'वैलेंटाइन डे' की आड़ में उच्छृंखल अनैतिक धींगामस्ती ठीक नहीं है
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रोम के राजा क्लोडिअस ने युवाओं को विवाह करने से इसलिये वंचित कर दिया था ,क्योंकि विवाहित युवा अच्छे सैनिक बनने में असमर्थ रहते थे! वैलेंटाइन नामक व्यक्ति ने इसका पुरजोर विरोध करके युवाओं के सामुहिक विवाह करवाने का प्रयास किया! इसके फलस्वरूप राजा ने क्रोधित होकर वैलेंटाइन को मौत की सजा दे दी थी! कहते हैं कि उसी की याद में वैलेंटाइन दिवस मनाया जाना शुरू हुआ!आज वैलेंटाइन दिवस का जो भी प्रारुप प्रचलित है ,उसका
कई सदियों पूर्व के विवाह समारोह से कोई भी संबंध जुडता हुआ नहीं लगता है! आजकल नये युवाओं और युवतियों के जोडे यहाँ -वहाँ पर अर्धनग्न होकर उच्छृंखल यौन -क्रियाओं को करते हुये सरेआम विचरण करते पाये जाते हैं!इस तरह से उन्मुक्त और अर्धनग्न युवक युवतियों का आवारा होकर घूमने का वैलेंटाइन से क्या संबंध है? इनको विवाह करने से किसने रोका है? पहले वह योग्यता अर्जित करो, जिसके सहारे भविष्य के जीवन की मूलभूत जरूरतें पूरी हो सकें! फिर अपनी मर्जी से या घरवालों की सहमति से विवाह कर लेना! ऐसा करने से हमारे युवकों और युवतियों को कोई नहीं रोक रहा है! लेकिन वास्तविकता तो यह है कि अधिकांश ऐसे युवाओं और युवतियों को भविष्य के गृहस्थ जीवन की कोई आर्थिक,सामाजिक, नैतिक, शैक्षणिक जिम्मेदारी लेना ही नहीं है!कोई जिम्मेदारी लिये बगैर ही इनको अपनी कामुकता को शांत करना है!इसके फलस्वरूप युवकों और युवतियों के सामने जो समस्याएं उत्पन्न होती हैं, उनका इनके पास क्या समाधान है?
माता -पिता, बड़े -बुजुर्ग,समाज और धर्म को युवकों और युवतियों द्वारा अपनी कामुकता की पूर्ति किये जाने में कोई आपत्ति नहीं है! आपत्ति यदि है तो कामुक संबंध बनाने के फलस्वरूप पैदा होने वाली वर्तमान और भविष्य की जिम्मेदारियों से पलायन करने के संबंध में है!सनातन धर्म और संस्कृति में इसी समस्या के समाधान हेतु चार आश्रमों ब्रह्मचर्य , गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास आश्रम की व्यवस्था की गई थी!यदि आपको काम का सुख चाहिये तो उसके फलस्वरूप उठने वाली समस्याओं की जिम्मेदारियों को भी अपने ऊपर लीजिये!सुख चाहते हो तो जिम्मेदारी भी तो स्वीकार करो।कर्म करो और उसका फल नहीं मिले,यह कैसे हो सकता है?सुख का भोग कर लिया लेकिन समस्या आते ही भाग खड़े हुये।इस प्रकार से संसार नहीं चलता है। यदि सभी इस प्रकार का व्यवहार करने लगे तो पूरा संसार बर्बाद हो जायेगा। और फिर किसी काम के भावी फल पर विचार करके ही तो उस काम को किया जाता है। मनुष्य मननशील प्राणी है।उसे ऐसा ही करना चाहिये। लेकिन कामुक और प्रेम संबंधों के बारे में ऐसा नहीं हो रहा है।न लड़की जिम्मेदारी लेने को तैयार है तथा न ही लडका।कुछ समय साथ रहे,मन भर गया और एक दूसरे के विरोध में न्यायालय में खड़े हो गये।यह किस प्रकार का प्यार है? यदि वास्तव में ही हुआ है तो उसे निभाकर दिखलाओ। धन दौलत में अमीर युरोपीयन और अमेरिकन अब्राहमिक कल्चर में यह सब चल जाता होगा लेकिन भारत में यह बर्बादी का कारण बनेगा। भारत जैसे बदहाल और गरीब राष्ट्र में आखिर प्रेम संबंध टूटने के पश्चात् उत्पन्न संतानों का भरण -पोषण कौन करेगा?भारत में भारतीय जीवन मूल्यों के पालन से ही काम चलेगा। युरोपीयन और अमेरिकन उच्छृंखलता भारत में काम नहीं आयेगी। यहां तो यह पूरे सामाजिक ढांचे को तहश नहश कर डालेगी।लिव इन रिलेशनशिप, समलिंगी विवाह, समान गोत्र विवाह कानूनसम्मत तो बना दिये गये हैं लेकिन भारत जैसे गरीब, बेरोजगार और बदहाल राष्ट्र में यह कैसे हो पायेगा? इसके लिये कोई भी प्रबंध नहीं किया गया है।
ऐसा नहीं हो सकता कि अधिकार तो ले लिये जायें लेकिन कर्तव्यों से पलायन कर दिया जाये! ऐसे तो व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र और धर्म की सारी व्यवस्था भंग होकर अव्यवस्था फैल जायेगी! यूरोपीयन राष्ट्रों और अमरीका जैसे राष्ट्रों में पिछली
कई शताब्दियों से यही तो हो रहा है! वहाँ तो युवकों और युवतियों के विवाहपूर्व अवैध काम संबंध से उत्पन्न संतान का पालन पोषण करने की सरकारी व्यवस्था मौजूद है! भारत में इन अवैध संतानों की जिमेदारी कौन लेगा? युवक और युवतियां तो भाग खड़े होते हैं! आखिर उनकी गलतियों का दंड उनके माता- पिता, समाज और राष्ट्र को क्यों मिलना चाहिये? भारत में यही हो रहा है! हमारे यहां सुख और सुविधाएं तो सभी को चाहियें लेकिन कोई भी जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं है।
जीवन में कामवासना अकेली जरूरत या भूख नहीं है! हमारे शास्त्रकारों ने प्राणियों की चार प्रकार की जरूरतों का जिक्र किया है!'हितोपदेश' के अनुसार आहार, निद्रा ,भय और मैथुन आदि चारों मनुष्य सहित सभी पशु और पक्षियों में भी पाये जाते हैं!मनुष्य मनुष्य तभी बनता है, जब वह धर्माचरण करता है! धर्माचरण के बगैर मनुष्य पशु के समान है!आहार, निद्रा, भय और मैथुन तो अन्य जीवों में भी होते हैं!आज से छह हजार वर्षों पहले महर्षि कणाद ने 'वैशेषिक दर्शनशास्त्र' में 'धर्म' उसको कहा है, जिसके सहाय से सांसारिक हित और आध्यात्मिक कल्याण हो सके?धर्म का कर्मकाण्ड- पक्ष, नैतिक -पक्ष, दार्शनिक- पक्ष और आध्यात्मिक-पक्ष आदि सभी का महत्व है!एक पक्ष को ही संपूर्ण मान लेना सही नहीं है! आजकल कर्मकाण्ड धर्म तक ही सीमित होकर रह गया है!
