Saturday, January 31, 2026

इक्कीसवीं सदी की 'लाईफ फिलासफी' (The 'Life Philosophy' of the 21st Century)


 

 


 दुनिया का सबसे पुरातन विषय 'दर्शनशास्त्र' कहा जाता है। दर्शनशास्त्र सवाल करना सिखाता है।दर्शनशास्त्र तर्क करना सिखाता है। दर्शनशास्त्र प्रमाण की मांग करना सिखाता है। दर्शनशास्त्र कारणकार्य से आगे बढ़ने की सीख देता है। दर्शनशास्त्र हरेक विषय, समस्या, विश्वास, आस्था और कर्म के संबंध में तार्किक चिंतन करके स्वीकार या अस्वीकार करने की योग्यता पर बल देता है।आज से 2500 वर्ष पहले शंकराचार्य ने जैन, बौद्ध, चार्वाक आदि से सवाल ही तो किये थे। लेकिन उनके सवालों का जवाब सही तरह से कोई नहीं दे पाया। काफी लोगों ने सनातन धर्म में वापसी कर ली ।जो अपनी पराजय को पचा नहीं पाये या फिर जो अंधभक्त थे, उन्होंने भारत से बाहर जाकर विदेशों में अपना प्रचार किया। महर्षि दयानंद सरस्वती ने उन्नीसवीं सदी में जैन,बौद्ध, चार्वाक, ईसाई, इस्लाम तथा हिंदुओं के विभिन्न मतों से सवाल ही तो किये थे।इसके फलस्वरूप काफी लोग सनातन धर्म में वापस आये तथा काफी लोगों को सनातन धर्म के सत्य स्वरूप का ज्ञान हुआ। बीसवीं सदी में आचार्य रजनीश ने स्थापित राजनीतिक, दार्शनिक, धार्मिक, आध्यात्मिक, सामाजिक, नैतिक व्यवस्था पर अनेक सवाल खड़े किये थे।इसके साथ- साथ उन्होंने हजारों सवालों का तार्किक समाधान भी जनमानस के सम्मुख प्रस्तुत किया।इक्कीसवीं सदी में राजीव भाई दीक्षित ने सनातन धर्म और संस्कृति के संबंध में पूर्वाग्रह से पैदा की गई टिप्पणियों के सटीक उत्तर दिये तथा सवाल उठाने वालों से अनेक सवाल भी किये। हालांकि सवाल उठाने वालों के साथ स्थापित सिस्टम ने कभी भी अच्छा व्यवहार नहीं किया। शंकराचार्य, महर्षि दयानंद सरस्वती, आचार्य रजनीश,राजीव भाई दीक्षित की असमय की गई हत्याएं इसका प्रमाण हैं।लेकिन ध्यान रहे कि जिस राष्ट्र की जनता सिस्टम से सवाल करना छोड देती है,वह अपने अधिकारों से भी हाथ धो बैठती है। और सिस्टम से सवाल नहीं पूछने का एकमात्र कारण सिस्टम के प्रति अंधभक्ति होती है। इसके दुष्परिणाम भी शीघ्र ही मिलने शुरू हो जाते हैं। किसी भी सिस्टम में यह देखा जा सकता है।बस देखने,जानने और समझने के लिये निष्पक्षता आवश्यक है। अंधभक्त के पास इन तीनों का अभाव होता है।

विज्ञान, धर्म, अध्यात्म,योग, राजनीति, व्यापार, शिक्षा,शोध आदि किसी भी क्षेत्र में यदि पाखंड, ढोंग और शोषण से बचना है तो तार्किक चिंतन करना,सवाल -जवाब करना, प्रमाण की तलाश करना और कारणकार्य में संबंध स्थापित करना बेहद आवश्यक है। उपरोक्त सभी क्षेत्रों में जो भी सवाल उठाने या तार्किक चिंतन से दूर भागता है,सोच लो कि वह आपका शोषण करने की तैयारी में है।वह उस- उस क्षेत्र में फिसड्डी है।वह अपने कर्तव्यों का भलि तरह से निर्वहन नहीं कर रहा है। ऐसे व्यक्तियों में यदि थोड़ी भी राष्ट्रभक्ति,धर्मभक्ति और मूल्यभक्ति बची है,तो उन्हें तुरंत उस क्षेत्र से हट जाना चाहिये।
आजादी के पश्चात् भारत की इस विषय में स्थिति सोचनीय हो गई है। हमारे धर्मगुरु, योगाचार्य,नेता, सुधारक और यहां तक कि वैज्ञानिक भी सवाल- जवाब से दूर भाग रहे हैं।

हमारी ही नहीं अपितु समस्त संसार की शिक्षा -व्यवस्था विज्ञान और तकनीक की ओर जाने पर जोर जबरदस्ती कर रही है।इस जोर जबरदस्ती का परिणाम समस्त संसार में आतंकवाद, उग्रवाद, भ्रष्टाचार, अव्यवस्था, अनैतिकता, लूटपाट, बलात्कार, शोषण और युद्ध का बोलबाला है। शांति,संतोष,संतुलन, समन्वय, सह-अस्तित्व तो कुछ समय के लिये ही दिखाई देते हैं।यह कुछ समय भी शायद शांति आदि के लिये न होकर अशांति, अव्यवस्था, आतंकवाद और युद्धों की तैयारी का काल जान पड़ता है। भौतिक विकास गलत नहीं है लेकिन एकतरफा भौतिक विकास ने संसार को अव्यवस्था,विनाश और युद्धों की भूमि बनाकर रख छोड़ा है। प्राथमिक से लेकर विश्वविद्यालयीन कक्षाओं तक का मुख्य उद्देश्य विज्ञान और तकनीक आधारित हो गया है। इससे भौतिक विकास तो बहुत अधिक हो रहा है लेकिन जीवनमूल्यों का प्रतिवर्ष ह्रास होता जा रहा है।इस भौतिक विकास का लाभ भी संसार के कुछ प्रतिशत लोगों तक ही पहुंच रहा है।कुल मिलाकर इसे विकास कहें या विनाश कहें -इसे कोई कम समझ वाला व्यक्ति भी बतला सकता है। लेकिन क्योंकि वर्तमान विकास की शैली का निर्धारण भी विज्ञान और तकनीक के हाथों में न होकर उद्योगपतियों, पूंजीपतियों और कोरपोरेट घरानों के हाथों में है।

इसके साथ में एक और भी दुर्घटना घटित हो रही है और वह है धर्म के क्षेत्र में नेताओं का प्रवेश तथा राजनीति के क्षेत्र में धर्मगुरुओं की घुसपैठ। दोनों एक दूसरे के क्षेत्रों में जगह बनाने की भरपूर कोशिशें कर रहे हैं। वास्तविकता यह है कि कोई नेता जब राजनीति में असफल और अपरिपक्व सिद्ध होता है,तो वह धर्म का सहारा लेता है। और जब किसी धर्मगुरु को धर्म में संतुष्टि नहीं मिलती है, तो वह राजनीति की तरफ भागता है। उपरोक्त दोनों ही लोग अपने अपने क्षेत्रों में फिसड्डी सिद्ध होकर दूसरे के क्षेत्र में सेंधमारी करते हैं।इस सेंधमारी में राष्ट्र की युवाशक्ति और जनसाधारण मेहनतकश नागरिक बर्बाद हो रहे हैं। लेकिन नेता और धर्मगुरु अपनी -अपनी राजनीतिक और धार्मिक महत्वाकांक्षा में अंधे और बहरे होकर न तो किसी के दुख, पीड़ा, गरीबी, बेरोजगारी आदि को समझते हैं तथा न ही कोई विकास का काम करते हैं। कहते हैं कि गीदड़ की मौत आने पर वह आबादी की तरफ भागता है लेकिन जब किसी नेता की राजनीति और धर्मगुरु का चमत्कार नहीं चल पाते हैं,तो दोनों एक दूसरे के क्षेत्रों की तरफ भागते हैं। बेचारे गीदड़ को तो मौत मिलती है लेकिन नेता और धर्मगुरु को पद, प्रतिष्ठा,धन, दौलत, जमीन, जायदाद, वैभव,विलास, गाड़ी,बंगले, विदेशी सैर-सपाटे आदि सब कुछ मिल जाते हैं।
आधुनिक मानव को भीड़ में सत्य के दर्शन करने की ज़िद्द क्यों है? आधुनिक मानव घर पर बैठे बिठाये ही सब कुछ क्यों प्राप्त कर लेना चाहता है? बिना त्याग, तपस्या, एकाग्रता और स्वाध्याय के उसे सारी सुविधाएं और उपलब्धियां चाहियें। हल्दी लगे न फिटकरी और रंग भी चोखा होय - यह नहीं हो सकता है। भौतिक जगत् में शायद तिकड़मबाजी, चापलूसी और भ्रष्टाचार से बहुत कुछ हासिल हो सकता होगा, लेकिन भीतरी जगत् में नहीं। और भौतिक जगत् में भी तिकड़मबाजी आदि करने के लिये भी तो हाथ पैर मारने पडते हैं। आंतरिक जगत् में यह भी नहीं चल पायेगा। वहां तो पवित्रता, शुचिता, स्पष्टता और निरहंकारिता काम आयेंगे।
 जिनको कुछ भी नहीं करना होता है,वो विज्ञान और तकनीक पर भी संदेह करते हैं तथा धर्म और अध्यात्म पर भी संदेह करते हैं।बस,हर कहीं कमियां निकालते रहकर स्वयं कुछ भी नहीं करने के बहाने तलाश करना ही ऐसे लोगों का काम है। जहां पर कमी हो, उसे बतलाया जाना चाहिये तथा जहां पर अच्छाई लगे, वहां प्रशंसा  करने की हिम्मत भी दिखलाना चाहिये। सकारात्मकता लोगों का हरेक प्रयास सृजनशीलता के लिये होता है, केवल विध्वंस के लिये नहीं। जहां भी कुछ कमी लगे या बुराई लगे, वहां पर प्रहार करना भी आवश्यक है। बिना सोचे-समझे केवल हां- हां करते जाना भी गुलामी है तथा नही- नहीं करते जाना भी गुलामी है। दोनों ही गुलामियां हैं।अंधे होकर किसी धारणा या विश्वास के समर्थन में नारेबाजी मत करो। कमियां बतलाने और प्रशंसा करने - दोनों में सृजनात्मक होना आवश्यक है।

 जब कोई किसी व्यक्ति के चारित्रिक गुणों सत्यनिष्ठा, स्पष्टता, बुद्धिमत्ता, निरहंकारिता और सफलता का सामना नहीं कर पाता है तो वह कुछ भी करके उसका चरित्रहनन करने पर उतर आता है। वास्तव में ही यदि उसमें कोई योग्यता होती तो वह उस योग्यता से ही सामना करने की हिम्मत करता है। चारों तरफ ऐसे लोगों की भरमार है।न चाहते हुये भी ऐसे लोग आये दिन सामने से मुकाबला नहीं करके पीछे से पीठ पर प्रहार करते हैं। लगातार किसी बात के दोहराव से प्रभावित होकर जनसाधारण उस झूठी बात को ही सही मानने पर विवश हो जाता है, इसलिये बुरे कहे जाने वाले लोग अक्सर किसी भी अच्छे और भले व्यक्ति को बदनाम करने में शीघ्र सफल हो जाते हैं। इससे वास्तव में अच्छा व्यक्ति अकेला पड़ जाता है तथा बुरा व्यक्ति अपना संगठन बनाने में सफल हो पाता है।सत्य की विजय और असत्य के पराजित होने की विभिन्न संप्रदायों की सीख अक्सर गलत सिद्ध होकर रह जाती है। झूठे लोगों के बहुमत में अकेला अच्छा व्यक्ति सदैव पराजित होता है। लोकतंत्र में सत्य की नहीं अपितु भीड़ की विजय होती है। और अच्छे लोगों के पास कभी भीड़ नहीं होती है, जबकि बुरे लोग झूठ,कपट,छल,धन- दौलत आदि के सहारे जनमानस का बहुमत अपने पक्ष में कर लेते हैं। संसार में जिसके पास बहुमत है, जिसके पास लोगों की भीड़ है तथा जिसके पास जनमानस को बरगलाने का हूनर है, वही सफल कहा जाता है। और ऐसा समस्त धरा पर दिखाई भी दे रहा है।
होना तो यह चाहिये कि धर्म को राजनीति की अपेक्षा योगाभ्यास के क्षेत्र में जाना चाहिये तथा राजनीति को नैतिकता के क्षेत्र में जाना चाहिये।यानी धर्मगुरुओं को राजनीति करने के बजाय योगाभ्यास करना चाहिये तथा नेताओं को नैतिक होने की आवश्यकता है।भारत, भारतीय और भारतीयता तभी सुरक्षित रह पायेंगे। धर्मगुरु यदि योग साधना करके अपने चाल,चरित्र और चेहरे को एक समान बनाकर जनमानस को सनातन जीवन- मूल्यों की शिक्षा देंगे,तो उस शिक्षा को जनमानस अवश्य मानेगा। चरित्रहीन, भ्रष्ट और व्यापारी धर्मगुरु यदि जनमानस को आचरण शुद्धि के उपदेश देंगे,तो उनको कोई भी नहीं मानेगा। पिछले कयी दशक से भारत में यही हो रहा है।इसी तरह से नेता लोगों को जनमानस की मूलभूत सुविधाओं को समय पर उपलब्ध करवाने के लिये विधायक, सांसद और मंत्री बनाया जाता है। लेकिन नेता लोग पूंजीपतियों और धर्मगुरुओं की शरण में जाकर जनता -जनार्दन की सेवा करने के बजाय उसको नकली मुद्दों में उलझाये रखते हैं।इस कार्य में नेताओं की मदद धर्मगुरु, पूंजीपति और मीडिया मिलकर करते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि नेताओं की राजनीति का धंधा, धर्मगुरुओं का शोषण का धंधा तथा पूंजीपतियों का लूट-पाट  व्यापार का धंधा खूब तरक्की करता जाता है। परिणामस्वरूप भारत के कुछ प्रतिशत धनी मानी लोगों को छोड़कर  हर वर्ग गरीबी, बदहाली, बिमारी, अशिक्षा, कुशिक्षा और भूखमरी से त्रस्त होता जा रहा है।

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डॉ. शीलक राम आचार्य 
दर्शनशास्त्र -विभाग 
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय 
कुरुक्षेत्र -136119

आद्य शंकराचार्य की 2500 वर्ष पुरातन ज्ञान- परंपरा (2500 years old tradition of knowledge of Adi Shankaracharya)



आद्य शंकराचार्य को विश्व के दार्शनिक क्षेत्र में सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। शंकराचार्य के जीवन और कार्यक्षेत्र के संबंध में उनके शिष्यों ने अनेकों ग्रंथों की रचना की है। विदेशी हमलावरों का मुख्य लक्ष्यों में से एक यह भी होता था कि सनातन धर्म और संस्कृति की पहचान के हरेक प्रतीक को नष्ट किया जाये, इसलिये उनके द्वारा अनेकों महत्वपूर्ण ग्रंथ नष्ट कर दिये गये। अंग्रेजी और उनके अंधानुयायी भारतीय लेखकों द्वारा भारतीय धर्म, संस्कृति, दर्शनशास्त्र, इतिहास आदि के संबंध में संदेहों को समाप्त करने की बजाय उनको बढ़ाने पर जोर अधिक दिया जाता रहा है। ऐसे लेखकों के संबंध में षड्दर्शनशास्त्र के भाष्यकार आचार्य उदयवीर शास्त्री ने कहा है कि पाश्चात्य ईसाई विद्वानों द्वारा इस विषय में किये गये निराधार मिथ्या प्रलापों को पत्थर की लकीर समझकर निश्चिंत बैठे हैं। उन्हीं के हाथों में आज वह शक्ति है, जिसके द्वारा कोई विचार प्रसार पा जाते हैं। शंकराचार्य के संबंध में उनके एक शिष्य पद्मपाद ने 'विजयडिंडिम' नामक ग्रंथ लिखा था,जो कि आज उपलब्ध नहीं है। शंकराचार्य के जीवन के संबंध में अन्य ग्रंथों में आनंदगिरि की शंकरविजय,राजचूडामणि रचित शंकर अभ्युदय,आनंदतीर्थ की शंकर आचार्य अवतार कथा, रामकृष्ण की शंकर अभ्युदय काव्य, व्रजराज की शंकर दिग्विजय सार,चित्सुख की वृहत् शंकर दिग्विजय, नीलकंठ भट्ट की शंकरमंदारसौरभ आदि पठनीय ग्रंथ हैं।

आचार्य उदयवीर शास्त्री के अनुसार शंकराचार्य का अयुमान 32 वर्ष,6 महीने,10 दिन का था।2631 युधिष्ठिर सम्वत् बताया है। युधिष्ठिर सम्वत् कलि सम्वत् से 38 वर्ष पहले शुरू होता है।इसका प्रारंभ युधिष्ठिर का राज्यारोहण काल है। युधिष्ठिर ने 36 वर्ष तक शासन किया था। उसके दो वर्ष बाद कलि सम्वत् शुरू हुआ था।इस तरह से ईस्वी सन् शुरू होने से 509 वर्ष पूर्व शंकराचार्य का जन्मकाल आता है तथा उनका देहावसान काल ईसापूर्व 477 में पड़ता है। ध्यान रहे कि वर्तमान कलि सम्वत् का प्रारंभ ईस्वी सन् से 3102 वर्ष पहले हुआ था।
शारदापीठ के विवरणानुसार शंकराचार्य ने सर्वप्रथम ज्योतिर्मठ की स्थापना  497 ईसापूर्व में की थी। इसका पश्चात् शारदामठ 492 ईसापूर्व में, फिर शृंगेरी 492 ईसा पूर्व में तथा अंत में गोवर्धनमठ की स्थापना 485 ईसापूर्व में की। उन्होंने शारदामठ के अध्यक्ष पद पर सर्वप्रथम सुरेश्वराचार्य को बैठाया था।वो इस पद पर 42 वर्षों तक रहे। उनके पश्चात् चित्सुख,सर्वज्ञान,ब्रह्मानंद तीर्थ,स्वरूपाभिज्ञान, मंगलमूर्ति, भास्कर, प्रज्ञान आदि आचार्य अध्यक्ष पद पर विराजमान रहे।
गोवर्धनमठ की परंपरा में प्रथम आचार्य का नाम पद्मपाद आता है। उनके पश्चात् शूलपाणि, नारायण,विद्यारण्य,वामदेव,पद्मनाभ, जगन्नाथ,मधुरेश्वर, गोविंद,श्रीधर आदि आते हैं।

