस्था ही यह कह रही है कि विवाह पूर्व शारीरिक संबंध अपराध नहीं है,तो फिर लड़कियों के साथ छेड़छाड़ और बलात्कार की घटनाएं तो बढ़ेंगी ही। पहले आग लगाओ और फिर उस पर पानी डालकर आग को बुझाने का ढोंग करो- यह कौनसी बुद्धिमत्ता है? पहले सड़कों पर कीचड फैलाओ और फिर क्रेन से वहां पर फंसी गाडियां निकालकर सेवा का ढोंग करो- यह कौनसी नैतिकता है? युवाओं के चरित्र को जानबूझकर भ्रष्ट करने के षड्यंत्र रचे जा रहे हैं। पहले मर्जी से शारीरिक संबंध बनाओ और फिर जाकर न्यायालय में खड़े हो जाओ कि इस युवा ने मेरे साथ जबरदस्ती से शारीरिक संबंध बनाये हैं। ऐसे पथभ्रष्ट युवाओं से गर्भनिरोधक और सैक्स पावर बढ़ाने की दवाईयां बेचकर एक तरफ डाक्टर रुपया बना रहे हैं और दूसरी तरफ वकीलों की फोज उनके मुकदमे लड़कर रुपया कमा रही है।देश का युवा बर्बाद हो रहा है।जिस आयु में युवाओं की पूरी ऊर्जा अपनी शिक्षा,परीक्षा और कैरियर बनाने में लगनी चाहिये थी,उस आयु में युवा वर्ग व्यर्थ के पचड़ों में फंसा हुआ है।यह जहां हमारे धर्माचार्यों की विफलता है, वही पर न्याय व्यवस्था की पोलखोल है। युवा वर्ग पढ़ लिखकर रोजगार न मांगे, इसलिये उसको विवाह पूर्व शारीरिक संबंध बनाने के लिये प्रेरित किया जा रहा है।
7.)जब विवाह पूर्व सहमति से शारीरिक संबंध बनाना अपराध नहीं है तो भारतीय ज्ञान परंपरा के पाठ्यक्रम में भी यह विषय जोड़ दो, ताकि युवा वर्ग जमकर शारीरिक संबंध बना सके।एक तरफ शिक्षा संस्थानों में नैतिकता की शिक्षा देने का नाटक करने और दूसरी तरफ युवाओं की कामवासना की पूर्ति के लिये सरल रास्ते उपलब्ध करवाने में कोई भी सामंजस्य और समझदारी नहीं है। आखिर हमारी न्याय व्यवस्था को हो क्या गया है?वह भारत को युरोप बनाने पर क्यों तुली हुई है। यदि युरोप ही बनाना है तो आर्थिक रूप से युरोप की बराबरी करो। यदि युरोप की बराबरी करना है तो भारत की 150 करोड़ आबादी को युरोप वाली मूलभूत आवश्यक सुविधाएं प्रदान करके दिखलाओ। न्यायधीश इस संबंध में कुछ क्रांति करके दिखलाओ। वायदाखिलाफी करने वाले लूटेरे नेताओं को न्यायालय में बुलाकर उन्हें आदेश दो कि इतने दिन में भारतीय जनमानस को मूलभूत सुविधाएं प्रदान करनी ही होंगी। लेकिन नहीं,वो ऐसा नहीं करेंगे।वो तो भारतीय जनमानस को शादा जीवन और उच्च विचार के उपदेश पिलाकर अय्याशी करने के लिये युरोप में छुट्टियां मनाने चले जायेंगे।
8.) भारत में इतने महात्मा,ज्ञानी,गीता- मर्मज्ञ, योगाचार्य,संत,मुनि,कथाकार, सुधारक,संन्यासी दिन- रात उपदेश करने में लगे हुये हैं।जगह- जगह सत्संग चल रहे हैं। जगह -जगह कथाएं हो रही हैं।योग -शिविर भी खूब चल रहे हैं। चरित्र -निर्माण शिविरों की तो बाढ सी आई रहती है।नाम, दीक्षा,शक्तिपात, कुंडलिनी जागरण आदि के अनुष्ठान बहुतायत से होते रहते हैं। आचार्य रजनीश के आने के पश्चात् तो लगभग सभी धर्माचार्यों ने उनकी नकल करते हुये अपने- अपने ध्यान-योग शिविर लगाने शुरू कर रखे हैं। अमरनाथ, बद्रीनाथ, केदारनाथ, हरिद्वार, ऋषिकेश,बालाजी मेहंदीपुर, तिरुपति बालाजी, कुरुक्षेत्र, अमृतसर,उज्जैन,प्रयाग,अजमेर, मक्का -मदीना, वेटिकन आदि की
तीर्थयात्राओं पर लोगों की भीड़ बढ़ती ही जा रही है। लेकिन दूसरी तरफ हिंसा, मारामारी, बदले की भावना, चोरी, भ्रष्टाचार, बलात्कार, छेड़छाड़,महंगाई, लड़ाई -झगडे और युद्धों की बाढ़ आई रहती है। स्वार्थ,लालच, अहंकार,काम,क्रोध, लोभ और बेहोशी में जनमानस आकंठ डूबे हुये हैं।यह सब क्यों हो रहा है?जब चहुंओर अच्छी शिक्षाएं मिल रही हैं तो यह अनाचरण और दोगलापन क्यों? सही बात तो यह है कि अधिकांश उपरोक्त तथाकथित महापुरुष कहे जाने वालों का स्वयं का आचरण, चरित्र, व्यक्तित्व और दिनचर्या ही ठीक नहीं है। जो खुद ही भ्रष्ट,पतित -चरित्र,चोर, बलात्कारी और पापी होगा,उसका किसी अन्य पर सृजनात्मक प्रभाव पड़ ही नहीं सकता है। इसके सिवाय अधिकांश भक्त लोग अपने गुरुओं, भगवानों, अवतारों, नेताओं, तीर्थस्थलों पर जाते ही अपने पापों और कुकर्मों को माफ करवाने के लिये या फिर कोई नयी डिमांड पूरा करवाने के लिये जाते हैं। इनमें भक्तिभाव रत्तीभर भी नहीं होता है। इनके गुरुओं, कथाकारों,भगवानों, सुधारकों और नेताओं ने इनको पट्टी पढा रखी है कि केवल हमारे सत्संग,कथा, शिविर, रैली आदि में सम्मिलित होने से तुम्हारा कल्याण हो जायेगा। वैसे भी कलयुग चल रहा है। कलयुग में योग, ध्यान,ज्ञान आदि प्रभावी न होकर केवल कैसी भी झूठी मूठी भक्ति ही कल्याणकारी सिद्ध होती है। इसके सिवाय किसी को कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं है।
9.)औपनिवेशिक सोच के लोगों ने जानबूझकर महर्षि मनु को बदनाम करने का अभियान चलाया हुआ है। उनके श्लोकों का गलत अर्थ किया जाता है, संदर्भ से हटकर अर्थ किया जाता है,केवल नकारात्मक श्लोकों को उद्धृत किया जाता है
तथा मिलावटी श्लोकों को आधार बनाकर अनाप-शनाप बाते की जाती हैं। औपनिवेशिक विचारक और लेखक विधायक मानसिकता के साथ काम न करके पूर्वाग्रह से काम करते आये हैं।नारी अस्मिता के रक्षार्थ मनु के इस श्लोक का गलत अर्थ लगाया जाता रहा है। देखिये -
पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने।
रक्षण्ति स्थविरे पुत्रा न स्त्री
स्वातंत्र्यमर्हति।।
नारी के लिये कुमारी अवस्था में उसका पिता,यौवनावस्था में उसका पति, वृद्धावस्था में उसका पुत्र उसके लिये रक्षा-कवच बनता है।नारी को कभी भी बिना किसी संरक्षण के स्वतंत्र और उन्मुक्त नहीं छोड़ना चाहिये। इसमें नारी की कमजोरी या उसकी गुलामी का भाव न होकर पुरुष से उसकी सुरक्षा करने का भाव निहित है। एकांत में या निरीह अवस्था में या बिना सहारे के नारी को छोड़कर देख लो। पुरुषों द्वारा उसके साथ दुर्व्यवहार होगा ही होगा। इसमें नारीवादी कार्यकर्ता कहेंगे कि ऐसे में तो सुधार पुरुष में होना चाहिये,नारी को किसी के आश्रित क्यों करते हो?हमारी सारी शिक्षा, दीक्षा, परीक्षा और मनोरंजन में संयम,अनुशासन, सम्मान, मूल्य पालन आदि न होकर उन्मुक्त भोग को बढ़ावा देने पर जोर है।टीवी, अखबार, मोबाइल आदि सभी में कामवासना भड़काने वाले कार्यक्रम मौजूद हैं।हर प्रकार के नशे को सिस्टम द्वारा बढ़ावा दिया जा रहा है।न्यायालय भी विवाहेतर शारीरिक संबंधों को अपराध या अनैतिक नहीं मानता है।इसका फायदा उठाकर कामवासना भडके हुये लोग खुलेआम कुछ भी करने के लिये घूम रहे हैं। ऐसे पुरुषों से नारी के रक्षार्थ महर्षि मनु का उपरोक्त श्लोक है। इसमें नारी निंदा नहीं अपितु नारी गरिमा मौजूद है।ऐसी विषम स्थिति में लड़कियों के साथ कुछ अनहोनी हो जाती है तो वो शोर मचाती हैं कि हमें बचाओ। यदि आप अपने आपको इतना समर्थ मानते हो तो करो अपनी रक्षा स्वयं ही।आपको तो पिता,भाई,पति, पुत्र आदि किसी की ढाल नहीं चाहिये।यह दोगलापन छोडना होगा।
10.) भारत में चोरी करके थिसिस तैयार कर जमा करवाकर पीएचडी की उपाधि प्राप्त करना एक आम बात है। लेकिन जब से विभिन्न विश्वविद्यालयों ने पश्चिम की शैली में आनलाईन मोड में कोर्स शुरू किये हैं,चोरी से नोट्स तैयार करवाकर आईएसबीएन सहित प्रकाशित करवाकर छात्रों को उपलब्ध करवाना आम बात हो गई है। और यह सब कुछ 'नयी शिक्षा नीति', के अंतर्गत हो रहा है।इन कोर्सेज में फीस बहुत अधिक होती है, इसलिये बिना किसी पूर्व तैयारी के विश्वविद्यालयों ने रुपया कमाने के लिये आनन फानन में अनेक कोर्स शुरू कर दिये हैं। बच्चों को नोट्स उपलब्ध करवाना अनिवार्य है।समय इतना होता नहीं है, इसलिये संबंधित प्रोफेसर को कम से कम समय में नोट्स तैयार करके विश्वविद्यालय को उपलब्ध करवाना अनिवार्य कर दिया जाता है। प्रामाणिक नोट्स तैयार करना एक समयसाध्य कार्य है। इनको लिखने,टंकित करवाने, अशुद्धियां ठीक करने और प्रकाशित करवाने में सयय लग जाता है। संबंधित शिक्षक भी क्या करें - वो यहां वहां से पुस्तकें उठाकर उनसे चोरी से स्टडी मैटीरियल की हु-ब-हू नकल करके नोट्स तैयार करवाकर विश्वविद्यालयों को सौंप रहे हैं।इन नकल किये हुये नोट्स में गहनता, तार्किकता,प्रामाणिकता,स्तरीयता,
विषय -संबद्धता का बिल्कुल अभाव होता है। आनलाइन शिक्षा प्रणाली तो विदेशों से ले ली है लेकिन छात्रों और शिक्षकों को विदेशों वाली सुविधाओं को कौन उपलब्ध करवायेगा? बस, विद्यार्थियों से रुपया हड़पो और भाग जाओ। शिक्षा का आनलाइन सिस्टम पूरी तरह से फर्जीवाड़ा है। इसमें शत- प्रतिशत चोरी चलती है। पहले से ही ध्वस्त हो चुकी भारतीय शिक्षा इससे शिक्षा और भी अधिक बर्बाद हो जायेगी। यदि आनलाइन के लिये तैयार पुस्तक रुप में नौट्स की छानबीन करवाई जाये तो भारतीय शिक्षा व्यवस्था का एक बहुत बहुत फर्जीवाड़ा उजागर हो सकता है।भारत को विश्वगुरु बनाने के हर प्रयास के पीछे भारत को विश्वगरीब बनाने का षड्यंत्र छिपा हुआ है।न प्रोफेसर,न कक्षाएं,न भवन,न पुस्तकालय,न प्रयोगशालाएं,न स्तरीय पुस्तकें,न नकलरहित परीक्षाएं तथा न ही कोई दूरदर्शी सोच।बस, धड़ाधड़ आनलाइन के नाम पर महालूट चल रही है।
11.)किसी लेखक की रचना का मूल्यांकन करने या समीक्षा करने के लेखन -कर्म में साहित्यिक प्रतिमानों के अनुसार निष्पक्षता से गुण और दोष दोनों को उजागर करना होता है। किसी लेखक की कृति की केवल एकतरफा प्रशंसा करना,लंबी गुणावली बतलाना और जो लेखक की रचना में मौजूद भी नहीं होता है, उसका श्रेय भी जबरदस्ती से लेखक को प्रदान कर देना न तो पुस्तक समीक्षा कहला सकती है,न ही उसे किसी प्रकार का मूल्यांकन कहा जा सकता है तथा न ही ऐसा करना एक अच्छे,भले और निष्पक्ष समीक्षक की पहचान ही कहला सकती है।ऐसा करना साहित्य का पतन कहलाता है। स्वतंत्रता के पश्चात् भारती हिंदी सहित अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के साहित्य में जहां आत्मप्रशंसा की चाह में बढ़ोतरी हुई है, वहीं पर किसी न किसी विचारधारा, राजनीतिक दल या जातिवादी संगठन की चापलूसी,चारणगिरी के साथ- साथ मानवीय चेतना से दूरी,स्वार्थपरता,तर्कहीनता,सिद्धा़तहीनता, महत्वाकांक्षा और पुरस्कार की कामना आदि में निरंतर बढ़ोतरी होती गई है। बहुत से तथाकथित लेखकों और समीक्षकों में पहले ही बातचीत हो जाती है कि किस तरह से क्या- क्या लिखना है। साहित्यिक क्षेत्र में ऐसी कृतियां और ऐसी कृतियों की समीक्षाएं कूड़ा-कर्कट से अधिक महत्व की नहीं हैं। ऐसे लेखकों द्वारा ऐसा कितना महान साहित्य सृजित हो रहा है कि उसमें केवल गुण ही गुण मौजूद हैं तथा दोष कोई भी नहीं हैं? कालिदास,भारवि,माघ, तुलसीदास,कबीर, रविदास,दिनकर, पंत, प्रेमचंद, लखमीचंद,बाजेभगत, मेहरसिंह, मांगेराम,धनपत सिंह आदि की रचनाओं की समीक्षा करते हुये भी गुण और दोष दोनों को बतलाया जाता रहा है।हरियाणवी साहित्य में यह प्रवृत्ति कुछ अधिक ही उभरकर सामने आ रही है। पहले तो सिस्टम ने ही हरियाणवी और हरियाणवी में मौजूद साहित्य को बर्बाद करने मे कमी नहीं छोड़ रखी है, ऊपर से झूठी और एकतरफा समीक्षाएं लिखने वाले ये तथाकथित समीक्षक महोदय- पता नहीं हरियाणा राज्य के लेखन को कहां ले जाकर छोड़ेंगे?