जीवन में कामवासना अकेली जरूरत या भूख नहीं है! हमारे शास्त्रकारों ने प्राणियों की चार प्रकार की जरूरतों का जिक्र किया है!'हितोपदेश' के अनुसार आहार, निद्रा ,भय और मैथुन आदि चारों मनुष्य सहित पशुओं में भी पाये जाते हैं!धर्म का आध्यात्मिक-पक्ष मूल सत्ता का साक्षात्कार करना चाहता है!धर्म का दार्शनिक-पक्ष धर्म को तार्किकता प्रदान करता है! धर्म का नैतिक-पक्ष मनुष्य के आचरण में सही -गलत का निर्धारण करता है! धर्म का कर्मकाण्डपरक अर्थ धर्म के रहस्यों को विविध कर्मकांडों के माध्यम से अभिव्यक्त करता है!
फरवरी महीने में वैलेंटाइन नाम से सात दिन तक रोज डे, प्रपोज डे, चाकलेट डे, टैडी डे, हग डे,किस डे,
वैलेंटाइन डे आदि मनाये जाते हैं!उच्छृंखल भारतीय युवक -युवतियों को धूर्तता और छल से अपना कूड़ा- कर्कट रुपी बेचने वाली विदेशी बहुराष्ट्रीय ने खूब बेवकूफ बना रखा है!हरेक भारतीय पर्व, उत्सव और त्यौहार को बहुराष्ट्रीय कंपनियों और सीरियल निर्माताओं ने अपने व्यापार का साधन बना लिया है!इनमें पूरी तरह से पाश्चात्य उन्मुक्त भोगवाद घुस चुका है! सांस्कृतिक, धार्मिक और आध्यात्मिक रंग फीका पडता जा रहा है तथा पाश्चात्य रंग गहरा होता जा रहा है!साधु, महात्मा और धर्मगुरु चुपचाप तमाशा देख रहे हैं! विभिन्न धर्मसंसदों में इस वैलेंटाइन की उच्छृंखल अनैतिक धींगामस्ती पर भी कोई फरमान जारी होना चाहिये ! क्या हमारे धर्माचार्यों का यह कर्तव्य नहीं बनता कि वो सनातनियों को सनातनी जीवनमूल्यों की सीख लेकर उन्हें सदाचारी बनायें?और अब तो वैलेंटाइन डे के सात दिनों को चौदह दिनों में बदल दिया गया है! वैलेंटाइन डे के बाद थप्पड़ डे, घूस्सा डे, गाली गलौज डे,विदाई डे आदि भी शुरू कर दिये हैं!पता नहीं कहाँ तक पतन के गड्ढों में गिरेंगे! शिक्षा -संस्थानों में इन दिनों मनचले युवाओं और युवतियों की धींगामस्ती चरम पर है!और महाकुम्भ आदि के अवसरों पर हमारे तथाकथित साधु -संत धर्मसंसद लगाकर कुछ हिन्दुओं को हिंदू धर्म से निष्कासित करने की एकतरफा चेतावनी दे रहे हैं!काश इस तरह की चेतावनी एपस्टीन फाईल में फंसे हुये बडबोले और अय्यास नेताओं को भी दे देते। लगता है कि सारी नैतिकता आम आदमी के पालन करने को है, जबकि धनी -मानी लोगों को कुछ भी अनैतिक, गैरकानूनी और अधार्मिक करने का अधिकार मिला हुआ हो। हमारे धर्मगुरुओं के निठल्लेपन, नाकारापन,अय्याशी, महत्वाकांक्षा, पाखंड और ढोंग के कारण आज सनातन धर्म और संस्कृति उपहास का विषय बनते जा रहे हैं! श्रीराम, श्रीकृष्ण और मनुस्मृति का अपमान करने वाले मुफ्तखोरों के विरुद्ध भी ऐसी ही चेतावनियों को जारी करने की हिम्मत दिखलाओ! भारतीय बच्चों और युवा- वर्ग को शिक्षा- संस्थानों में सनातन धर्म, संस्कृति, दर्शनशास्त्र और नीतिशास्त्र की सीख देने की कोई व्यवस्था नहीं है!नई शिक्षा नीति हो या पहले वाली शिक्षा नीति हो, दोनों में ही सिर्फ आदर्श की बातें ही बातें हैं! धरातल पर कुछ भी सृजनात्मक हो नहीं रहा है!झूठ,कपट,छल, धोखाधड़ी,शोषण,पद, प्रतिष्ठा,अय्याशी के जुगाड़ के लिये सभी दीवाने हुये लगते हैं!यह सब करने के लिये पहले के सत्ताधारी सैक्युलरिजम आदि की आड लेते थे! आज वालों ने हिन्दू, हिंदुत्व, हिंदी, गाय, गंगा, गीता,राष्ट्रवाद आदि की आड लेकर भारत और भारतीयों के साथ कुछ भी करने की ज़िद्द को जारी रखा है।
सत्यनिष्ठ,प्रेमनिष्ठ,करुणानिष्ठ होने के आदेश कोई भी नेता, धर्मगुरु, सुधारक जारी नहीं करता है।
सनातनी जीवन- मूल्यों को तो जैसे जमीन में दफना ही दिया गया है!जब नेता, धर्मगुरु, सुधारक और इनके करीबी लोग ही भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हुये होंगे तथा बलात्कारियों तक को अभयदान दे दिया जाता रहेगा, तो जनजीवन में जीवन- मूल्यों का कोई महत्व नहीं रह जायेगा!अपनी राजनीति को बचाने के लिये व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक,आर्थिक, शैक्षणिक,नैतिक, धार्मिक, यौगिक, राजनीतिक मूल्यों की धज्जियाँ उडाना राष्ट्रहित में नहीं है! इन राक्षसी प्रवृत्ति के लोगों पर रोक लगाने की बजाय इनको सरंक्षण दिया जा रहा है!नैतिकता और कानून किसी की हैसियत, राजनीतिक दल ,आर्थिक हालत और जुगाड़ को देखकर निर्धारित किये जा रहे हैं! सत्यवादी, निष्पक्ष, प्रतिभाशाली और मेहनतकश लोग अहंकारी सत्ता के खौफ के कारण एकांत कोनों में छिपे बैठेंगे तो भारत राष्ट्र को विश्वगरीब बनने से कोई भी ताकत नहीं रोक सकती है। अपनी सभ्यता, अपनी संस्कृति, अपने जीवन- मूल्य, अपनी शिक्षा, अपनी माटी, अपनी जमीन, अपने लोग तथा इन सबसे उपजा हुआ सनातन का ज्ञान।इन सबसे बढ़कर हमारे लिये कुछ भी नहीं है।बस समय रहते समझ,विवेक,संवेदनशीलता, जागरुकता और कर्तव्यनिष्ठता को समझना आवश्यक है। यदि पर्व/उत्सव/त्यौहार ही मनाने हैं तो बसंत पंचमी से लेकर होली तक लगातार चालीस दिनों तक चलने वाले मस्ती और उल्लास से भरे हुये सनातनी त्यौहार होलिकोत्सव,फागोत्सव,कामोत्सव को मनाओ। लेकिन यह सब मर्यादा, शुचिता, समझदारी और धैर्य से होना चाहिये।