ज्योतिर्मठ की आचार्य परंपरा के अनुसार शंकराचार्य ने बद्रीनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार करके वहां पर मठ की स्थापना की। वहीं पर निवास करके उन्होंने विभिन्न ग्रंथों पर भाष्य लिखे।यह के अध्यक्ष पद पर सर्वप्रथम तोटकाचार्य विराजमान हुये थे। कुछ को छोड़कर यहां के अन्य आचार्यों की पूरी सूची अनुपलब्ध है। श्रृंगेरी मठ के आचार्यों में सर्वप्रथम स्थान तो स्वयं आद्य शंकराचार्य का ही आता है। उनके पश्चात् हस्तमलकाचार्य को अध्यक्ष बनाया गया।
शारदामठ की परंपरा अनुसार ज्योतिष्मठ के प्रथम शंकराचार्य त्रोटकाचार्य,शारदमठ के प्रथम शंकराचार्य सुरेश्वराचार्य,शृंगेरी मठ के प्रथम शंकराचार्य हस्तमलकाचार्य तथा गोवर्धनमठ के प्रथम शंकराचार्य पद्मपादाचार्य थे। परंपरा यह कहती है कि स्वयं आद्य शंकराचार्य किसी भी मठ  के  शंकराचार्य  बनकर  नहीं रहे थे 
शंकराचार्य द्वारा स्थापित व्यवस्था के अंतर्गत दशनामी संन्यासियों की परंपरा है।ज्योतिर्मठ के अंतर्गत गिरि, पर्वत और सागर आते हैं। श्रृंगेरी मठ की परंपरा में सरस्वती,भारती और पुरी आते हैं। गोवर्धन मठ की परंपरा में वन और अरण्य आते हैं।शारदामठ की परंपरा में तीर्थ और आश्रम आते हैं।इस प्रकार से दशनामी संन्यासियों में गिरि,पर्वत, सागर, सरस्वती,भारती,पुरी,वन,अरण्य, तीर्थ और आश्रम आते हैं।

 उड़ीसा जगन्नाथपुरी में स्थित मठ का का संबंध 'ऋग्वेद' से है। कर्नाटक में स्थित श्रृंगेरी मठ का 'यजुर्वेद' से है। गुजरात में स्थित शारदामठ का संबंध 'सामवेद' से है। उत्तराखंड में स्थित ज्योतिर्मठ का संबंध 'अथर्ववेद' से है।इस मठ के वर्तमान आचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी वर्तमान भ्रष्ट व्यवस्था पर अपनी निष्पक्ष,बेबाक और सत्यनिष्ठ टिप्पणियों के लिये जाने जाते हैं। श्रृंगेरी मठ के वर्तमान शंकराचार्य भारती तीर्थ हैं। गोवर्धन मठ के वर्तमान शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद जी हैं।शारदामठ के वर्तमान शंकराचार्य स्वामी सदानंद जी हैं।
भारत की चार दिशाओं में शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार मठों की स्थापना का उद्देश्य दार्शनिक,सांस्कृतिक, राष्ट्रीय,धार्मिक, आध्यात्मिक और राजनीतिक सभी कुछ था। चारों मठों की स्थापना का यह प्रयास आज से 2500 वर्षों पहले उत्पन्न हुये एक महापुरुष की दुरदर्शी, दूरवर्ती और गहन -गूढ़ सोच का परिचायक है।आज से पच्चीस सदी पहले जैन, बौद्ध, चार्वाक और वाममार्गियों जैसे कयी संप्रदायों द्वारा उत्पन्न दार्शनिक,राष्ट्रीय, सांस्कृतिक,धार्मिक, राजनीतिक ख़तरों से बचाव के लिये शंकराचार्य द्वारा किये गये प्रयास भारत के हजारों लाखों वर्षों के इतिहास में सदैव सदैव के लिये स्मरण रखे जायेंगे। पूर्वाग्रहग्रस्त पाश्चात्य लेखकों और उनके अंध- प्रशंसक भारतीय लेखकों ने आजादी के पश्चात् के सात दशकों के दौरान आद्य शंकराचार्य के योगदान को कमतर करके आंका है। भारतीय इतिहास पर छाये हुये इस धूंधलके को हटाना आवश्यक है। राजनीतिक और शैक्षिक स्तर पर सत्यनिष्ठा और निष्पक्षता से जो प्रयास किये जाने चाहिये थे,वो अब तक हो नहीं पाये हैं। कुछ गिने-चुने भारतीय विद्वानों यथा आचार्य उदयवीर शास्त्री, पंडित भगवद्दत, पुरुषोत्तम नागेश ओक,वैंकटचललैय्या आदि ने इस संबंध में महत्वपूर्ण शोध प्रस्तुत किये हैं।

गोवर्धन मठ का आदर्श वाक्य 'प्रज्ञानम् ब्रह्म' है।श्रृंगेरी मठ का का आदर्श वाक्य 'अहंं ब्रह्मास्मि' है।शारदा मठ का आदर्श वाक्य 'तत्वमसि' है।जगन्नाथपुरी मठ का आदर्श वाक्य 'अयमात्मा ब्रह्म' है।वर्तमान में 'गोवर्धन मठ' के 145 वें शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद जी हैं।वर्तमान में 'श्रृंगेरीमठ' के 36 वें शंकराचार्य भारती कृष्ण तीर्थ हैं।वर्तमान में 'शारदा मठ' के 80 वें शंकराचार्य सदानंद जी जी हैं।वर्तमान में 'ज्योतिर्मठ' के शंकराचार्य होने के संबंध में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी का सर्वोच्च न्यायालय में मुकदमा विचाराधीन है।
पाश्चात्य लेखकों और उनके समर्थक भारतीय लेखकों ने आद्य शंकराचार्य का काल आठवीं सदी में माना है।यह उनकी भ्रांति , पूर्वाग्रह  और संकुचित सोच का परिचायक है। भारतीय विश्वविद्यालयों में संस्कृत साहित्य, दर्शनशास्त्र और भारतीय ज्ञान परंपरा के विभागों में पिछले 75 वर्षों से यही रटवाया और पढ़ाया जाता रहा है।यह बिल्कुल गलत है। आद्य शंकराचार्य का सही काल 509 ईसापूर्व है,न कि आठवीं सदी। बौद्ध मत के जिस गौतम (छठी सदी ईसापूर्व) के नाम से आज बौद्ध मत प्रचलित है, उसके तुरंत पश्चात् आद्य शंकराचार्य का जन्मकाल आता है। उनके बौद्ध मत, जैन मत, चार्वाक मत और वाममार्ग आदि के कारण भारत में जो सांस्कृतिक खालीपन,राजनीतिक अव्यवस्था,धार्मिक पाखंड, सांप्रदायिक थोथा कर्मकांड, उन्मुक्त यौनाचार और नैतिक मान्यताओं की उच्छृंखलता की शुरुआत हुई थी,उनको समाप्त करने में मंडन मिश्र और शंकराचार्य का महत्वपूर्ण योगदान था। मंडन मिश्र का ही संन्यास नाम सुरेश्वराचार्य था,जिनको स्वयं शंकराचार्य ने शारदा मठ का अध्यक्ष बनाया था।

ईसाई मत में नकली पोप नहीं बना सकते। बौद्ध मत में नकली दलाई-लामा नहीं बना सकते। इस्लाम में नकली पैगंबर नहीं बना सकते।सिख मत में नकली गुरु नहीं बना सकते। लेकिन यह नकली शंकराचार्य बनाने की बिमारी हिंदुओं में क्योंकर लग गई है? मूलतः तो शंकराचार्य चार ही होते हैं। लेकिन भारत में अपने आपको शंकराचार्य कहने वाले सैकड़ों धर्मगुरु घूम रहे हैं। इन सबने नकली गद्दियों, मठों, पीठों की स्थापना करके अपना ढोंग शुरू कर रखा है।भारत के हरेक शहर में कोई न कोई विश्वगुरु या  जगत्गुरु या शंकराचार्य मिल जायेगा। हिंदुओं के साथ यह क्या हो रहा है? हिंदुओं को दिग्भ्रमित करने के लिये यह कौन-सा षड्यंत्र रचा जा रहा है? जिसको देखो वही शंकराचार्य, विश्वगुरु, जगतगुरु, महामंडलेश्वर,महायोगी, महावतार, पथप्रदर्शक आदि बना घूम रहा है। धार्मिक जगत् ये तथाकथित लोग जब स्वयं ही भटके हुये हैं,तो हिंदुओं का मार्गदर्शन कैसे करेंगे? अपने आपको शास्त्रों का मर्मज्ञ कहने वालों में इतनी तो समझ होनी ही चाहिये कि जब तुम स्वयं ही आपस में लड़-झगड़कर आये दिन कोई न कोई विवाद खड़ा कर रहे हो,तो हिंदुओं को क्या सिखलाओगे?

लगता है कि भारत में हिंदुओं के शंकराचार्य, धर्मगुरु, महामंडलेश्वर, योगाचार्य आदि बनने के स्थान पर विभिन्न राजनीतिक दलों के शंकराचार्य, धर्मगुरु, महामंडलेश्वर, योगाचार्य आदि बनने और बनाने की होड़ लगी हुई है। विभिन्न राजनीतिक दल मिलकर हिंदुओं के धर्मगुरुओं का खूब अपने राजनीतिक उद्देश्यों के लिये इस्तेमाल कर रहे हैं। एक वर्तमान शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती जी ने ठीक ही कहा है कि जब भारत में नकली राष्ट्रपति,प्रधानमंत्री, गृहमंत्री नहीं बन सकते हैं,तो नकली शंकराचार्य, धर्मगुरु, महामंडलेश्वर, जगतगुरु, विश्वगुरु क्यों बनाये जा रहे हैं? इसका अर्थ तो यह है कि नेताओं ने अपने स्वार्थ साधने के लिये धर्म को भी अपने कब्जे में कर लिया है। और हमारे धर्माचार्य किसी न किसी पद, प्रतिष्ठा,धन,दौलत, प्रसिद्धि पाने के मोह में सनातन धर्म और संस्कृति का बहुत बड़ा नुकसान कर रहे हैं। भारत, भारतीय और भारतीयता के लिये यह बहत घातक सिद्ध हो रहा है। इससे भारत का जनमानस जहां पर अधार्मिक, अनैतिक और चरित्रहीन होता जा रहा है, वहीं पर भारत राष्ट्र, सनातन धर्म और संस्कृति को भी हर प्रकार से पतन की ओर धकेलने के प्रयास सफल होते जा रहे हैं।
शंकराचार्य के सही काल का निर्धारण करने के लिये आचार्य उदयवीर शास्त्री और डॉ परमेश्वर नाथ मिश्र की पुस्तकें पढना चाहियें। इन्होंने इस संबंध में बहुत परिश्रम किया है। शंकराचार्य ने कांची कामकोटि में किसी पीठ की स्थापना नहीं की गई थी, लेकिन वहां पर कयी वर्ष तक निवास किया था। इसलिये कांची कामकोटि पीठ की अपनी प्रसिद्धि रही है। कामाक्षी देवी के प्रति भक्तिभाव होने की वजह से वहां पर निवास करते रहे थे, इसलिये वहां पर भी एक पीठ की तरह से ही संस्थान बन गया था।बाद में इसकी अध्यक्षता एक अन्य पीठ के साथ- साथ सुरेश्वराचार्य को सौंप दी गई थी। इसकी प्रसिद्धि इतनी बढ़ी कि यहां पर विराजमान गुरु भी शंकराचार्य कहलाने लगे। परिणामस्वरूप श्रृंगेरी मठ की प्रतिष्ठा कम होती गई। कालांतर में यह विच्छिन्न हो गया।कयी सदियों तक यह आचार्यों से रहित ही रहा। संभवतः कांची कामकोटि पीठ के 37 वें शंकराचार्य विद्याघन के काल में इसका जीर्णोद्धार हुआ।ये यहां पर 759-788 ईस्वी तक विराजमान रहे थे। अपने शिष्य नित्यबोधघन (773-848 ईस्वी) को इस काम के लिये नियुक्त किया। श्रृंगेरी मठ के कयी शताब्दी के विलुप्त कार्यकाल का सही आंकलन नहीं कर पाने के कारण 38 वें शंकराचार्य अभिनव शंकर को ही आद्य शंकराचार्य मान लेने के कारण 788 ईस्वी को आद्य शंकराचार्य का प्रादुर्भावकाल स्वीकार कर लिया गया।कहा जाता है कि ये भी अपने समय के उच्च कोटि के विद्वान थे। श्रृंगेरी और कांची कामकोटि पीठों के परस्पर मनमुटाव से आद्य शंकराचार्य के काल के संबंध में लगभग 1300 वर्षों का अंतर आ गया है।यह तथ्य बाकी  सभी पीठों के इतिहास अध्ययन से भी सिद्ध होता है। लेकिन लेखकों ने पूर्वाग्रहवश केवल श्रृंगेरी की विकृत और खंडित परंपरा को आधार मानकर बाकी पीठों में उपलब्ध साक्ष्यों की उपेक्षा करके आद्य शंकराचार्य के काल को तेरह सदी नया सिद्ध करने पर जोर लगाये रखा है। लगता है कि श्रृंगेरी मठ शंकराचार्य नित्यबोधघन के काल से पूर्व 800 वर्ष तक ध्वस्त रहा था। पाश्चात्य लेखकों और और उनके अंधभक्त भारतीय लेखकों की यह आदत रही है कि किसी भी तरह से पुरातन भारतीय इतिहास को प्रथम युनानी फिलासफर थैलीज, अब्राहमिक परंपरा और भारतीय सिद्धार्थ गौतम के बाद का सिद्ध किया जा सके। भारतीय काल गणना के संबंध में उनके द्वारा निर्धारित भारतीय शासकों, महानायकों, महापुरुषों, दार्शनिकों आदि के कालनिर्णय में पूर्वाग्रह, भेदभाव, कपोल-कल्पना और मनघड़ंत भेदभाव मौजूद हैं।

जो लेखक सिद्धार्थ गौतम और आद्य शंकराचार्य के काल में लगभग 1300 वर्षों का अंतराल मानते हैं, उन्हें यह ज्ञान होना चाहिये कि सनातन धर्म के शास्त्रों पर प्रहार करने वाले किसी भी सनातन विरोधी महापुरुष को उत्तर देने के लिये भारतीय महापुरुषों ने कभी इतनी प्रतीक्षा नहीं करवाई है। अपने ऊपर हुये किसी भी राजनीतिक,धार्मिक या दार्शनिक हमले का इन्होंने तुरंत प्रत्युत्तर दिया है। महावीर, सिद्धार्थ, चार्वाक और वाममार्गियों को जवाब देने में भी कोई देरी नहीं हुई और इनके तुरंत पश्चात् गौडपाद,गोविंदपाद,कुमारिलभट्ट, मंडन मिश्र,शंकराचार्य आदि दार्शनिकों ने जन्म लेकर अपना कर्तव्य पूरा किया था।


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डॉ. शीलक राम आचार्य 
दर्शनशास्त्र- विभाग 
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय 
कुरुक्षेत्र -136119

Thursday, January 15, 2026

'दर्शनशास्त्र' विषय स्थापित अव्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह लगाने का हौंसला देता है (The subject of 'Philosophy' gives courage to question the established order)