12.) व्यापारी, उद्योगपति,कोरपोरेट्स घराने, बड़े -बड़े माल के मालिक, दुकानदार, शोरूम संचालक, निजी शिक्षा -संस्थान,फिल्म -निर्माता आदि सभी अपना उपभोक्ता सामान बेचने के लिये हिप्नोसिस तकनीक का प्रयोग नहीं अपितु दुरुपयोग कर रहे हैं। घटिया सामान और धुआंधार प्रचार।बस, उपभोक्ता इनके बनाये जाल में फंसकर गुणवत्ता रहित सामान को भी खुशी -खुशी खरीदकर घर ले आता है। घटिया से घटिया सामान तैयार करके उसके साथ में किसी अर्धनग्न अभिनेत्री को खड़ी कर देते हैं। उपभोक्ता की कामुकता भड़काकर उसकी एकाग्रता को खरीदे जाने वाले सामान से हटाकर अर्धनग्न अभिनेत्री पर केंद्रित कर देते हैं। और फिर इसके साथ -साथ एकाग्र हुये मन पर किसी प्रभावी वाक्य एकदभ से दोहराने की चालाकी की जाती है। उपभोक्ता जब सामान खरीदने जायेगा तो सब कुछ भूलाकर उसे ही याद करेगा तथा वही सामान खरीदकर घर लायेगा। चाहे उस सामान की गुणवत्ता कितना ही घटिया, हानिकारक और सेहत के प्रतिकूल हो। उपभोक्ता सामान निर्माता खरबों की मालिक बहुराष्ट्रीय कंपनियां, बड़े व्यापारिक घराने, राजनीतिक दल, निजी शिक्षा -संस्थान आदि इसी तरह से उपभोक्ताओं से छल और धोखाधड़ी करके अपना कूड़ा-कर्कट सामान बेचकर मालामाल होती जा रही हैं। आधुनिक विकसित कहे जाने वाले युग के वैज्ञानिक, प्रोफेसर, शोधार्थी,शिक्षाविद्,नीति- निर्माता, सुधारक, धर्माचार्य,नीतिशास्त्री आदि सभी इस वैश्विक धोखाधड़ी पर चुप्पी साधे बैठे हैं। बहुराष्ट्रीय कंपनियों और उद्योगपतियों ने आरोग्यता की दृष्टि से घटिया,विषयुक्त,घातक,रसायनयुक्त, पर्यावरण- प्रदुषक उपभोक्ता सामान को बेच- बेचकर दुनियावासियों को बिमारियों का घर बना दिया है तथा धरती के पर्यावरण को बर्बाद कर डाला है। विज्ञापनों के द्वारा रिपीटीशन, एकाग्रता,चोंकाकर, प्रलोभन देकर, मन को भटकाकर उपभोक्ताओं में हिप्नोसिस पैदा की जाती है।इस अवस्था में कूड़ा-कर्कट, विषयुक्त,घातक रसायनयुक्त सामान धड़ल्ले से बिकता है।सारी आधुनिकता, वैज्ञानिकता, नैतिकता, तार्किक चिंतन गया तेल लेने।
13.) किसी राजनीतिक दल, संगठन, मजहब, संप्रदाय, मत आदि का सदस्य बनने पर यदि आपकी प्रश्न करने, अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने और कमियां बतलाने की शक्ति को छीन लिया जाये तो आप मान लेना कि वह राजनीतिक दल, संगठन, मजहब, संप्रदाय,मत आदि आपके लिये गुलामी और दासता का फंदा बन गया है। भारत में हालात ऐसे ही बन चुके हैं। अपनी जीवन जीने की स्वतंत्रता को किसी राजनीतिक दल, मजहब, संप्रदाय,मत,वाद या जातीय भीड़ को गिरवी रखकर बड़े -बड़े धुरंधर कहलाने वाले लेखक,कवि, साहित्यकार,विचारक,शिक्षक, दार्शनिक,समाज सुधारक, योगी और धर्माचार्य पतन को प्राप्त हो रहे हैं।
14.)सनातन धर्म को बदनाम करने का इससे अधिक घटिया प्रयास क्या हो सकता है कि गाय को माता मानकर वोट मांगने वाले नेता सत्ता मिलने पर यह कहने लगते हैं कि गाय तब तक माता है जब तक वो गर्भवती नहीं होती है। गर्भवती होने के पश्चात् गाय माता नहीं रहती है तथा उसका मांस खाया जा सकता है।कुछ नेता ऐसा बोल रहे हैं कि चौदह वर्ष से ऊपर की गाय को मांस के लिये इस्तेमाल किया जा सकता है। और कुछ बुद्धि के कोल्हू नेता ऐसा बोल रहे हैं कि मणिपुर, नागालैंड, मिजोरम,गोवा, मध्यप्रदेश आदि की गाय को मांस के लिये खाया जा सकता है क्योंकि इन राज्यों की गाय गौमाता नहीं होती है।कुछ घोंचू ऐसा बोलते रहे हैं कि विदेशों में गौमांस खाया जा सकता है तथा कुछ ऐसा बोल रहे हैं कि घर के भीतर गौमांस खाना पाप नहीं है,घर के बाहर बाहर गौमांस खाना पाप होता है। और विडंबना देखिये कि कुछ को छोड़कर अधिकांश सनातन धर्म के धर्माचार्य, महामंडलेश्वर, शंकराचार्य, योगाचार्य, कथाकार,संत आदि इस प्रकार के सनातन धर्म विरोधी कुकृत्यों पर मौन धारण किये बैठे हैं। और फिर यही बेहरुपिये यह बोलते रहते हैं कि सनातन धर्म खतरे में है। वास्तविकता तो यह है कि सनातन धर्म को सबसे बड़ा खतरा इन बेहरुपियों से ही है।
15.) जो घोंचू कल तक हमारे पडौस में कुछ निठल्ले शराबी -कबाबी -शबाबियों की चिल्म भरने का काम करता था,आज एक इस्तिहार से पता चला कि वह तो सीनियर प्रोफेसर बन गया है। क्या बात है?भारत ने कितना विकास कर लिया है कि बिना किसी विषय की पूर्व योग्यता के आवारा, निकम्मे, गालीबाज और चिल्म भरने वाले लोग भी प्रोफेसर बन रहे हैं।बताओ और कितना विकास करवाओगे भारत का?जब राजा ही आठवीं फेल हो और वह अपनी फेल होने वाली डिग्री भी नहीं दिखला रहा हो, उस देश में पढे -लिखे, तार्किक चिंतन करने वाले, पीएचडी- डी-लिट करने वालों और रचनात्मक लेखन करने वालों का क्या काम है? ऐसे देश में न तो किसी ढंग के विश्वविद्यालय की आवश्यकता है,न प्रयोगशालाएं बनाने की आवश्यकता है ,न तकनीकी संस्थान बनाने की आवश्यकता है,न पुस्तकालय खोलने की आवश्यकता है तथा न ही प्रामाणिक शोध करने करवाने की आवश्यकता है।बस, किसी ऐरे -गेरे- नत्थू -खैरे अपराधी नेता की चिल्म भरो, उसके पैर दबाओ,उसकी शारीरिक संतुष्टि करो, मूढ़ों की भीड़-भाड़ रैलियों के लिये जुटाओ तथा उसके लिये शराब -कबाब -शबाब की बढ़िया व्यवस्था करो। सफलता के लिये यही काफी है। बाकी क्यों किताबों में माथापच्ची करना। क्यों किसी प्रयोगशाला में प्रयोग आदि करना। क्यों बढ़िया साहित्य सृजन करना। विश्वगुरु नहीं अपितु अब तो विश्वमहागुरु बनने की ओर अग्रसर हैं।
16.) किसी भी उपदेश ,समस्या, परिस्थिति, व्यक्ति, वस्तु, स्थान, विचारधारा, सिद्धांत, निर्णय पर तार्किक ढंग से सोच -विचारकर निर्णय पर पहुंचने से रोकना सनातन धर्म और संस्कृति के अनुसार सही नहीं है। अब्राहमिक और ब्राहमिक सोच में यही तो अंतर है। पहले वाली मानने पर आधारित है तो दूसरे वाली तार्किक चिंतन करके जानने पर आधारित है। मानने पर जोर देने वाली सोच वास्तव में कोई सोच न होकर निरा अंधविश्वास है।इसे सोच नहीं कह सकते।सोच में तो तर्क से सोचना,विचारना, चिंतन करना आवश्यक होता है। अब्राहमिक में सोचना बिल्कुल निषेध है। सोचने में पहले से कुछ भी निर्धारित नहीं होता है अपितु विभिन्न पक्षों पर निष्पक्षता से सोच -विचार करने के पश्चात् ही निर्णय लिया जाता है। मानने या अंध विश्वास करने में पहले से ही निर्णय लिया हुआ होता है। ध्यान रहे कि अंधविश्वास या मानना न तो विश्वास है,न श्रद्धा है,न आस्था है,न भक्ति है तथा न ही कोई समर्पण है।यह तो एक गुलामी और दासता है।मानव प्राणियों को गुलाम बनाकर रखने का यह कुछ धूर्त लोगों का सोचा समझा हुआ षड्यंत्र होता है। ऐसे लोगों के खुद के पास तो इतना सोचना और समझना तो होता ही है कि जिससे जनता जनार्दन को सोचने, विचारने,तर्क करने से दूर करके अंधे,बहरे,गूंगे, लंगड़े लोगों की भीड़ पर एकछत्र शासन करके अपनी जिंदगी को हर तरह से खुशहाल बनाया जा सके।
पहले तो इस षड्यंत्र में केवल धर्माचार्य और शासक ही सम्मिलित थे लेकिन पिछले 200-300 वर्षों से इसमें अब जातिवादी सुधारक,उद्योगपति,कोरपोरट घराने,शिक्षा संस्थान, न्याय व्यवस्था,दवा निर्माता कंपनियां और बहुराष्ट्रीय कंपनियां भी सम्मिलित हो गई हैं।ये सभी जनता जनार्दन को गुलाम और दास बनाकर रखने में एक साथ मिलकर काम कर रहे हैं।ये सभी मीडिया का भरपूर सहयोग ले रहे हैं। उपरोक्त सभी षड्यंत्रकारी जनमानस को तर्क, विचार, चिंतन, न्याय, मीमांसा,कारणकार्य और प्रमाणों की शिक्षा से दूर रखने में अपनी पूंजी का एक बहुत बड़ा हिस्सा खर्च कर रहे हैं।इस सुंदर धरती ग्रह के लिये अन्य बड़े खतरों के साथ यह भी एक बड़ा खतरा उभरकर सामने आया है।
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डॉ. शीलक राम आचार्य
दर्शनशास्त्र -विभाग
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय
कुरुक्षेत्र -136119
'योग और योगाभ्यास' पर अयोग्य योग-शिक्षकों का कब्जा ('Yoga and Yoga Practice' is taken over by unqualified yoga teachers)
'योग और योगाभ्यास' पर अयोग्य योग-शिक्षकों का कब्जा
1.)सामुहिक रुप से योगाभ्यास एक छलावा है। भीड़-भाड़ एकत्र करके कुछ शारीरिक व्यायाम करवाना किसी भी दृष्टिकोण से योगाभ्यास नहीं है।वार्म अप, सुक्ष्म क्रियाएं, हल्के व्यायाम या फिर सूक्ष्म व्यायाम शारीरिक निरोगता के लिये लाभकारी होते हैं, लेकिन इसे योगाभ्यास नहीं कहा जा सकता है। वैसे तो देश विदेश में वर्ष भर योग शिविर,योग कक्षाएं, योगाभ्यास कक्षाएं या ध्यान शिविर वगैरह चलते रहते हैं लेकिन 21 जून के आसपास इसका जुनून विशेष रूप से देखने को मिलता है।जिसे देखो वही मैट या चद्दर या योग साधक की चदरिया ओढ़े दिखाई पड़ता है।पार्क,उद्यान,हाल,योग संस्थान,झील, तालाब आदि के आसपास लोगों की भीड़-भाड़ योगाभ्यास की आड़ में शारीरिक तोड़-मरोड़ करती देखी जा सकती है। लेकिन यह सब करना योगाभ्यास नहीं है।मोटे पेट, थुलथुल पेट,भारी भरकम कमर, चलने में अशक्त, पेंट शर्ट बैल्ट धारण किये,जीभ के गुलाम, अनुशासनहीन,क्रोध की साक्षात् मूर्ति, मांस -मीट- अंडाभक्षी, जींसधारी, शराबी,शबाबी आदि सभी योगाभ्यास के लाभ गिनवाते हुये या योगाभ्यास की आड़ में हल्की कसरतें करते हुये देखे जा सकते हैं।
2.) योगाभ्यास भारतवर्ष की पुरातन सनातन वैदिक विद्या है।यह एक अनुशासन है।यह किसी शास्त्र को रटना न होकर शुद्ध रूप से संयम है।यह योग संबंथी पुस्तकों, ग्रंथों और योगियों की जीवनियों का अध्ययन मात्र न करके एक प्रायोगिक चेतना का विज्ञान है।यह केवल कोई सिद्धांत,वाद,मत, विचार आदि न होकर एक साधना द्वारा अनुभूति का शास्त्र है।यह जीवन जीने की कला है।यह जीवन का विज्ञान है।यह चेतना का विज्ञान है।यह केवल परीक्षा का विषय न होकर दीक्षा, साधना और स्वानुभूति है।यह निज स्वरूप में ठहलना है।यह होश, जागरण, सजगता और विवेक का तप है।यह निर्विचार चेतना में होना है।यह विचारों पर नियंत्रण है।यह स्वयं के चित्त को मल ,विकार और अशुद्धियों से खाली करके स्वयं की चेतना को पारदर्शी बनाना है।योग कोई दिखावा नहीं अपितु दिखावा करने वाले मन को समझना है।योग केवल शुष्क तर्क - वितर्क न होकर तर्कातीत की यात्रा है। इसमें तर्क- वितर्क का भी सम्मान है लेकिन वहां से आगे जाना भी है।योग संसार विरोध नहीं अपितु संसार रहते हुये भी निर्विकार,निश्छल और निस्पंद होना है।योग अपनी सोई शक्तियों का जागरण करके उनका सृजनात्मक उपयोग है।योग विभूतियों और सिद्धियों का प्रदाता है लेकिन इन्हीं में फंसकर नहीं रह जाना है।
योग 'स्व' और 'पर' में सामंजस्य है।योग संसार और अध्यात्म में समन्वय है।योग इहलोक और परलोक में मैत्री है।योग संयोग और वियोग में समरसता है।योग चित्त वृत्तियों को समझकर उन पर नियंत्रण है।योग चित्त की वृत्तियों का प्रबोध है।योग चित्तवृत्तिनिरोध और चित्तवृत्तिप्रबोध में रहते हुये निष्कंप चेतना में होना है।योग वर्तमान में होना है। बाहरी सभी पहचान से आगे बढ़कर स्वयं को जानना योग है।परिधि और केंद्र, बाहर और भीतर,तुम और मैं - इनमें एकसूत्रता समझकर अद्वैतानुभूति योग है।एक व्यक्ति के अस्तित्व के जितने भी स्तर हैं,उन सबको शुद्ध करते हुये परम चेतना में होना योग है।समाज, व्यक्ति,शरीर,श्रास- प्रश्वास,प्राण, विचार, भावना आदि से होशपूर्ण जुड़ाव रखते हुये अस्तित्व से जुड़ाव करना योग है।जीवन में मौजूद टूटन,बिखराव,अकेलेपन को जानकर अपने मूल स्थान का साक्षात्कार योग है। उपरोक्त दी गई परिभाषाओं में शारीरिक तोड़-मरोड़ को किसी ने योग की संज्ञा नहीं दी है। व्यायाम या सूक्ष्म क्रियाओं को किसी ने भी योग नहीं कहा है।दिखावे को किसी ने योग नहीं कहा है।केवल मैट,लोवर,ढीले वस्त्र और योग साधक या योग शिक्षक लिखी गई बनियान पहनने को किसी ने भी योग नहीं कहा है। भीड़-भाड़ में जाकर गप्पें मारने को किसी ने योग नहीं कहा है। किसी योगी का अंधभक्त बनने को भी किसी न योग नहीं कहा है।