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डॉ.शीलक राम आचार्य
दर्शनशास्त्र -विभाग
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय
कुरुक्षेत्र -136119
आर्यावर्त चिंतन
आर्यावर्त चिंतन भारतीय दर्शन, सांस्कृतिक विमर्श और राष्ट्रचेतना पर केंद्रित एक वैचारिक एवं शोधपरक डिजिटल मंच है। यह मंच आचार्य शीलक राम जी के वैदिक-दार्शनिक चिंतन, सांस्कृतिक विश्लेषण और समकालीन सामाजिक-राजनीतिक प्रश्नों पर आधारित दृष्टिकोण को सुव्यवस्थित रूप में प्रस्तुत करता है। यहाँ प्रस्तुत सामग्री में — * भारतीय दार्शनिक परंपराओं का विश्लेषणात्मक अध्ययन * आधुनिक शिक्षा और नैतिक विमर्श का आलोचनात्मक परीक्षण * राष्ट्र और समाज से संबंधित जटिल प्रश्नों का तर्कसंगत विवेचन * परंपरा और आधुनिकता
Sunday, February 15, 2026
'वैलेंटाइन डे' की आड़ में उच्छृंखल अनैतिक धींगामस्ती ठीक नहीं है
एपस्टीन फाईल
*एपस्टीन फाईल में जिन हजारों लोगों का नाम मौजूद है, ध्यान रहे कि वो सभी लोग वही हैं, जिनकी जनमानस पूजा करता आ रहा है।ये वही तथाकथित हमारे महापुरुष हैं जिनकी हम मिलकर जय जयकार करते आ रहे हैं। यही है हमारा आधुनिक धार्मिक, नैतिक , सामाजिक और वैज्ञानिक विकास। एपस्टीन फाईल में जिनका नाम मौजूद है, उनमें से कोई भी व्यक्ति साधारण व्यक्ति नहीं है। सभी के सभी राजनीति, व्यापार,मजहब,मत,वाद, संप्रदाय, प्रबंधन, विज्ञान, शिक्षा क्षेत्र के धुरंधर हैं।एक से बढ़कर एक प्रसिद्धि प्राप्त तथाकथित महापुरुष। आधुनिक वैज्ञानिक विकसित युग में जिनको महापुरुष, आदरणीय, बड़ा और पूज्यनीय माना जाता है और जिनकी जनता -जनार्दन पूजा करता है - सारे के सारे वही बड़े लोग एपस्टीन फाईल में मौजूद हैं।इस महा भ्रष्टाचार का भांडाफोड होने पर आज हम सब स्तब्ध हैं लेकिन किसी को भी अपनी निजी सोच और निर्णयों पर संदेह नहीं हो रहा है। क्यों हम ऐसे अय्याश,महाभोगी, कामवासना के कीड़ों को अपना आदरणीय मान लेते हैं? क्यों ऐसे उन्मुक्त भोगी राक्षसों को हम अपना आदर्श मानकर उन्हें सिर पर चढ़ाकर रखते हैं?जब हमारे आदरणीय आदर्श ही इतने अय्याश, उन्मुक्त भोगी, मनुष्यों का मांस खाने वाले और राक्षसी दरिंदे होंगे तो एक समता, समानता और संवेदनशील विश्व का निर्माण करने के सभी दावे खोखले और झूठे ही होंगे।हम आज भी वही पशुओं के तल पर खड़े हैं - कोई विकास वगैरह नहीं हुआ है। विकास आज का सबसे बड़ा झूठ है।हमारा पतन हुआ है और हो रहा है।आज भी दुनिया की बागडोर पाशविक राक्षसी दरिंदों के हाथों में मौजूद है। एपस्टीन फाईल की पूरी सच्चाई यदि सामने आ जाये तो राजनीति, मजहब, संप्रदाय, व्यापार, प्रबंधन, शिक्षा , विज्ञान, मीडिया आदि सभी क्षेत्रों की पोल खुल जायेगी। लेकिन विडंबना यह है कि आज का पूरा सिस्टम इन्हीं राक्षसी दरिंदों के हाथों में मौजूद है।ये अपनी सच्चाई को बाहर आने से हर हाल में रोकने के सारे प्रयास करेंगे और कर भी रहे हैं।*
डॉ. शीलक राम आचार्य
Wednesday, February 4, 2026
आधुनिक विकास में 'नैतिकता' का पतन (The decline of 'morality' in modern development)
विद्या विवादाय धनं मदाय खलस्य शक्तिः परपीडनाय।
साधोस्तु सर्वं विपरीतमेतद् ज्ञानाय दानाय च रक्षणाय॥
इसका अर्थ है कि दुष्ट की विद्या विवाद के लिए, धन अहंकार के लिए और शक्ति दूसरों को कष्ट देने के लिए होती है, इसके विपरीत सज्जनों की विद्या ज्ञान के लिए, धन दान के लिए और शक्ति दूसरों की रक्षा के लिये होती है।भारत पर अकारण हमले करने वाली विदेशी शक्तियों और विदेशी शासकों साईरस,डेरियस, सिकंदर,मंगोल,हूण,डच, डैनिश, पुर्तगाली और अंग्रेजों ने आखिर ऐसा क्यों किया था?इन आक्रमणों के पीछे उनकी कौनसी मानसिकता थी? शताब्दियों तक धर्माचार्यों और सैनिकों की सेना लेकर भारत पर आक्रमण करने के पीछे उनकी कौनसी कामना थी,जो पूरी हो जाती?अकारण किसी संप्रभु राष्ट्र पर आक्रमण करके उसके धन -दौलत, संपदा,वैभव, शिक्षा, नैतिक -मूल्यों सभ्यता, संस्कृति और धर्म को बर्बाद करना कौनसा कल्याणकारी कृत्य है?यह एक आसुरी और राक्षसी कृत्य है।
डॉ शीलक राम आचार्य
दर्शनशास्त्र -विभाग
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय
कुरुक्षेत्र -136119
Saturday, January 31, 2026
इक्कीसवीं सदी की 'लाईफ फिलासफी' (The 'Life Philosophy' of the 21st Century)