लूटेरे फिरंगियों से आजादी के पश्चात् भारत में सभी संप्रदायों में खुद को परस्पर एक -दूसरे संप्रदाय से पुराना सिद्ध करने की प्रतियोगिता चल रही है।जैसा पुराना होना सत्य होने की गारंटी बन गई हो। जैसे पुराना होना प्रामाणिक होने की कसौटी बन गई हो।जो जितना पुराना,वह उतना ही प्रामाणिक और प्रासंगिक।इस प्रकार की बेवकूफी जोरों से चल रही है। इनमें से अधिकांश को जीवनमूल्यों को आचरण में उतारने से कोई मतलब नहीं है।इनको अपने अनुयायियों के चरित्र,चाल, चेहरे, आचरण, व्यवहार से कोई भी लेना -देना नहीं है।बस, संख्या बल और पुराना होने का महत्व रहा गया है।जो जितना पुराना तथा जिसके पास जितनी अधिक संख्या हो,वह उतना ही अधिक प्रामाणिक और स्वीकार करने योग्य है। विभिन्न प्रकार के प्रमाणों को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत करने में अधिकांश संप्रदायों ने अनेकों व्यक्तियों को लगा रखा है।इनको भारी भरकम फीस दी जाती है।झूठे, भेदभावपूर्ण, पूर्वाग्रहग्रस्त और मनघड़ंत आंकडों को तैयार करके अंधभक्तों को सौंप दिया जाता है।ये अंधभक्त बिना कोई पारिश्रमिक लिये सोशल मीडिया पर इस तैयार बकवास की जुगाली करते रहते हैं।इन पर कोई रोक-टोक नहीं होती है। सनातन धर्म,संस्कृति,दर्शनशास्त्र, इतिहास,नीतिशास्त्र, तर्कशास्त्र,समाजशास्त्र,
चिकित्साशास्त्र, ज्योतिषशास्त्र,गणितशास्त्र,शिक्षा,पुरातन ग्रंथों और महापुरुषों के संबंध में अनाप-शनाप कुछ भी सोशल मीडिया पर परोसा जा रहा है। सिस्टम को क्योंकि सिर्फ अपने वोट बैंक से मतलब है - वह इस कुकर्म को होने दे रहा है। सिस्टम की निष्ठा सुशासन,स्वशासन और गुणशासन में न होकर लंबे समय तक खुद को सत्तासीन बनाये रखना है। जिन वायदों को चुनाव पूर्व में बार बार दोहराकर सिस्टम सत्ता पर कब्जा करने में सफल रहा था,सत्ता मिलने पर जानबूझकर उन वायदों की घोर उपेक्षा होती रही है। तथाकथित बड़े और विभिन्न संप्रदायों के अगुआ कहलवाने लोग हर तरह से भ्रष्ट  सिस्टम से समझौता कर लेते हैं।हम तुम्हें थोक में अपने अंधभक्तों के वोट  दिलवायेंगे और तुम हमें खुलकर भोग- विलास के साधन प्रदान कर देना। राष्ट्र, धर्म, संस्कृति,सुशासन, स्वशासन, स्वभाषा, नैतिकता, आचरण, सुरक्षा,शिक्षा, रोजगार आदि जायें भाड़ में।महाआश्चर्य तो तब होता है जब कल पैदा हुये कोई संप्रदाय के गुरु खुद को दुनिया का सबसे पुरातन संप्रदाय बताने लगते हैं। ध्यान रहे कि राजसत्ता,मजहबसत्ता और धनसत्ता का मजबूत समझौता भारत सहित पूरे एशिया महाद्वीप को बर्बाद किये दे रहा है।या तो आप इस गठबंधन के गठबंधन में सम्मिलित हो जाओ या फिर चुप बैठे रहो। यदि आपने इसका विरोध किया तो आपकी खैर नहीं है। किसी को पता नहीं आपके साथ क्या दुर्व्यवहार किया जायेगा। किसी को मालूम नहीं कि आपको कहां अधमरा करके फेंक दिया जायेगा।पता नहीं आपकी कब किसी सड़क दुर्घटना में मौत हो जाये। अपने मजहब, अपने संप्रदाय, अपने मत और अपने विश्वास को अंधविश्वास में बदलकर उसे सबसे पुराना और वैज्ञानिक सिद्ध करने पर पूरा जोर लगा दो। किसी की भी मत सुनो।एक ही झूठ को बार -बार दोहराओ। अपने वर्ग,जाति और विश्वास के लोगों का माईंड वाश करने का इससे बढ़िया कोई तरीका नहीं है।आपके ऊपर धनवर्षा,आशीर्वचन वर्षा और भोगसामग्री की मूसलाधार वर्षा होने लगेगी। यदि वास्तव में आपमें प्रतिभा, बुद्धि, तार्किकता, संवेदनशीलता और बुराई का विरोध करने की क्षमता है,तो सच मानिये कि मौजूदा व्यवस्था में आपकी बर्बादी सुनिश्चित है।
 किसी व्यक्ति, वस्तु,स्थान,पूजा- स्थल,संस्था, संगठन,खेल पुरस्कार,खेल मैदान आदि का नाम बदलने मात्र से कोई आमूल बदलाव या क्रांति या परिवर्तन या सृजनात्मक परिणाम आ जायेगा? अच्छे,भले, सदाचारी, नैतिक, आदर्शवादी नाम रखने का अपना महत्व होता है, इससे मना करना भी बेवकूफी होगी। लेकिन केवलमात्र नाम को बदलने या अच्छा नाम रखने मात्र से भी तो सब कुछ नहीं हो जानेवाला है।नाम के अनुकूल कर्म भी तो करने चाहियें। काम तो कोई करना नहीं,बस अच्छे नाम रखकर ही अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लो। इससे कुछ भी सार्थक परिणाम नहीं आयेगा।हां,भ्रम में रहना जरुर शुरू हो जायेगा।नाम बड़े और दर्शन छोटे,सारे आचरण खोटे ही खोटे। जनमानस को बेवकूफ बनाने, जमीनी समस्याओं से जनमानस का ध्यान हटाने तथा वाहियात के कार्यों में जनमानस की ऊर्जा को व्यर्थ गंवाने के लिये यदि पुराने नामों की जगह पर नये नाम रखे जायेंगे,तो इसे धोखाधड़ी ही कहा जायेगा। इसे राष्ट्रघात ही कहा जायेगा। जनता -जनार्दन को यह लगते रहना चाहिये कि सिस्टम कुछ न कुछ विकास के काम कर रहा है। केवल इसके लिये भवनों, इमारतों,कार्यालयों,खेल मैदानों,खेल पुरस्कारों,साहित्यिक पुरस्कारों, संगठनों,विश्वविद्यालयों आदि के नाम बदलना राष्ट्र की जनता के साथ विश्वासघात है। अब्राहम की जगह पर मनु,जरथुष्ट्र की जगह पर श्रीराम,ईसा की जगह पर श्रीकृष्ण,महापद्मनंद की जगह पर चंद्रगुप्त मौर्य,सिकंदर की जगह पर समुद्रगुप्त,बाबर की जगह पर महाराणा सांगा, औरंगजेब की जगह पर शिवाजी, मैकाले की जगह पर ऋषि दयानंद, मैक्समूलर की जगह पर श्री अरविन्द तो होना ही चाहिये। लेकिन मनु,श्रीराम, श्रीकृष्ण, चंद्रगुप्त मौर्य,समुद्रगुप्त, महाराणा सांगा, शिवाजी, ऋषि दयानंद और श्री अरविन्द जैसे काम भी तो करके दिखलाओ।केवल खोखले वायदे करने और नाम बदलने से किसी प्रकार का कोई भी विकास नहीं होने वाला है। हां, कुछ समय के लिये जनमानस को बेवकूफ अवश्य बनाया जा सकता है।रावण का नाम राम करने से क्या रावण राम बन जायेगा?सूअर का नाम गाय रखने से क्या सूअर गाय बन जायेगा? बर्बादी का नाम विकास रख़ने से क्या बर्बादी विकास बन जायेगी?कालू नाम के व्यक्ति का नाम गौरा रखने से क्या कालू गौरा बन जायेगा?
इस्ट इंडिया कंपनी जब भारत आई तो अपने व्यापारिक ठिकानों की सुरक्षा के लिये उसने कयी दशकों तक अपनी प्राइवेट आर्मी बनाये रखी थी। भारत पर कब्ज़ा करने के पश्चात् उसने अन्य आर्मी का निर्माण किया था,जो व्यापारिक ठिकानों की सुरक्षा के साथ भारतीय राज्यों के शासकों के साथ युद्ध लडकर उनसे मनमाना व्यवहार करके लूट-खसोट करने लगी थी।इसी लूट-खसोट के बल पर ब्रिटेन का आर्थिक ढांचा खड़ा किया गया तथा दुनिया के अनेक देशों में युद्ध अभियान संपन्न किये गये।इस प्रकार की प्राइवेट आर्मी अब दोबारा से खडी हो रही हैं। बड़े बड़े उद्योगपति और कोरपोरेट घरानों ने अपनी निजी सेनाएं सुरक्षा एजैंसियों के नाम पर खडी करना शुरू कर दिया है।भारत में भी यह परंपरा फिर से शुरू हो गई है। भारतीय उद्योगपति और कोरपोरेट इस प्रकार की निजी सुरक्षा एजेंसियां खडी कर रहे हैं।अनेक बड़े बड़े कारखाने, बंदरगाह, खदानें और शिक्षा संस्थानों पर इस प्रकार की सुरक्षा एजेंसियों की तैनाती को देखा जा सकता है।यह फिर से ईस्ट इंडिया कंपनी जैसी कंपनियों की शुरुआत लगती है।सच तो यह है कि उद्योगपति और कोरपोरेट घरानों के लिये व्यापार मुख्य होता है। इनके लिये राष्ट्रवाद, राष्ट्रसेवा, राष्ट्र विकास और मानवीयता जैसे शब्दों का कोई मतलब नहीं होता है। इन्हें सिर्फ और सिर्फ अपने व्यापारिक हितों की चिंता होती है।इन व्यापारिक हितों के रास्ते में जो भी आता है,ये उसकी आवाज को दबाने के लिये किसी भी सीमा तक जा सकते हैं।इन पर मैक्यावली,मैकाले, मैक्समूलर,मिल और बैंथम आदि की विचारधारा हावी रहती है।एक समय ऐसा आता है कि ये सरकारी निर्णयों को भी प्रभावित करने लगते हैं। सरकारें इनके संकेतों पर नाचने लगती हैं। ठीक को गलत और गलत को ठीक सिद्ध करने के लिये ऐसे धनाढ्य लोग लोकतंत्र के चौथे खंभे प्रैस को भी अपने प्रभाव में कर लेते हैं।प्रैस भी इनकी कारगुजारियों पर खुलकर कुछ भी नहीं लिख सकता है।एक अवसर ऐसा आता है कि ऐसे लोग लूटेरी इस्ट इंडिया कंपनी का रुप धारण कर लेते हैं। क्योंकि आधुनिक विकास की वजह से विज्ञान और तकनीक का चमत्कारी विकास हुआ है, अतः ये लोग इस्ट इंडिया कंपनी से भी हजारों गुना अधिक खु़ंखार,जुल्मी, लूटेरे, भ्रष्ट,अत्याचारी और राष्ट्रविरोधी सिद्ध होते हैं। ध्यान रहे कि गुलामी कभी भी पुरानी वेशभूषा में नहीं आती है।गुलामी हर बार नयी वेशभूषा और नये ढंगों से आकर अपना नंगा नाच दिखलाती है।अंधभक्ति के आवेश में आकर अंधभक्त स्वयं तो बर्बाद होते ही हैं, इसके साथ - साथ अन्यों को भी लेकर डूबते हैं।तीसरी दुनिया के देशों में ऐसे ही हालात उत्पन्न हो गये हैं। लूटपाट और भ्रष्टाचार का समर्थन करने वाले अंधभक्त लोगों को बहुत बाद में यह मालूम होता है कि वो गुलाम बन चुके हैं। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।जो बर्बादी होनी होती है,वह हो चुकी होती है।अब पछताये होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत?
यह वास्तविकता है कि जिनको भी किसी राष्ट्र पर लंबे समय तक शासन करना होता है,उनको जनता -जनार्दन से शिक्षा का अधिकार छीन लेना पड़ता है। उनको जनमानस से दार्शनिकीकरण,तार्किकता, जिज्ञासा, प्रश्न करने की शक्ति छीन लेना पड़ता है। यदि लोग दर्शनशास्त्र,तर्कशास्त्र और विज्ञान जैसे विषयों की पढ़ाई- लिखाई करके वर्तमान में व्याप्त राजनीतिक अव्यवस्था पर प्रश्न चिन्ह लगायेंगे तो किसी राजा का शासन लंबे समय तक चल पाना असम्भव हो जायेगा।बस,इसीलिये धुर्त, लूटेरे,शोषक और तानाशाह किस्म के शासक सर्वप्रथम जनमानस को उपलब्ध शिक्षा के ढांचे पर चोंट करते हैं।जब लोग शिक्षित ही नहीं होंगे तो वो प्रश्न ही नहीं उठायेंगे। ऐसे में लंबे समय तक शासन करना संभव हो जाता है।इसके लिये मजहब, संप्रदाय,मत, विश्वास,जाति,भाषा, क्षेत्र आदि को केंद्र में रखकर बहुसंख्यकों की भावनाओं से खिलवाड़ करने को भी माध्यम बनाया जाता है।
 संस्कृत में मनुष्य के लिये कहा गया है ' मननात् मनुष्य:' अर्थात् जो मनन करे,वह मनुष्य कहलाता है।जो मनन नहीं करता है, उसे मनुष्य नहीं कहा गया है।ऐसा व्यक्ति पशु समान है। ऐसा व्यक्ति क्योंकि अपने मन से मनन करके तथा बुद्धि से निर्णय करने की अपेक्षा दूसरे के संकेतों पर चलकर जीवन यापन करता है।इसीलिये उसे पशु कहा गया है।वह पाश से बंधा हुआ होता है।वह दूसरों के बतलाये गये,सुझाये रास्तों पर चलता है। जैसे पशु दूसरों के संकेतों पर गुलामी का जीवन जीता है।वेद की शिक्षा है कि 'मनुर्भव'। लेकिन ऐसे व्यक्ति तो मनुष्य बनने की राह से भटके हुये होते हैं।शोषक धर्माचार्यों, तानाशाह शासकों और सस्ते मजदूर चाहने वाले उद्योगपतियों को तार्किक विश्लेषण करके निर्णय पर पहुंचने वाले नागरिक नहीं चाहियें। ऐसे नागरिक राष्ट्र में किसी भी स्तर पर मौजूद कमियों और अव्यवस्था पर प्रश्न उठाते हैं।भारत सहित यूरोप,अमरीका,रुस,चीन आदि सभी देशों में मौजूद उपरोक्त तार्किक किस्म के लोग सदैव स्थापित भ्रष्ट राजसत्ता, मजहबसत्ता और धनसत्ता के लिये खतरा बने रहते हैं।
उन्नीसवीं सदी में धार्मिक स्तर पर व्याप्त पाखंड, ढोंग और गुरुडम पर प्रश्न उठाने पर ऋषि दयानंद के साथ कैसा दुर्व्यवहार किया गया? राजनीतिक, आर्थिक, व्यापारिक और चिकित्सीय स्तर पर व्याप्त भ्रष्टाचार और लूटपाट पर प्रश्न करने पर राजीव भाई दीक्षित के साथ क्या किया गया?योग,अध्यात्म,मजहब,संप्रदाय, राजनीति,शिक्षा,राष्ट्रवाद की आड़ में चल रहे छल,प्रपंच और दिखावे पर प्रश्नचिन्ह लगाने पर ओशो रजनीश के साथ भारत सहित समस्त संसार के देशों ने किस प्रकार से जुल्म किये? उपरोक्त उदाहरण अधिक पुराने नहीं हैं। प्रश्न उठाने वालों से सभी भय खाते हैं।इसीलिये एक विचारक,चिंतक या दार्शनिक के चारों तरफ कुछ भी निश्चित नहीं होता है। स्थापित व्यवस्था उसके कारण अस्त-व्यस्त हो जाती है।या तो संसार के धर्माचार्य, नेता और पूंजीपति सुधर जायें या फिर अव्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह लगाने वाले प्रबुद्ध लोग इसी तरह से असमय मारे जाते रहेंगे।
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डॉ. शीलक राम आचार्य 
दर्शनशास्त्र- विभाग 
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय 
 कुरुक्षेत्र-136119

आज की नेतागिरी

 आज की नेतागिरी 
...….....
छल- प्रपंच न निज आये चरित्र में। 
इर्ष्या - द्वेष  नहीं  भरे  हों भीतर में।।
नेता  बनने  में सबसे  बड़ी बाधा है।
उपरोक्त गुणों को अभी नहीं साधा है।।

वायदों की झड़ी लगाने का दम हो।
झूठ  बोलने का  साहस  हरदम हो।।
कहीं गई बात से पलटने की कला।
ऐसा व्यक्ति नेता क्यों न बने भला।।

बात- बात पर  अहंकार प्रदर्शन हो।
कभी  पद्मासन, कभी शीर्षासन हो।।
कुटिल हंसी हंसने में पूरा प्रवीण हो।
चरित्र -चाल- चलन जीर्ण- शीर्ण हो।।

राजनीति  में प्रवेश  बेशक कर दो।
भूख- भय- बिमारी  भरपूर डर दो।।
गिरगिट से ले लो बस रंग बदलना।
शियार लोमड़ी से छलपूर्वक चलना।।

घाघ  नेता तुम शीघ्र  बन जाओगे।
राष्ट्रप्रसिद्ध अवश्य ही कहलाओगे।।
चलकर  आयेंगे  खुद ही पुरस्कार।
प्रतिभावानों की गर्दन होकर सवार।।

अभी  इतना जल्दी नहीं करना है।
पुलिस गीदड़ भभकी नहीं डरना है।।
धरना प्रदर्शन तोड़फोड़ भी जरुरी।
नेता बनने के लिये यह भी मजबूरी।।

खामखां के सभी मुद्दों को उठाओ।
जनता-जनार्दन भाषण भड़काओ।।
विरोधियों की कमियों को गिनाओ।
अपनी तो बस खुबियां ही बतलाओ।।

फिर  भी  लोग यदि नहीं आते हों।
तुम्हारे  पास  आने  से घबराते हों।।
जाति-मजहब की बारूद को लाओ।
वैमनस्य की उसमें अग्नि सुलगाओ।।

इससे भी काम यदि नहीं बनता हो।
 बातों को कोई  भी नहीं सुनता हो।।
पूजा-स्थलों  पर  मांस  फिंकवा दो।
एक दो मजहबी पुस्तक जलवा दो।।

एक ही झूठ को बार-बार दोहराओ।
सौ -सौ बार जोर-जोर से चिल्लाओ।।
भीड़  अवश्य ही  एकत्र होने लगेगी।
छुक छुक राजनीति की गाड़ी चलेगी।।

अभी  तो  तुम्हारी बस शुरुआत है।
ऐसी कोई विशेष बनी नहीं बात है।। 

बहुत दांव-पेंच अभी सीखने बाकी।
बड़े-बड़ों के नाक कान काटो ताकि।।

 धोखाधड़ी व आवश्यक चापलूसी।
मित्र,प्यारे और दुश्मन कानाफूसी।।
निज रहस्य किसी को न बतलाना।
दूसरों के रहस्य सबको ही जनाना।।

रुपवती नवयौवनाओं के संग-संग।
महसूस करना भोग-विलास-उमंग।।
भीतर,भीतर  ही यह सब करना है।
नैतिक रुप से कभी नहीं सुधरना है।।

मुंह फेर लेना काम निकालकर।
गरीब  की कभी न संभाल कर।।
धन-दौलत खर्च वैभव विलास।
बाप पर भी नहीं करना विश्वास।।

फ्री में किसी का काम न करना।
भ्रष्टाचरण  में  प्रतिदिन उभरना।।
कमीशनखोरी समझना अधिकार।
लूट-खसोट करते रहना हर प्रकार।।

करनी -कथनी में रखना भेदभाव।
शराब-शबाब-कबाब भोगना चाव।।
त्राहि-त्राहि जनता जनार्दन करती।
कल मरती है बेशक  आज मरती।।

मंचों  से  जनमानस  बरगलाना।
ऊंचे -ऊंचे सपने बहुत दिखलाना।।
धरातल पर कोई काम नहीं करना।
चलता रहेगा जन्मना मरते जाना।।

जब भी राजनीति धीमी पड़ जाये।
लोगों की रीढ खड़ी हो अकड़ जाये।।
नये-नये लोकलुभावन प्रपंच रचना।
अंधभक्तों  की  अंधभक्ति परखना।।

राजनीति कभी सेवा मत जानना।
भोली जनता टैक्स  भार तानना।।
माई़ंडवाश लोगों का करते जाना।
दुर्व्यवहार फिर कोई भी मनमाना।।

विधायक और सांसद तोड़फोड़।
अकड़ वालों की दूर करना मरोड़।।
जो कोई भी रस्ते की बनता बाधा।
काट- छांट कर करना उसे आधा।।

राजनीति,जंग,प्रेम में सब जायज।
होता नहीं यहां कुछ भी नाजायज।।
अंधेर नगरी और चोपट सा राजा।
टके सेर भाजी और टके सेर खाजा।।
.......
डॉ.शीलक राम आचार्य 
वैदिक योगशाला

समर्थ को नहिं दोष गुसाईं (Don't blame Samarth)