3.)भारत और भारत से बाहर जितना भी योग -केंद्रों का पंजीकरण बढता जा रहा है, उतना ही योग की आड़ में पाखंड, ढोंग, दिखावा, शोषण और दुकानदारी बढते जा रहे हैं। भारत में योग और योगाभ्यास की आड़ में राजनीति भी खूब की जा रही है।एक प्रसिद्ध व्यापारी बाबा ने तो एक पार्टी विशेष को सत्ता में लाने के लिये अपने अंधभक्त अनुयायियों को उस पार्टी के समर्थन में करोड़ों की संख्या में वोट डालने के लिये विवश किया था। पैंतीस रुपये प्रति लीटर पैट्रोल और डीजल,सस्ती रसोई गैस , विदेशी बैंकों से लाखों करोड़ का काला धन वापसी, राष्ट्रवाद की स्थापना,भारत को विश्वगुरु बनाने , शिक्षा के स्वदेशीकरण आदि के बड़े,-बड़े महाझूठ बोलने का घृणित कुकृत्य एक योगी कहलाने वाला व्यक्ति कैसे कर सकता है? लेकिन भारत में हमने यह सब होते हुये भी देख लिया है। ध्यान रहे कि यह न तो योग है,न भोग है,न संयोग है,न उद्योग (सद्कर्म) है, अपितु यह हमारे भारत के लिये कैंसर,तपेदिक और कोरोना से भी खतरनाक महारोग है। अपने व्यापारिक हित साधने के लिये ऐसे नकली और ढोंगी योगियों ने इस देश को खूब मूर्ख बनाया हुआ है। इनसे सावधान रहने की आवश्यकता है।इनकी पहुंच हमारे राजनीतिक, प्रशासनिक,विधिक सिस्टम में बहुत ऊपर तक है।
4.)योग और योगाभ्यास के सूत्र सर्वप्रथम वेदों में मौजूद हैं। वहीं से प्रेरणा पाकर ऋषियों ने योग संबंधित शास्त्रों की रचना समय -समय पर की है।दो सो से अधिक उपनिषद् योग, योगाभ्यास, साधना और अध्यात्म के ही पुराने साक्ष्य हैं।कुछ उपनिषद् तो दस हजार - बीस हजार वर्षों से भी अधिक पुराने हैं। औपनिवेशिक सोच के कारण इनको नया सिद्ध किया जा रहा हो,यह उनका सनातन धर्म और संस्कृति के प्रति द्वेषभाव है। पिछले साढ़े पांच हजार वर्षों के दौरान योग संबंधित अनेक ग्रंथ लिखे गये थे लेकिन यवन, ईसाई और इस्लामी हमलावरों के हमलों में काफी ग्रंथ नष्ट कर दिये गये। महर्षि पतंजलि रचित 'योगसूत्र' फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथ मौजूद है। इसमें 195 सूत्र और चार पाद मौजूद हैं।इसी ग्रंथ के अनुकरण पर विभिन्न धाराओं के योगियों यथा श्रमण, स्वामी,संन्यासी, भिक्षु, मुनि और योग- साधक आदि ने अपने -अपने मतों में योगाभ्यास की विभिन्न विधियों को विकसित किया। सबका मूल महर्षि पतंजलि के ग्रंथ 'योगसूत्र' में मिल जायेगा।इसी का अनुकरण और अनुसरण करते हुये अष्टांगयोग,सप्तांगयोग,षडंगयोग,
राजयोग,हठयोग,प्राणयोग,जपयोग,मंत्रयोग, कुंडलिनी योग, कर्मयोग,भक्तियोग,ज्ञानयोग,तंत्रयोग,ध्यानयोग,सहजयोग,सूरतशब्दयोग आदि सैकड़ों प्रकार के योग -मतों का प्रचलन हुआ है।
5.)योगसूत्र के प्रथम तीन सूत्र बड़े महत्व के हैं। बाकी योगसूत्र में इन तीन सूत्रों का विस्तृत व्याख्यान मात्र है।प्रथम सूत्र में योग को अनुशासन कहा गया है। अनुशासन के सिवाय योग कुछ नहीं है।योग की शुरुआत,योग का पथ,योग की उपलब्धि और योग उसके पश्चात् का जीवन -इन सभी स्तरों पर अनुशासन ही प्रधान है। यदि अनुशासन नहीं तो योग नहीं। बिना अनुशासन के योग एक भ्रम है।जो लोग अपनी दिनचर्या, जीवनचर्या,आहार -विहार, खान-पान, निद्रा और जागरण तथा योगाभ्यास में अनुशासन का पालन नहीं करते,वो योगाभ्यास में एक कदम भी आगे नहीं रख सकते हैं।योग के प्रथम तीन सूत्र इस प्रकार से हैं -
अथ योगानुशासनम्।।
योगश्चित्तवृत्तिनिरोध:।।
तदा द्रष्टु स्वरूप अवस्थानम्।।(योगसूत्र, समाधिपाद,1-3)
इनका अर्थ है कि अब योग के अनुशासन को बतलाया जाता है।
योग चित्त की वृत्तियों पर नियंत्रण है। योगाभ्यास से द्रष्टा की अपने स्वरूप में स्थिति हो जाती है। यदि चहुंओर दृष्टि को किया जाये तो मालूम होगा कि लोग स्वयं अनुशासित न होकर केवल अन्यों को अनुशासित होने की सीख देते मिल जायेंगे। लेकिन जो व्यक्ति स्वयं अनुशासित नहीं है,वह दूसरों को अनुशासित होने की सीख कैसे दे सकता है? और यदि वह ऐसा करेगा भी तो उसकी सीख का किसी पर कोई प्रभाव पड़ने वाला नहीं है।सब सबको अनुशासन सिखला रहे हैं लेकिन स्वयं उच्छृंखल बने हुये हैं।जिनका स्वयं के आहार,विहार,पोशाक,सोने,जागने, चरित्र,आचरण,संवाद, शिक्षा, स्वाध्याय आदि में कोई अनुशासन नहीं है,वो योगाभ्यास में एक कदम भी आगे नहीं बढा सकते हैं।यह अनुशासन कहीं दुकानों पर रुपये देकर नहीं मिलता है अपितु इससे प्रतिदिन अपने आचरण में स्थान देने का तप करना पड़ता है। किसी दूसरे का अनुशासन केवल उसके हित के लिये होता है।इसे कहीं से उधार भी नहीं लिया जा सकता है।यह किसी गुरु से भी नहीं मिलता है।यह पद, प्रतिष्ठा और बैंक बैलेंस से भी नहीं मिलता है। तथाकथित बड़े कहे जाने वाले लोगों का यह भ्रम रहता है कि उनको अनुशासन की आवश्यकता नहीं है। लेकिन उनका यह सोचना महामूर्खता है।
6.) योगाभ्यास में सफलता पाने के लिये किसी पाखंडी गुरु का सामीप्य और उससे नामदान या दीक्षा आदि लेना,कोई बड़ा प्रशासनिक पद, सामाजिक -राजनीतिक प्रतिष्ठा और बैंक बैलेंस आदि का महत्व बिल्कुल गौण यानी न के समान है।इस प्रकार की मूढताओं से बचना आवश्यक है। किसी योग्य और समर्थ गुरु के मार्गदर्शन में सतत् अभ्यास और अनासक्ति से साधना करते रहें। अभ्यास और अनासक्ति स्वयं ही करने होते हैं।कोई दूसरा आपके लिये यह सब नहीं कर सकता है।यह कोई ऐसा अनुष्ठान या कर्मकांड नहीं है जिसको करे कोई अन्य और फल आपको मिल जाये।ऐसा असंभव है। यहां सिफारिश नहीं चलती है। यहां चापलूसी और धनाढ्य होने की अकड़ नहीं चलती है।इसीलिये इसको शुरू में ही स्पष्ट करते हुये महर्षि पतंजलि कहते हैं -
अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोध:।। (योगसूत्र, समाधिपाद,12)
यानी सतत् अभ्यास और अनासक्ति से चित्त की वृत्तियों पर नियंत्रण हो सकता है।
7.) 'योग' कोई व्यायाम,कसरत, शारीरिक तोड़-मरोड़,सैर, प्रतियोगिता या खेल नहीं है।यह किसी से आगे जाने या किसी से पीछे होना नहीं है।यह स्वयं के द्वारा,स्वयं के ऊपर और स्वयं में रुपांतरण का विज्ञान है।पिछले कुछ वर्षों से 'योग' को एक खेल के रूप में प्रचलित करके एक प्रतियोगिता कहा जा रहा है।यह ठीक नहीं है। प्रतियोगिताओं के रूप में जो भी आजकल 21 जून को या योग केंद्रों और शिक्षा संस्थानों में किया जा रहा है,वह न तो योगासन है,न योगाभ्यास है बल्कि एक प्रकार की व्यायामासन खेल प्रतियोगिता है।इसका सनातन भारतीय योगाभ्यास से कोई भी संबंध नहीं है। इसके अतिरिक्त देश- विदेशों में योगाभ्यास की आड़ में जो हाटयोग,स्काईयोग, म्यूजिकयोग,
रोपयोग,रिदमयोग,वार्मअप योग,उछल-कूद योग,आईसयोग,वैपरयोग,बाबायोग,जग्गीयोग, श्री श्री योग आदि विभिन्न प्रकार के मूढतापूर्ण प्रयोग करवाये जा रहे हैं, उनका भी सनातन भारतीय योगाभ्यास से कोई लेना-देना नहीं है।इन सबसे साधकों को कुछ शारीरिक लाभ और गुरुओं को प्रसिद्धि के साथ धन- दौलत अवश्य मिल जाते हैं, लेकिन वृत्तियों के नियंत्रण में इनका कोई योगदान नहीं है।
8.) महर्षि पतंजलि ने एक महत्वपूर्ण सूत्र 'चित्तवृत्तिनिरोध' से भिन्न चित्त की अवस्था के संबंध में कहा है।जब चित्त की वृत्तियों पर द्रष्टा यानी किसी साधक या व्यक्ति का नियंत्रण नहीं होता है तो चित्त काम, क्रोध ,लोभ,मोह,द्वेष, ईर्ष्या, कामुकता, बदले की भावना,प्रेम, घृणा आदि वृत्तियों जैसा ही हो जाता है।चित्त के कार्य करने की प्रक्रिया जैसे जटिल विषय को इतनी सरलता और सहजता से आज तक किसी भी योगी और मनोविद् ने नहीं समझाया है। इससे एक विषयासक्त और इंद्रियजयी,भोगी और योगी व्यक्ति में भेद-रेखा स्पष्टता से पहचान में आ जाती है। भौतिकविद् भौतिक पदार्थ पर काम करते हैं जबकि अध्यात्मविद् चेतना पर काम करते हैं। आचार्य रजनीश ने महर्षि पतंजलि को चेतना का वैज्ञानिक कहा है। लाखों वर्षों के कालखंड में दस प्रसिद्ध भारतीय मनीषियों में उन्होंने महर्षि पतंजलि को भी गिनवाया है। चित्तवृत्तिनिरोध से भिन्न चित्त के संबंध में महर्षि पतंजलि कहते हैं -
वृत्तिसारुप्यमितरत्र।।( समाधिपाद,4)
9.) योग - महाविज्ञान में मौजूद श्वास और मन के परस्पर संबंध के रहस्य को उद्घाटित करते हुये हठयोगी स्वात्माराम ने कहा है-
चले वाते चलं चितं निश्चले निश्चलं भवेत्।
योगी स्थाणुत्वमाप्नोति ततो वायुं निरोधयेत्।।
( हठयोग प्रदीपिका,2/2)
इसका अर्थ है कि जब श्वास -प्रश्वास चलती है तो मन भी चलता है और जब श्वास -प्रश्वास पर नियंत्रण हो जाता है तो मन पर भी नियंत्रण हो जाता है। श्वास -प्रश्वास पर नियंत्रण होने से योगाभ्यासी को अचल मन: स्थिति प्राप्त हो जाती है। वह अडिग बन जाता है। बाहरी विषय उसे परेशान नहीं कर सकते। विषयों की ओर जाते हुये मन पर उसका पूर्ण नियंत्रण हो जाता है।इस श्लोक से यह पूरी तरह से समझ में आता है कि या तो श्वास -प्रश्वास पर नियंत्रण कर लो या फिर मन पर नियंत्रण कर लो। पहले वाले योग साधक को प्राणयोगी तथा दूसरे वाले योग साधक को राजयोगी कहा गया है। सीधे ही मन पर या विचारों पर नियंत्रण लगभग असम्भव है, इसलिये सर्वप्रथम यम,नियम, आसन वाले तीन अनुशासन में पारंगत होकर प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिये। प्राणायाम महर्षि पतंजलि के अष्टांगयोग में चौथा अनुशासन है।
10.) यहां पर ध्यान देने योग्य बात यह है कि चारों तरफ जो योग -केंद्रों, पार्कों,बाग- बगीचों, सरकारी कार्यालयों और शिक्षा -संस्थानों में योगाभ्यास करने वालों की भीड़-भाड़ दिखाई दे रही है,वह किस प्रकार का योगाभ्यास कर रही है?इस योगाभ्यास में महर्षि पतंजलि प्रोक्त योग के चौथे अनुशासन 'प्राणायाम' या हठयोग के ग्रंथों में वर्णित आठ प्रकार के प्राणायामों का सही तरीके से अभ्यास किया या करवाया जा रहा है या नहीं? भारत और विदेशों में स्थित लाखों योग -केंद्रों में से गिनती के योग केंद्र ऐसे होंगे, जहां पर सनातन शास्त्रीय मर्यादा अनुसार प्राणायाम का अभ्यास किया और करवाया जाता है। अधिकांश जगहों पर प्राणायाम की आड़ में सिर्फ गहरी श्वसन क्रिया का अभ्यास हो रहा है। सही तरीके से प्राणायाम करने के लिये सर्वप्रथम यम, नियमों को आचरण में स्थान देकर घंटे आधे घंटे तक एकासन में अविचल बैठने का अभ्यास आवश्यक है। आजकल के आपाधापी और व्यापार के युग में किसी के पास न तो इतना समय ही है तथा न ही किसी के पास इतना संयम और तप है। बड़े बड़े धुरंधर अंतरराष्ट्रीय योगी कहलाने वाले लोग भी प्राणायाम के नाम पर सिर्फ श्वास- प्रश्वास का अभ्यास कर और करवा रहे हैं।यही कारण है कि इस प्रकार के नकली प्राणायाम का कोई गहरा और स्थायी प्रभाव साधकों के शरीर, प्राण, विचार,मन और भावनाओं पर नहीं पड़ रहा है। और इसीलिये आजकल के इन प्रसिद्ध योगाचार्यों, संतों, बाबाओं और योग महर्षियों को या तो अपने आयुर्वेदिक उत्पाद के रूप में चूर्ण, चटनी,टाफी,जूस, च्यवनप्राश, हैल्थ ड्रिंक,जींस,कच्छे, बनियान,सैक्सवर्धक गोलियां
बनाकर बेचने पड़ रहे हैं या फिर गंडे, ताबीज़, कड़े,माला,धागे,भभूत, नारियल, मूर्तियां,लाकेट,अंगुठियां, रुद्राक्ष और मिट्टी आदि बेचने पड़ रहे हैं। इनके नकली योगाभ्यास , जल्दी सफलता पाने की महत्वाकांक्षा, धन- दौलत की चाह,अंधभक्तों की भीड़-भाड़, आलीशान आश्रमों का लालच और महंगी गाड़ियों की वासना और विज्ञापन की धूमधाम के कारण यह सब हो रहा है। यदि ऐसे उच्छृंखल भोगी लोगों को योगी या योगाचार्य कहोगे तो अभ्यास, वैराग्य, संयम, त्याग, तपस्या, करुणा , अपरिग्रह, संतोष, अहिंसा,सत्य, ब्रह्मचर्य,शौच, स्वाध्याय आदि का आचरण करने वाले योगियों को क्या कहोगे?