दुनिया का सबसे पुरातन विषय 'दर्शनशास्त्र' कहा जाता है। दर्शनशास्त्र सवाल करना सिखाता है।दर्शनशास्त्र तर्क करना सिखाता है। दर्शनशास्त्र प्रमाण की मांग करना सिखाता है। दर्शनशास्त्र कारणकार्य से आगे बढ़ने की सीख देता है। दर्शनशास्त्र हरेक विषय, समस्या, विश्वास, आस्था और कर्म के संबंध में तार्किक चिंतन करके स्वीकार या अस्वीकार करने की योग्यता पर बल देता है।आज से 2500 वर्ष पहले शंकराचार्य ने जैन, बौद्ध, चार्वाक आदि से सवाल ही तो किये थे। लेकिन उनके सवालों का जवाब सही तरह से कोई नहीं दे पाया। काफी लोगों ने सनातन धर्म में वापसी कर ली ।जो अपनी पराजय को पचा नहीं पाये या फिर जो अंधभक्त थे, उन्होंने भारत से बाहर जाकर विदेशों में अपना प्रचार किया। महर्षि दयानंद सरस्वती ने उन्नीसवीं सदी में जैन,बौद्ध, चार्वाक, ईसाई, इस्लाम तथा हिंदुओं के विभिन्न मतों से सवाल ही तो किये थे।इसके फलस्वरूप काफी लोग सनातन धर्म में वापस आये तथा काफी लोगों को सनातन धर्म के सत्य स्वरूप का ज्ञान हुआ। बीसवीं सदी में आचार्य रजनीश ने स्थापित राजनीतिक, दार्शनिक, धार्मिक, आध्यात्मिक, सामाजिक, नैतिक व्यवस्था पर अनेक सवाल खड़े किये थे।इसके साथ- साथ उन्होंने हजारों सवालों का तार्किक समाधान भी जनमानस के सम्मुख प्रस्तुत किया।इक्कीसवीं सदी में राजीव भाई दीक्षित ने सनातन धर्म और संस्कृति के संबंध में पूर्वाग्रह से पैदा की गई टिप्पणियों के सटीक उत्तर दिये तथा सवाल उठाने वालों से अनेक सवाल भी किये। हालांकि सवाल उठाने वालों के साथ स्थापित सिस्टम ने कभी भी अच्छा व्यवहार नहीं किया। शंकराचार्य, महर्षि दयानंद सरस्वती, आचार्य रजनीश,राजीव भाई दीक्षित की असमय की गई हत्याएं इसका प्रमाण हैं।लेकिन ध्यान रहे कि जिस राष्ट्र की जनता सिस्टम से सवाल करना छोड देती है,वह अपने अधिकारों से भी हाथ धो बैठती है। और सिस्टम से सवाल नहीं पूछने का एकमात्र कारण सिस्टम के प्रति अंधभक्ति होती है। इसके दुष्परिणाम भी शीघ्र ही मिलने शुरू हो जाते हैं। किसी भी सिस्टम में यह देखा जा सकता है।बस देखने,जानने और समझने के लिये निष्पक्षता आवश्यक है। अंधभक्त के पास इन तीनों का अभाव होता है।
विज्ञान, धर्म, अध्यात्म,योग, राजनीति, व्यापार, शिक्षा,शोध आदि किसी भी क्षेत्र में यदि पाखंड, ढोंग और शोषण से बचना है तो तार्किक चिंतन करना,सवाल -जवाब करना, प्रमाण की तलाश करना और कारणकार्य में संबंध स्थापित करना बेहद आवश्यक है। उपरोक्त सभी क्षेत्रों में जो भी सवाल उठाने या तार्किक चिंतन से दूर भागता है,सोच लो कि वह आपका शोषण करने की तैयारी में है।वह उस- उस क्षेत्र में फिसड्डी है।वह अपने कर्तव्यों का भलि तरह से निर्वहन नहीं कर रहा है। ऐसे व्यक्तियों में यदि थोड़ी भी राष्ट्रभक्ति,धर्मभक्ति और मूल्यभक्ति बची है,तो उन्हें तुरंत उस क्षेत्र से हट जाना चाहिये।
आजादी के पश्चात् भारत की इस विषय में स्थिति सोचनीय हो गई है। हमारे धर्मगुरु, योगाचार्य,नेता, सुधारक और यहां तक कि वैज्ञानिक भी सवाल- जवाब से दूर भाग रहे हैं।
हमारी ही नहीं अपितु समस्त संसार की शिक्षा -व्यवस्था विज्ञान और तकनीक की ओर जाने पर जोर जबरदस्ती कर रही है।इस जोर जबरदस्ती का परिणाम समस्त संसार में आतंकवाद, उग्रवाद, भ्रष्टाचार, अव्यवस्था, अनैतिकता, लूटपाट, बलात्कार, शोषण और युद्ध का बोलबाला है। शांति,संतोष,संतुलन, समन्वय, सह-अस्तित्व तो कुछ समय के लिये ही दिखाई देते हैं।यह कुछ समय भी शायद शांति आदि के लिये न होकर अशांति, अव्यवस्था, आतंकवाद और युद्धों की तैयारी का काल जान पड़ता है। भौतिक विकास गलत नहीं है लेकिन एकतरफा भौतिक विकास ने संसार को अव्यवस्था,विनाश और युद्धों की भूमि बनाकर रख छोड़ा है। प्राथमिक से लेकर विश्वविद्यालयीन कक्षाओं तक का मुख्य उद्देश्य विज्ञान और तकनीक आधारित हो गया है। इससे भौतिक विकास तो बहुत अधिक हो रहा है लेकिन जीवनमूल्यों का प्रतिवर्ष ह्रास होता जा रहा है।इस भौतिक विकास का लाभ भी संसार के कुछ प्रतिशत लोगों तक ही पहुंच रहा है।कुल मिलाकर इसे विकास कहें या विनाश कहें -इसे कोई कम समझ वाला व्यक्ति भी बतला सकता है। लेकिन क्योंकि वर्तमान विकास की शैली का निर्धारण भी विज्ञान और तकनीक के हाथों में न होकर उद्योगपतियों, पूंजीपतियों और कोरपोरेट घरानों के हाथों में है।
इसके साथ में एक और भी दुर्घटना घटित हो रही है और वह है धर्म के क्षेत्र में नेताओं का प्रवेश तथा राजनीति के क्षेत्र में धर्मगुरुओं की घुसपैठ। दोनों एक दूसरे के क्षेत्रों में जगह बनाने की भरपूर कोशिशें कर रहे हैं। वास्तविकता यह है कि कोई नेता जब राजनीति में असफल और अपरिपक्व सिद्ध होता है,तो वह धर्म का सहारा लेता है। और जब किसी धर्मगुरु को धर्म में संतुष्टि नहीं मिलती है, तो वह राजनीति की तरफ भागता है। उपरोक्त दोनों ही लोग अपने अपने क्षेत्रों में फिसड्डी सिद्ध होकर दूसरे के क्षेत्र में सेंधमारी करते हैं।इस सेंधमारी में राष्ट्र की युवाशक्ति और जनसाधारण मेहनतकश नागरिक बर्बाद हो रहे हैं। लेकिन नेता और धर्मगुरु अपनी -अपनी राजनीतिक और धार्मिक महत्वाकांक्षा में अंधे और बहरे होकर न तो किसी के दुख, पीड़ा, गरीबी, बेरोजगारी आदि को समझते हैं तथा न ही कोई विकास का काम करते हैं। कहते हैं कि गीदड़ की मौत आने पर वह आबादी की तरफ भागता है लेकिन जब किसी नेता की राजनीति और धर्मगुरु का चमत्कार नहीं चल पाते हैं,तो दोनों एक दूसरे के क्षेत्रों की तरफ भागते हैं। बेचारे गीदड़ को तो मौत मिलती है लेकिन नेता और धर्मगुरु को पद, प्रतिष्ठा,धन, दौलत, जमीन, जायदाद, वैभव,विलास, गाड़ी,बंगले, विदेशी सैर-सपाटे आदि सब कुछ मिल जाते हैं।