 'भारत बुद्ध का देश है, युद्ध का देश नहीं।'यह कथन आधा अधुरा ही नहीं अपितु भारतीय नेताओं की कमजोर मानसिकता का परिचायक है।इस धरती पर ऐसा कोई समय नहीं रहा,जब युद्ध नहीं हो रहे हों।ऐसा कोई समय नजर नहीं आता,जब विभिन्न देश युद्धों में नहीं उलझे हुये हों। इस धरती पर युद्ध,आतंक, तोड़फोड़, उग्रवाद और वैमनस्य सदैव मौजूद रहे हैं।भारत हो या अन्य कोई देश हो, युद्ध सदैव अपरिहार्य रहे हैं। ध्यान रहे कि जो देश लड़ना छोड़ देंगे,वो गुलाम होकर बर्बाद हो जायेंगे। अतीत में यह हजारों बार हुआ है। बाहरी या भीतरी किसी भी कारण से जिन देशों ने लडना छोड़ दिया,वो गुलाम हो गये। ऐसे देशों पर विदेशी हमलावरों द्वारा क्रूर अत्याचार किये गये। सैकड़ों वर्षों तक वहां की सभ्यता, संस्कृति, धर्म, जीवन-मूल्यों और पूजास्थलों को बर्बाद कर दिया गया। भारत ऐसे हमलावरों का सर्वाधिक शिकार रहा है।यवन,मंगोल,हुण,तातार,मुगल,डच, डैनिस, पुर्तगाली,अंग्रेज आदि हमलावर बुद्ध की करुणा और युद्धविरोधी सोच के कारण भारत पर दो हजार वर्षों से हमले कर -करके भारत को लूटते रहे, बर्बाद करते रहे तथा यहां की पुरातन समृद्ध विरासत को बर्बाद करते रहे।इसके बावजूद यह कहना कि भारत बुद्ध का देश है, युद्ध का नहीं - एक प्रवंचना ही कहा जायेगा। कबूतर के आंखों को बंद कर लेने से बिल्ली का होना खत्म नहीं हो जाता है। कबूतर के लिये खतरे के रूप में बिल्ली कबूतर के आंखों को बंद कर लेने पर भी वही मौजूद होती है।बुद्ध बुद्ध रटने से करुणा और शांति का जन्म नहीं होता है। किसी के द्वारा कुछ भी नैतिक या धार्मिक या करुणामय दोहराने से आसन्न खतरे कम नहीं हो जाते हैं। बल्कि इस प्रकार की जीवन-शैली से तो दुश्मन द्वारा हार जाना और भी अधिक सहज हो जाता है। चाणक्य,चंद्रगुप्त मौर्य, पुष्यमित्र शुंग,समुद्रगुप्त, चंद्रगुप्त द्वितीय,सातवाहन आदि अखिल वृहद् भारतीय राजाओं तक भारत की सैन्य तैयारियां विश्व में सबसे मजबूत और अभेद्य होती आई थीं।इनके पश्चात् आठवीं नौवीं सदी तक भी भारत की सीमाओं की तरफ देखने की किसी की हिम्मत नहीं होती थीं। ज्यों -ज्यों बौद्ध मत के क्षणभंगवाद,शून्यवाद, वज्रयान मतों तथा अद्वैत वेदांत का एकतरफा प्रभाव बढ़ने से संसार विरोध की प्रवृत्ति में बढ़ोतरी हुई, त्यों -त्यों भारत कमजोर होता गया।इसके फलस्वरूप भारत पर विदेशी हमलावरों की वक्र दृष्टि का प्रकोप बढ़ता गया।डेरियस, सिकंदर आदि विदेशी हमलावरों का भारतीय राजाओं ने जो बुरा हाल किया था,उसकी मिसाल दुनिया में कहीं नहीं मिलेगी। सिकंदर के हमले के एक हजार वर्षों तक भारत पर किसी भी हमलावर ने हमला करने की हिम्मत नहीं की। 

विदेशी लेखकों ने भारतीय इतिहास लेखन में अनेक प्रकार की छेड़छाड़ और मिलावटे करके उसे पूरी तरह से विकृत करके प्रस्तुत किया है। भारत का इतिहास हारों का इतिहास नहीं अपितु युद्धभूमि पर अजेय योद्धाओं की तरह लड़कर विजयी होने का शानदार इतिहास है।ईसा पूर्व और ईसा पश्चात् की इतिहास की अवधारणा बेतुकी, मनघड़ंत, पूर्वाग्रहग्रस्त और कपोल-कल्पित है। सम्राट अशोक जब तक सनातन धर्मी बना रहा,तब तक वह एशिया महाद्वीप में अजेय रहा था। लेकिन ज्यों ही जीवन के अंतिम दिनों में उसने और उसके उत्तराधिकारियों का झुकाव बौद्ध मत की तरफ हुआ, त्यों ही विदेशी हमलावरों ने भारत पर हमले करने की योजनाएं बनानी शुरू कर दी थीं। बौद्ध मत का अनुकरण करने वाले राजाओं का कार्यकाल अशांति, असुरक्षा और उथल-पुथल भरा रहा था। ऊपर से सनातनी दिखलाते हुये भी महापद्मनंद छिपा हुआ बौद्ध था। विदेशी और स्वदेशी लेखकों ने इनको नाई जाति से संबंधित बतलाकर क्षत्रिय विनाशक विचार का समर्थक भी कहा है। लेकिन इस तरह की बातें बढ़ा चढ़ाकर कहीं गई लगती हैं।उस समय पर किसी प्रकार का कोई जातिवाद नहीं था।हां,लोग अपनी पसंद का काम अवश्य करते थे।अंतिम बौद्ध राजा वृहद्रथ के संबंध विदेशी हमलावरों से थे। सनातन धर्म और संस्कृति के विरोध में उन्होंने विदेशी राजाओं की मदद लेने की भी कोशिश की थीं।इसी विश्वासघात के फलस्वरूप उन्हीं के सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने उनकी हत्या करके विदेशी हमलावरों और बौद्ध राजाओं से भारत की सीमाओं को सुरक्षित किया था। 

भारत के अधिकांश राजाओं का इतिहास लड़कर विजय प्राप्त करने या लड़ते हुये वीरगति प्राप्त करने का इतिहास रहा है।इसके मात्र कुछ अपवाद हो सकते हैं।सूर्यवंशी,चंद्रवंशी आदि वंशों से संबंधित क्षत्रिय वर्गों राजपूत,जाट,सिख,गोरखा, मराठा आदि सभी का इतिहास गौरवशाली रहा है।और तो और आजकल जिन्हें आदिवासी, दलित, पिछड़े आदि वर्गों से संबोधित किया जाता है,वो भी मुगलकाल और अंग्रेजी काल तक क्षत्रिय योद्धा वर्ग से संबंध रखते थे। सर्वप्रथम अंग्रेजों ने भारत में जातिवाद के  विष की वृहद् स्तर पर खेती की थी।जो भी लड़ाकू वर्ग थे, उन्हीं को अपराधी जातियां वर्गीकृत करके धड़ल्ले से झूठी पुस्तकें और दस्तावेज तैयार करवाये गये।जिस प्रकार की जातियों की गणना अंग्रेजी लेखकों ने की है,वह भारतीय ग्रंथों में कहीं भी वर्णित नहीं है। इतना सब प्रपंच रचा ही इसलिये था, ताकि भारत को कमजोर कर दिया जाये।लडने वाले विभिन्न वर्गों को अपराधी वर्गों की श्रेणी में सूचीबद्ध करके उनको बर्बाद कर दिया। उनको हर तरफ से तथा हर तरह से अपमानित किया जाता रहा है।भील,निषाद आदि वर्गों का इस्तेमाल क्षत्रिय वर्गों का वीरतापूर्ण इतिहास रहा है। और तो और प्रथम और द्वितीय महायुद्धों में भी भारतीय सैनिकों का विश्व प्रसिद्ध वीरता, युद्ध कौशल और बलिदानों का इतिहास रहा है। 

सन् 1947 ईस्वी में आजादी के पश्चात् भारत का जिस तरह से सैनिकीकरण होना चाहिये था तथा जिस तरह से स्वदेशी सैनिक साजो- सामान बनाने के लिये एक पूरा ढांचा निर्मित होना चाहिये था,वह नहीं हो पाया। अंग्रेजों ने जानबूझकर 'लाईट आफ एशिया' जैसी पुस्तकें लिखकर भारत को कमजोर करने के लिये इसे बुद्ध के देश होने की तोतारटंत शुरू करवा दी।इस षड्यंत्र को सफल करने के लिये सैकड़ों विदेशी लेखकों और बीसियों विश्वविद्यालयों ने सक्रिय भूमिका निभाई है। मैक्समूलर,रीज डैविड, श्रीमती रिज डैविड,ऐनी बेसेंट,कर्नल अल्काट,टी. एस. सुजूकी,अनागारिक धर्मपाल, स्चेरवात्सकी बर्नौफ,बैचनर,हर्मन हैस आदि इसी श्रेणी में आते हैं कमाल की बात है कि साम्यवादी कहलवाने वाले भारतीय लोग भी बौद्धवादी साम्यवादी चीन के हर प्रकार के युद्ध कौशल की प्रशंसा करते रहते हैं, जबकि भारत को बुद्ध का देश कहकर पंचशील और सर्वपंथसमभाववादी आदि के झूठे नारों में उलझाकर सैनिक रुप से कमजोर करते आये हैं।

ध्यान रहे कि भारत एकतरफा न तो कभी शांति का राष्ट्र रहा है तथा न ही भारत की ऐसी कोई परंपरा रही है।भारत की परंपरा रही है ,पहले शांति और यदि दुश्मन इसे नहीं मानते तो युद्ध और क्रांति। इतिहास लेखकों को महाभारत के युद्ध से ही कुछ सीख ले लेना चाहिये थी। भगवान् श्रीराम ने तो रावण से युद्ध करते समय कभी घोषणा नहीं की कि भारतवर्ष एकतरफा रुप से अहिंसा, शांति और समर्पण का देश है।भगवान् श्रीकृष्ण ने तो कभी नहीं कहा कि भारत केवल पतंजलि की योग साधना के अंतर्गत यम और नियमों के पालन का देश है। सच तो यह है कि आजादी के पश्चात् भारत को बुद्ध और गांधी का देश कहकर पुकारना भारत की सबसे बड़ी कमजोर रही है।भारत यदि बुद्ध और गांधी का देश है ,तो भारत श्रीराम, श्रीकृष्ण, अर्जुन,भीम, चंद्रगुप्त मौर्य, चंद्रगुप्त विक्रमादित्य, पुष्यमित्र शुंग, समुद्रगुप्त, हेमचंद विक्रमादित्य, हर्षवर्धन,सातवाहन,शिवाजी,राणा प्रताप,राणा सांगा, बप्पा रावल, गुरु गोविंद सिंह,लक्ष्मीबाई,सुभाष चन्द्र बोस और पटेल का देश भी है।यह ध्यान रहे। 

यदि आजादी के पश्चात् हम इस नीति पर चलते तो आज भारत को अपनी अस्सी प्रतिशत सैन्य तैयारियां के लिये रुस,अमरीका,फ्रांस, इजरायल पर निर्भर नहीं रहना पड़ता। और इसके पश्चात् भी कोई भारत को बुद्ध और गांधी का देश मानने की जिद्द करता है,तो फिर भारतीय सेना और पुलिस के लिये लाखों करोड़ रुपए खर्च क्यों किये जा रहे हैं?हिम्मत है तो भारत को सेना विहीन, पुलिस विहीन और हथियार रहित घोषित कर दो। पाखंड करने की क्या आवश्यकता है? यदि भारत अपनी सैन्य क्षमता में आत्मनिर्भर होता तो कभी का पीओके को भारत में शामिल कर लेता। बांग्लादेश में मारे जा रहे हिन्दू इस तरह से नहीं मारे जाते। श्रीलंका, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल जैसे वभारत के पडौसी देश अमरीका और चीन के प्रभाव में आकर भारत को आंखें नहीं दिखलाते।जिस बांग्लादेश को स्वतंत्र करवाने में भारत ने अपने 4000 जवानों का बलिदान दिया था,आज वही बांग्लादेश भारत को आंखें दिखला रहा है।

सच तो यह है कि हम बुद्ध और गांधी का देश होने की बहुत बड़ी कीमत चुका रहे हैं।अब तो संभल जाओ। छोड़ो भारत को बुद्ध और गांधी का देश कहना और सैनिक रुप से भारत को आत्मनिर्भर बनाने पर त्वरित काम करो। तभी भारत विश्वगुरू और विश्व महाशक्ति बन पायेगा।संसार में सदैव ही समर्थ, शक्तिशाली, ताकतवर और धनसंपन्न देशों का ही विकास हुआ है।आज भी संसार में केवल शक्ति, शौर्य,ताकत, लक्ष्मी और वीरता की ही तूती बोल रही है।समर्थ को नहिं दोष गुसाईं। कोई राष्ट्र जब भी विदेशी हमलावरों की वक्र दृष्टि का शिकार होता है,तो उसके मुख्य कारणों में विदेशी हमलावरों का छल और कपटाचरण, स्वयं उस देश के विपक्षी नेताओं की गद्दारी तथा सेना के उच्च- अधिकारियों का लोभ में आकर विदेशियों के हाथों में बिक जाना आदि होते हैं।जिस देश में ये कमियां नहीं होंगी,उस देश को कोई बाहरी शक्ति गुलाम नहीं बना सकती है। पांचवीं सदी ईसापूर्व से लेकर उन्नीसवीं सदी ईसा पश्चात् तक जब- जब भारत विदेशी शक्तियों का गुलाम हुआ, उसके मूल में बाहरी हमलावरों का छल और कपटाचरण, भारतीय शासकों का प्रलोभन में आकर विदेशी शक्तियों के हाथों बिक जाना और सैन्य अधिकारियों द्वारा किया गया विश्वासघात ही रहा है।इसकी शुरुआत महापद्मनंद और वृहद्रथ जैसे शासकों से हुई थी। यदि भारत के पूरी तरह से गुलाम होने की बात की जाये तो उसकी कहानी भी ऐसी ही है।

बंगाल के स्वतंत्र अंतिम नवाब सिराजुद्दौला अपने चचेरे भाई शौकतगंज, सेनापति मीर जाफर तथा अन्य कमांडरों के विश्वासघात के कारण सन् 1757 ईस्वी के प्लासी युद्ध में अंग्रेजी वायसराय लार्ड क्लाइव से हार गये थे। सिराजुद्दौला की  बेरहमी से हत्या कर दी गई।ईस्ट इंडिया कंपनी का भारत पर कब्ज़ा हो गया। इससे पूरे भारतीय उपमहाद्वीप पर अंग्रेजी राज का रास्ता साफ हो गया।अंग्रेजों ने यह युद्ध शौर्य और वीरता से नहीं अपितु छल, कपट और धोखाधड़ी से जीता था। वास्तव में अंग्रेजों ने सभी युद्ध धोखाधड़ी से ही जीते थे।'फूट डालो और राज करो' तथा 'इस्तेमाल करो और फेंक दो' की नीतियों से ही उन्होंने भारत पर कब्ज़ा किया तथा लगभग पौने दो सौ वर्षों तक भारत पर शासन करके भारत को बर्बाद कर दिया। अंग्रेजों की यह छल, कपट, धोखाधड़ी और लूट-खसोट की कुनीति अब भी पूरे संसार में चल रही है। अमरीका,रुस, इजरायल, इंग्लैंड, फ्रांस आदि सभी देश इसी का अंधानुकरण कर रहे हैं। इनके लिये नैतिकता, धार्मिकता, करुणा, मानवता,अहिंसा,सह -अस्तित्व, सामंजस्य,प्रेम, प्यार आदि का कोई मतलब नहीं है।आज भी ये लोग'जिसकी लाठी, उसकी भैंस' वाली जीवनचर्या पर चल रहे हैं। अमरीका ने वैंजेयुवेला पर कब्जा सैनिक ताकत के बल पर नहीं अपितु धोखाधड़ी करके, देश के विपक्ष तथा वहां की सेना के कमांडरों और कुछ सांसदों को डालरों में खरीदकर किया है। वरना वैंजेयुवेला के पास भी बहुत बड़ी सेना, सुखोई जैसे युद्धक विमान, उच्च कोटि के राडार, टैंक आदि सब कुछ उपलब्ध हैं। लेकिन जब देश के भीतर ही गद्दार बैठे होंगे तो उच्च -कोटि के हथियार भी कहां काम आते हैं। सन् 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में कुछ रियासतों के राजाओं ने ऐसी ही गद्दारी करके अंग्रेजों का साथ दिया था,जिसके ईनाम स्वरूप अंग्रेजों ने उन गद्दारों को बड़े -बड़े जमीन के टुकड़े, पैंशन और भोग -विलास के लिये अंग्रेजी नवयुवतियां प्रदान की थीं।इसी प्रकार की गद्दारी सन् 1947 ईस्वी के भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान मुस्लिम लीग, हिंदू महासभा और संघ जैसे संगठनों ने की थी। और यदि आज से 2500 वर्षों पहले की बात करें तो महापद्मनंद,वृहद्रथ आदि बौद्ध राजाओं ने भी विदेशी शक्तियों से मिलकर भारत के विरोध में साजिशें रचीं थीं। इससे यह सिद्ध है कि किसी राष्ट्र के विकसित,स्वतंत्र और सुरक्षित होने के लिये सत्ताधारी और विपक्षी नेताओं का राष्ट्रभक्त होना,सेना के कमांडरों का राष्ट्र पर बलिदान होने वाले होना, स्वदेशी हथियार प्रणाली का होना तथा जनता -जनार्दन का स्वदेश प्रेमी और स्वाभिमानी होना आवश्यक है। इनके बगैर थोथे नारे लगाने मात्र से कोई राष्ट्र विकसित, समृद्ध, सुरक्षित, विश्वशक्ति तथा विश्वगुरु नहीं बन सकता है।

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डॉ शीलक राम आचार्य
दर्शनशास्त्र- विभाग 
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय 
कुरुक्षेत्र -136119

खुलकर हंसना और रोना भी स्वास्थ्य के लिये आवश्यक है (Laughing and crying openly is also essential for health.)