11.)पिछले 100-125 वर्षों के दौरान आसन को व्यायाम के रूप में प्रचलित करने में अनेक योगाचार्य सम्मिलित हैं।आसन के द्वारा शारीरिक सौष्ठव, सौंदर्य और देहयष्टि को सुडौल बनाने पर जोर देकर इन्होंने योग साधकों को'चित्तवृत्तिनिरोध' से दूर ले जाने में सहयोग करके योग के मूल-भाव को जनमानस से लुप्त सा कर दिया है।रह रहकर ये योगाचार्य मन नियंत्रण की बातें भी करते रहे लेकिन जनमानस में शरीर और इंद्रियों के प्रति सहज राग होने के कारण उन्हें योग का यह विकृत और आधा अधुरा रुप ही ठीक लगा। 'महाजनों येन गत: स पंथा' की सीख को शिरोधार्य करके इन्होंने इसे ही वास्तविक योग स्वीकार कर लिया। पाश्चात्य औपनिवेशिक विचारकों का भी यही लक्ष्य था कि किसी तरह मन नियंत्रण वाली इस सनातन योग विद्या को अब्राहमिक भौतिकवादी जडवादी उपयोगितावादी रुप दे दिया जाये। योगेन्द्र,कुवलयानंद,कृष्णामाचार्य, अयंगर, भारतीय योग संस्थान,आर्य वीर दल, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और बाद में रामदेव आदि द्वारा इसी को खूब प्रचारित किया गया।आज यह शारीरिक तोड़-मरोड़ वाला व्यायाम,कसरत और खेल ही योग बनकर रह गया है। लेकिन यह पूरी तरह से भटकाव है। आश्चर्यजनक है कि इनमें से आर्यसमाज को छोड़कर किसी संगठन ने भी भारत की स्वतंत्रता के संग्राम में हिस्सा नहीं लिया। पता नहीं किसलिये ये अपने शरीरों को मजबूत बना रहे थे?21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मनाने में भी योग की यही आधकचरी अवधारणा प्रचारित हो गई है।
12.) महर्षि पतंजलि ने अपने 5500 वर्षों पुरातन 'योगसूत्र' में आसन को अष्टांगयोग में तीसरा अनुशासन कहा है। इसमें आसन को देह की स्थिरता, सहजता,दृढता आदि के रूप में लिया है।आसन को स्पष्ट करते हुये महर्षि पतंजलि ने तीन सूत्र दिये हैं -
स्थिरसुखमासनम्।।
प्रयत्नशैथिल्यअनंतसमाप्तिभ्याम्।।
ततो द्वंद्वान्भिघात:।।
(योगसूत्र,साधनपाद,46-48)
इनका अर्थ है स्थिरता और सुखपूर्वक बैठना आसन है।आसन में इस प्रकार बैठने से शरीर की सभी हलचल समाप्त होकर साधक अपने निज स्वरूप में स्थित होने की ओर अग्रसर होता है। इससे सुख- दुख, सर्दी- गर्मी और मौसम परिवर्तन को सहने की योग्यता अर्जित हो जाती है। इसके पश्चात् ही कोई योग- साधक योग के चौथे अनुशासन 'प्राणायाम' का अभ्यास करने में समर्थ होता है। ध्यान रखने की बात यह है कि इस प्रकार से आसन का अभ्यास शायद ही कोई योग -केंद्र या योगाश्रम करवाता होगा। वास्तविकता यह है कि आसन की जिस अवधारणा को आजकल प्रचलित कर दिया गया है,वह अवधारणा पुरातन काल में नटों और युद्धक कला का अभ्यास करने वालों के लिये होती थी।इसे आजकल 'मार्शल आर्ट' कह दिया जाता है।भारत की पुरातन युद्धक कला 'कलारीपयट्टू' से ही संसार की सभी मार्शल आर्ट का विकास हुआ है।
13.) 'योगा फार हैल्दी एजिंग' का लक्ष्य केवल कसरत करने, व्यायाम करने, शारीरिक तोड़-मरोड़ करने और नटबाजी से कैसे हासिल होगा?इस पर विचार न करके अरबों रुपए प्रचार -प्रसार पर उडाये जा रहे हैं।कसरत और व्यायाम करना तो पहले से ही मौजूद है। क्या ऐसे लोगों का बुढ़ापा सुखप्रद और आरोग्यप्रद होता है? कहीं ऐसा दिखाई तो नहीं दे रहा है।हर तरफ चिकित्सकों के वहां पचास-साठ वर्ष के लोगों की भीड़ लगी रहती है।अस्थमा,श्वास ,शूगर, खांसी,घूटनों की खराबी, जोड़ों में दर्द,लीवर सूजन,गूर्दो में विकार, मोतियाबिंद आदि भयंकर बिमारियों से ग्रस्त बुजुर्ग लोगों की चिकित्सा या इन बिमारियों की रोकथाम क्या कसरत, व्यायाम, नटबाजी रुपी नकली योगाभ्यास से हो जायेगी?साक्ष्य आधारित विज्ञान का युग होने का दंभ भरने वाले शिक्षक, प्रोफेसर, चिकित्सक, योगाचार्य, वैज्ञानिक, शोधार्थी भी इस विषय पर प्रश्न, जिज्ञासा, संदेह नहीं कर रहे हैं। चापलूसी,अंधभक्ति, हां जी - हां जी करके मूंडी हिलाने वाली मंदबुद्धि भीड़ सनातन- विद्या 'योग और योगाभ्यास' का कल्याण कैसे करेगी? किसी को भी इसकी चिंता नहीं है। सभी अपने- अपने नंबर बनाने, फोटो खिंचवाने और सर्टिफिकेट लेने में लगे हुये हैं।
14.)छुटभय्ये वैज्ञानिक भी होते हैं।अधकचरे वैज्ञानिक भी होते हैं।प्रकृति को केवल भोग की वस्तु मानने वाले वैज्ञानिक ही होते हैं। सुंदर धरती ग्रह को अधिकांश जीव- जंतुओं के लिये नारकीय बना देने वाले भी वैज्ञानिक ही होते हैं। एकतरफा तथ्य को महत्व देकर सत्य के विरोधी भी वैज्ञानिक होते हैं। मनुष्य में मौजूद अनेक प्रकार की शक्तियों में से केवल विचार को प्रधान मानकर भाव के विरोधी भी वैज्ञानिक ही होते हैं।स्वार्थ और बस उपयोगिता की प्रधानता।यूज एंड थ्रो और डिवाईड एंड रूल।तोडते जाओ और तोड़ते जाओ।गुरुओं और वैज्ञानिकों का यह धंधा बन चुका है। दोनों एक ही नाव में सवार हैं। समझे बिना स्वीकार मत करो। और यदि समझ गये तो स्वीकार अस्वीकार व्यर्थ हो जायेंगे। किसी को पकड़ा तो धोखा खाओगे और यदि नहीं पकड़ा तो पश्चाताप रहेगा कि पकड़ लेते तो पता नहीं कौनसी क्रांति हो जाती।सब कुछ अधकचरा, अपरिपक्व और सतही सा है।इन सबके बीच में हमारी स्वयं की समझ साथ निभाती है। लेकिन उस पर विश्वास न करके किसी गुरु, वैज्ञानिक, ग्रंथ, संप्रदाय पर विश्वास करने की ओर बढ जाते हैं। आज हालात यह हो गई है कि स्वयं की समझ को उजागर करने में हमारे गुरु और भौतिकविद् दोनों बाधा बने हुये हैं। इसमें जिस विषय से सर्वाधिक मदद मिल सकती है,उस विषय 'योग और योगाभ्यास' का कबाड़ा कर दिया गया है। जहां भौतिक विज्ञान के अपने नियम और अनुशासन होते हैं, वहीं पर 'योग- महाविज्ञान' के अपने नियम, अनुशासन,संयम, तपस्या और सावधानियां आदि होते हैं। लेकिन महीना दो महीना शारीरिक कसरत और उठा-पटक करवाकर लोगों को प्रामाणिक योग शिक्षक के सर्टिफिकेट लाखों की संख्या में वितरित किये जा रहे हैं। जिनको इस योग विद्या का क ख ग भी नहीं आता है,वो भी भारत प्रसिद्ध योगाचार्य और योग -विशेषज्ञ बनकर लाखों लोगों को योगाभ्यास करवा रहे हैं।
15.)आगे को बढी और नीचे लटकी हुई बड़ी- बड़ी तोंद, भारी- भरकम कमर,आंखों पर बड़े -बड़े चश्मे,टाईट पोशाक,चमड़े की धारण की हुई टाईट बैल्ट और धन- दौलत -पद- प्रतिष्ठा- प्रधानी की हिमालय समान अकड़ - आज के अधिकांश योग- शिक्षकों और योगाभ्यास के हिमायतियों की यही पहचान है। कोई कुछ टिप्पणी कर दे तो देशद्रोही, पाकिस्तानी, खालिस्तानी घोषित कर देंगे।इनकी हरेक तर्कहीन और उल्टी-सीधी बात को मान लो तो ठीक वरना आपकी खैर नहीं। ज्यों ही कोई विद्या या विषय या व्यक्ति प्रसिद्ध हुआ नहीं कि वोट के भूखे लूटरे नेता लोग वहां पर जबरदस्ती से प्रवेश करके सब गुड़ गोबर कर देते हैं। और आजकल के योगाचार्यों और धर्माचार्यों को मोह, माया,पद,प्रतिष्ठा,धन, दौलत से इतना अधिक लगाव है कि ये तुरंत धूर्त नेताओं से सांठगांठ कर लेते हैं।योग और योगाभ्यास जाये भाड़ में।बस भारत और भारत से बाहर यही चल रहा है।
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डॉ. शीलक राम आचार्य
दर्शनशास्त्र-विभाग
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय
कुरुक्षेत्र -136119'योग और योगाभ्यास' पर अयोग्य योग-शिक्षकों का कब्जा
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1.)सामुहिक रुप से योगाभ्यास एक छलावा है। भीड़-भाड़ एकत्र करके कुछ शारीरिक व्यायाम करवाना किसी भी दृष्टिकोण से योगाभ्यास नहीं है।वार्म अप, सुक्ष्म क्रियाएं, हल्के व्यायाम या फिर सूक्ष्म व्यायाम शारीरिक निरोगता के लिये लाभकारी होते हैं, लेकिन इसे योगाभ्यास नहीं कहा जा सकता है। वैसे तो देश विदेश में वर्ष भर योग शिविर,योग कक्षाएं, योगाभ्यास कक्षाएं या ध्यान शिविर वगैरह चलते रहते हैं लेकिन 21 जून के आसपास इसका जुनून विशेष रूप से देखने को मिलता है।जिसे देखो वही मैट या चद्दर या योग साधक की चदरिया ओढ़े दिखाई पड़ता है।पार्क,उद्यान,हाल,योग संस्थान,झील, तालाब आदि के आसपास लोगों की भीड़-भाड़ योगाभ्यास की आड़ में शारीरिक तोड़-मरोड़ करती देखी जा सकती है। लेकिन यह सब करना योगाभ्यास नहीं है।मोटे पेट, थुलथुल पेट,भारी भरकम कमर, चलने में अशक्त, पेंट शर्ट बैल्ट धारण किये,जीभ के गुलाम, अनुशासनहीन,क्रोध की साक्षात् मूर्ति, मांस -मीट- अंडाभक्षी, जींसधारी, शराबी,शबाबी आदि सभी योगाभ्यास के लाभ गिनवाते हुये या योगाभ्यास की आड़ में हल्की कसरतें करते हुये देखे जा सकते हैं।
2.) योगाभ्यास भारतवर्ष की पुरातन सनातन वैदिक विद्या है।यह एक अनुशासन है।यह किसी शास्त्र को रटना न होकर शुद्ध रूप से संयम है।यह योग संबंथी पुस्तकों, ग्रंथों और योगियों की जीवनियों का अध्ययन मात्र न करके एक प्रायोगिक चेतना का विज्ञान है।यह केवल कोई सिद्धांत,वाद,मत, विचार आदि न होकर एक साधना द्वारा अनुभूति का शास्त्र है।यह जीवन जीने की कला है।यह जीवन का विज्ञान है।यह चेतना का विज्ञान है।यह केवल परीक्षा का विषय न होकर दीक्षा, साधना और स्वानुभूति है।यह निज स्वरूप में ठहलना है।यह होश, जागरण, सजगता और विवेक का तप है।यह निर्विचार चेतना में होना है।यह विचारों पर नियंत्रण है।यह स्वयं के चित्त को मल ,विकार और अशुद्धियों से खाली करके स्वयं की चेतना को पारदर्शी बनाना है।योग कोई दिखावा नहीं अपितु दिखावा करने वाले मन को समझना है।योग केवल शुष्क तर्क - वितर्क न होकर तर्कातीत की यात्रा है। इसमें तर्क- वितर्क का भी सम्मान है लेकिन वहां से आगे जाना भी है।योग संसार विरोध नहीं अपितु संसार रहते हुये भी निर्विकार,निश्छल और निस्पंद होना है।योग अपनी सोई शक्तियों का जागरण करके उनका सृजनात्मक उपयोग है।योग विभूतियों और सिद्धियों का प्रदाता है लेकिन इन्हीं में फंसकर नहीं रह जाना है।
योग 'स्व' और 'पर' में सामंजस्य है।योग संसार और अध्यात्म में समन्वय है।योग इहलोक और परलोक में मैत्री है।योग संयोग और वियोग में समरसता है।योग चित्त वृत्तियों को समझकर उन पर नियंत्रण है।योग चित्त की वृत्तियों का प्रबोध है।योग चित्तवृत्तिनिरोध और चित्तवृत्तिप्रबोध में रहते हुये निष्कंप चेतना में होना है।योग वर्तमान में होना है। बाहरी सभी पहचान से आगे बढ़कर स्वयं को जानना योग है।परिधि और केंद्र, बाहर और भीतर,तुम और मैं - इनमें एकसूत्रता समझकर अद्वैतानुभूति योग है।एक व्यक्ति के अस्तित्व के जितने भी स्तर हैं,उन सबको शुद्ध करते हुये परम चेतना में होना योग है।समाज, व्यक्ति,शरीर,श्रास- प्रश्वास,प्राण, विचार, भावना आदि से होशपूर्ण जुड़ाव रखते हुये अस्तित्व से जुड़ाव करना योग है।जीवन में मौजूद टूटन,बिखराव,अकेलेपन को जानकर अपने मूल स्थान का साक्षात्कार योग है। उपरोक्त दी गई परिभाषाओं में शारीरिक तोड़-मरोड़ को किसी ने योग की संज्ञा नहीं दी है। व्यायाम या सूक्ष्म क्रियाओं को किसी ने भी योग नहीं कहा है।दिखावे को किसी ने योग नहीं कहा है।केवल मैट,लोवर,ढीले वस्त्र और योग साधक या योग शिक्षक लिखी गई बनियान पहनने को किसी ने भी योग नहीं कहा है। भीड़-भाड़ में जाकर गप्पें मारने को किसी ने योग नहीं कहा है। किसी योगी का अंधभक्त बनने को भी किसी न योग नहीं कहा है।