आधुनिक मानव को भीड़ में सत्य के दर्शन करने की ज़िद्द क्यों है? आधुनिक मानव घर पर बैठे बिठाये ही सब कुछ क्यों प्राप्त कर लेना चाहता है? बिना त्याग, तपस्या, एकाग्रता और स्वाध्याय के उसे सारी सुविधाएं और उपलब्धियां चाहियें। हल्दी लगे न फिटकरी और रंग भी चोखा होय - यह नहीं हो सकता है। भौतिक जगत् में शायद तिकड़मबाजी, चापलूसी और भ्रष्टाचार से बहुत कुछ हासिल हो सकता होगा, लेकिन भीतरी जगत् में नहीं। और भौतिक जगत् में भी तिकड़मबाजी आदि करने के लिये भी तो हाथ पैर मारने पडते हैं। आंतरिक जगत् में यह भी नहीं चल पायेगा। वहां तो पवित्रता, शुचिता, स्पष्टता और निरहंकारिता काम आयेंगे।
जिनको कुछ भी नहीं करना होता है,वो विज्ञान और तकनीक पर भी संदेह करते हैं तथा धर्म और अध्यात्म पर भी संदेह करते हैं।बस,हर कहीं कमियां निकालते रहकर स्वयं कुछ भी नहीं करने के बहाने तलाश करना ही ऐसे लोगों का काम है। जहां पर कमी हो, उसे बतलाया जाना चाहिये तथा जहां पर अच्छाई लगे, वहां प्रशंसा करने की हिम्मत भी दिखलाना चाहिये। सकारात्मकता लोगों का हरेक प्रयास सृजनशीलता के लिये होता है, केवल विध्वंस के लिये नहीं। जहां भी कुछ कमी लगे या बुराई लगे, वहां पर प्रहार करना भी आवश्यक है। बिना सोचे-समझे केवल हां- हां करते जाना भी गुलामी है तथा नही- नहीं करते जाना भी गुलामी है। दोनों ही गुलामियां हैं।अंधे होकर किसी धारणा या विश्वास के समर्थन में नारेबाजी मत करो। कमियां बतलाने और प्रशंसा करने - दोनों में सृजनात्मक होना आवश्यक है।
जब कोई किसी व्यक्ति के चारित्रिक गुणों सत्यनिष्ठा, स्पष्टता, बुद्धिमत्ता, निरहंकारिता और सफलता का सामना नहीं कर पाता है तो वह कुछ भी करके उसका चरित्रहनन करने पर उतर आता है। वास्तव में ही यदि उसमें कोई योग्यता होती तो वह उस योग्यता से ही सामना करने की हिम्मत करता है। चारों तरफ ऐसे लोगों की भरमार है।न चाहते हुये भी ऐसे लोग आये दिन सामने से मुकाबला नहीं करके पीछे से पीठ पर प्रहार करते हैं। लगातार किसी बात के दोहराव से प्रभावित होकर जनसाधारण उस झूठी बात को ही सही मानने पर विवश हो जाता है, इसलिये बुरे कहे जाने वाले लोग अक्सर किसी भी अच्छे और भले व्यक्ति को बदनाम करने में शीघ्र सफल हो जाते हैं। इससे वास्तव में अच्छा व्यक्ति अकेला पड़ जाता है तथा बुरा व्यक्ति अपना संगठन बनाने में सफल हो पाता है।सत्य की विजय और असत्य के पराजित होने की विभिन्न संप्रदायों की सीख अक्सर गलत सिद्ध होकर रह जाती है। झूठे लोगों के बहुमत में अकेला अच्छा व्यक्ति सदैव पराजित होता है। लोकतंत्र में सत्य की नहीं अपितु भीड़ की विजय होती है। और अच्छे लोगों के पास कभी भीड़ नहीं होती है, जबकि बुरे लोग झूठ,कपट,छल,धन- दौलत आदि के सहारे जनमानस का बहुमत अपने पक्ष में कर लेते हैं। संसार में जिसके पास बहुमत है, जिसके पास लोगों की भीड़ है तथा जिसके पास जनमानस को बरगलाने का हूनर है, वही सफल कहा जाता है। और ऐसा समस्त धरा पर दिखाई भी दे रहा है।
होना तो यह चाहिये कि धर्म को राजनीति की अपेक्षा योगाभ्यास के क्षेत्र में जाना चाहिये तथा राजनीति को नैतिकता के क्षेत्र में जाना चाहिये।यानी धर्मगुरुओं को राजनीति करने के बजाय योगाभ्यास करना चाहिये तथा नेताओं को नैतिक होने की आवश्यकता है।भारत, भारतीय और भारतीयता तभी सुरक्षित रह पायेंगे। धर्मगुरु यदि योग साधना करके अपने चाल,चरित्र और चेहरे को एक समान बनाकर जनमानस को सनातन जीवन- मूल्यों की शिक्षा देंगे,तो उस शिक्षा को जनमानस अवश्य मानेगा। चरित्रहीन, भ्रष्ट और व्यापारी धर्मगुरु यदि जनमानस को आचरण शुद्धि के उपदेश देंगे,तो उनको कोई भी नहीं मानेगा। पिछले कयी दशक से भारत में यही हो रहा है।इसी तरह से नेता लोगों को जनमानस की मूलभूत सुविधाओं को समय पर उपलब्ध करवाने के लिये विधायक, सांसद और मंत्री बनाया जाता है। लेकिन नेता लोग पूंजीपतियों और धर्मगुरुओं की शरण में जाकर जनता -जनार्दन की सेवा करने के बजाय उसको नकली मुद्दों में उलझाये रखते हैं।इस कार्य में नेताओं की मदद धर्मगुरु, पूंजीपति और मीडिया मिलकर करते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि नेताओं की राजनीति का धंधा, धर्मगुरुओं का शोषण का धंधा तथा पूंजीपतियों का लूट-पाट व्यापार का धंधा खूब तरक्की करता जाता है। परिणामस्वरूप भारत के कुछ प्रतिशत धनी मानी लोगों को छोड़कर हर वर्ग गरीबी, बदहाली, बिमारी, अशिक्षा, कुशिक्षा और भूखमरी से त्रस्त होता जा रहा है।