यदि किसी को हर मुश्किल समय के बाद रोने का हूनर आता है,तो सच मानिये कि वह कैसी भी मुसीबत आने पर न तो उस मुसीबत से भागेगा,न हताश और निराश होगा तथा आत्महत्या नहीं करेगा।रोने से नकारात्मक ऊर्जा का रेचन हो जाता है। जैसे कूकर में सब्जी बनाते समय पीक बिंदु आते ही भांप का निकलना होता है।ठीक वैसे ही जब -जब कोई व्यक्ति किसी दुख, परेशानी, प्रताड़ना, ज़ुल्म, हताशा, कुंठा, तनाव आदि के दौरान ऊर्जा के अतिरेक से भर जाता है,तब -तब किसी समय पर उस ऊर्जा के अतिरेक से एकत्र हुई ऊर्जा को रोने के माध्यम से निकाल दिया जाये,तो बहुत अधिक राहत मिलती है।भविष्य के लिये जीने का आधार तैयार हो जाता है। लेकिन यह रोना किसी को दिखाने के लिये न होकर यदि एकांत में हो जाये,तो नकारात्मक ऊर्जा का रेचन शीघ्रता से हो जाता है।रोने के साथ हंसना भी इसमें सहायक हो सकता है। लेकिन हंसने की क्रिया अकेले में नहीं होनी चाहिये। इसके लिये मित्र, प्यारे,दोस्त,संगे, संबंधी, सहपाठी, सहयात्री आदि कोई भी हो सकते हैं कि जिनके संग हंसना चाहिये। रोना अकेले में और हंसना सबके बीच में। रोना भीड़-भाड़ से दूर होकर एकांत में तथा हंसना बिल्कुल लोगों के मध्य में। रोना और हंसना ये दोनों बहुत गहरे व्यायाम हैं,जिनका प्रभाव भौतिक शरीर,प्राणिक शरीर, मनस् शरीर और भाव शरीर तक होता है।पुरुष वर्ग नेज्ञअपमान के भय से रोना छोड़ दिया है, इसलिये उनमें गुस्सा और चिड़चिड़ापन भी बहुत अधिक मिलता है तथा आत्महत्या की औसत नारी वर्ग से अधिक है। पुरुषों पर नारी -वर्ग की बेवजह की प्रताड़ना, झूठे मुकदमों और नारी के लिये भेदभावपूर्ण एकतरफा अत्यधिक कानूनी अधिकार मिलने के कारण पिछले एक दशक के दौरान तो पुरुष -वर्ग ने विवाह -संस्था से भी किनारा कर लिया है। क्योंकि रोने को पुरुष- वर्ग की शान के खिलाफ माना जाता रहा है, इसलिये पुरुष- वर्ग ने अपना इंतजाम विवाह संस्था से दूरी बनाकर कर लिया है। हालांकि इससे भविष्य में सामाजिक ढांचे का तहश ननहश होकर सामाजिक अव्यवस्था का बढना शुरू हो जायेगा।इसका प्रभाव दिखने भी लगा है। मोबाइल, टीवी, वेश्याघर आदि भी कब तक पुरुष -वर्ग को राहत देने में सफल हो पायेंगे।इनकी भी अपनी एक सीमा होती है। एकांत में खुलकर रोना और अपने कहे जाने वालों के मध्य में हंसना ही जीवन जीने का एकमात्र रास्ता बचता है।क्रोध, बदले की भावना, कामुकता,वासना, अपमान, विफलता, तनाव, हताशा आदि के समय पर जब नकारात्मक ऊर्जा का अतिरेक महसूस हो, उसके कुछ समय के पश्चात् ही एकांत में खुलकर रोने से आंसुओं के माध्यम से सहजता को उपलब्ध किया जा सकता है। राजनीतिक, धार्मिक, व्यापारिक, शैक्षणिक आदि का सिस्टम तो इतना विकृत हो गया है कि कहीं भी सुख,शांति,संतुलन,संतुष्टि, तृप्ति का अहसास मिलने की संभावना न के बराबर है। ऐसे में जीवन जीने के लिये कुछ तो चाहिये,कि जिससे जीने का सहारा मिल जाये। ऐसे में रोना और हंसना सबसे उपयुक्त औषधि सिद्ध होते हैं।तो अब के पश्चात् जब भी किसी दुख,दर्द,धोखाधड़ी, विश्वासघात, अपमान आदि में सब कुछ फीका लगने लगे या आत्महत्या का विचार आने लगे या संसार से पलायन कर जाने का मन करे तो रोने और हंसने को अवश्य आजमाकर देखना। इसका प्रैक्टिकल करना आवश्यक है।

नकारात्मक ऊर्जा की अधिकता व्यक्ति के शरीर, प्राण,मन, बुद्धि, भावना आदि सभी स्तरों पर अव्यवस्था उत्पन्न कर देती है। व्यक्ति सतर्क रहे, इसके लिये झटका लगना आवश्यक है। लेकिन अधिक समय तक नकारात्मक ऊर्जा के प्रभाव में रहना व्यक्तित्व को असंतोष से भर देता है।रोना ऐसी अवस्था में राहत देने का काम करता है।यह रोना भीतर से होना चाहिये,दिखावे के लिये नहीं।ऐसी धारणा बनी हुई है कि रोना तो नारी का गुण है। पुरुषों के लिये रोना शोभा नहीं देता।जैविक दृष्टि से इसमें कुछ सच्चाई हो सकती है, लेकिन जो भी व्यक्ति किसी आवेग,संवेग या अति से ग्रस्त होता है, उसके लिये रोना औषधि का काम करता है।नर या नारी होने से कोई फर्क नहीं पड़ता। हां,यह आवश्यक है कि यदि सबके सामने रोना शुरू कर दोगे,तो यह उतना प्रभावी नहीं हो सके। इससे रोने को किसी व्यक्ति की कमजोरी मानकर उसके संबंध में गलत निर्णय लिये जा सकते हैं। और फिर सबके सामने खुलकर रोया भी नहीं जा सकता है। एकांत में यह क्रिया से आसानी से संपन्न होती है। एकांत में रोयें और खुलकर रोयें। देखें आप एकदम से कितना हल्का,निर्भार और ऊर्जावान महसूस करते हैं। प्रसिद्ध दार्शनिक और अध्यात्मिक महापुरुष आचार्य रजनीश ने तो इसके लिये एक ध्यान विधि ही बना रखी है।इस विधि को उन्होंने 'मिस्टिक रोज' नाम दिया है।एक घंटा खुलकर हंसना,एक घंटा खुलकर रोना तथा एक घंटा विश्राम करना।यह विधि काफी प्रभावी है। उन्होंने हंसने की क्रिया को दैवीय कृत्य कहकर इसकी भूरि -भूरि प्रशंसा की है। उदासी को उन्होंने आजकल के नकली धर्माचार्यों की विशेषता कहा है,तो हंसने को आध्यात्मिक गुण की संज्ञा प्रदान की है। व्यक्ति द्वारा दमित किये गये क्रोध, बदले की भावना, कामुकता, अतृप्ति, असंतोष, अपमान आदि की द्वारा बनी हुई ग्रंथियों को पिघलाने के लिये हंसना और रोना कारगर राहत का काम करते हैं। पाश्चात्य मनोविज्ञान ने भी इस पर काम किया है।

व्यक्ति जब पैदा होता है तो रोने को जीवन का चिन्ह माना जाता है। यदि बच्चा रोये नहीं तो सभी के लिये मुश्किल खड़ी हो जाती है। इसलिये जन्म के पश्चात् नवजात को हिला,डुला और थपथपाकर रुलाने की कोशिश की जाती है। नौ महीने के पश्चात् एकदम से माता के गर्भ में मौजूद सुरक्षित वातावरण से बाहरी अनजान वातावरण में आना बच्चे के लिये काफी कष्टकारी होता है। बाहरी परिवेश में संतुलन बनाने के लिये तकलीफ और संघर्ष करना पड़ता है। इससे उत्पन्न दुख, पीड़ा,भय आदि के आघात से मुक्ति पाने के लिये रोना आवश्यक है।इसका अर्थ है कि बच्चे ने संघर्ष को स्वीकार कर लिया है।जो बच्चे इस संघर्ष को स्वीकार नहीं करते हैं,वो पैदा होने से ठीक पहले, पैदा होते समय या पैदा होने के बाद में मर जाते हैं।पुरातन आयुर्वेद के ग्रंथों सुश्रुत,चरक, वागभट्ट आदि संहिताओं ने रोने को त्रिदोष के अंतर्गत वातप्रधान लक्षण माना है। भावनात्मक असंतुलन से उत्पन्न असंतोष के कारण वात के सहयोग से जल तत्व आंसुओं से बाहर निकलता है। इससे विजातीय विष को बाहर निकालने में सहायता मिलती है। व्यक्ति शांत,निर्भार और सहज महसूस करता है। मनोवैज्ञानिक फ्रायड रोने को दमित भावनाओं का लक्षण कहता है।एडलर इसे हीनभावना या सामाजिक जुडाव की कमी से जोड़कर देखते हैं।जुंग इसे अचेतन और चेतन मन के बीच संघर्ष तथा सामुहिक अचेतन मन से आनेवाले भावनात्मक दबावों के मुक्ति पाने की क्रिया के रूप में देखता है।

रोना और हंसना किसी भी प्रकार की मानसिकता, सामाजिक, नैतिक, आध्यात्मिक और दार्शनिक काउंसलिंग में सहायक क्रिया सिद्ध हो सकती है।बस, आवश्यक यह है कि इसके लिये सतत् अभ्यास, अनुशासन और अनुभव आवश्यक हैं। अधकचरी जानकारी लाभ की बजाय नुकसान का कारण बन सकती है। आजकल विभिन्न प्रकार की काउंसलिंग को वो लोग कर रहे हैं,जो स्वयं बिमार हैं। इन्हें स्वयं खुद को ही काउंसलिंग की त्वरित आवश्यकता है।रोने और हंसने को किसी असामान्य व्यक्ति की काउंसलिंग करने की एक सहायक क्रिया के रूप में प्रयोग किया जा सकता है। इनकी मदद से भावनात्मक ज्वार आंसुओं के माध्यम से या फिर हंसने के दौरान ठहाकों के माध्यम से बाहर निकल जाता है। व्यक्ति तरोताजा होकर किसी भी परिस्थिति का पूरी ऊर्जा से सामना करने के लिये तैयार हो जाता है। हरियाणवी क्षत्रिय जीवन- शैली में रोने को तो कोई स्थान नहीं है लेकिन परस्पर हंसी,मजाक, ठिठोली और ठहाकों को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है।शायद संसार में इतना हंसी मजाक कहीं भी नहीं होता होगा। उच्छृंखल एकतरफा पाश्चात्य भौतिकवादी जीवन-शैली का अंधानुकरण करने के कारण पिछले दो दशक से हरियाणवी जनमानस में हंसना,मजाक करना, चुटकुले आदि सुनना -सुनाना कम हो चुका है। लोगों की सहनशक्ति बहुत कम हो गई है। परस्पर वैमनस्य, बदले की भावना, टांगखिंचाई और ईर्ष्या की भावना में बढ़ोतरी होना विकास का नहीं अपितु पिछड़ेपन की निशानी है। ऐसे में हमें फिर से हंसी, ठिठोली और मजाक करने की जीवन-शैली पर वापस लौटना ही होगा।

 लंबे- लंबे,उदास  और गंभीर चेहरों से खुशी गायब हो जाती है।माना कि संसार में परेशानियां बहुत अधिक हैं। माना कि राजनीतिक सिस्टम ने हमें बर्बाद कर दिया है।माना कि हमारे यहां पाखंड, ढोंग, दिखावा और भ्रष्टाचार बहुत बढा हुआ है।माना कि हमारी शिक्षा - व्यवस्था दुनिया में सर्वाधिक पिछडी हुई है।माना कि बेरोजगारी ने युवावर्ग की कमर तोड दी है। लेकिन इन सबके बावजूद हम रोना और हंसना तो नहीं छोड़ सकते हैं। यदि हमें जीवित रहना है,तो अपनी शारीरिक - मानसिक जरुरत अनुसार हंसने और रोने को अपनी दिनचर्या में स्थान अवश्य दें। हंसना और रोना दोनों हमें गहरे तल तक प्रभावित करते हैं।बस, ध्यान यह रखें कि रोना कहीं घर के किसी कोने में या खेत में या कहीं भी एकांत में। जहां तक हंसने की बात है,जहां भी उचित मौका मिले, वहां पर अवश्य हंसना। लेकिन किसी के दुख,दर्द, परेशानी,टोटे,मौत या बुरे वक्त में बिल्कुल मत हंसना। सामाजिक दायित्व निभाना सबकी जिम्मेदारी है। समाज में आज भी किसी के  रोने को कमजोरी और हंसने को लड़कपन की निशानी मानते हैं। परस्पर संबंधों में धोखाधड़ी प्रचुरता से मौजूद है। पारिवारिक संबंधों में खटास है।पती पत्नी में भी अनबन रहती है।संतान भी धोखा देने के लिये तैयार है।तलाक की औसत हर साल बढ रही है।लिव इन रिलेशनशिप में बढ़ोतरी हो रही है।साल- छह महीने साथ व्यतीत करके जोडे कोर्ट में मुकदमे कर रहे हैं।नकली दहेज के मुकदमे दर्ज हो रहे हैं।राजनीतिक, प्रशासनिक,धार्मिक, आर्थिक,शैक्षिक, व्यापारिक, रोजगार,खेती-बाड़ी आदि की हालत बहुत खराब है। ऐसे विषम हालात में आपको प्रतिपल हंसने और रोने के लिये तैयार रहना चाहिये। जीने का यही एकमात्र आधार आपको विषम परिस्थितियों में जीवनेच्छा प्रदान करने में समर्थ है। वरना सांसारिक संघर्ष की चक्की में पिसते- पिसते बर्बाद हो जाओगे या फिर ऐसे ही असमय मर जाओगे।

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डॉ. शीलक राम आचार्य 
दर्शनशास्त्र- विभाग 
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय 
कुरुक्षेत्र-136119

Saturday, December 6, 2025

दर्शनशास्त्र और जीवन : वैचारिक कट्टरता का विनाशकारी इतिहास (Philosophy and Life: The Disastrous History of Ideological Fanaticism)


'दर्शनशास्त्र' की किसी भी थ्योरी, सिद्धांत,मत या वाद पर वाद- विवाद करते हुये यह ध्यान रखा जाना आवश्यक है कि वह थ्योरी, सिद्धांत, मत और मत जीवन की विभिन्न सामाजिक, शारीरिक, व्यक्तिगत,पारिवारिक,प्राणिक, वैचारिक, मानसिक, भावनात्मक, आत्मिक आवश्यकताओं को किस सीमा तक संतोष प्रदान करता है।केवल तार्किक रुप से किसी घटना, व्यक्ति, वस्तु, स्थान, परिस्थिति को जांचना सही नहीं है।उस तार्किकता के साथ जीवन की विभिन्न आवश्यकताओं को भी समझना है। विभिन्न थ्योरीज़, सिद्धांत आदि जीवन और जगत् के लिये होते हैं,जीवन थ्योरीज और जगत् के लिये नहीं होता है। सामान्यतः बुद्धिमान लोग जीवन जीना भूल जाते हैं लेकिन थ्योरीज़ आदि का याद रखते हैं। विभिन्न थ्योरीज़ के लिये अपने जीवन को बर्बाद करने वाले इन तथाकथित बुद्धिजीवियों के कारण दुनिया में अनेक युद्ध तक हो चुके हैं।जिसकी जो थ्योरी है,वह इसके विरोध में कोई भी तर्क या प्रमाण मानने को तैयार नहीं होता है।इस प्रकार की कट्टरता और अंधभक्ति दर्शनशास्त्र जैसे विषय के लिये शर्म, अपमान और उपहास की बात है।पश्चिम में फिलासफी के अंतर्गत भौतिकवाद,परमाणुवाद,परिवर्तनवाद,अज्ञेयवाद, संदेहवाद, बुद्धिवाद,अनुभववाद, समीक्षावाद, प्रत्ययवाद, इन्द्रियानुभववाद, वस्तुस्वातंत्र्यवाद,नारीवाद, मार्क्सवाद, विकासवाद,बहुसंस्कृतिवाद, उच्छृंखल भोगवाद, अवसरवाद, बांटो और शासन करो, इस्तेमाल करो और फेंक दो आदि सैकड़ों थ्योरीज़, सिद्धांत,वाद,मत, विचारधाराएं पिछले 2500 वर्षों के कालखंड में अस्तित्व में आये हैं। इनमें से कयी थ्योरीज को आधार बनाकर यूरोपियन देशों ने समस्त धरा के देशों पर समय- समय पर आक्रमण करके उनको लूटा, वहां पर नरसंहार किये, मतांतरण करवाया तथा तानाशाही से शासन भी किया है।एकेश्वरवाद,पैगंबरवाद,खलीफावाद आदि की थ्योरीज से अरब जगत् प्रभावित रहा है। और इसकी आड़ में अनेक अरबी कबीलों के खूंखार सरदारों ने एशिया, यूरोप और अफ्रीका के बहुत से देशों में अपना दमन,मतांतरण और तानाशाही कुचक्र कायम किया।ये सारे के सारे बेशक अनपढ़, मूर्ख,उज्जड,जंगली और पाशविक थे, लेकिन फिर भी किसी न किसी थ्योरी या मत या विचारधारा या जीवनशैली को कट्टरता के साथ लेकर चल रहे थे।जिसको जैसा अच्छा लगता हो,वह वैसा ही करे, लेकिन इसे दूसरों पर जबरदस्ती करके,तलवार के भयाक्रांत करके,पवित्र पुस्तक का प्रलोभन देकर और किसी पैगंबर के नाम पर थोपना मानवता नहीं अपितु जंगलीपना और राक्षसपना है।भारत में बौद्ध,कापालिक,तांत्रिक आदि ने भी कुछ समय के लिये ऐसा कुकृत्य करने का प्रयास किया था और सनातन भारतीय धर्म और संस्कृति को बहुत नुक्सान भी पहुचाया था, लेकिन उस समय पर मौजूद सनातनी मंडननमिश्र,कुमारिलभट्ट, गौडपादाचार्य,शंकराचार्य आदि के आगे वो अधिक आगे तक सफल नहीं हो पाये थे। बौद्ध मत को छोड़कर किसी ने भी विदेशी धरती पर शासन या आक्रमण या मतांतरण या कन्वर्जन या अत्याचार या विध्वंस आदि नहीं किये थे। दुनिया की सबसे पुरानी ज्ञान पुस्तक वेद में ही केवल सृष्टि उत्पत्ति के संबंध में ही बारह सिद्धांत मौजूद हैं, लेकिन वो परस्पर झगडे झांसे या अत्याचार या दमन या मतांतरण आदि का कारण नहीं बने। ऋग्वेद के नासदीय और पुरुष सूक्तों के आधार पर प्रसिद्ध वैदिक विचारक मधुसूदन ओझा ने सृष्टि उत्पत्ति के संबंध में ही दस सिद्धांत बतलाये हैं। बाकी विषयों के संबंध में भी सिद्धांतों की भरमार है।एक बार सृष्टि सिद्धांतों को देखिये -