3.)भारत और भारत से बाहर जितना भी योग -केंद्रों का पंजीकरण बढता जा रहा है, उतना ही योग की आड़ में पाखंड, ढोंग, दिखावा, शोषण और दुकानदारी बढते जा रहे हैं। भारत में योग और योगाभ्यास की आड़ में राजनीति भी खूब की जा रही है।एक प्रसिद्ध व्यापारी बाबा ने तो एक पार्टी विशेष को सत्ता में लाने के लिये अपने अंधभक्त अनुयायियों को उस पार्टी के समर्थन में करोड़ों की संख्या में वोट डालने के लिये विवश किया था। पैंतीस रुपये प्रति लीटर पैट्रोल और डीजल,सस्ती रसोई गैस , विदेशी बैंकों से लाखों करोड़ का काला धन वापसी, राष्ट्रवाद की स्थापना,भारत को विश्वगुरु बनाने , शिक्षा के स्वदेशीकरण आदि के बड़े,-बड़े महाझूठ बोलने का घृणित कुकृत्य एक योगी कहलाने वाला व्यक्ति कैसे कर सकता है? लेकिन भारत में हमने यह सब होते हुये भी देख लिया है। ध्यान रहे कि यह न तो योग है,न भोग है,न संयोग है,न उद्योग (सद्कर्म) है, अपितु यह हमारे भारत के लिये कैंसर,तपेदिक और कोरोना से भी खतरनाक महारोग है। अपने व्यापारिक हित साधने के लिये ऐसे नकली और ढोंगी योगियों ने इस देश को खूब मूर्ख बनाया हुआ है। इनसे सावधान रहने की आवश्यकता है।इनकी पहुंच हमारे राजनीतिक, प्रशासनिक,विधिक सिस्टम में बहुत ऊपर तक है।
4.)योग और योगाभ्यास के सूत्र सर्वप्रथम वेदों में मौजूद हैं। वहीं से प्रेरणा पाकर ऋषियों ने योग संबंधित शास्त्रों की रचना समय -समय पर की है।दो सो से अधिक उपनिषद् योग, योगाभ्यास, साधना और अध्यात्म के ही पुराने साक्ष्य हैं।कुछ उपनिषद् तो दस हजार - बीस हजार वर्षों से भी अधिक पुराने हैं। औपनिवेशिक सोच के कारण इनको नया सिद्ध किया जा रहा हो,यह उनका सनातन धर्म और संस्कृति के प्रति द्वेषभाव है। पिछले साढ़े पांच हजार वर्षों के दौरान योग संबंधित अनेक ग्रंथ लिखे गये थे लेकिन यवन, ईसाई और इस्लामी हमलावरों के हमलों में काफी ग्रंथ नष्ट कर दिये गये। महर्षि पतंजलि रचित 'योगसूत्र' फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथ मौजूद है। इसमें 195 सूत्र और चार पाद मौजूद हैं।इसी ग्रंथ के अनुकरण पर विभिन्न धाराओं के योगियों यथा श्रमण, स्वामी,संन्यासी, भिक्षु, मुनि और योग- साधक आदि ने अपने -अपने मतों में योगाभ्यास की विभिन्न विधियों को विकसित किया। सबका मूल महर्षि पतंजलि के ग्रंथ 'योगसूत्र' में मिल जायेगा।इसी का अनुकरण और अनुसरण करते हुये अष्टांगयोग,सप्तांगयोग,षडंगयोग,
राजयोग,हठयोग,प्राणयोग,जपयोग,मंत्रयोग, कुंडलिनी योग, कर्मयोग,भक्तियोग,ज्ञानयोग,तंत्रयोग,ध्यानयोग,सहजयोग,सूरतशब्दयोग आदि सैकड़ों प्रकार के योग -मतों का प्रचलन हुआ है।
5.)योगसूत्र के प्रथम तीन सूत्र बड़े महत्व के हैं। बाकी योगसूत्र में इन तीन सूत्रों का विस्तृत व्याख्यान मात्र है।प्रथम सूत्र में योग को अनुशासन कहा गया है। अनुशासन के सिवाय योग कुछ नहीं है।योग की शुरुआत,योग का पथ,योग की उपलब्धि और योग उसके पश्चात् का जीवन -इन सभी स्तरों पर अनुशासन ही प्रधान है। यदि अनुशासन नहीं तो योग नहीं। बिना अनुशासन के योग एक भ्रम है।जो लोग अपनी दिनचर्या, जीवनचर्या,आहार -विहार, खान-पान, निद्रा और जागरण तथा योगाभ्यास में अनुशासन का पालन नहीं करते,वो योगाभ्यास में एक कदम भी आगे नहीं रख सकते हैं।योग के प्रथम तीन सूत्र इस प्रकार से हैं -
अथ योगानुशासनम्।।
योगश्चित्तवृत्तिनिरोध:।।
तदा द्रष्टु स्वरूप अवस्थानम्।।(योगसूत्र, समाधिपाद,1-3)
इनका अर्थ है कि अब योग के अनुशासन को बतलाया जाता है।
योग चित्त की वृत्तियों पर नियंत्रण है। योगाभ्यास से द्रष्टा की अपने स्वरूप में स्थिति हो जाती है। यदि चहुंओर दृष्टि को किया जाये तो मालूम होगा कि लोग स्वयं अनुशासित न होकर केवल अन्यों को अनुशासित होने की सीख देते मिल जायेंगे। लेकिन जो व्यक्ति स्वयं अनुशासित नहीं है,वह दूसरों को अनुशासित होने की सीख कैसे दे सकता है? और यदि वह ऐसा करेगा भी तो उसकी सीख का किसी पर कोई प्रभाव पड़ने वाला नहीं है।सब सबको अनुशासन सिखला रहे हैं लेकिन स्वयं उच्छृंखल बने हुये हैं।जिनका स्वयं के आहार,विहार,पोशाक,सोने,जागने, चरित्र,आचरण,संवाद, शिक्षा, स्वाध्याय आदि में कोई अनुशासन नहीं है,वो योगाभ्यास में एक कदम भी आगे नहीं बढा सकते हैं।यह अनुशासन कहीं दुकानों पर रुपये देकर नहीं मिलता है अपितु इससे प्रतिदिन अपने आचरण में स्थान देने का तप करना पड़ता है। किसी दूसरे का अनुशासन केवल उसके हित के लिये होता है।इसे कहीं से उधार भी नहीं लिया जा सकता है।यह किसी गुरु से भी नहीं मिलता है।यह पद, प्रतिष्ठा और बैंक बैलेंस से भी नहीं मिलता है। तथाकथित बड़े कहे जाने वाले लोगों का यह भ्रम रहता है कि उनको अनुशासन की आवश्यकता नहीं है। लेकिन उनका यह सोचना महामूर्खता है।
6.) योगाभ्यास में सफलता पाने के लिये किसी पाखंडी गुरु का सामीप्य और उससे नामदान या दीक्षा आदि लेना,कोई बड़ा प्रशासनिक पद, सामाजिक -राजनीतिक प्रतिष्ठा और बैंक बैलेंस आदि का महत्व बिल्कुल गौण यानी न के समान है।इस प्रकार की मूढताओं से बचना आवश्यक है। किसी योग्य और समर्थ गुरु के मार्गदर्शन में सतत् अभ्यास और अनासक्ति से साधना करते रहें। अभ्यास और अनासक्ति स्वयं ही करने होते हैं।कोई दूसरा आपके लिये यह सब नहीं कर सकता है।यह कोई ऐसा अनुष्ठान या कर्मकांड नहीं है जिसको करे कोई अन्य और फल आपको मिल जाये।ऐसा असंभव है। यहां सिफारिश नहीं चलती है। यहां चापलूसी और धनाढ्य होने की अकड़ नहीं चलती है।इसीलिये इसको शुरू में ही स्पष्ट करते हुये महर्षि पतंजलि कहते हैं -
अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोध:।। (योगसूत्र, समाधिपाद,12)
यानी सतत् अभ्यास और अनासक्ति से चित्त की वृत्तियों पर नियंत्रण हो सकता है।
7.) 'योग' कोई व्यायाम,कसरत, शारीरिक तोड़-मरोड़,सैर, प्रतियोगिता या खेल नहीं है।यह किसी से आगे जाने या किसी से पीछे होना नहीं है।यह स्वयं के द्वारा,स्वयं के ऊपर और स्वयं में रुपांतरण का विज्ञान है।पिछले कुछ वर्षों से 'योग' को एक खेल के रूप में प्रचलित करके एक प्रतियोगिता कहा जा रहा है।यह ठीक नहीं है। प्रतियोगिताओं के रूप में जो भी आजकल 21 जून को या योग केंद्रों और शिक्षा संस्थानों में किया जा रहा है,वह न तो योगासन है,न योगाभ्यास है बल्कि एक प्रकार की व्यायामासन खेल प्रतियोगिता है।इसका सनातन भारतीय योगाभ्यास से कोई भी संबंध नहीं है। इसके अतिरिक्त देश- विदेशों में योगाभ्यास की आड़ में जो हाटयोग,स्काईयोग, म्यूजिकयोग,
रोपयोग,रिदमयोग,वार्मअप योग,उछल-कूद योग,आईसयोग,वैपरयोग,बाबायोग,जग्गीयोग, श्री श्री योग आदि विभिन्न प्रकार के मूढतापूर्ण प्रयोग करवाये जा रहे हैं, उनका भी सनातन भारतीय योगाभ्यास से कोई लेना-देना नहीं है।इन सबसे साधकों को कुछ शारीरिक लाभ और गुरुओं को प्रसिद्धि के साथ धन- दौलत अवश्य मिल जाते हैं, लेकिन वृत्तियों के नियंत्रण में इनका कोई योगदान नहीं है।
8.) महर्षि पतंजलि ने एक महत्वपूर्ण सूत्र 'चित्तवृत्तिनिरोध' से भिन्न चित्त की अवस्था के संबंध में कहा है।जब चित्त की वृत्तियों पर द्रष्टा यानी किसी साधक या व्यक्ति का नियंत्रण नहीं होता है तो चित्त काम, क्रोध ,लोभ,मोह,द्वेष, ईर्ष्या, कामुकता, बदले की भावना,प्रेम, घृणा आदि वृत्तियों जैसा ही हो जाता है।चित्त के कार्य करने की प्रक्रिया जैसे जटिल विषय को इतनी सरलता और सहजता से आज तक किसी भी योगी और मनोविद् ने नहीं समझाया है। इससे एक विषयासक्त और इंद्रियजयी,भोगी और योगी व्यक्ति में भेद-रेखा स्पष्टता से पहचान में आ जाती है। भौतिकविद् भौतिक पदार्थ पर काम करते हैं जबकि अध्यात्मविद् चेतना पर काम करते हैं। आचार्य रजनीश ने महर्षि पतंजलि को चेतना का वैज्ञानिक कहा है। लाखों वर्षों के कालखंड में दस प्रसिद्ध भारतीय मनीषियों में उन्होंने महर्षि पतंजलि को भी गिनवाया है। चित्तवृत्तिनिरोध से भिन्न चित्त के संबंध में महर्षि पतंजलि कहते हैं -
वृत्तिसारुप्यमितरत्र।।( समाधिपाद,4)
9.) योग - महाविज्ञान में मौजूद श्वास और मन के परस्पर संबंध के रहस्य को उद्घाटित करते हुये हठयोगी स्वात्माराम ने कहा है-
चले वाते चलं चितं निश्चले निश्चलं भवेत्।
योगी स्थाणुत्वमाप्नोति ततो वायुं निरोधयेत्।।
( हठयोग प्रदीपिका,2/2)
इसका अर्थ है कि जब श्वास -प्रश्वास चलती है तो मन भी चलता है और जब श्वास -प्रश्वास पर नियंत्रण हो जाता है तो मन पर भी नियंत्रण हो जाता है। श्वास -प्रश्वास पर नियंत्रण होने से योगाभ्यासी को अचल मन: स्थिति प्राप्त हो जाती है। वह अडिग बन जाता है। बाहरी विषय उसे परेशान नहीं कर सकते। विषयों की ओर जाते हुये मन पर उसका पूर्ण नियंत्रण हो जाता है।इस श्लोक से यह पूरी तरह से समझ में आता है कि या तो श्वास -प्रश्वास पर नियंत्रण कर लो या फिर मन पर नियंत्रण कर लो। पहले वाले योग साधक को प्राणयोगी तथा दूसरे वाले योग साधक को राजयोगी कहा गया है। सीधे ही मन पर या विचारों पर नियंत्रण लगभग असम्भव है, इसलिये सर्वप्रथम यम,नियम, आसन वाले तीन अनुशासन में पारंगत होकर प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिये। प्राणायाम महर्षि पतंजलि के अष्टांगयोग में चौथा अनुशासन है।
10.) यहां पर ध्यान देने योग्य बात यह है कि चारों तरफ जो योग -केंद्रों, पार्कों,बाग- बगीचों, सरकारी कार्यालयों और शिक्षा -संस्थानों में योगाभ्यास करने वालों की भीड़-भाड़ दिखाई दे रही है,वह किस प्रकार का योगाभ्यास कर रही है?इस योगाभ्यास में महर्षि पतंजलि प्रोक्त योग के चौथे अनुशासन 'प्राणायाम' या हठयोग के ग्रंथों में वर्णित आठ प्रकार के प्राणायामों का सही तरीके से अभ्यास किया या करवाया जा रहा है या नहीं? भारत और विदेशों में स्थित लाखों योग -केंद्रों में से गिनती के योग केंद्र ऐसे होंगे, जहां पर सनातन शास्त्रीय मर्यादा अनुसार प्राणायाम का अभ्यास किया और करवाया जाता है। अधिकांश जगहों पर प्राणायाम की आड़ में सिर्फ गहरी श्वसन क्रिया का अभ्यास हो रहा है। सही तरीके से प्राणायाम करने के लिये सर्वप्रथम यम, नियमों को आचरण में स्थान देकर घंटे आधे घंटे तक एकासन में अविचल बैठने का अभ्यास आवश्यक है। आजकल के आपाधापी और व्यापार के युग में किसी के पास न तो इतना समय ही है तथा न ही किसी के पास इतना संयम और तप है। बड़े बड़े धुरंधर अंतरराष्ट्रीय योगी कहलाने वाले लोग भी प्राणायाम के नाम पर सिर्फ श्वास- प्रश्वास का अभ्यास कर और करवा रहे हैं।यही कारण है कि इस प्रकार के नकली प्राणायाम का कोई गहरा और स्थायी प्रभाव साधकों के शरीर, प्राण, विचार,मन और भावनाओं पर नहीं पड़ रहा है। और इसीलिये आजकल के इन प्रसिद्ध योगाचार्यों, संतों, बाबाओं और योग महर्षियों को या तो अपने आयुर्वेदिक उत्पाद के रूप में चूर्ण, चटनी,टाफी,जूस, च्यवनप्राश, हैल्थ ड्रिंक,जींस,कच्छे, बनियान,सैक्सवर्धक गोलियां
बनाकर बेचने पड़ रहे हैं या फिर गंडे, ताबीज़, कड़े,माला,धागे,भभूत, नारियल, मूर्तियां,लाकेट,अंगुठियां, रुद्राक्ष और मिट्टी आदि बेचने पड़ रहे हैं। इनके नकली योगाभ्यास , जल्दी सफलता पाने की महत्वाकांक्षा, धन- दौलत की चाह,अंधभक्तों की भीड़-भाड़, आलीशान आश्रमों का लालच और महंगी गाड़ियों की वासना और विज्ञापन की धूमधाम के कारण यह सब हो रहा है। यदि ऐसे उच्छृंखल भोगी लोगों को योगी या योगाचार्य कहोगे तो अभ्यास, वैराग्य, संयम, त्याग, तपस्या, करुणा , अपरिग्रह, संतोष, अहिंसा,सत्य, ब्रह्मचर्य,शौच, स्वाध्याय आदि का आचरण करने वाले योगियों को क्या कहोगे?
