दुनिया का सबसे पुरातन विषय 'दर्शनशास्त्र' कहा जाता है। दर्शनशास्त्र सवाल करना सिखाता है।दर्शनशास्त्र तर्क करना सिखाता है। दर्शनशास्त्र प्रमाण की मांग करना सिखाता है। दर्शनशास्त्र कारणकार्य से आगे बढ़ने की सीख देता है। दर्शनशास्त्र हरेक विषय, समस्या, विश्वास, आस्था और कर्म के संबंध में तार्किक चिंतन करके स्वीकार या अस्वीकार करने की योग्यता पर बल देता है।आज से 2500 वर्ष पहले शंकराचार्य ने जैन, बौद्ध, चार्वाक आदि से सवाल ही तो किये थे। लेकिन उनके सवालों का जवाब सही तरह से कोई नहीं दे पाया। काफी लोगों ने सनातन धर्म में वापसी कर ली ।जो अपनी पराजय को पचा नहीं पाये या फिर जो अंधभक्त थे, उन्होंने भारत से बाहर जाकर विदेशों में अपना प्रचार किया। महर्षि दयानंद सरस्वती ने उन्नीसवीं सदी में जैन,बौद्ध, चार्वाक, ईसाई, इस्लाम तथा हिंदुओं के विभिन्न मतों से सवाल ही तो किये थे।इसके फलस्वरूप काफी लोग सनातन धर्म में वापस आये तथा काफी लोगों को सनातन धर्म के सत्य स्वरूप का ज्ञान हुआ। बीसवीं सदी में आचार्य रजनीश ने स्थापित राजनीतिक, दार्शनिक, धार्मिक, आध्यात्मिक, सामाजिक, नैतिक व्यवस्था पर अनेक सवाल खड़े किये थे।इसके साथ- साथ उन्होंने हजारों सवालों का तार्किक समाधान भी जनमानस के सम्मुख प्रस्तुत किया।इक्कीसवीं सदी में राजीव भाई दीक्षित ने सनातन धर्म और संस्कृति के संबंध में पूर्वाग्रह से पैदा की गई टिप्पणियों के सटीक उत्तर दिये तथा सवाल उठाने वालों से अनेक सवाल भी किये। हालांकि सवाल उठाने वालों के साथ स्थापित सिस्टम ने कभी भी अच्छा व्यवहार नहीं किया। शंकराचार्य, महर्षि दयानंद सरस्वती, आचार्य रजनीश,राजीव भाई दीक्षित की असमय की गई हत्याएं इसका प्रमाण हैं।लेकिन ध्यान रहे कि जिस राष्ट्र की जनता सिस्टम से सवाल करना छोड देती है,वह अपने अधिकारों से भी हाथ धो बैठती है। और सिस्टम से सवाल नहीं पूछने का एकमात्र कारण सिस्टम के प्रति अंधभक्ति होती है। इसके दुष्परिणाम भी शीघ्र ही मिलने शुरू हो जाते हैं। किसी भी सिस्टम में यह देखा जा सकता है।बस देखने,जानने और समझने के लिये निष्पक्षता आवश्यक है। अंधभक्त के पास इन तीनों का अभाव होता है।
विज्ञान, धर्म, अध्यात्म,योग, राजनीति, व्यापार, शिक्षा,शोध आदि किसी भी क्षेत्र में यदि पाखंड, ढोंग और शोषण से बचना है तो तार्किक चिंतन करना,सवाल -जवाब करना, प्रमाण की तलाश करना और कारणकार्य में संबंध स्थापित करना बेहद आवश्यक है। उपरोक्त सभी क्षेत्रों में जो भी सवाल उठाने या तार्किक चिंतन से दूर भागता है,सोच लो कि वह आपका शोषण करने की तैयारी में है।वह उस- उस क्षेत्र में फिसड्डी है।वह अपने कर्तव्यों का भलि तरह से निर्वहन नहीं कर रहा है। ऐसे व्यक्तियों में यदि थोड़ी भी राष्ट्रभक्ति,धर्मभक्ति और मूल्यभक्ति बची है,तो उन्हें तुरंत उस क्षेत्र से हट जाना चाहिये।
आजादी के पश्चात् भारत की इस विषय में स्थिति सोचनीय हो गई है। हमारे धर्मगुरु, योगाचार्य,नेता, सुधारक और यहां तक कि वैज्ञानिक भी सवाल- जवाब से दूर भाग रहे हैं।