सद्सद्वाद,रजोवाद,व्योमवाद, अपरवाद, आवरणवाद, अम्भोवाद, अमृतमृत्युवाद, अहोरात्रवाद, दैववाद, संशयवाद।
यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि इस धरती पर विभिन्न थ्योरीज, सिद्धांत,वाद,मत आदि के कट्टर समर्थकों ने जितना विध्वंस,विनाश, मतांतरण, ज़ुल्म, अत्याचार किया है,उतना शायद किसी ने नहीं किया होगा। अब्राहमिक मतवादी इसमें शिरोमणि कहलाते हैं। और तो और विज्ञान भी पिछले 250 वर्षों के दौरान इनकी इसी कट्टरता और अंधभक्ति के कारण विध्वंस,विनाश और भेदभाव का कारण बनता जा रहा है।

डॉ. शीलक राम आचार्य
दर्शनशास्त्र-विभाग
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र
(हरियाणा)

शरीर के उत्सव में खोती आत्मा (The soul lost in the celebration of the body)

अब्राहमिक फैमीनीज्म से प्रेरित और पल्लवित अभिनेत्रियां,योग -शिक्षिकाएं,एयर होस्टेस,रिसैप्निस्ट, प्रबंधन क्षेत्र में कार्यरत युवतियां, नृतकियां, विश्वविद्यालयीन लड़कियां, सोशल मीडिया पर अर्धनग्न होकर रील बनाकर डालने वाली लड़कियां बोल्डनैस का मतलब नग्न होना मानती हैं। जिसके शरीर पर जितने कम कपड़े होंगे, उसे उतना ही अधिक बोल्ड माना जाता है।

बोल्डनैस को नग्नता,उघाडेपन और अंग -प्रदर्शन से जोड़ दिया गया है। बोल्डनैस को शरीर की कामुक मुद्राओं से आंका जा रहा है।नारी के शरीर पर जितने कम वस्त्र होंगे,वह उतनी ही अधिक बोल्ड, सुंदर और बोल्ड दिखेगी।
यदि इस प्रकार के अंग-प्रदर्शन,उघाडेपन और कामुक मुद्राओं को ही बोल्डनैस माना जायेगा तो फिर पुरुषों को भी ऐसा ही करना चाहिये। पुरुषों को भी ऐसा ही करना चाहिये। पुरुषों को भी बोल्ड क्यों नहीं होना चाहिये?बोल्डनैस का पैमाना लड़कियों और लड़कों के लिये भिन्न भिन्न क्यों है? 
क्या पुरुषों के पास नग्न और उघाडा होकर दिखाने के लिये कुछ भी नहीं है?यह आश्चर्यजनक है कि यदि कोई लड़का उघाड़ा होता है,तो वह असभ्यता और फूहड़ता माना जाता है लेकिन लड़कियों के संबंध में इसका बिल्कुल विपरीत है। लड़कियों के लिये नग्नता और उघाडापन सौंदर्य का प्रतीक बन गया है।
लड़की हो या लडका हो-उघाडा होकर वो क्या दिखाना और क्या छिपाना चाहते हैं? इसका क्या रहस्य है? कुछ तो ऐसा जरूर है, जिस पर कोई भी खुलकर बोलना नहीं चाहता है। यदि कोई बोलने का दुस्साहस करे भी तो उस पर सभी नग्नता समर्थक और नैतिकता समर्थक टूट पड़ते हैं। लगता है कि ये दोनों वर्ग इस नग्नता की आड़ लेकर अपनी दमित ऊर्जा का रेचन करके राहत महसूस करने पर लगे हुये हैं।
सोचने की बात यह भी है कि यदि नग्नता और उघाडापन ही सौंदर्य या बोल्डनैस या प्रतिभा का आंकलन है,तो ऐसे में तो गधे, कुत्ते, बिल्ली, सुअर, भैंस, झोटे आदि पशु अधिक बोल्ड, सुंदर और प्रतिभाशाली हैं।
लगता है कि अपने खालीपन, अपने अकेलेपन, अपने तनाव,अपनी हताशा और अपनी चिंता को युवाशक्ति -वर्ग अपनी और अन्यों की कामुकता को उत्तेजित करके उससे राहत पाना चाहते हैं। इन सबके आगे, पीछे,ऊपर, नीचे और बीच में सर्वत्र उच्छृंखल कामुकता प्रधान हो गई है।आहार निद्रा,भय और मैथुन किसी भी प्राणी के लिये आवश्यक होते हैं, लेकिन इस तरह से इन्हीं में डूबकर जीवन जीना पशुओं के लिये सही कहा जा सकता है, मनुष्य प्राणी के लिये नहीं।
पिछले कुछ दशकों से यह इस प्रकार की जीवन- शैली अवगुण की जगह  गुण में परिवर्तित हो गई है।इसे फैशन या आधुनिकता या आजादी या समान अधिकार कहकर महिमान्वित किया जा रहा है।
 व्यापार, राजनीति, उद्योग- धंधों,कोरपोरेट -घरानों,होटल- व्यवसाय, फिल्म -उद्योग, धर्म,योग,कथा, सत्संग, जागरण, शिक्षा, परिवहन और विज्ञापन आदि सभी क्षेत्रों के चालाक लोगों ने महिला- वर्ग की इस नग्नता और उघाडेपन को अपने व्यापारिक हित साधने का जरिया बना लिया है।
आज किसी को कुछ भी बेचना हो तो वह विज्ञापन के रूप में महिलाओं की नग्नता और उघाडेपन का सहारा लेता है। चतुर और धूर्त लोग रुपया कमा रहे हैं लेकिन बहुसंख्यक जनमानस का जमकर शोषण हो रहा है। नैतिकता,जीवन-मूल्य, सात्विकता, सरलता,सहजता,संयम, अनुशासन आदि जायें भाड़ में।


डॉ. शीलक राम आचार्य
दर्शनशास्त्र- विभाग
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र (हरियाणा)

Saturday, November 8, 2025

सनातन धर्म, संस्कृति और दर्शनशास्त्र को सबसे बड़ा खतरा (The biggest threat to Sanatan Dharma, culture and philosophy)

 सनातन धर्म, संस्कृति और दर्शनशास्त्र को सबसे बड़ा खतरा 
सनातन धर्म और संस्कृति को फिलहाल सबसे बड़ा खतरा हिंदुओं से ही है। जरथुष्ट्र से लेकर मूसा,ईसा, मुहम्मद, सिद्धार्थ गौतम आदि के अनुयायियों और अब हिंदू हितकारी कहे जाने इन ढोंगियों तथा साम्यवादियों और नवयानियों से खतरा बना रहता आया है।साईरस, सिकंदर,कासिम,गौरी, गजनी, अब्दाली, चंगेज, नादिर,बाबर, हुमायूं, शाहजहां, औरंगजेब, अकबर, कार्नवालिस, मैकाले आदि अब्राहमिक हमले पिछले 3000 वर्षों से होते आ रहे हैं। उपरोक्त सभी अब्राहमिक मजहबी थे तथा अब्राहमिक मजहबों के प्रचार-प्रसार के लिये तथा आर्थिक लूट के लिये हमले किये गये थे। फिलहाल भारत पर और सनातन धर्म और संस्कृति पर हो रहे हमले करने वाले कोई बाहरी हमलावर ने होकर हिंदू हितकारी कहे जाने वाले अंधानुयायी हैं। इन्होंने अपनी पहचान को छिपा दिया है।भारत, सनातन धर्म और सनातन संस्कृति को अब्राहमिक कहे जाने बाहरी हमलावर तो पूरी तरह से बर्बाद नहीं कर पाये थे। लेकिन फिलहाल जो खतरा सनातन धर्म और संस्कृति पर हो रहा है,वह पहले वाले हमलों से भी घातक है। इस समय अपने आपको सनातनी कहकर ही सनातन को बर्बाद करने मे लगे हुये हैं। सनातन धर्म और संस्कृति पर हो रहे इस हमले को सनातनी जनमानस भी समझ नहीं पा रहा है। आर्यसमाज से थोडी आशा थी कि वह ढाल बनकर खड़ा होगा लेकिन महर्षि दयानंद सरस्वती के कुछ समर्पित शिष्यों को छोड़कर यह संगठन भी इन नकली हिंदू हितकारियों के झांसे में फंसकर रह गया है।इन नकली हिंदू हितकारियों का साथ एक तरफ तो अब्राहमिक मजहब दे रहे हैं, दूसरी तरफ भारत के कुछ अमीर घराने सहयोग कर रहे हैं तथा तीसरी तरफ अनेक नकली शंकराचार्य, महामंडलेश्वर, स्वामी, संन्यासी, सद्गुरु आदि सहयोग कर रहे हैं। सामुहिक रूप से कोई भी संगठन सनातन धर्म और संस्कृति के रक्षार्थ फिलहाल प्रस्तुत नहीं है। हां, व्यक्तिगत रूप से अनेक विचारक, सुधारक, विद्वान, दार्शनिक तथा कुछ छोटे स्तर के संगठन अवश्य प्रयासरत हैं।वो सभी अपनी जान पर खेलकर प्रयासरत हैं।इसी क्रम में महर्षि दयानंद सरस्वती, स्वामी श्रद्धानंद, सुभाष चन्द्र बोस, बिस्मिल, भगतसिंह, अशफाक,राजीव भाई दीक्षित जैसे कयी महापुरुष अपना बलिदान दे चुके हैं। वांगचुक जैसे राष्ट्रवादी लोग भी राष्ट्रभक्त होने की सजा भुगत रहे हैं।

अब्राहमिक सोच का अंधानुकरण करने वाले नकली हिंदू हितकारियों ने पिछले दशक में पता नहीं कितने समकालीन वैदिक स्वामी दयानंद सरस्वती, राष्ट्रवादी इतिहासकार धर्मपाल, स्वदेशी राजीव भाई दीक्षित को छीन लिया है। वैसे तो आजादी के पश्चात् ही यह दुष्ट परंपरा साम्यवाद और नवयान की आड़ में शुरू हो गई थी लेकिन पिछले एक दशक के दौरान  सनातन धर्म और संस्कृति पर जो हमले हुये हैं, उन्होंने अब्राहमिक,नवयानी और साम्यवादियों के सम्मिलित रुप को भी पीछे छोड़ दिया है।बचे खुचे सनातन धर्म और संस्कृति को बर्बाद करके अपनी सत्ता कायम करने के लिये इन्होंने नकली शंकराचार्य,ढोगी संत,शोषक स्वामी, कपटी संन्यासी और व्यापारी योगाचार्य पैदा कर दिये पैदा हैं। विश्वविद्यालयों के शीर्ष पर अनपढ़ और पाखंडी लोगों को बैठा दिया है। सरकार सहायता प्राप्त अकादमियों और पीठों द्वारा जी- हुजूरी और चापलूसी करने वाले सम्मानित हो रहे हैं और मौलिक प्रतिभाशाली विचारक उपेक्षित किये जा रहे हैं।मुगल दरबारी चारण और भाटों के समकक्ष चापलूसों की पुस्तकें पुरस्कृत हो रही हैं जबकि जमीनी वास्तविकता को अभिव्यक्ति देने वाली राष्ट्रवादी पुस्तकों को रद्दी की टोकरी में फेंक दिया जा रहा है। ऐसे सनातन धर्म और संस्कृति विरोधी कुकृत्य करके भारत को विश्वगुरु बनाने का ढिंढोरा पीटा जा रहा है। यदि कोई इन कुकृत्यों का विरोध करे तो उसे देशद्रोही और सनातनद्रोही कहकर गालियां दी जा रही हैं। जाति, क्षेत्र, भाषा के नाम से भारत को बांटने के जितने घृणित प्रयास इस समय चल रहे हैं,इतने घृणित प्रयास शायद सभी अब्राहमिक संगठनों ने मिलकर पिछले 3000 वर्षों के दौरान किये होंगे।

 सर्वधर्मसमभाव क्या है? सर्वमतसमभाव क्या है?'धर्म' के साथ सर्व लगाना अपने आपमें महामूर्खता है।धर्म अनेक थोडे ही होते हैं। धर्म तो एक ही होता है। यदि सर्वमतसमभाव सही है तो यह सबके लिये यानी पारसी, यहुदी, ईसाई, इस्लाम, जैन,बौद्ध के लिये भी है या केवल हिन्दू मतानुयायियों के लिये ही है?सच तो यह है कि इस अवधारणा का सबसे अधिक नुकसान हिंदू को ही हुआ है। पारसी, यहुदी, ईसाई, इस्लाम, जैन,बौद्ध आदि को इसका अधिक नुकसान नहीं हुआ है। हिंदू को छोड़कर सभी मत हमलावर मन :स्थिति के रहे हैं।पूरी दुनिया को फतेह करके अपने अपने मत में दीक्षित करके अपना सांप्रदायिक,मजहबी और राजनीतिक साम्राज्य स्थापित करना इनका एकमात्र लक्ष्य रहा है। पिछले 3000 वर्षों से आर्यधर्मी रक्षात्मक होकर जीवन जी रहे हैं।आज भी स्थिति में कोई अधिक बदलाव नहीं हुआ है।इसीलिये आज भी आर्यधर्मी या सनातनधर्मी या वैदिकधर्मी सर्वाधिक असुरक्षित है।जब से इन्होंने हमलावर और रक्षात्मक शक्तियों में संतुलन बनाना बंद करके एकतरफा सर्वमतसमभाव का जीवन जीना शुरू किया है तभी से ये रक्षात्मक होकर रह गये हैं।ऐसी विषम स्थिति में सनातन या आर्य या वैदिक धर्म तो बचेगा लेकिन इसको आचरण में उतारने वाला इस धरती पर कोई नहीं बचेगा। सीधा सा तर्क है कि यदि यदि सभी मत समान हैं तो फिर आपको पारस, यहुदी, ईसाई, इस्लामी, जैन, बौद्ध आदि अपने अपने मतानुसार आज तक दूसरे देशों पर जो भी आक्रमण,हिंसा,मारकाट, नरसंहार , मतांतरण, युद्ध, बलात्कार, लूटपाट आदि करते आये हैं,उस सबको आपको जायज मानना होगा। क्यों? क्योंकि यह सब करने उनके मतानुसार सही है।उन द्वारा किये गये हरेक अमानवीय कृत्य को आपको मानना ही होगा, क्योंकि आप सर्वमतसमभाव को मानते हो।हां, यदि आप भीतर से कुछ और बाहर से कुछ अन्य हो,तो फिर आप कुछ भी कर सकते हो। लेकिन यह तो धर्मानुसार नहीं है।यह दुर्व्यवहार संप्रदाय अनुसार या मजहब अनुसार या मत अनुसार ठीक हो सकता है लेकिन धर्मानुसार नहीं। धर्म तो भीतर और बाहर से एक समान व्यवहार की सीख देता है।इसीलिये सर्वमतसमभाव की अवधारणा में फंसकर हिंदू ने अपने पैरों पर खुद ही कुल्हाड़ी से वार करके अपने ही पैरों को काट डाला है। भारत में विवेकानंद, प्रभुपाद, गांधी, परमहंस योगानंद, हेडगेवार आदि लोग तथा आजकल के अधिकांश शंकराचार्य, महामंडलेश्वर, स्वामी, संन्यासी, मुनि, योगाचार्य, सुधारक , राजनीतिक दल और नेता लोग आदि सभी इस सर्वमतसमभाव के भंवरजाल में फंसकर सनातन धर्म, दर्शनशास्त्र और संस्कृति को लुप्तप्राय: करने में सहयोगी बन रहे हैं।

 भारत में सनातन से ही 'मत' या 'संप्रदाय' बनाने की परंपरा धर्मानुसार रही है। लेकिन इस परंपरा को खंडित करने का कार्य सर्वप्रथम शंकराचार्य के शिष्यों ने उपनिषदों,ब्रह्मसूत्र, श्रीमद्भगवद्गीता को प्रस्थानत्रयी घोषित करके शुरुआत की। उन्होंने यह सिद्ध करने के लिये कि केवल अद्वैतवाद सही है और बाकी सब कुछ गलत है, हजारों ग्रंथों की रचना कर डाली। इसकी प्रतिक्रियास्वरूप विचारकों ने विशिष्टाद्वैतवाद, शुद्धाद्वैतवाद,द्वैताद्वैत वाद, अचि़त्ंयभेदाभेदवाद, शक्त्याद्वैतवाद, ध्वन्याद्वैतवाद आदि मत खडे हो गये तथा हरेक ने उपरोक्त तीन ग्रंथों उपनिषदों, ब्रह्मसूत्र और श्रीमद्भगवद्गीता से अपने अपने मतों को सही तथा बाकी को गलत सिद्ध करना शुरू कर दिया। इनकी इस वैचारिक कबड्डी में सनातन धर्म, दर्शनशास्त्र और संस्कृति के मूल स्रोत ग्रंथों वेदादि को बिल्कुल भूला दिया गया।हरेक संप्रदाय खुद को सही और बाकी को गलत कहकर परस्पर सभी को गलत ही सिद्ध करने का प्रयास कर रहा था।इस दुषित परंपरा ने आर्य या वैदिक या सनातन धर्म,दर्शनशास्त्र और संस्कृति को भारतीयों के जीवन से ओझल कर दिया है। भारत में सभी स्थानों पर पाखंडी,शोषक और पद- प्रतिष्ठा के लोभी बाबाओं की बाढ़ आई हुई है। नेता और अमीर घराने अपने लाभ के लिये इन बाबाओं का खूब दुरुपयोग कर रहे हैं। भारत के अधिकांश बाबा अपने आपको परमात्मा मानकर पूजा करवा रहे हैं। व्यक्तिवादी अनेक परमात्मा उत्पन्न हो गये हैं।ये पहले तो अब्राहमिक मजहबों की तरह मजहबी बने तथा बाद में अपने आपको ही परमात्मा मानने लगे हैं।ये सारे मिलकर सनातन धर्म,दर्शनशास्त्र,संस्कृति से ही उपदेश चुराते हैं और फिर इसी में कमियां निकालकर गालियां देने लगते हैं। पारसी, यहुदी, ईसाई और इस्लाम पहले ही सनातन धर्म, संस्कृति, दर्शनशास्त्र के साथ अतीत में ऐसा कर चुके हैं लेकिन अब तो खुद हिंदू भी ऐसा ही करने पर उतारू हैं।इस समय के ही नहीं अपितु पिछले 150 वर्षों के दौरान पैदा हुये अधिकांश धर्मगुरु अब्राहमिक मजहबों की तरह सनातन धर्म,संस्कृति,दर्शनशास्त्र के साथ दुश्मनी निभा रहे हैं। महर्षि दयानंद सरस्वती ने कुमारिल , मंडन मिश्र,शंकराचार्य के पश्चात् सनातन धर्म,संस्कृति, दर्शनशास्त्र के लिये सर्वाधिक प्रामाणिक, प्रशंसनीय और वास्तविक प्रयास किया था लेकिन उनकी असमय हत्या कर दी गई।हत्या करने वाले कोई और नहीं अपितु अब्राहमिक मजहबों के विचारक और शंकराचार्य के शिष्यों द्वारा गलत परंपरा को शुरू करने के फलस्वरूप पैदा हुये विभिन्न सांप्रदायिक विचारक ही थे।इस समय राजीव भाई दीक्षित भी इन्हीं के षड्यंत्र का शिकार हुये हैं।यह सबको पता है।