11.)पिछले 100-125 वर्षों के दौरान आसन को व्यायाम के रूप में प्रचलित करने में अनेक योगाचार्य सम्मिलित हैं।आसन के द्वारा शारीरिक सौष्ठव, सौंदर्य और देहयष्टि को सुडौल बनाने पर जोर देकर इन्होंने योग साधकों को'चित्तवृत्तिनिरोध' से दूर ले जाने में सहयोग करके योग के मूल-भाव को जनमानस से लुप्त सा कर दिया है।रह रहकर ये योगाचार्य मन नियंत्रण की बातें भी करते रहे लेकिन जनमानस में शरीर और इंद्रियों के प्रति सहज राग होने के कारण उन्हें योग का यह विकृत और आधा अधुरा रुप ही ठीक लगा। 'महाजनों येन गत: स पंथा' की सीख को शिरोधार्य करके इन्होंने इसे ही वास्तविक योग स्वीकार कर लिया। पाश्चात्य औपनिवेशिक विचारकों का भी यही लक्ष्य था कि किसी तरह मन नियंत्रण वाली इस सनातन योग विद्या को अब्राहमिक भौतिकवादी जडवादी उपयोगितावादी रुप दे दिया जाये। योगेन्द्र,कुवलयानंद,कृष्णामाचार्य, अयंगर, भारतीय योग संस्थान,आर्य वीर दल, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और बाद में रामदेव आदि द्वारा इसी को खूब प्रचारित किया गया।आज यह शारीरिक तोड़-मरोड़ वाला व्यायाम,कसरत और खेल ही योग बनकर रह गया है। लेकिन यह पूरी तरह से भटकाव है। आश्चर्यजनक है कि इनमें से आर्यसमाज को छोड़कर किसी संगठन ने भी भारत की स्वतंत्रता के संग्राम में हिस्सा नहीं लिया। पता नहीं किसलिये ये अपने शरीरों को मजबूत बना रहे थे?21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मनाने में भी योग की यही आधकचरी अवधारणा प्रचारित हो गई है।
12.) महर्षि पतंजलि ने अपने 5500 वर्षों पुरातन 'योगसूत्र' में आसन को अष्टांगयोग में तीसरा अनुशासन कहा है। इसमें आसन को देह की स्थिरता, सहजता,दृढता आदि के रूप में लिया है।आसन को स्पष्ट करते हुये महर्षि पतंजलि ने तीन सूत्र दिये हैं -
स्थिरसुखमासनम्।।
प्रयत्नशैथिल्यअनंतसमाप्तिभ्याम्।।
ततो द्वंद्वान्भिघात:।।
(योगसूत्र,साधनपाद,46-48)
इनका अर्थ है स्थिरता और सुखपूर्वक बैठना आसन है।आसन में इस प्रकार बैठने से शरीर की सभी हलचल समाप्त होकर साधक अपने निज स्वरूप में स्थित होने की ओर अग्रसर होता है। इससे सुख- दुख, सर्दी- गर्मी और मौसम परिवर्तन को सहने की योग्यता अर्जित हो जाती है। इसके पश्चात् ही कोई योग- साधक योग के चौथे अनुशासन 'प्राणायाम' का अभ्यास करने में समर्थ होता है। ध्यान रखने की बात यह है कि इस प्रकार से आसन का अभ्यास शायद ही कोई योग -केंद्र या योगाश्रम करवाता होगा। वास्तविकता यह है कि आसन की जिस अवधारणा को आजकल प्रचलित कर दिया गया है,वह अवधारणा पुरातन काल में नटों और युद्धक कला का अभ्यास करने वालों के लिये होती थी।इसे आजकल 'मार्शल आर्ट' कह दिया जाता है।भारत की पुरातन युद्धक कला 'कलारीपयट्टू' से ही संसार की सभी मार्शल आर्ट का विकास हुआ है।
13.) 'योगा फार हैल्दी एजिंग' का लक्ष्य केवल कसरत करने, व्यायाम करने, शारीरिक तोड़-मरोड़ करने और नटबाजी से कैसे हासिल होगा?इस पर विचार न करके अरबों रुपए प्रचार -प्रसार पर उडाये जा रहे हैं।कसरत और व्यायाम करना तो पहले से ही मौजूद है। क्या ऐसे लोगों का बुढ़ापा सुखप्रद और आरोग्यप्रद होता है? कहीं ऐसा दिखाई तो नहीं दे रहा है।हर तरफ चिकित्सकों के वहां पचास-साठ वर्ष के लोगों की भीड़ लगी रहती है।अस्थमा,श्वास ,शूगर, खांसी,घूटनों की खराबी, जोड़ों में दर्द,लीवर सूजन,गूर्दो में विकार, मोतियाबिंद आदि भयंकर बिमारियों से ग्रस्त बुजुर्ग लोगों की चिकित्सा या इन बिमारियों की रोकथाम क्या कसरत, व्यायाम, नटबाजी रुपी नकली योगाभ्यास से हो जायेगी?साक्ष्य आधारित विज्ञान का युग होने का दंभ भरने वाले शिक्षक, प्रोफेसर, चिकित्सक, योगाचार्य, वैज्ञानिक, शोधार्थी भी इस विषय पर प्रश्न, जिज्ञासा, संदेह नहीं कर रहे हैं। चापलूसी,अंधभक्ति, हां जी - हां जी करके मूंडी हिलाने वाली मंदबुद्धि भीड़ सनातन- विद्या 'योग और योगाभ्यास' का कल्याण कैसे करेगी? किसी को भी इसकी चिंता नहीं है। सभी अपने- अपने नंबर बनाने, फोटो खिंचवाने और सर्टिफिकेट लेने में लगे हुये हैं।
14.)छुटभय्ये वैज्ञानिक भी होते हैं।अधकचरे वैज्ञानिक भी होते हैं।प्रकृति को केवल भोग की वस्तु मानने वाले वैज्ञानिक ही होते हैं। सुंदर धरती ग्रह को अधिकांश जीव- जंतुओं के लिये नारकीय बना देने वाले भी वैज्ञानिक ही होते हैं। एकतरफा तथ्य को महत्व देकर सत्य के विरोधी भी वैज्ञानिक होते हैं। मनुष्य में मौजूद अनेक प्रकार की शक्तियों में से केवल विचार को प्रधान मानकर भाव के विरोधी भी वैज्ञानिक ही होते हैं।स्वार्थ और बस उपयोगिता की प्रधानता।यूज एंड थ्रो और डिवाईड एंड रूल।तोडते जाओ और तोड़ते जाओ।गुरुओं और वैज्ञानिकों का यह धंधा बन चुका है। दोनों एक ही नाव में सवार हैं। समझे बिना स्वीकार मत करो। और यदि समझ गये तो स्वीकार अस्वीकार व्यर्थ हो जायेंगे। किसी को पकड़ा तो धोखा खाओगे और यदि नहीं पकड़ा तो पश्चाताप रहेगा कि पकड़ लेते तो पता नहीं कौनसी क्रांति हो जाती।सब कुछ अधकचरा, अपरिपक्व और सतही सा है।इन सबके बीच में हमारी स्वयं की समझ साथ निभाती है। लेकिन उस पर विश्वास न करके किसी गुरु, वैज्ञानिक, ग्रंथ, संप्रदाय पर विश्वास करने की ओर बढ जाते हैं। आज हालात यह हो गई है कि स्वयं की समझ को उजागर करने में हमारे गुरु और भौतिकविद् दोनों बाधा बने हुये हैं। इसमें जिस विषय से सर्वाधिक मदद मिल सकती है,उस विषय 'योग और योगाभ्यास' का कबाड़ा कर दिया गया है। जहां भौतिक विज्ञान के अपने नियम और अनुशासन होते हैं, वहीं पर 'योग- महाविज्ञान' के अपने नियम, अनुशासन,संयम, तपस्या और सावधानियां आदि होते हैं। लेकिन महीना दो महीना शारीरिक कसरत और उठा-पटक करवाकर लोगों को प्रामाणिक योग शिक्षक के सर्टिफिकेट लाखों की संख्या में वितरित किये जा रहे हैं। जिनको इस योग विद्या का क ख ग भी नहीं आता है,वो भी भारत प्रसिद्ध योगाचार्य और योग -विशेषज्ञ बनकर लाखों लोगों को योगाभ्यास करवा रहे हैं।
15.)आगे को बढी और नीचे लटकी हुई बड़ी- बड़ी तोंद, भारी- भरकम कमर,आंखों पर बड़े -बड़े चश्मे,टाईट पोशाक,चमड़े की धारण की हुई टाईट बैल्ट और धन- दौलत -पद- प्रतिष्ठा- प्रधानी की हिमालय समान अकड़ - आज के अधिकांश योग- शिक्षकों और योगाभ्यास के हिमायतियों की यही पहचान है। कोई कुछ टिप्पणी कर दे तो देशद्रोही, पाकिस्तानी, खालिस्तानी घोषित कर देंगे।इनकी हरेक तर्कहीन और उल्टी-सीधी बात को मान लो तो ठीक वरना आपकी खैर नहीं। ज्यों ही कोई विद्या या विषय या व्यक्ति प्रसिद्ध हुआ नहीं कि वोट के भूखे लूटरे नेता लोग वहां पर जबरदस्ती से प्रवेश करके सब गुड़ गोबर कर देते हैं। और आजकल के योगाचार्यों और धर्माचार्यों को मोह, माया,पद,प्रतिष्ठा,धन, दौलत से इतना अधिक लगाव है कि ये तुरंत धूर्त नेताओं से सांठगांठ कर लेते हैं।योग और योगाभ्यास जाये भाड़ में।बस भारत और भारत से बाहर यही चल रहा है।
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डॉ. शीलक राम आचार्य
दर्शनशास्त्र-विभाग
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय
कुरुक्षेत्र -136119
चंदे की लूटपाट
चंदे की लूटपाट
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चंदे की लूट है
राम की आड़ में।
अय्याशी चलेगी
दुनिया भाड़ में।।
राम का नाम बस
मस्त चंदाचोर हैं।
असली राम भक्त
बना दिये ढोर हैं।।
धर्महीन लूटेरे जो
नहीं कोई मर्यादा।
घर निज भर रहे
ज्यादा से ज्यादा।।
दूध की रखवाली
करवा रहे बिल्ली।
छोटे लूटेरे बर्बाद
बड़े लूटेरे दिल्ली।।
धर्मगुरु राजनीति
नेता धर्मगुरु बने।
असली रामभक्त
बजा रहे झुनझुने।।
पावन बस वेश है
बैठा शैतान भीतर।
नीतिविहीन बने हैं
गौमांसभक्षी चरित्र।।
हो रहे सभी प्रयास
सनातन बदनामी के।
पदासीन सरंक्षक नहीं
बिना लूट कहानी के।।
गजनी पछता रहा
सिर गौरी पीट रहा।
इतना लूट न पाये
लूट का परमिट रहा।।
चंगेज आश्चर्य भरा
नादिर रुदन करता।
आज का धर्मगुरु ही
लूटपाट में विचरता।।
असली जो धर्माचार्य
बैठा दिये हैं कोने में।
नकली धर्माचार्य बन
पापबीज को बोने में।।
रामनाम की लूट नहीं
धन-दौलत की लूट है।
छल,कपट, धोखाधड़ी
भक्ति इनकी अटूट है।।
राम धन या धन राम
भक्त कौन किसका है।
सत्व-प्रधान भयभीत
आसुरी लूट चस्का है।।
तुम बस दान करो
हम बस लूट करेंगे।
मूल्य वही सनातनी
जो हमको सूट करेंगे।।
न्यायालय हमारा है
पुलिस भी हमारे संग।
एजेंसी जी-हुजूरी करें
सिस्टम पूरा बना अपंग।।
सरेआम लूटेरे हम
देख लो तुम रोककर।
जिसको चाहे लूटेंगे
कहते सीना ठोककर।।
न भारत से मतलब
न सनातन फिक्र है।
अब्राहम मानसपुत्र
जीवन-शैली जिक्र है।।
राम हों चाहे कृष्ण
चाहे मनु भगवान् हों।
सांगा,प्रताप,शिवाजी
लूट सभी घमसान हों।।
कुछ अंधभक्त पहले से
कुछ को बना रखा है।
अरबों- खरबों लूट का
इसी से ही स्वाद चखा है।।
हमारी लूट राष्ट्रभक्ति
सेवा उनकी राष्ट्रद्रोह।
राष्ट्रसेवक जो मानते
वो प्रचंड मूर्ख ओह।।
लूट हमारा दर्शन है
लूट है हमारी नीति।
धन,जोबन छोड़कर
न धर्म,राष्ट्र से प्रीति।।
बाकी सब लूट लिया
मंदिरों की अब पारी।
चंदा हो या चढावा हो
लूट नीति सब पर भारी।।
कैसा भी लूटेरा हो
कोई बड़ा बदमाश।
बस हमारी शरण हो
करे सुखद अहसास।।
चोर,उचक्के,डाकू
छटे हुये अपराधी।
बलात्कारी कैसा भी
भोगासक्ति समाधि।।
सोना,चांदी लूट है
हजारों महंगी ईंट।
धर्म विकृत कर रहे
भ्रष्टाचरण अमिट।।
पाचन मजबूत है
सब कुछ पचता।
सत्य साधु ,सिद्ध
भाग रहा बचता।।
भवन आलीशान
महलनुमा निवास हैं।
इंद्र भी शर्मा जाये
अट्टालिकाएं खाश हैं।।
विद्यालय जर्जर हुये
टपकते बरसात में।
कंकालनुमा छात्र हैं
बैठे जैसे हवालात में।।
शिक्षा बर्बाद होई
शोध-कार्य बंद है।
करता जो लूटपाट
वही अक्लमंद है।।
भगवान् मंदिर चाहे
मंदिर चाहे शिक्षा का।
पेपर लीक हो रहे
भट्ठागोल परीक्षा का।।
लोकतंत्र बना लूटतंत्र
हितचिंतक यहां कौन।
जनमानस भयभीत सा
न्यायालय भी बैठा मौन।।
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डॉ. शीलक राम आचार्य
वैदिक योगशाला
वैचारिक,सामाजिक और नैतिक दायित्व -बोध की कमी से जुझता हुआ भारत (India grapples with a lack of ideological, social and moral responsibility.)