हमारी ही नहीं अपितु समस्त संसार की शिक्षा -व्यवस्था विज्ञान और तकनीक की ओर जाने पर जोर जबरदस्ती कर रही है।इस जोर जबरदस्ती का परिणाम समस्त संसार में आतंकवाद, उग्रवाद, भ्रष्टाचार, अव्यवस्था, अनैतिकता, लूटपाट, बलात्कार, शोषण और युद्ध का बोलबाला है। शांति,संतोष,संतुलन, समन्वय, सह-अस्तित्व तो कुछ समय के लिये ही दिखाई देते हैं।यह कुछ समय भी शायद शांति आदि के लिये न होकर अशांति, अव्यवस्था, आतंकवाद और युद्धों की तैयारी का काल जान पड़ता है। भौतिक विकास गलत नहीं है लेकिन एकतरफा भौतिक विकास ने संसार को अव्यवस्था,विनाश और युद्धों की भूमि बनाकर रख छोड़ा है। प्राथमिक से लेकर विश्वविद्यालयीन कक्षाओं तक का मुख्य उद्देश्य विज्ञान और तकनीक आधारित हो गया है। इससे भौतिक विकास तो बहुत अधिक हो रहा है लेकिन जीवनमूल्यों का प्रतिवर्ष ह्रास होता जा रहा है।इस भौतिक विकास का लाभ भी संसार के कुछ प्रतिशत लोगों तक ही पहुंच रहा है।कुल मिलाकर इसे विकास कहें या विनाश कहें -इसे कोई कम समझ वाला व्यक्ति भी बतला सकता है। लेकिन क्योंकि वर्तमान विकास की शैली का निर्धारण भी विज्ञान और तकनीक के हाथों में न होकर उद्योगपतियों, पूंजीपतियों और कोरपोरेट घरानों के हाथों में है।
इसके साथ में एक और भी दुर्घटना घटित हो रही है और वह है धर्म के क्षेत्र में नेताओं का प्रवेश तथा राजनीति के क्षेत्र में धर्मगुरुओं की घुसपैठ। दोनों एक दूसरे के क्षेत्रों में जगह बनाने की भरपूर कोशिशें कर रहे हैं। वास्तविकता यह है कि कोई नेता जब राजनीति में असफल और अपरिपक्व सिद्ध होता है,तो वह धर्म का सहारा लेता है। और जब किसी धर्मगुरु को धर्म में संतुष्टि नहीं मिलती है, तो वह राजनीति की तरफ भागता है। उपरोक्त दोनों ही लोग अपने अपने क्षेत्रों में फिसड्डी सिद्ध होकर दूसरे के क्षेत्र में सेंधमारी करते हैं।इस सेंधमारी में राष्ट्र की युवाशक्ति और जनसाधारण मेहनतकश नागरिक बर्बाद हो रहे हैं। लेकिन नेता और धर्मगुरु अपनी -अपनी राजनीतिक और धार्मिक महत्वाकांक्षा में अंधे और बहरे होकर न तो किसी के दुख, पीड़ा, गरीबी, बेरोजगारी आदि को समझते हैं तथा न ही कोई विकास का काम करते हैं। कहते हैं कि गीदड़ की मौत आने पर वह आबादी की तरफ भागता है लेकिन जब किसी नेता की राजनीति और धर्मगुरु का चमत्कार नहीं चल पाते हैं,तो दोनों एक दूसरे के क्षेत्रों की तरफ भागते हैं। बेचारे गीदड़ को तो मौत मिलती है लेकिन नेता और धर्मगुरु को पद, प्रतिष्ठा,धन, दौलत, जमीन, जायदाद, वैभव,विलास, गाड़ी,बंगले, विदेशी सैर-सपाटे आदि सब कुछ मिल जाते हैं।
आधुनिक मानव को भीड़ में सत्य के दर्शन करने की ज़िद्द क्यों है? आधुनिक मानव घर पर बैठे बिठाये ही सब कुछ क्यों प्राप्त कर लेना चाहता है? बिना त्याग, तपस्या, एकाग्रता और स्वाध्याय के उसे सारी सुविधाएं और उपलब्धियां चाहियें। हल्दी लगे न फिटकरी और रंग भी चोखा होय - यह नहीं हो सकता है। भौतिक जगत् में शायद तिकड़मबाजी, चापलूसी और भ्रष्टाचार से बहुत कुछ हासिल हो सकता होगा, लेकिन भीतरी जगत् में नहीं। और भौतिक जगत् में भी तिकड़मबाजी आदि करने के लिये भी तो हाथ पैर मारने पडते हैं। आंतरिक जगत् में यह भी नहीं चल पायेगा। वहां तो पवित्रता, शुचिता, स्पष्टता और निरहंकारिता काम आयेंगे।
जिनको कुछ भी नहीं करना होता है,वो विज्ञान और तकनीक पर भी संदेह करते हैं तथा धर्म और अध्यात्म पर भी संदेह करते हैं।बस,हर कहीं कमियां निकालते रहकर स्वयं कुछ भी नहीं करने के बहाने तलाश करना ही ऐसे लोगों का काम है। जहां पर कमी हो, उसे बतलाया जाना चाहिये तथा जहां पर अच्छाई लगे, वहां प्रशंसा करने की हिम्मत भी दिखलाना चाहिये। सकारात्मकता लोगों का हरेक प्रयास सृजनशीलता के लिये होता है, केवल विध्वंस के लिये नहीं। जहां भी कुछ कमी लगे या बुराई लगे, वहां पर प्रहार करना भी आवश्यक है। बिना सोचे-समझे केवल हां- हां करते जाना भी गुलामी है तथा नही- नहीं करते जाना भी गुलामी है। दोनों ही गुलामियां हैं।अंधे होकर किसी धारणा या विश्वास के समर्थन में नारेबाजी मत करो। कमियां बतलाने और प्रशंसा करने - दोनों में सृजनात्मक होना आवश्यक है।