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डॉ. शीलक राम आचार्य
दर्शनशास्त्र -विभाग
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय
कुरुक्षेत्र -136119
आद्य शंकराचार्य की 2500 वर्ष पुरातन ज्ञान- परंपरा (2500 years old tradition of knowledge of Adi Shankaracharya)
आद्य शंकराचार्य को विश्व के दार्शनिक क्षेत्र में सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। शंकराचार्य के जीवन और कार्यक्षेत्र के संबंध में उनके शिष्यों ने अनेकों ग्रंथों की रचना की है। विदेशी हमलावरों का मुख्य लक्ष्यों में से एक यह भी होता था कि सनातन धर्म और संस्कृति की पहचान के हरेक प्रतीक को नष्ट किया जाये, इसलिये उनके द्वारा अनेकों महत्वपूर्ण ग्रंथ नष्ट कर दिये गये। अंग्रेजी और उनके अंधानुयायी भारतीय लेखकों द्वारा भारतीय धर्म, संस्कृति, दर्शनशास्त्र, इतिहास आदि के संबंध में संदेहों को समाप्त करने की बजाय उनको बढ़ाने पर जोर अधिक दिया जाता रहा है। ऐसे लेखकों के संबंध में षड्दर्शनशास्त्र के भाष्यकार आचार्य उदयवीर शास्त्री ने कहा है कि पाश्चात्य ईसाई विद्वानों द्वारा इस विषय में किये गये निराधार मिथ्या प्रलापों को पत्थर की लकीर समझकर निश्चिंत बैठे हैं। उन्हीं के हाथों में आज वह शक्ति है, जिसके द्वारा कोई विचार प्रसार पा जाते हैं। शंकराचार्य के संबंध में उनके एक शिष्य पद्मपाद ने 'विजयडिंडिम' नामक ग्रंथ लिखा था,जो कि आज उपलब्ध नहीं है। शंकराचार्य के जीवन के संबंध में अन्य ग्रंथों में आनंदगिरि की शंकरविजय,राजचूडामणि रचित शंकर अभ्युदय,आनंदतीर्थ की शंकर आचार्य अवतार कथा, रामकृष्ण की शंकर अभ्युदय काव्य, व्रजराज की शंकर दिग्विजय सार,चित्सुख की वृहत् शंकर दिग्विजय, नीलकंठ भट्ट की शंकरमंदारसौरभ आदि पठनीय ग्रंथ हैं।
आचार्य उदयवीर शास्त्री के अनुसार शंकराचार्य का अयुमान 32 वर्ष,6 महीने,10 दिन का था।2631 युधिष्ठिर सम्वत् बताया है। युधिष्ठिर सम्वत् कलि सम्वत् से 38 वर्ष पहले शुरू होता है।इसका प्रारंभ युधिष्ठिर का राज्यारोहण काल है। युधिष्ठिर ने 36 वर्ष तक शासन किया था। उसके दो वर्ष बाद कलि सम्वत् शुरू हुआ था।इस तरह से ईस्वी सन् शुरू होने से 509 वर्ष पूर्व शंकराचार्य का जन्मकाल आता है तथा उनका देहावसान काल ईसापूर्व 477 में पड़ता है। ध्यान रहे कि वर्तमान कलि सम्वत् का प्रारंभ ईस्वी सन् से 3102 वर्ष पहले हुआ था।
शारदापीठ के विवरणानुसार शंकराचार्य ने सर्वप्रथम ज्योतिर्मठ की स्थापना 497 ईसापूर्व में की थी। इसका पश्चात् शारदामठ 492 ईसापूर्व में, फिर शृंगेरी 492 ईसा पूर्व में तथा अंत में गोवर्धनमठ की स्थापना 485 ईसापूर्व में की। उन्होंने शारदामठ के अध्यक्ष पद पर सर्वप्रथम सुरेश्वराचार्य को बैठाया था।वो इस पद पर 42 वर्षों तक रहे। उनके पश्चात् चित्सुख,सर्वज्ञान,ब्रह्मानंद तीर्थ,स्वरूपाभिज्ञान, मंगलमूर्ति, भास्कर, प्रज्ञान आदि आचार्य अध्यक्ष पद पर विराजमान रहे।
गोवर्धनमठ की परंपरा में प्रथम आचार्य का नाम पद्मपाद आता है। उनके पश्चात् शूलपाणि, नारायण,विद्यारण्य,वामदेव,पद्मनाभ, जगन्नाथ,मधुरेश्वर, गोविंद,श्रीधर आदि आते हैं।
ज्योतिर्मठ की आचार्य परंपरा के अनुसार शंकराचार्य ने बद्रीनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार करके वहां पर मठ की स्थापना की। वहीं पर निवास करके उन्होंने विभिन्न ग्रंथों पर भाष्य लिखे।यह के अध्यक्ष पद पर सर्वप्रथम तोटकाचार्य विराजमान हुये थे। कुछ को छोड़कर यहां के अन्य आचार्यों की पूरी सूची अनुपलब्ध है। श्रृंगेरी मठ के आचार्यों में सर्वप्रथम स्थान तो स्वयं आद्य शंकराचार्य का ही आता है। उनके पश्चात् हस्तमलकाचार्य को अध्यक्ष बनाया गया।
शारदामठ की परंपरा अनुसार ज्योतिष्मठ के प्रथम शंकराचार्य त्रोटकाचार्य,शारदमठ के प्रथम शंकराचार्य सुरेश्वराचार्य,शृंगेरी मठ के प्रथम शंकराचार्य हस्तमलकाचार्य तथा गोवर्धनमठ के प्रथम शंकराचार्य पद्मपादाचार्य थे। परंपरा यह कहती है कि स्वयं आद्य शंकराचार्य किसी भी मठ के शंकराचार्य बनकर नहीं रहे थे
शंकराचार्य द्वारा स्थापित व्यवस्था के अंतर्गत दशनामी संन्यासियों की परंपरा है।ज्योतिर्मठ के अंतर्गत गिरि, पर्वत और सागर आते हैं। श्रृंगेरी मठ की परंपरा में सरस्वती,भारती और पुरी आते हैं। गोवर्धन मठ की परंपरा में वन और अरण्य आते हैं।शारदामठ की परंपरा में तीर्थ और आश्रम आते हैं।इस प्रकार से दशनामी संन्यासियों में गिरि,पर्वत, सागर, सरस्वती,भारती,पुरी,वन,अरण्य, तीर्थ और आश्रम आते हैं।