 संप्रदाय,मत या वाद वहीं तक सही होते हैं ,जहां तक वे सनातन धर्म,संस्कृति और दर्शनशास्त्र का समर्थन करता हों।जब भी वो इस सीमा का उल्लंघन करने लगें तो उन पर लगाम कसना आवश्यक होता है। शंकराचार्य के बाद वह लगाम बिल्कुल ढीली छोड़ दी गई है। शंकराचार्य के शिष्यों ने अतीत में एकतरफा अद्वैतवाद के रूप में खूब धींगामुश्ती की है। बाकी विचारक भी उन्हीं के पदचिन्हों पर चलकर वैचारिक कबड्डी खेलने का काम करते रहे हैं। सभी को यह आश्चर्यजनक लगेगा कि समय और परिस्थिति अनुसार खुद चार्वाक,आजीवक,महावीर, सिद्धार्थ गौतम आदि ने अपने अपने समय पर आई विकृतियों को दूर करके सनातन धर्म,संस्कृति, दर्शनशास्त्र के प्रचार-प्रसार के लिये प्रयास किये लेकिन शिष्यों - प्रशिष्यों को यह सब अपनी आजीविका और अहंकार के अनुकूल नहीं लगा। और परिणामस्वरूप अनेक मजहब उत्पन्न ही नहीं हुये अपितु खूनी संघर्ष भी खूब हुये हैं। बौद्ध राजाओं और भिक्षुओं द्वारा सनातन धर्म,संस्कृति, दर्शनशास्त्र को नष्ट करने करने के लिये अपनी पूरी शक्ति लगा दी थी।इसीलिये आज भी नवयानी बौद्ध अपने आपको सनातन धर्म, संस्कृति, दर्शनशास्त्र के समीप न कहकर ईसाईयत और इस्लाम के समीपस्थ महसूस करते हैं। राधास्वामी,रामकृष्ण मिशन, ब्रह्माकुमारीज, इस्कान,राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ,पतंजलि योगपीठ,सच्चा सौदा,धन धन सतगुरु,योग वेदांत समीति ,ईशा फाउंडेशन, ओशो धाम आदि सैकड़ों धार्मिक कहे जाने वाले संगठन सर्वमतसमभाव की आड़ में खुद तो अरबपति खरबपति बन बैठे हैं लेकिन ये सारे मिलकर सनातन धर्म, संस्कृति, दर्शनशास्त्र की बेतुकी और अमर्यादित आलोचना करते रहते हैं। और तो और हमें जो संवैधानिक व्यवस्था सन् 1947 ईस्वी के बाद मिली है,वह भी सनातन के विरोध और सर्वमतसमभाव के नकली सिद्धांत पर खडी हुई है।इस नकली सिद्धांत पर चलने के लिये सिर्फ हिन्दू को ही विवश किया जाता है। हिंदू को छोड़कर सभी मजहबों को उच्छृंखल आजादी प्रदान की गई है। इसलिये रामकृष्ण मिशन जैसे संगठनों ने तो अपने आपको सनातन धर्म से अलग करने के लिये न्यायालय तक की शरण ली थी। कितना विचित्र और हृदयविदारक है यह सब कि जिन मतों, संप्रदायों और वाद आदि का कर्तव्य सनातन धर्म,संस्कृति, दर्शनशास्त्र, नैतिकता, आचरण आदि को सुरक्षा कवच प्रदान करना था, पिछली कयी सदियों से वो सारे मिलकर इसी सनातन के विभिन्न घटकों पर प्रहार करने का कोई भी अवसर नहीं चूकते हैं।

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आचार्य शीलक राम 
दर्शनशास्त्र- विभाग 
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय 
कुरुक्षेत्र -136119

भागों नहीं अपितु सामना करो

सत्यनिष्ठा,कर्त्तव्यपरायणता, विश्वसनीयता आदि नैतिक जीवन मूल्यों के साथ साथ अपनी संतान को इतनी तिकड़मबाजी, चापलूसी और झूठ बोलना अवश्य सिखला देना कि वो भ्रष्टाचार,कपट,छल और रिश्वतखोरी के परिवेश में सफलता की सीढ़ियां चढ सकें। जिनके हाथों में सिस्टम की बागडोर है,सच जानिये कि वो सभी के सभी परले दर्जे के भ्रष्टाचारी, झूठे, कपटी, चापलूस और गिरगिटिया चरित्र के स्वामी हैं। ऐसे दुषित सिस्टम और गले सड़े परिवेश में नैतिक जीवन-मूल्यों को पूछने वाला कोई भी नहीं है। जिनके हाथों में सिस्टम है वो सभी अपनी संतानों को बढ़िया शिक्षा के लिये विदेशी विश्वविद्यालयों में पढ़ने के लिये भेज देते हैं और बाकी बचे भारतीयों को नैतिकता, राष्ट्रवाद, राष्ट्रप्रेम और स्वदेशी पर चलकर तथा भारत के ही सडे गले विश्वविद्यालयों में शिक्षा लेने को विवश करते हैं।कुछ धूर्तों ने कपटाचरण करके आरक्षण के द्वारा अपने निशुल्क भोजन, पानी, औषधि और शिक्षा की व्यवस्था कर ली है तो नेता,धर्मगुरु, प्रशासनिक अधिकारी और अमीर घरानों के हाथों में राजसत्ता, धर्मसत्ता और धनसत्ता की बागडोर है। इन्होंने अपने जीवन में हर प्रकार की खुशहाली की भरपूर व्यवस्था कर ली है। बाकी बचे हुये भारतीयों के पल्ले में गरीबी,कुशिक्षा, बदहाली,शोषण, प्रताड़ना , ज़ुल्म के सिवाय कुछ नहीं है।अब भी संभल जाओ। यहां पर तो राष्ट्रवाद के सपने दिखलाने वाले नेता ही सबसे बडे देशविरोधी हैं। स्वदेशी के नारे लगाने वाले नेता और धर्मगुरु विदेशी सामान का उपभोग करके अय्याशी कर रहे हैं। धर्म और नैतिकता की दुहाई देने वाले धर्मगुरु,संत,संन्यासी,स्वामी और गुरु लोग सबसे बड़े अधार्मिक और अनैतिक हैं।सच तो यह है कि हमारे भारत के अधिकांश नेता, धर्मगुरु, योगाचार्य,संत, स्वामी, संन्यासी,सद्गुरु और सुधारक आदि सबसे अधिक भ्रष्ट,कामुक, झूठे, कपटी,छली, धूर्त, विदेशी सामान के उपभोक्ता और अनैतिक हैं।

 विश्वविद्यालयीन अध्ययन अध्यापन के दौरान पिछले डेढ दशक के दौरान हमने भी बेतहाशा ज़ुल्म, प्रताड़ना, अपमान, भेदभाव, जातिवाद और आर्थिक अभाव को झेला है। लेकिन हमने तो आत्महत्या नहीं की।हम तो डटे भी रहे हैं तथा जीवित भी रहे हैं।एक आईपीएस अधिकारी,उसकी आईएएस पत्नी, विदेश में बच्चे भी पढ़ रहे हैं,महंगे मकानों में रह रहे हैं तथा सरकार में पहुंच भी बहुत अधिक है - फिर भी प्रैसर को नहीं झेल पाये। काहे के आईपीएस और आईएएस अधिकारी हैं? इनकी यही ट्रैनिंग होती है कि प्रैसर आये तो आत्महत्या कर लेना? यहां विश्वविद्यालय में देखो - पीएचडी किये हुये हैं,कयी कयी विषयों में स्नातकोत्तर हैं। सैकड़ों रिसर्च पेपर प्रकाशित हो चुके हैं, पचासों पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं,साथ में आयु और अनुभव के साथ एक चौथाई तनख्वाह भी नहीं मिल रही तथा सेवानिवृत्त होने पर भिखारी हो जाना पड़ेगा।इतने प्रैसर, अपमान, प्रताड़ना, भेदभाव और जातिवाद के बावजूद अपने शैक्षणिक कर्तव्य का नियमित निर्वहन कर रहे हैं।हम तो जीवित हैं,हम तो नहीं मरे, हमने तो आत्महत्या नहीं की।

 सरकार और सिस्टम द्वारा प्रचारित कर्त्तव्यपरायणता और सत्यनिष्ठा का हमारे लिये कोई पारिश्रमिक नहीं है।इस तरह की बातें सिर्फ कागजों तक सीमित हैं।जिसको भी मौका मिलता है,वह सारी मर्यादाओं को ताक पर रखकर जमकर धन दौलत को एकत्र कर रहा है।इसीलिये तो मैं बार बार कह रहा हूं कि थोडा बहुत आचार्य कौटिल्य को भी पढ लिया करो। अपनी संतान को आचार्य कौटिल्य से अवश्य अवगत करवाना तथा उनसे कहना कि भ्रष्ट राजनीतिक सिस्टम में कर्त्तव्यपरायणता, सत्यनिष्ठा, स्पष्टता, मेहनत और उचित पारिश्रमिक के लिये कोई स्थान नहीं है।आप,आपकी संतान और आपके निकट संबंधी तक भूखों मर जायेंगे। कोई भी पूछनेवाला नहीं होगा।यह दुनिया ऐसी ही है। यहां सभी उगते सूरज को सलाम करते हैं। मुसीबत पड़ने पर सबसे पहले वहीं मित्र साथ छोड़कर भागेंगे जिन्होंने हर हाल में साथ निभाने की कसमें खाईं थीं। यदि सिस्टम ठीक है तो आप भी ठीक रहना लेकिन यदि सिस्टम भ्रष्ट है तो फिर सिस्टम के साथ ही चलना बेहतर है।
यदि देह में कोई कमी आ जाये तो शुद्धि आदि करके उसको निरोग करना होता है,उस देह से अलग होकर उसको गालियां देना कोई समाधान नहीं है। और फिर यह ध्यान रहे कि महावीर, बौद्ध, चार्वाक आदि सभी सनातनी ही थे, उन्होंने किसी मजहब की स्थापना नहीं की थी। उनके देहावसान के पश्चात् यह दुकानदारी शुरू हुई थी।कुछ लोग अलग अलग नामों से यह दुकानदारी आज भी कर रहे हैं।एक ही पहलू से मत सोचो अपितु अन्य पहलुओं से भी सोचने का प्रयास करो। बाकी कुछ लोगों को गाली गलौज करने, कमियां निकालने और अपमान करने का संवैधानिक अधिकार मिला हुआ है।इस भेदभाव पर उनकी जबान पर ताले लग जाते हैं।आज जो लोग जातिवाद, सांप्रदायिकता, ऊंच-नीच और छुआछूत के नारे लगा रहे हैं,वो ही सबसे बडे जातिवादी, सांप्रदायिक, भेदभाव को प्रश्रय देने वाले और छुआछूत को बढ़ावा देने वाले हैं।

 कम या अधिक संख्या में स्वार्थी, निठल्ले और धूर्त लोग सदैव रहे हैं।आज भी हैं और आगे भी रहेंगे।एक बहुत बड़ा सवाल यह भी है कि जिनका अतीत में शोषण हुआ था,वो शोषण के विरोध में खड़े क्यों नहीं हुये? क्या इतने कमजोर थे कि आवाज भी न उठा पाये? ज्ञात इतिहास में विरोध का कोई उदाहरण उपलब्ध नहीं है। कहीं यह तो नहीं है कि कुछ लोगों को मुफ्त का खाने, पीने,रहने आदि की पहले से ही लत पडी हुई है। अपनी इस लत को स्वीकार न करके औरों पर दोषारोपण करके खुद को बचाकर निकल जाने का जुगाड करने के नये नये तरीके तलाश किये जा रहे हैं!
आज राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्य न्यायाधीश, हरियाणा के मुख्यमंत्री आदि सभी दबे कुचले वर्ग हैं लेकिन फिर भी गाली गलौज किया जा रहा है।अरे भाई और क्या चाहिए?अब तो शासन प्रशासन सब तुम्हारा है।अब भी भेदभाव, ऊंच-नीच और प्रताड़ना क्यों हैं?कभी अपने वर्ग के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और मुख्य न्यायाधीश के विरोध में धरना प्रदर्शन करो कि हमारे ऊपर अत्याचार क्यों हो रहे हैं? लेकिन नहीं करेंगे और अब भी गालियां देंगे ब्राह्मण, बनिया,जाट, राजपूत आदि को।

कमी कहीं और नहीं अपितु कमी खुद में है।वह तो स्वीकार हो नहीं रहा,बस दोषारोपण शुरू। और इसके लिये वर्ग विशेष को संवैधानिक अधिकार मिले हुये हैं।जो सनातन से बाहर गये थे, क्या उनमें कमी नहीं थी?उनको दूध के धूले क्यों मान रहे हो?सारे प्रश्न सनातनियों से ही क्यों?जो स्वार्थ में भागकर गये थे, उनसे भी तो पूछो।

 कमियां निकालकर गालियां देने का धंधा बन गया है।हर व्यवस्था में समय के साथ विकृतियां आना स्वाभाविक है लेकिन उनके सुधार और परिष्कार की जिम्मेदारी न उठाकर पूरी व्यवस्था को ही गालियां देना या गलत कहना ठीक नहीं है।और नयी व्यवस्थाएं जो बनी हैं, क्या उनमें कमियां नहीं हैं? फिर उनको भी छोड दो।

दलितों और पिछड़ों के साथ अन्याय की बातों को बढ़ा चढ़ाकर बताने के प्रयास अंग्रेजी काल की शुरुआत में हुये थे।दलित ही दलितों के विरोधी अधिक है।इस समय देख लो- राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और मुख्य न्यायाधीश दलित और पिछड़े वर्गों से हैं,इस समय पर दलित और पिछड़ों पर ज़ुल्म होने का कारण क्या दलित और पिछड़ों द्वारा शासित व्यवस्था नहीं है?लेकिन अब भी गालियां मनुस्मृति और ब्राह्मणों को दी जा रही हैं।मैं खुद पिछडे वर्ग से हूं। मुझे मेरे पिछड़े वर्ग वालों ने सदैव दबाकर रखने की कोशिश की है लेकिन मेरे ब्राह्मण,जाट आदि भाईयों ने मेरी सदैव मदद की है।हरियाणा में दलितों में भी दलित जातियों के दो दलित वर्ग बना दिए हैं। इसका विरोध सवर्ण नहीं अपितु खुद दलित ही कर रहे हैं तथा अपने ही अति दलित भाइयों को अधिकार नहीं देना चाहते।

जब खुद में कमी होती है तो दूसरे उसका फायदा उठाते हैं। दलितों में अपने खुद में भी कमियां रही हैं जिससे उन पर अत्याचार हुये तथा अब भी हो रहे हैं।पिछले 2500 वर्षों के कालखंड में अनेक दलित वर्ग के राजाओं ने राज किया है। दलित राजाओं के शासन में यदि दलितों पर अत्याचार होते रहे थे तो इसके लिए दलित ही जिम्मेदार अधिक हैं,सर्वण इतने जिम्मेदार नहीं थे। पिछले वर्षों के दौरान तथाकथित दलित वर्ग के लोग आये दिन सनातनी देवी देवताओं, मूल्यों, ग्रंथों, महापुरुषों को गालियां देकर अपमानित करते रहते हैं लेकिन इसके जुर्म के फलस्वरूप किसी पर भी प्राथमिकी दर्ज नहीं होती है। यदि कोई सवर्ण जातियों से संबंधित व्यक्ति दलितों के महापुरुषों, ग्रंथों या उनकी मान्यताओं पर जायज टिप्पणी भी कर देता है तो उस पर तुरंत एससी एसटी एक्ट के अंतर्गत प्राथमिकी दर्ज हो जाती है।यह भेदभाव क्या है? क्या समानता को मानने वाला संविधान इसकी इजाजत देता है? राजनीतिक दलों के नेता और दलित वर्गों के नेता अपनी राजनीति चमकाने के लिये भारत को जातीय संघर्ष की तरफ धकेल रहे हैं।यह किसी भी तरह से राष्ट्रहित में नहीं है। इससे न तो दलितों का हित हो रहा है तथा न ही सवर्ण कहे जाने वालों का।इस भेदभाव, ज़ुल्म और नये प्रकार के जातिवाद पर रोक कौन लगायेगा? मुद्दा तो अधिकांश में भ्रष्टाचार, बलात्कार, स्वार्थ और कुछ अन्य ही होता है लेकिन उसे तुरंत जातीय रुप देकर जनमानस को एक दूसरे के विरोध में खड़ा करके सामाजिक ढांचे को कमजोर किया जा रहा है। अंग्रेजों द्वारा प्रदत्त जातीय महामारी को आजादी के पश्चात् किसी भी राजनीतिक दल से समाप्त करने का प्रयास नहीं किया है। इस मामले जितनी दोषी भाजपा है उतनी ही दोषी कांग्रेस भी है। अपने राजनीतिक फायदे के लिये जहां भाजपा मनु और मनुस्मृति की आड़ लेकर सनातन धर्म और संस्कृति को कमजोर कर रही है वहीं पर कांग्रेस और उसके नेता राहुल गांधी मनु, मनुस्मृति और मनुवाद की आड़ लेकर सनातन धर्म और संस्कृति को गालियां दे रहे हैं। बाकी दल और नेता तो अपने फायदे के लिये पलटी मारकर कभी कांग्रेस में और कभी भाजपा के पाले में जाकर बैठ जाते हैं।इस राष्ट्रविरोधी घटिया खेल में ये और इनके साथी अमीर घराने तथा धर्माचार्य और सुधारक तो भरपूर अय्याशी कर रहे हैं लेकिन भारत, भारतीय और भारतीयता कमजोर होते जा रहे हैं।

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आचार्य शीलक राम 
दर्शनशास्त्र- विभाग 
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय 
कुरुक्षेत्र -136119