जब कोई किसी व्यक्ति के चारित्रिक गुणों सत्यनिष्ठा, स्पष्टता, बुद्धिमत्ता, निरहंकारिता और सफलता का सामना नहीं कर पाता है तो वह कुछ भी करके उसका चरित्रहनन करने पर उतर आता है। वास्तव में ही यदि उसमें कोई योग्यता होती तो वह उस योग्यता से ही सामना करने की हिम्मत करता है। चारों तरफ ऐसे लोगों की भरमार है।न चाहते हुये भी ऐसे लोग आये दिन सामने से मुकाबला नहीं करके पीछे से पीठ पर प्रहार करते हैं। लगातार किसी बात के दोहराव से प्रभावित होकर जनसाधारण उस झूठी बात को ही सही मानने पर विवश हो जाता है, इसलिये बुरे कहे जाने वाले लोग अक्सर किसी भी अच्छे और भले व्यक्ति को बदनाम करने में शीघ्र सफल हो जाते हैं। इससे वास्तव में अच्छा व्यक्ति अकेला पड़ जाता है तथा बुरा व्यक्ति अपना संगठन बनाने में सफल हो पाता है।सत्य की विजय और असत्य के पराजित होने की विभिन्न संप्रदायों की सीख अक्सर गलत सिद्ध होकर रह जाती है। झूठे लोगों के बहुमत में अकेला अच्छा व्यक्ति सदैव पराजित होता है। लोकतंत्र में सत्य की नहीं अपितु भीड़ की विजय होती है। और अच्छे लोगों के पास कभी भीड़ नहीं होती है, जबकि बुरे लोग झूठ,कपट,छल,धन- दौलत आदि के सहारे जनमानस का बहुमत अपने पक्ष में कर लेते हैं। संसार में जिसके पास बहुमत है, जिसके पास लोगों की भीड़ है तथा जिसके पास जनमानस को बरगलाने का हूनर है, वही सफल कहा जाता है। और ऐसा समस्त धरा पर दिखाई भी दे रहा है।
होना तो यह चाहिये कि धर्म को राजनीति की अपेक्षा योगाभ्यास के क्षेत्र में जाना चाहिये तथा राजनीति को नैतिकता के क्षेत्र में जाना चाहिये।यानी धर्मगुरुओं को राजनीति करने के बजाय योगाभ्यास करना चाहिये तथा नेताओं को नैतिक होने की आवश्यकता है।भारत, भारतीय और भारतीयता तभी सुरक्षित रह पायेंगे। धर्मगुरु यदि योग साधना करके अपने चाल,चरित्र और चेहरे को एक समान बनाकर जनमानस को सनातन जीवन- मूल्यों की शिक्षा देंगे,तो उस शिक्षा को जनमानस अवश्य मानेगा। चरित्रहीन, भ्रष्ट और व्यापारी धर्मगुरु यदि जनमानस को आचरण शुद्धि के उपदेश देंगे,तो उनको कोई भी नहीं मानेगा। पिछले कयी दशक से भारत में यही हो रहा है।इसी तरह से नेता लोगों को जनमानस की मूलभूत सुविधाओं को समय पर उपलब्ध करवाने के लिये विधायक, सांसद और मंत्री बनाया जाता है। लेकिन नेता लोग पूंजीपतियों और धर्मगुरुओं की शरण में जाकर जनता -जनार्दन की सेवा करने के बजाय उसको नकली मुद्दों में उलझाये रखते हैं।इस कार्य में नेताओं की मदद धर्मगुरु, पूंजीपति और मीडिया मिलकर करते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि नेताओं की राजनीति का धंधा, धर्मगुरुओं का शोषण का धंधा तथा पूंजीपतियों का लूट-पाट व्यापार का धंधा खूब तरक्की करता जाता है। परिणामस्वरूप भारत के कुछ प्रतिशत धनी मानी लोगों को छोड़कर हर वर्ग गरीबी, बदहाली, बिमारी, अशिक्षा, कुशिक्षा और भूखमरी से त्रस्त होता जा रहा है।
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डॉ. शीलक राम आचार्य
दर्शनशास्त्र -विभाग
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय
कुरुक्षेत्र -136119
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