उड़ीसा जगन्नाथपुरी में स्थित मठ का का संबंध 'ऋग्वेद' से है। कर्नाटक में स्थित श्रृंगेरी मठ का 'यजुर्वेद' से है। गुजरात में स्थित शारदामठ का संबंध 'सामवेद' से है। उत्तराखंड में स्थित ज्योतिर्मठ का संबंध 'अथर्ववेद' से है।इस मठ के वर्तमान आचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी वर्तमान भ्रष्ट व्यवस्था पर अपनी निष्पक्ष,बेबाक और सत्यनिष्ठ टिप्पणियों के लिये जाने जाते हैं। श्रृंगेरी मठ के वर्तमान शंकराचार्य भारती तीर्थ हैं। गोवर्धन मठ के वर्तमान शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद जी हैं।शारदामठ के वर्तमान शंकराचार्य स्वामी सदानंद जी हैं।
भारत की चार दिशाओं में शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार मठों की स्थापना का उद्देश्य दार्शनिक,सांस्कृतिक, राष्ट्रीय,धार्मिक, आध्यात्मिक और राजनीतिक सभी कुछ था। चारों मठों की स्थापना का यह प्रयास आज से 2500 वर्षों पहले उत्पन्न हुये एक महापुरुष की दुरदर्शी, दूरवर्ती और गहन -गूढ़ सोच का परिचायक है।आज से पच्चीस सदी पहले जैन, बौद्ध, चार्वाक और वाममार्गियों जैसे कयी संप्रदायों द्वारा उत्पन्न दार्शनिक,राष्ट्रीय, सांस्कृतिक,धार्मिक, राजनीतिक ख़तरों से बचाव के लिये शंकराचार्य द्वारा किये गये प्रयास भारत के हजारों लाखों वर्षों के इतिहास में सदैव सदैव के लिये स्मरण रखे जायेंगे। पूर्वाग्रहग्रस्त पाश्चात्य लेखकों और उनके अंध- प्रशंसक भारतीय लेखकों ने आजादी के पश्चात् के सात दशकों के दौरान आद्य शंकराचार्य के योगदान को कमतर करके आंका है। भारतीय इतिहास पर छाये हुये इस धूंधलके को हटाना आवश्यक है। राजनीतिक और शैक्षिक स्तर पर सत्यनिष्ठा और निष्पक्षता से जो प्रयास किये जाने चाहिये थे,वो अब तक हो नहीं पाये हैं। कुछ गिने-चुने भारतीय विद्वानों यथा आचार्य उदयवीर शास्त्री, पंडित भगवद्दत, पुरुषोत्तम नागेश ओक,वैंकटचललैय्या आदि ने इस संबंध में महत्वपूर्ण शोध प्रस्तुत किये हैं।
गोवर्धन मठ का आदर्श वाक्य 'प्रज्ञानम् ब्रह्म' है।श्रृंगेरी मठ का का आदर्श वाक्य 'अहंं ब्रह्मास्मि' है।शारदा मठ का आदर्श वाक्य 'तत्वमसि' है।जगन्नाथपुरी मठ का आदर्श वाक्य 'अयमात्मा ब्रह्म' है।वर्तमान में 'गोवर्धन मठ' के 145 वें शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद जी हैं।वर्तमान में 'श्रृंगेरीमठ' के 36 वें शंकराचार्य भारती कृष्ण तीर्थ हैं।वर्तमान में 'शारदा मठ' के 80 वें शंकराचार्य सदानंद जी जी हैं।वर्तमान में 'ज्योतिर्मठ' के शंकराचार्य होने के संबंध में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी का सर्वोच्च न्यायालय में मुकदमा विचाराधीन है।
पाश्चात्य लेखकों और उनके समर्थक भारतीय लेखकों ने आद्य शंकराचार्य का काल आठवीं सदी में माना है।यह उनकी भ्रांति , पूर्वाग्रह और संकुचित सोच का परिचायक है। भारतीय विश्वविद्यालयों में संस्कृत साहित्य, दर्शनशास्त्र और भारतीय ज्ञान परंपरा के विभागों में पिछले 75 वर्षों से यही रटवाया और पढ़ाया जाता रहा है।यह बिल्कुल गलत है। आद्य शंकराचार्य का सही काल 509 ईसापूर्व है,न कि आठवीं सदी। बौद्ध मत के जिस गौतम (छठी सदी ईसापूर्व) के नाम से आज बौद्ध मत प्रचलित है, उसके तुरंत पश्चात् आद्य शंकराचार्य का जन्मकाल आता है। उनके बौद्ध मत, जैन मत, चार्वाक मत और वाममार्ग आदि के कारण भारत में जो सांस्कृतिक खालीपन,राजनीतिक अव्यवस्था,धार्मिक पाखंड, सांप्रदायिक थोथा कर्मकांड, उन्मुक्त यौनाचार और नैतिक मान्यताओं की उच्छृंखलता की शुरुआत हुई थी,उनको समाप्त करने में मंडन मिश्र और शंकराचार्य का महत्वपूर्ण योगदान था। मंडन मिश्र का ही संन्यास नाम सुरेश्वराचार्य था,जिनको स्वयं शंकराचार्य ने शारदा मठ का अध्यक्ष बनाया था।
ईसाई मत में नकली पोप नहीं बना सकते। बौद्ध मत में नकली दलाई-लामा नहीं बना सकते। इस्लाम में नकली पैगंबर नहीं बना सकते।सिख मत में नकली गुरु नहीं बना सकते। लेकिन यह नकली शंकराचार्य बनाने की बिमारी हिंदुओं में क्योंकर लग गई है? मूलतः तो शंकराचार्य चार ही होते हैं। लेकिन भारत में अपने आपको शंकराचार्य कहने वाले सैकड़ों धर्मगुरु घूम रहे हैं। इन सबने नकली गद्दियों, मठों, पीठों की स्थापना करके अपना ढोंग शुरू कर रखा है।भारत के हरेक शहर में कोई न कोई विश्वगुरु या जगत्गुरु या शंकराचार्य मिल जायेगा। हिंदुओं के साथ यह क्या हो रहा है? हिंदुओं को दिग्भ्रमित करने के लिये यह कौन-सा षड्यंत्र रचा जा रहा है? जिसको देखो वही शंकराचार्य, विश्वगुरु, जगतगुरु, महामंडलेश्वर,महायोगी, महावतार, पथप्रदर्शक आदि बना घूम रहा है। धार्मिक जगत् ये तथाकथित लोग जब स्वयं ही भटके हुये हैं,तो हिंदुओं का मार्गदर्शन कैसे करेंगे? अपने आपको शास्त्रों का मर्मज्ञ कहने वालों में इतनी तो समझ होनी ही चाहिये कि जब तुम स्वयं ही आपस में लड़-झगड़कर आये दिन कोई न कोई विवाद खड़ा कर रहे हो,तो हिंदुओं को क्या सिखलाओगे?