Friday, October 31, 2025

भारतीय ज्ञान परंपरा के परिप्रेक्ष्य म्हं 'दर्शनशास्त्र' की कहाणी


इस दुनिया म्हं पहला 'दर्शनशास्त्र' भारत नैं दिया था।जै किसै कै कोये शक संदेह हो तै ऋग्वेद का नासदीय सूक्त और  पुरुष सूक्त पढकै देख ल्यो।ज्यब या सृष्टि पैदा हुई, परमात्मा हैं हर तरहां का ज्ञान चार वेदां म्हं छंद रश्मियां के रूप म्हं दे दिया था।ब्यना ज्ञान के सृष्टि पैदा करण का कोये मतलब कोन्यां होत्ता।बस,इस्सै नैं ध्यान म्हं रखकै परमात्मा नैं सब तरहां का ज्ञान माणस सृष्टि बणाण के बख्त दे दिया था।वेद आज के कोन्यां।आज तैं एक अरब छाणवैं करोड़ आठ लाख तरेपन हजार एक सौ पच्चीस साल पहल्यां वेद दिये गये थे।सोच्चण,समझण अर किस्सै निर्णय पै पहोंचण खात्यर दर्शनशास्त्र का ज्ञान सबतैं जरूरी सै। परमपिता नैं जो वेद दिये थे,वै सबतैं पहल्यां चार ऋषि अग्नि, वायु,आदित्य अर अंगिका नैं साक्षात् करकै कट्ठे करकै एक जगहां पै बांधण का काम करया था।वै चारुं ऋषि दुनिया के सबतै पहले दार्शनिक थे।उन ऋषियां नैं अर उनके पाच्छै आज ताईं ब्रह्मा आदि हजारां ऋषियां नैं वेदां का प्रचार -प्रसार करकै सारी सृष्टि म्हं ज्ञान देवण का काम करया सै। तर्क करण, विचार करण, प्रमाण गैल्यां बात कहण, प्रश्न ठावण, बुद्धि तैं सोचकै निर्णय लेवण, समस्या की तह म्हं जाकै कारण नै टोहवण की परंपरा सारी दुनिया म्हं भारत के ऋषियां नैं फैलाई सै।आज अंग्रेजी शिक्षा कै प्रभाव म्हं कोये कुछ बी कहता रहवै,पर साच्ची बात याहे सै जो मनैं ऊप्पर बताई सै।
युनानी,रोमन,मिश्री,अरबी,चीनी, जापानी,अफ्रीकन जिसे सारे दर्शनां के मां,बाब्बू अर गुरु सब कुछ भारतीय दर्शनशास्त्र सै। युनानी थैलीज तैं लेकै सोफिस्ट,सुकरात, प्लेटो,अरस्तू ताईं, युनानी विचारकां के नक्शे-कदम पै चाल्लण आले अरबी विचारक, इस्लामी विचारक, यहुदी विचारक, ईरानी विचारक, ईसाई विचारक अंसेलम, बुद्धिवादी और अनुभववादी विचारक, युरोपीयन विचारक,अमेरिकी विचारक, आलोचनात्मक विचारक, अस्तित्ववादी विचारक, नारीवादी विचारक, समकालीन उच्छृंखल विचारक आदि सारे के सारे भारतीय दर्शनशास्त्र के ऋणी सैं। भारतीय दर्शनशास्त्र की किस्सै एक बात नैं पकडकै हनुमान की पूंछ की तरियां बढाकै दुनिया कै आग्गै धर देसैं।धन, दौलत अर प्रचार का जुगाड इन धोरै सैए। इसके हांगे तैं ये कुछ बी मनमाना करते आरे सैं अर इब बी करण लागरे सैं। 
 आज तैं 5000-6000 साल पहल्यां सृष्टि के मूल म्हं काम करण आले वेद सिद्धांत बतावण खात्यर छह दर्शनां का निर्माण करया गया था। मीमांसा दर्शनशास्त्र जैमिनी नैं,वैशेषिक दर्शनशास्त्र कणाद नैं, न्याय दर्शनशास्त्र गौतम नैं, सांख्य दर्शनशास्त्र कपिल नैं,योग दर्शनशास्त्र पतंजलि नैं अर वेदांत दर्शनशास्त्र बादरायण व्यास नैं ल्यक्खे थे।ये छहों दर्शनशास्त्र सूत्ररुप म्हं सैं।पाच्छै इनपै हजारां की संख्या म्हं भाष्य,टीका, व्याख्या आदि करे गये। भारतीय दर्शनशास्त्र के ये सारे ग्रंथ दुनिया के दर्शनशास्त्र के प्रेरणास्रोत रहे सैं।बस जरूरत सै इननैं पड्ढण,ल्यक्खण अर हर रोज के चालचलण म्हं उतारण की।ऊप्पर जिन छह दर्शनां का ज्यक्रा करया गया सै,उनम्हं कर्म कारण, उपादान कारण,प्रमाण कारण, सृष्टि बणावण की विधि अर प्रकृति पुरुष विवेक, योग-साधना कारण अर मूलनिमित्त कारण का भेद खोल्या गया सै। दुनिया के सारे दर्शनशास्त्र पाछले हजारां सालां तैं योए काम करण लागरे सैं।
अब्राहमिक संस्कृति क्योंके एकतरफा भोगवादी भौतिकवादी सै, इसलिये इसके दर्शनशास्त्र नैं फिलासफी कहवैं सैं।इस म्हं कोरे विचारां की कबड्डी घणी हो सै अर जीवन म्हं उतारकै उसै अनुसार जीवन जीण की कोये बी जरूरत ना समझी जाती।इसनैं इस्सै खात्यर भौतिकवादी फिलासफी बी कहवैं सैं।इननैं बाहरी संसार की सुख सुविधा तैं वास्ता खणा हो सै अर चेतना आदि लेणा देणा बहोत कम हो सै।अपणे स्वार्थ नैं पूरा करण खात्यर ये लोग किस्सै गैल्यां कुछ बी धोखाधड़ी अर विश्वासघात कर सकैं सैं।इस्सै उपयोगितावादी अर धोखाधड़ी की फिलासफी तैं प्रभावित होकै यवनां,अंग्रेजां,पुर्तगालियां,डच्चां,
डैनिसां,मंगोलां,मुगलां,अरबियां नैं दूसरे देशां म्हं जाकै खूब हमले करकै उन पै कब्जा करकै तानाशाही तैं हजारां सालां तै राज करया सै। दुनिया के इतिहास नैं पढकै कोये बी इस सच्चाई नैं जाण सकै सै। भारतीय दर्शनशास्त्र नैं कदे बी इसी घटिया, मारकाट मचाववण की, नरसंहार करण की ,बहन बेटियां की इज्जत आबरो नैं लूट्टण की,पूजा स्थलां नैं बर्बाद करण की अर ज्ञान के केंद्रा नैं जलावण की सीख कोन्यां दी सै। भारतीय दर्शनशास्त्र अर युनानी फिलासफी का यो भेद बहोत बड्डा सै।यो आज बी चालरया सै।
सही बात तैं या सै अक भारतीय दर्शनशास्त्र सदा तैं जीवण दर्शनशास्त्र रहया सै अर युनानी फिलासफी सदा तैं कोरे विचारां की कबड्डी रही सै। भारत म्हं दर्शनशास्त्र की जितणी बी शाखा प्रशाखा सैं,सारियां के मान्नण आले अनुयायियां की करोडां म्हं संख्या रही सै। युनानी अर युनानी फिलासफी तैं जन्मी पाश्चात्य फिलासफी म्हं या बात देक्खण नैं कोन्यां म्यलती। इस्सै खात्यर हजारां लाक्खां साल पुराणा भारतीय दर्शनशास्त्र आज बी दुनिया का सबतैं बढ़िया, सृजनात्मक, रचनात्मक,कृण्वंतो विश्वमार्यम् ,वसुधैव कुटुंबकम् नैं मान्नण जाणन आला दर्शनशास्त्र सै। दुनिया म्हं शांति,सद्भाव,भाईचारे, समन्वय,प्रेम, करुणा नैं फलावण खात्यर केवलमात्र भारतीय दर्शनशास्त्र तैं आशा बचरी सै।यो काम जितणे तकाजे तैं होज्या उतणाए बढ़िया सै।
युनानी,मिश्री, रोमन,अरबी,चीनी फिलासफी का प्रेरणास्रोत तै भारतीय दर्शनशास्त्र रहा ए सै, इसके साथ म्हं खुद भारत म्हं बी भारतीय दर्शनशास्त्र तैं प्रेरणा लेकै घणेए दर्शनशास्त्र पैदा होये। उनम्हं बृहस्पति,चार्वाक,मक्खली गौशाला,संजय वेलट्टिपुत्त,प्रकुध कात्यायन,निर्ग्रंथ नाथपुत्त,सिद्धार्थ बुद्ध,गौतम बुद्ध,तंत्र की विभिन्न शाखाएं,भागवत्,त्रैतवाद,द्वैतवाद, अद्वैतवाद,विशिष्टाद्वैतवाद,
शुद्धाद्वैतवाद,द्वैताद्वैतवाद,
शब्दाद्वैतवाद,शक्त्याद्वैतवाद,अचि़त्यभेदाभेदवाद आदि दर्शनशास्त्र दुनिया म्हं प्रसिद्ध सैं। वर्तमान काल म्हं बी भारतीय दर्शनशास्त्र म्हं महर्षि दयानंद , विवेकानंद,अरविन्द,रमण महर्षि, रविन्द्र नाथ , गांधी, जिद्दू कृष्णमूर्ति, ओशो रजनीश,श्रीराम शर्मा आचार्य, राजीव भाई दीक्षित,आचार्य बैद्यनाथ शास्त्री, राधाकृष्णन, कृष्णचंद्र भट्टाचार्य ,सावरकर, अंबेडकर,आचार्य अग्निव्रत आदि सैकड़ों विचारकां अर दार्शनिकां नैं महत्वपूर्ण योगदान दिया सै।
 पहल्यां के समय पै सरकारी व्यवस्था धर्म, संस्कृति,योग, अध्यात्म, दर्शनशास्त्र,नैतिकता, तर्कशास्त्र,आयुर्वेद नैं घणाए महत्व दिया करती।पर इस समय भारत म्हं इनकी हालत बहोत खराब होरी सै।
महाभारत तैं पहल्यां के दार्शनिकां नैन जै छोड बी द्यां तै अर पाछले पांच छह हजार साल की बात करां तै भारतभूमि नैं हजारां प्रामाणिक दार्शनिक दिये सैं।उन म्हं जैमिनी, कणाद,गौतम,कपिल पतंजलि ,बादरायण व्यास, महर्षि वेदव्यास, गौड़पाद, गोविंदपाद,कुमारिल भट्ट, मंडन मिश्र, गौड़पादाचार्य, शंकराचार्य, प्रभाकर,नागार्जुन,धर्मकीर्ति, अश्वघोष,चंद्र कीर्ति,असंग,वसुबंधु, शान्तरक्षित, आर्यदेव, दिग्नाग,कुंदकुंदाचार्य, उमास्वाति, अकलंक,सिद्धसेन दिवाकर, हरिभद्र ,ईश्वर कृष्ण, विज्ञानभिक्षु, वाचस्पति मिश्र, वात्स्यायन,उद्योतकर,उदयन, जयंत भट्ट,गंगेश उपाध्याय,श्रीधर,,श्री हर्ष,प्रकाशानंद, रामानुजाचार्य,वेंकटनाथ, माध्वाचार्य, जयतीर्थ,व्यास देव, निंबार्क आचार्य, वल्लभाचार्य, वसुगुप्त, अभिनव गुप्त, भास्कराचार्य जिसे हजारां दार्शनिक होये सैं।इननैं संसार अर संसार तैं पार के विषयां पै उट्ठण आली सारी समस्यां पै गंभीरता तैं मात्थापच्ची करकै नये नये विचार ,सिद्धांत अर निष्कर्ष दुनिया के आग्गै रक्खे सैं।
भारतीय दर्शनशास्त्र म्हं एक दौर वो बी आया ज्यब चार्वाक अर तंत्र की आड़ लेकै घणेए इसे दर्शनशास्त्री पैदा होगे,जिननैं सनातन धर्म,संस्कृति अर दर्शनशास्त्र पै ए हमले शुरू कर दिये थे।इन सबनैं शास्त्रार्थ म्हं पराजित करकै दोबारा तैं सनातन धर्म,संस्कृति अर दर्शनशास्त्र नैं स्थापित करण का काम कुमारिल, मंडन मिश्र अर शंकराचार्य नै करया था।
भारतीय दर्शनशास्त्र दुनिया का एकमात्र इसा दर्शनशास्त्र सै,जिसम्हं वैचारिक आजादी मौजूद सै। बाकी के किसै बी दर्शनशास्त्र म्हं थोड़ी बहोत आजादी तै म्यलज्यागी,पर भारतीय दर्शनशास्त्र जितणी आजादी कितै बी कोन्यां म्यलती। युनानी फिलासफी म्हं बी आजादी कोन्यां दिखती।जै उडै वैचारिक आजादी होती तै सुकरात जहर देकै ना मारा जाता। भारत म्हं तै वैचारिक आजादी इतणी सै अक परमात्मा नैं नकारण आले बृहस्पति को गुरुआं का गुरु अर महर्षि कहया गया सै।खुद शंकराचार्य नैं साठ से अधिक संप्रदायां गैल्यां शास्त्रार्थ करया था। सिद्धार्थ बुद्ध के समय पै बी सैकडां मत अर संप्रदाय मौजूद थे।इस तरहां का यो विचारां,मतां अर संप्रदायां की स्थापना करकै फलण फूलण की आजादी भारत में पहल्यां बी थी,आज भी सै अर आग्गे बी रहण की आशा सै।पर वैचारिक आजादी का ज्यब ज्यब भारत की एकता अर अखंडता खात्यर दुरुपयोग होया तै उननैं उस समय के दार्शनिकां अर शासकां नैं दंड भी दिया था। अब्राहमिक मजहबां म्हं या आजादी आज बी कोन्यां म्यलरी सै।इस वैचारिक आजादी नैं कायम राखण खात्यर अधिकार अर कर्त्तव्यां म्हं संतुलन बहोत जरुरी सै।
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आचार्य शीलक राम 
दर्शनशास्त्र- विभाग 
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय 
कुरुक्षेत्र -136119
मोबाइल -9813013065

Tuesday, October 21, 2025

दिवाली के शुभ अवसर पर तृतीय दौड़ प्रतियोगिता का आयोजन (Third race competition organized on the auspicious occasion of Diwali)

 

धर्म, दर्शन, साहित्य, राष्ट्रवाद, हिन्दी भाषा के प्रचार-प्रसार को समर्पित, शोध के क्षेत्र में कार्य करने वाली तथा आचार्य शीलक राम जी द्वारा संचालित आचार्य अकादमी चुलियाणा (पंजी.) द्वारा होली के शुभ अवसर पर तृतीय दौड़ प्रतियोगिता का सफल आयोजन रवि भारद्वाज द्वारा संचालित मास्टर धर्मपाल क्रिकेट अकादमी दिमाना में किया गया। इस प्रतियोगिता में चुलियाणा व दिमाना  के गावों के 150 से ज्यादा लडके व लडकियों ने पांच अलग-अलग आयु वर्ग में भाग लिया। सभी प्रतिभागियों को आचार्य अकादमी की तरफ से रिफरैसमेंट व सभी विजेताओं को स्मृति चिन्ह तथा नकद ईनाम राशि भी प्रदान की गई। इस अवसर पर मुख्य अतिथि डॉ देवेंद्र हुड्डा जी पूर्व प्राचार्य राजकीय महाविद्यालय सांपला रहे। उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि ग्रामीण क्षेत्र में आचार्य शीलक राम व आचार्य आकादमी चुलियाणा द्वारा इस प्रकार के आयोजन करना बहुत ही गर्व की बात है। आज जबकि नवयुवक नशे जैसी बुराईयों की ओर जा रहे हैं तो उनका मुकाबला करने के लिए इस प्रकार के आयोजन होते रहने चाहिए। प्रोफेसर रोशन लाल रोहिल्ला ने अपने संबोधन में कहा कि आचार्य शीलक राम व आचार्य अकादमी चुलियाणा द्वारा यह एक बहुत ही अच्छी पहल है तथा आगे भी इस प्रकार के सफल आयोजन करने के लिए बधाई दी। प्रोफेसर पवन कुमार व सुश्री श्रुति डबास ने भी सभी प्रतिभागियों को आशीर्वाद दिया। डॉ. सुरेश जांगडा ने बताया कि आचार्य अकादमी द्वारा यह तृतीय दौड़ प्रतियोगिता है तथा भविष्य में भी प्रतिवर्ष होली व दिवाली के अवसर पर इस प्रकार की खेल प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाता रहेगा। इसके अलावा आचार्य अकादमी चुलियाणा कई बार क्रिकेट प्रतियोगिता का भी सफल आयोजन करवा चुकी है। उन्होंने यह भी बताया कि उपरोक्त प्रतियोगिता बिल्कुल निशूल्क करवाई गई है तथा आचार्य अकादमी चुलियाणा अपने चौदह साल के दौरान दो हजार से ज्यादा देश विदेश के कवियों, लेखकों, साहित्याकारों को सम्मानित भी कर चुकी है। उन्होंने यह भी बताया कि आचार्य अकादमी हर साल श्रीमती हेमलता हिन्दी साहित्य (गद्य, पद्यादि) पुरस्कार, राजीव भाई दीक्षित भारतीय इतिहास, आयुर्वेद, स्वदेशी व राष्ट्रभक्ति पुरस्कार, स्वामी दयानन्द सरस्वती दर्शनशास्त्र पुरस्कार, स्वदेशी, राष्ट्रवाद, सनातन वैदिक धर्म व संस्कृति पुरस्कार, चौधरी छोटूराम किसान, मजदूरी और शिक्षा पुरस्कार व बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर समानता व समता पुरस्कार हर साल प्रदान करती है। आचार्य अकादमी लगातार ग्यारह शोध अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं  का प्रकाशन भी कर रही है। जिनमे प्रमाण अंतरराष्ट्रीय मुल्यांकित त्रैमासिक शोध पत्रिका  (आईएसएसएन : 2249-2976), चिन्तन अंतरराष्ट्रीय मुल्यांकित त्रैमासिक शोध पत्रिका (आईएसएसएन :2229-7227), हिन्दू अंतरराष्ट्रीय मुल्यांकित त्रैमासिक शोध पत्रिका (आईएसएसएन:2348-0114), आर्य अंतरराष्ट्रीय मुल्यांकित त्रैमासिक शोध पत्रिका (आईएसएसएन: 2348876X) व द्रष्टा अंतरराष्ट्रीय मुल्यांकित त्रैमासिक शोध पत्रिका (आईएसएसएन: 2277-2480) प्रमुख है।