वैचारिक,सामाजिक और नैतिक दायित्व -बोध की कमी से जुझता हुआ भारत
1.) बतलाया जा रहा है कि योग का बाजार फिलहाल 138 अरब डालर का है।यह सन् 2033 ईस्वी तक 250 अरब डालर का हो जायेगा। इतने बड़े बाजार में भारत की भागीदारी सिर्फ 5 प्रतिशत के आसपास है। किसी भी विद्या को सजा संवारकर प्रस्तुत करके उसे व्यापार बना देने में यूरोपीय और अमरीकी लोग माहिर हैं। भारत के बाबा, स्वामी, संन्यासी और योगाचार्यों की नजर योग को व्यापार बना देने पर लगी हुई है। कोई योग करे या न करे,बस सुबह-शाम योगा मैट,अंग दिखाऊ कपड़े और पीने के पानी की बोतल आदि के साथ खुद को किसी न किसी योग केंद्र या योगाश्रम में दिखाना ही है।बस कुछ उल्टी- सीधी वार्म अप की क्रियाओं को किया, आसनों के नाम पर शरीर को तोडा -मरोड़ा,प्राणायाम के नाम पर गहरे श्वास लिये और भंवरे आदि की आवाज के साथ हुं हां की और हो गया योगाभ्यास।न कोई अनुशासन,न कोई संयम, न कोई होश,न कोई शास्त्रीय योगाभ्यास तथा न ही कोई सात्विक आहार- विहार। ढंग से शास्त्रीय योगाभ्यास करवाकर देख लेना - अधिकांश मैटधारी,लोवरधारी,बोतलधारी योग साधक बीच में छोड़कर भाग जायेंगे और दोबारा वहां पर कभी नहीं आयेंगे। 21 जून अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पूरी तरह से राजनीतिक कार्यक्रम बन चुका है।इसे भारत में तो राष्ट्रीय राजनीति दिवस या राष्ट्रीय रैली दिवस घोषित कर दिया जाना चाहिये।योग और योगाभ्यास की आड़ में जनमानस को बेवकूफ बनाया जा रहा है।कुछ भी अनैतिक करके स्वयं को सही और बाकी सभी को गलत सिद्ध करना - यह योग नहीं अपितु उन्मुक्त भोग है। धर्म, संस्कृति,अध्यात्म, साधना, आयुर्वेद,योग,तीर्थस्थल, पूजा-पाठ,गाय, गंगा, गायत्री, गीता,गणेश,गणवेश आदि सभी को घटिया राजनीति का माध्यम बनाया जा रहा है। और नहीं तो केवल 'योग' को तो छोड़ देते। अपनी लूटेरी और भ्रष्ट राजनीति से योग को तो दूर रखते। लेकिन नहीं इसमें भी राजनीति को घुसेड़ दिया गया है।लोग सुबह-सुबह योगाभ्यास करने के लिये बुलाये गये और शुरू हो गई राजनीतिक भाषणबाजी।आज अनेक जगहों पर इस धींगामुश्ती के फलस्वरूप लोगों ने खूब अफ़रा-तफ़री मचाई है। आज के योगाभ्यास में 'यम' के अंतर्गत मौजूद 'सामाजिक अनुशासन' के रूप में अहिंसा,सत्य, अस्तेय,ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह कहीं भी दिखाई नहीं दे रहे थे। और 'नियम' के अंतर्गत मौजूद शौच, संतोष, तप ,स्वाध्याय ईश्वरप्रणिधान रुपी व्यक्तिगत अनुशासन की धज्जियां उड़ती हुई देखी जा रही हैं। योगाभ्यास के विभिन्न मंचों पर राजनीतिक रुप से सर्वोच्चता ग्रंथि के मनोरोगियों का कब्जा हर कहीं पर देखा गया है। शारीरिक रूप से बिमार बड़ी- बड़ी तोंद निकले,कमर की जगह पर कमरा लिये तथा चश्मे लगाये हुये तथा मरियल से चलने में अशक्त लोग अधिकांशतः जनमानस को योगाभ्यास का महत्व बतलाते हुये दिखाई दे रहे हैं।
2.)तथाकथित बड़े -बड़े योगाचार्य भी इस मूढ़ता पर चुप्पी साधे बैठे हैं कि 30-35 हजार लोगों की रैलीनूमा भीड़ के साथ योगाभ्यास नहीं होता है।इतनी भीड़ तो एक साथ कोई व्यायाम भी सही ढंग से नहीं कर सकती है, योगाभ्यास तो बहुत दूर की बात है। लेकिन यह मूढ़ता योगाभ्यास की आड़ लेकर चल रही है।या तो इन तथाकथित योगाचार्यों को योग विद्या का क ख ग भी नहीं आता है या फिर पद, प्रतिष्ठा और पैसे के लालच में ये जानबूझकर कुछ नहीं बोल रहे हैं। इनमें से एक बात तो सच अवश्य है। किसी प्रकार का हल्का व्यायाम या सूक्ष्म क्रियाएं या वार्म भी भीड़ में भलि तरह से नहीं होता है। क्योंकि एक तो अफरातफरी में गलत ठीक करने का ध्यान नहीं रहता है। दूसरे कोई यदि गलत कर रहा है है तो प्रशिक्षकों का हरेक व्यक्ति पर ध्यान दिया जाना असंभव है। तीसरा इस तरह की भीड़-भाड़ में हरेक व्यक्ति दिखावा करने के भाव से बैठा हुआ होता है। एकांत,चित्तवृत्ति निरोध, स्वच्छ परिवेश,खुला आसमान,धूल- धुवां रहित स्थान आदि का इसमें कोई ख्याल नहीं होता है।इस प्रकार के आयोजन राजनीतिक और व्यापारिक होते हैं।इनका योगाभ्यास से कोई मतलब नहीं होता।एक उच्च कोटि की विद्या को किस तरह से उसके ही लोगों द्वारा विकृत किया जाता है,उसका यह उदाहरण सामने है।
3.)योगाभ्यास एकांत और शांत स्थान पर विराजमान होकर किया जाता लेकिन आजकल के योगाचार्य भीड़-भाड़,हो -हल्ले,चिल्ल -पों और शोर-शराबे में योगाभ्यास करना और करवाना आवश्यक समझते हैं। सही बात तो यह है कि इन्हें योगाभ्यास से कोई मतलब नहीं होता है। इनको तो कुछ भी करके पद, प्रतिष्ठा, प्रसिद्धि, फोटोशूट और धन- दौलत चाहिये। एकांत और शांत परिवेश में शांति तो मिल जायेगी लेकिन पद, प्रतिष्ठा आदि नहीं मिल सकते।एक साधारण योग -साधक से लेकर राजा तक योगाभ्यास की आड़ में फोटोशूट करवाने में लगे रहते हैं।यह योगाभ्यास की अवन्नति, गिरावट और पतन का काल चल रहा है।मोटे रुपये लेकर विश्वविद्यालयों,योग केंद्रों और योगाश्रमों तक में आनलाईन योगाभ्यास करवाया जा रहा है और धड़ल्ले से तक इंटर्नशिप करवाई जा रही हैं।
4.)वैज्ञानिक पिछले 300 वर्षों से कहते आ रहे हैं कि विज्ञान के अनुसार जीवन जीओ,यह धरती स्वर्ग बन जायेगी। अपने जीवन में विज्ञान और वैज्ञानिक खोज से प्राप्त तकनीक का प्रयोग करो, जीवन खुशहाल बन जाएगा। वैज्ञानिक ढंग से चिकित्सकों के बतलाये अनुसार आहार ग्रहण करो, कभी बिमार नहीं होओगे। वैज्ञानिक ढंग से शिक्षा ग्रहण करो, बेरोजगार नहीं रहोगे। वैज्ञानिक ढंग से वस्त्र धारण करो,निरोग रहोगे।बिमार होने पर जीवन रक्षक एलोपैथिक दवाईयों, विभिन्न जांच, महंगे चिकित्सकों और मल्टी विटामिन आदि की शरण में जाओ। परमात्मा भी आपका कुछ नहीं बिगाड़ पायेगा। विज्ञान, वैज्ञानिक, वैज्ञानिक मशीनरी, वैज्ञानिक जांच- पड़ताल, वैज्ञानिक जीवन-शैली को अपने जीवन में उतार लो। इससे आप एक उच्च स्तरीय जीवन जीने में सफल होओगे। लेकिन ऐसा तो कुछ भी नहीं हुआ है। जितना विकास हुआ, उतना ही चहुंओर विध्वंस दिखाई दे रहा है।जीवन के हरेक स्तर पर अव्यवस्था मौजूद है। भेदभाव और भ्रष्टाचार चरम है। तीन चौथाई विश्व के लोग अशिक्षा,भूखमरी, बेरोजगारी,अन्याय, बिमारियों और आतंक से जूझ रहे हैं। विज्ञान ने सुविधाएं देकर विश्व का अमन,चैन और भाईचारा छीन लिया है।
5.)धर्म विज्ञान अनुसार हो तथा विज्ञान धर्मानुसार हो-इस पर न तो वैज्ञानिक सहमत हैं तथा न ही धर्माचार्य सहमत हैं। दोनों का धंधा खतरे में पड़ जाता है।इस समय वैज्ञानिकों का पलड़ा भारी है और धर्मगुरुओं का पलड़ा हल्का है।इसीलिये सभी धर्माचार्य स्वयं के विचारों, विश्वासों, धारणाओं, कर्मकांडों और मान्यताओं को वैज्ञानिक सिद्ध करने में लगे रहते हैं।इनकी इतनी हिम्मत नहीं है कि ये वैज्ञानिकों से यह कहने की हिम्मत कर सकें कि विज्ञान को भी धार्मिक और आध्यात्मिक होना चाहिये। आखिर धर्म को ही वैज्ञानिक क्यों होना चाहिये? विज्ञान को भी तो धार्मिक और आध्यात्मिक होने की हिम्मत करना चाहिये। लेकिन इस विषय में दोनों ही पक्ष धूर्तता से कार्य कर रहे हैं। दोनों को अपने धंधे की चिंता है। यहां पर मौजूद जनमानस, पशुओं,पक्षियों, पेड़-पौधों, नदियों, तालाबों, झीलों, समुद्रों, पहाड़ों, जंगलों से दोनों में से किसी को कोई लेना-देना नहीं है।
6.)सफलता का कोई निश्चित फार्मूला नहीं होता है। हालांकि जिनको अपने स्वयं की धारणाओं को दूसरों पर थोपने की जिद्द होती है, वो सभी सफलता के निश्चित और अचूक फार्मूले बतलाते हुये मिलेंगे। धर्माचार्य, गुरु,संत,मोटीवेशनल स्पिकर,शिक्षक और नेता आदि सभी इस प्रकार के फार्मूले बतलाते हुये मिल जायेंगे। लेकिन हकीकत की जांच करने पर उपरोक्त सभी गलत सिद्ध होते हुये पाये जाते हैं। सफलता के अचूक फार्मूले बतलाते हुये प्रतिभा, पुरुषार्थ, अनुशासन,संयम, धैर्य, समर्पण, निष्ठा आदि का गुणगान किया जाता है। लेकिन कोई लिखकर नहीं दे सकता है कि इनका पालन करने से सफलता मिल ही जायेगी। करोड़ों लोगों में उपरोक्त गुणों के होते हुये भी वो बुरी तरह से विफल होते हुये देखे जा सकते हैं। करोड़ों लोग ऐसे मिल जायेंगे जिनमें उपरोक्त गुण नहीं होते हुये भी उन्हें सफल होते हुये देखा जा सकता है।यदि सफलता का कोई निश्चित फार्मूला होता तो सभी उसे अप्लाई करते और पूरे संसार का हरेक व्यक्ति सफल होकर खुशहाल जीवन जीता। लेकिन ऐसा कहीं हो नहीं रहा है। पिछले 250-300 वर्षों से विज्ञान भी सुखी, समृद्ध और खुशहाल होने के अचूक फार्मूले बतलाता आ रहा है लेकिन परिणाम हम सबके सामने विषमता, बेरोजगारी, बदहाली, अन्याय, अत्याचार, भ्रष्टाचार, हिंसा, तनाव, हताशा और युद्धों के रूप में मौजूद है। जब वैज्ञानिकों से जवाब मांगा जाता है तो वो आगबबूला होकर रुढ़िवादी और पिछड़ा हुआ होने के आरोप लगाकर चुप करवाने का प्रयास करते हैं।
7.)पाश्चात्य किस्म की लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक और प्रशासनिक सिस्टम शायद कभी मेहनतकश और सत्यनिष्ठ व्यक्ति के साथ सहयोग करके आगे बढ़ता होगा। सिस्टम कमोबेश ऐसा ही होता आया है।जनमानस पर कभी कम अत्याचार और कभी अधिक अत्याचार। जनमानस को सुरक्षा, रोजगार, शिक्षा, चिकित्सा,आवास, सड़क,पानी आदि मूलभूत सुविधाएं देने का वायदा करके सिस्टम जनमानस से कयी प्रकार के
महंगे टैक्स की उगाही करता है। लेकिन भ्रष्टाचार में लिप्त सिस्टम उस टैक्स के बदले जनमानस को एक प्रतिशत भी सुविधाएं प्रदान नहीं करता है। जनमानस से उगाही किये गये टैक्स का अधिकांश हिस्सा नेताओं, नेताओं के समीपवर्ती मित्रों, पूंजीपतियों,कोरपोरेट घरानों, उच्च अधिकारियों और न्यायविदों की अय्याशी पर खर्च होता है। जनमानस यदि आवाज उठाये या प्रश्न करे तो भ्रष्ट सिस्टम तानाशाही से उसका मुंह बंद कर देता है। इससे सैकड़ों गुना अच्छा सिस्टम तो पुराने भारतवर्ष का राजतांत्रिक सिस्टम था, जिसमें हजारों वर्षों तक भारत वास्तव में विश्वगुरु और विश्व महाशक्ति बना रहा था।
8.)वास्तविकता यह है कि विभिन्न प्रकार के मोटीवेशनल स्पिकर, गुरु, सुधारक आदि के चक्कर में पड़कर अपना जीवन बर्बाद मत करें। सफलता का कोई निश्चित और अचूक सूत्र न तो किसी के पास पहले था तथा न ही अब है।यह होने से वह निश्चित रूप से हो जायेगा तथा यह कर्म करने से निश्चित रूप से वह फल मिल जायेगा - यह बहुत बड़ा झूठ है।ऐसी शिक्षाओं और ऐसे शिक्षकों से सावधान रहें। ऐसे लोग स्वयं अपने जीवन में उन फार्मूलों को अपनाकर कभी सफलता प्राप्त नहीं कर पाये,जिन फार्मूलों को वो आपको बतला रहे हैं। ऐसे लोगों की सफलता आपको बेवकूफ बनाकर,अपने व्याख्यान सुनाकर,मोटीवेशन के बदले महंगी फीस वसूली करके और जनमानस को पुस्तकें बेचकर अर्जित की गई दौलत पर निर्भर है। बड़े शहरों में इन लूटेरों ने कोचिंग सेंटर रुपी भव्य आश्रम खोले हुये होते हैं।एक बहुत बड़ा धंधा है।यह लाखों करोड़ का बिजनेस है।
9.)जड़ प्रकृति में जिस तरह से कारणकार्य का वाद काम करता है,वह जनमानस के जीवन में बिल्कुल काम नहीं करता है।जिस प्रकार से प्रकृति के जड़ नियम काम करते हैं, ठीक उसी तरह से राजनीतिक -प्रशासनिक- विधिक-शैक्षणिक सिस्टम काम नहीं करता है। यहां पर कोई कारणकार्य नियम नहीं होता है। यहां पर तो धींगामुश्ती, तानाशाही,जोराजोरी, पहुंच, सिफारिश, रिश्वत, चापलूसी आदि का साम्राज्य रहता है। यहां कर्मफल का नियम बिल्कुल काम नहीं करता है।बस, भ्रष्ट सिस्टम द्वारा जनमानस को आजीवन चलने वाली यह ठगी समझ में आने से रोका जाता है। ताकि सिस्टम का भांडाफोड न हो जाये। ताकि जनमानस जाग न जाये। धर्माचार्य, नेता, कथाकार,शिक्षक, सुधारक आदि जनमानस को दिन -रात कर्म, पुरुषार्थ, मेहनत, प्रतिभा, बुद्धिमत्ता, सत्यनिष्ठा का महत्व समझाते रहते हैं और स्वयं कभी भी इस रास्ते पर नहीं चलते हैं। क्यों? क्योंकि इनको पता है कि राजनीतिक- प्रशासनिक -विधिक सिस्टम में उपरोक्त सात्विक गुण कभी काम नहीं करते हैं। यहां तो सदैव धींगामुश्ती, तानाशाही, अपराध, बेईमानी, भ्रष्टाचरण ही सफलता की कूंजी होता है।
10.)बुद्धिमान,चित्तवान, विवेकवान व्यक्ति किस समय पर क्या प्रतिक्रिया देगा,यह किसी को मालूम नहीं है।इस संबंध में कुछ भी पूर्व -निर्धारित और पूर्वनिश्चित नहीं है। परस्पर व्यवहार करने वाले व्यक्ति प्रकृति की तरह जड़ और निर्जीव नहीं हैं।किस कर्म के प्रति वो क्या प्रतिक्रिया देंगे,इस संबंध में कुछ भी नहीं कहा जा सकता है।इस संदर्भ में बौद्ध मत से पहले मौजूद अनिश्चयवादी विचारकों संजय वेलट्टिपुत्त आदि की याद आती है।सोच,विचार और चिंतन करके कार्य करने वाले मनुष्य समाज और इन द्वारा निर्मित संगठनों में कर्म और कर्म का फल बिल्कुल भी निश्चित नहीं है। राजसत्ता, धनसत्ता,धर्मसत्ता, विधिकसत्ता के अनुचित हस्तक्षेप से कुछ भी होना संभव है। इसलिये तथाकथित महापुरुषों की चिकनी चुपड़ी बातों में आकर अपना जीवन बर्बाद और गुलाम मत करें। भ्रष्टाचरण और अपराध से लबालब भरे हुये मौजूदा राजनीतिक -प्रशासनिक- विधिक सिस्टम में यह आपको निर्धारित करना है कि आप कर्म और कर्मफल में किस तरह से सामंजस्य बनाते हैं। यहां पर साम,दाम,दण्ड,भेद आदि सब चलता है।
11.) किसी मजहब, राजनीतिक दल, संगठन में सम्मिलित होने से जनमानस की समस्यायों के समाधान की बात बिल्कुल झूठी सिद्ध हो चुकी है। हिंदू, बौद्ध,जैन,ईसाई, इस्लामी,सिख,नव बौद्ध,सेक्यूलर, संघ,साम्यवादी आदि मत और कांग्रेस, भाजपा,सपा, बसपा,आआपा, डीएमके, जेडीयू आदि राजनीतिक दलों का हाल भारतीयों ने पिछले पचहत्तर वर्षों के दौरान देख लिया है। कमोबेश सभी लूटेरे,शोषक और भ्रष्टाचारी सिद्ध हुये हैं।इन सभी ने कभी न कभी दावे किये थे कि यदि हमारे साथ रहोगे तो तुम्हारी सभी समस्याओं का समाधान हो जायेगा। लेकिन परिणाम लगभग शून्य हैं। विभिन्न मजहबों ने समानता, भाईचारा,सह अस्तित्व,प्रेम, करुणा की बातें करके मतांतरण करवाये लेकिन बदले में हिंसा,वैमनस्य,द्वेष,भेदभाव आदि ही दिये। विभिन्न राजनीतिक दलों ने विकास,समृद्धि,न्याय, सुविधाएं देने के बदले में गरीबी, बदहाली, अव्यवस्था,अन्याय और शोषण ही दिये हैं।सभी के किये हुये वायदे झूठे निकले हैं।इस धरा का वर्तमान और भविष्य सनातन धर्म और संस्कृति के मार्गदर्शन और आचरण में निहित है। सार्वभौमिक और सार्वकालिक नैतिकता,आचरण,जीवन-मूल्य आदि सनातन धर्म और संस्कृति में मौजूद हैं। पिछले चार हजार वर्षों के कालखंड में विभिन्न मजहबों ने जो वायदे करके सनातनियों को अपने अपने मतों में दीक्षित किया था,वो सभी वायदे झूठे सिद्ध हो चुके हैं।
पिछले चार हजार वर्षों के दौरान विभिन्न राजनीतिक दलों और मजहबों के आपसी झगड़ों और युद्धों में 100 करोड़ के आसपास लोग मारे जा चुके हैं। इनमें सर्वाधिक संख्या सनातनियों की है। इस दौरान पैंतीस करोड़ सनातनी मारे जा चुके हैं। उपरोक्त आंकड़े विभिन्न गुरुओं और मजहबों, नेताओं और राजनीतिक दलों की वास्तविकता उजागर कर रहे हैं।
12.)संसार में सब कुछ अनिश्चित है। संसार में सब कुछ पूर्वनिश्चित है। संसार में कुछ अनिश्चित है तथा कुछ पूर्वनिश्चित है। संसार में अनिश्चित और पूर्वनिश्चित के संबंध में कुछ भी नहीं कहा जा सकता है। अपने आपको कोई संसारी कहता हो या वानप्रस्थी कहता हो या फिर संन्यासी कहता हो-सबके जीवन में इस प्रकार के प्रश्न उठते रहते हैं।इन प्रश्नों की ओर ध्यान नहीं दे पाते हैं -यह इसका एक अलग पहलू है। सभी लोग विचारक या चिंतक या तार्किक किस्म के नहीं होते हैं, इसलिये यह सब होता है। जीवन की समस्यायों, आपाधापी और आवश्यकताओं में उलझकर लोग उपरोक्त समस्या पर एक विचारक या दार्शनिक की तरह सोच नहीं पाते हैं।ये प्रश्न उठते सबके जीवन में हैं। सभी लोगों में इतनी सहनशक्ति और धैर्य नहीं होते हैं कि जीवन की समस्यायों से घिरे होकर भी उनके तार्किक ढंग से वैचारिक और दार्शनिक चिंतन कर सकें।लोग सफलता पाने के लिये प्रयास करते हैं। वो कभी सफल होते हैं तथा अधिकांशतः विफल होते हैं। पूर्वजों द्वारा बतलाई गई बातों, पूर्वजन्म के संस्कारों तथा पुरोहितों-संन्यासियों -स्वामियों -कथाकारों की बातों को सुन -सुनकर भरोसा कर लिया जाता है कि पिछले जन्मों या इस जन्म के किये अच्छे या बुरे कर्मों के कारण जीवन में ऐसा ही होता है। और लगभग व्यक्तियों का जीवन इसी परिपाटी पर चलता रहता है।इन प्रश्नों पर जो व्यक्ति तार्किक ढंग से सोच, विचार और चिंतन करना शुरू कर देता है,वह बहुत अधिक परेशान हो जाता है।उसकी परेशानियां उसे जीवन और जगत् के प्रति निराशावादी, आशावादी, संदेहवादी और संशयवादी बनाने में सहायक होती हैं।इन परेशानियों से उत्पन्न हताशा,कुंठा,तनाव, चिंता और अकेलेपन के दबाव को सहन करने की शक्ति कुछ ही लोगों में होती है। ऐसे लोग ही आगे चलकर महान चिंतक,विचारक,दार्शनिक, वैज्ञानिक और संन्यासी बनते हैं।
13.) निकम्मे,नाकारा और शोषक सिस्टम की यही पहचान होती है कि वह जनता से धन वसुलने के लिये बिजली के स्मार्ट मीटर,टोल टैक्स के लिये स्मार्ट फास्ट टैग पूरे देश में लगवा देगा लेकिन शिक्षा देने के लिये स्मार्ट स्कूल,खेलो के लिये स्मार्ट अकेडमी, किसानों को फसलों के पूरे दाम,मौसम की जानकारी, बीज प्रबंधन और फसल बिक्री देने के लिये स्मार्ट व्यवस्था नहीं करेगा।बिमार लोगों के लिये स्मार्ट हस्पताल खोलने की इन्हें फुर्सत नहीं है। रोड़ टैक्स और टोल टैक्स स्मार्ट व्यवस्था से भरपूर वसूली कर लेंगे लेकिन सड़क निर्माण की कोई स्मार्ट व्यवस्था नहीं है। टिकट देकर रुपये लेने की स्मार्ट व्यवस्था है लेकिन रेलवे में सुविधाओं की कोई स्मार्ट व्यवस्था नहीं है। शोधकर्ताओं से मोटी- मोटी फीस वसूली कर लेंगे लेंगे शिक्षा में शोध की कोई स्मार्ट व्यवस्था नहीं है। महंगी फीस भरकर शिक्षा प्राप्त कर ली लेकिन रोजगार देने की कोई स्मार्ट व्यवस्था नहीं है।कहने का आशय यह है कि जनता का खून चूसने की स्मार्ट व्यवस्था मौजूद हैं लेकिन सुविधाएं देने के नाम पर हमारा सिस्टम पूरी तरह से फिसड्डी सिद्ध हो रहा है।
14.) जड़ संसार की क्रियाओं को छोड़कर संसार में कुछ भी ऐसा है कि जिसके संबंध में यह कहा जा सके कि यह करने से यह फल अवश्य मिल जायेगा? कोई भी वैज्ञानिक,धर्मगुरु, सुधारक, योगाचार्य आदि इसका निश्चित दावा कर सकता है? फलां विश्वविद्यालय से पढ़ाई करने या फलां कोचिंग सेंटर से प्रतियोगिता की तैयारी करने से नौकरी हर हालत में मिल ही जायेगी,इसकी गारंटी कोई ले सकता है? फलां फलां भोजन ग्रहण करने से व्यक्ति कभी बिमार नहीं होगा,इसका दावा कोई चिकित्सक या भोजन विशेषज्ञ कर सकता है? फलां फलां योगाभ्यास करने से व्यक्ति को मानसिक शांति मिल ही जायेगी, क्या कोई योगाचार्य इसका दावा कर सकता है? फलां फलां ढंग से औलाद का पालन पोषण करने से वह बिगड़ेगी नहीं,ऐसी विधि कोई बतला सकता है? उपरोक्त प्रश्नों का उत्तर नहीं में ही होगा, हां में नहीं। निश्चित रूप से कोई कुछ भी उत्तर नहीं दे सकता तथा न ही कोई दावा कर सकता। जड़ जगत् में कुछ तो निश्चितता है लेकिन चेतन प्राणियों और उन द्वारा किये गये कर्मों के फल के संबंध में जगत् में कुछ भी निर्धारित या निश्चित नहीं है।कुछ भी परिणाम आ सकता है।हर परिणाम के लिये व्यक्ति को तैयार रहना चाहिये। श्रीमद्भगवद्गीता के युग तक जनमानस इस व्यवस्था को भलि तरह से समझता था तथा इसके अनुरूप जीवन भी जीता था। महाभारत युद्ध के 1500 वर्षों पश्चात् यह व्यवस्था भंग होकर रह गई। जीवन में एकतरफा तार्किकता,नैतिकता,धार्मिकता का अभाव होने का कारण नेताओं, धर्माचार्यों,सुधारकों और नीतिज्ञों की शिथिलता रही।कुछ भी नैतिक या अनैतिक करके मनचाहा फल पाने की अफ़रा-तफ़री मच गई। वहीं काल था,जब अनेक प्रकार के एकांगी मतानुयायियों निगंठ नाथपुत्त, सिद्धार्थ गौतम,संजय वेलट्टिपुत्त,प्रकुध कात्यायन,अजित केशकंबल,आजीवक, चार्वाक आदि ने जन्म लिया।इन सभी की विचारधारा सही थी लेकिन एकतरफा थी।उस समय होना तो यह चाहिये था कि पहले से मौजूद सर्वांगीण और बहुआयामी सनातन धर्म और संस्कृति की व्यवस्था में आई विकृतियों को दूर किया जाता। लेकिन ऐसा नहीं किया गया। उपरोक्त महापुरुषों के देहावसान के पश्चात् अनुयायियों ने एकांगी विचारधारा को ही सर्वांगीण जीवन शैली के रूप में प्रचलित और प्रचारित करने के प्रयास शुरू कर दिये।बस,इस अव्यवस्था का लाभ उठाकर अब्राहमिक विचारधारा के अंतर्गत पारसी, यहुदी आदि से प्रेरित जीवन-शैली ने सिर उठाना शुरू कर दिया।
15.) सनातन धर्म और संस्कृति में मीमांसा और श्रीमद्भगवद्गीता में मौजूद कर्म और कर्मफल की व्यवस्था ने अव्यवस्था पर लगाम लगाये रखी थी। इसमें कर्म करने पर जोर था तथा फल पाना अस्तित्व पर छोड़ने का नियम था।इस संदर्भ में सनातन धर्म के ग्रंथ सर्वाधिक वैज्ञानिकता लिये हुये हैं और ये ही जनमानस को सर्वाधिक सहायक सिद्ध हो सकते हैं। उदाहरण के लिये श्रीमद्भगवद्गीता का प्रस्तुत श्लोक जिसमें कर्म और कर्मफल के रहस्य को समझाया गया है। देखिये -
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूमा ये संगो..........।।(श्रीमद्भगवद्गीता, 2/47)
कर्म करने पर तुम्हारा अधिकार है, फल मिलने पर नहीं।कर्मफल में आसक्ति मत रखो लेकिन कर्म का त्याग भी मत करो। इससे अधिक आध्यात्मिक,धार्मिक, नैतिक, सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक व्यवस्था आज तक इस धरती पर नहीं जन्मी है। लेकिन अब तो एकतरफा भौतिकवाद के प्रचार-प्रसार के कारण लोग नैतिक- अनैतिक, धार्मिक -अधार्मिक, कानूनी- गैर-कानूनी आदि कोई भी कर्म करके जीवन में सफलता पाने का प्रयास कर रहे हैं। इससे अनिश्चितता का बढते जाना आवश्यक होता गया है।लोग मीमांसा सूत्र,श्रीमद्भगवद्गीता, योगसूत्र, योग वाशिष्ठ,महागीता,तंत्रयोग ,मंत्रयोग,
हठयोग आदि तथा विज्ञान और घटिया राजनीति का सहारा लेकर इनकी आड़ में अव्यवस्था फैलाने में लगे हुये हैं।इसका सर्वाधिक नुकसान पुरुषार्थी, मेहनतकश, सत्यनिष्ठ, नैतिक, प्रतिभाशाली और संवेदनशील लोगों को उठाना पड़ रहा है।
16.)आप सबने देख और समझ लिया होगा कि किस तरह से मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम और श्रीकृष्ण के पूजास्थलों की आड़ लेकर हजारों करोड़ रुपए का घपला किया गया है।यह घपला करने वाले कोई अब्राहमिक विदेशी हमलावर मजहबी लोग न होकर खुद को सनातनी कहने वाले लोग ही कर रहे हैं। ऐसे में सुधार और परिष्कार की आशा रखना बहुत कठिन हो गया है। इनको कुछ भी अनैतिक, अधार्मिक और भ्रष्टाचरण करके धन -दौलत और भव्य विलासिता चाहिये। गौमाता को मारकर व्यापार करना,गंगाशुद्धि की आड़ में धन ऐंठना, श्रीमद्भगवद्गीता की आड़ में अय्याशी करना तथा योगविद्या की आड़ में राजनीति करना इनके लिये पाप -कर्म नहीं है। धनसत्ता, धर्मसत्ता, राजसत्ता,प्रैससत्ता,न्यायसत्ता पर कब्जा करके यह सब इनके लिये और भी सहज हो गया है। सनातन धर्म और संस्कृति को फिलहाल विदेशी नहीं अपितु स्वदेशी गौरी, गजनी, चंगेज, नादिरशाह,अब्दाली, बख्तियार, अकबरों और औरंगजेब से खतरा है।
17.) सत्कर्म करते रहना बहुत भलि जीवन शैली है। लेकिन कुछ तथाकथित महापुरुष यह कहते पाये जाते हैं कि दूसरे क्या कर रहे हैं, इससे कोई मतलब मत रखो।बस,निज कर्म करते रहो। वास्तव में यह भी तो अनैतिकता को बढ़ावा देना कहा जायेगा। अपनी क्षमता, परिस्थिति और बलानुसार दूसरों के आचरण और व्यवहार के संबंध में भी जागरुकता करते रहना एक भले व्यक्ति का कर्तव्य है। मुझे क्या और तुझे क्या - वाली जीवन-शैली समाज के लिये घातक सिद्ध हो रही है। समझदार,पदेन और सज्जन कहलवाने वाले व्यक्तियों की चुप्पी ने सामाजिक व्यवस्था को और भी अधिक बिगाड़ दिया है। समाज से यदि कुछ लेते हैं तो बदले में कुछ देना भी चाहिये। पाश्चात्य शैक्षिक प्रभाव और राजनीति में भ्रष्टाचरण के चरम पर होने से भारतीयों में सामाजिक दायित्व बोध कम हो गया है।सब यह सोचने लगे हैं कि जब हमारे आदरणीय नेता, धर्मगुरु, स्वामी, संन्यासी, योगाचार्य,सुधारक, शिक्षक, न्यायाधीश और उच्च अधिकारी ही जमकर देश को लूट रहे हैं तो हम पीछे क्यों रहें?
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डॉ. शीलक राम आचार्य
दर्शनशास्त्र- विभाग
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय
कुरुक्षेत्र -136119