लगता है कि भारत में हिंदुओं के शंकराचार्य, धर्मगुरु, महामंडलेश्वर, योगाचार्य आदि बनने के स्थान पर विभिन्न राजनीतिक दलों के शंकराचार्य, धर्मगुरु, महामंडलेश्वर, योगाचार्य आदि बनने और बनाने की होड़ लगी हुई है। विभिन्न राजनीतिक दल मिलकर हिंदुओं के धर्मगुरुओं का खूब अपने राजनीतिक उद्देश्यों के लिये इस्तेमाल कर रहे हैं। एक वर्तमान शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती जी ने ठीक ही कहा है कि जब भारत में नकली राष्ट्रपति,प्रधानमंत्री, गृहमंत्री नहीं बन सकते हैं,तो नकली शंकराचार्य, धर्मगुरु, महामंडलेश्वर, जगतगुरु, विश्वगुरु क्यों बनाये जा रहे हैं? इसका अर्थ तो यह है कि नेताओं ने अपने स्वार्थ साधने के लिये धर्म को भी अपने कब्जे में कर लिया है। और हमारे धर्माचार्य किसी न किसी पद, प्रतिष्ठा,धन,दौलत, प्रसिद्धि पाने के मोह में सनातन धर्म और संस्कृति का बहुत बड़ा नुकसान कर रहे हैं। भारत, भारतीय और भारतीयता के लिये यह बहत घातक सिद्ध हो रहा है। इससे भारत का जनमानस जहां पर अधार्मिक, अनैतिक और चरित्रहीन होता जा रहा है, वहीं पर भारत राष्ट्र, सनातन धर्म और संस्कृति को भी हर प्रकार से पतन की ओर धकेलने के प्रयास सफल होते जा रहे हैं।
शंकराचार्य के सही काल का निर्धारण करने के लिये आचार्य उदयवीर शास्त्री और डॉ परमेश्वर नाथ मिश्र की पुस्तकें पढना चाहियें। इन्होंने इस संबंध में बहुत परिश्रम किया है। शंकराचार्य ने कांची कामकोटि में किसी पीठ की स्थापना नहीं की गई थी, लेकिन वहां पर कयी वर्ष तक निवास किया था। इसलिये कांची कामकोटि पीठ की अपनी प्रसिद्धि रही है। कामाक्षी देवी के प्रति भक्तिभाव होने की वजह से वहां पर निवास करते रहे थे, इसलिये वहां पर भी एक पीठ की तरह से ही संस्थान बन गया था।बाद में इसकी अध्यक्षता एक अन्य पीठ के साथ- साथ सुरेश्वराचार्य को सौंप दी गई थी। इसकी प्रसिद्धि इतनी बढ़ी कि यहां पर विराजमान गुरु भी शंकराचार्य कहलाने लगे। परिणामस्वरूप श्रृंगेरी मठ की प्रतिष्ठा कम होती गई। कालांतर में यह विच्छिन्न हो गया।कयी सदियों तक यह आचार्यों से रहित ही रहा। संभवतः कांची कामकोटि पीठ के 37 वें शंकराचार्य विद्याघन के काल में इसका जीर्णोद्धार हुआ।ये यहां पर 759-788 ईस्वी तक विराजमान रहे थे। अपने शिष्य नित्यबोधघन (773-848 ईस्वी) को इस काम के लिये नियुक्त किया। श्रृंगेरी मठ के कयी शताब्दी के विलुप्त कार्यकाल का सही आंकलन नहीं कर पाने के कारण 38 वें शंकराचार्य अभिनव शंकर को ही आद्य शंकराचार्य मान लेने के कारण 788 ईस्वी को आद्य शंकराचार्य का प्रादुर्भावकाल स्वीकार कर लिया गया।कहा जाता है कि ये भी अपने समय के उच्च कोटि के विद्वान थे। श्रृंगेरी और कांची कामकोटि पीठों के परस्पर मनमुटाव से आद्य शंकराचार्य के काल के संबंध में लगभग 1300 वर्षों का अंतर आ गया है।यह तथ्य बाकी सभी पीठों के इतिहास अध्ययन से भी सिद्ध होता है। लेकिन लेखकों ने पूर्वाग्रहवश केवल श्रृंगेरी की विकृत और खंडित परंपरा को आधार मानकर बाकी पीठों में उपलब्ध साक्ष्यों की उपेक्षा करके आद्य शंकराचार्य के काल को तेरह सदी नया सिद्ध करने पर जोर लगाये रखा है। लगता है कि श्रृंगेरी मठ शंकराचार्य नित्यबोधघन के काल से पूर्व 800 वर्ष तक ध्वस्त रहा था। पाश्चात्य लेखकों और और उनके अंधभक्त भारतीय लेखकों की यह आदत रही है कि किसी भी तरह से पुरातन भारतीय इतिहास को प्रथम युनानी फिलासफर थैलीज, अब्राहमिक परंपरा और भारतीय सिद्धार्थ गौतम के बाद का सिद्ध किया जा सके। भारतीय काल गणना के संबंध में उनके द्वारा निर्धारित भारतीय शासकों, महानायकों, महापुरुषों, दार्शनिकों आदि के कालनिर्णय में पूर्वाग्रह, भेदभाव, कपोल-कल्पना और मनघड़ंत भेदभाव मौजूद हैं।
जो लेखक सिद्धार्थ गौतम और आद्य शंकराचार्य के काल में लगभग 1300 वर्षों का अंतराल मानते हैं, उन्हें यह ज्ञान होना चाहिये कि सनातन धर्म के शास्त्रों पर प्रहार करने वाले किसी भी सनातन विरोधी महापुरुष को उत्तर देने के लिये भारतीय महापुरुषों ने कभी इतनी प्रतीक्षा नहीं करवाई है। अपने ऊपर हुये किसी भी राजनीतिक,धार्मिक या दार्शनिक हमले का इन्होंने तुरंत प्रत्युत्तर दिया है। महावीर, सिद्धार्थ, चार्वाक और वाममार्गियों को जवाब देने में भी कोई देरी नहीं हुई और इनके तुरंत पश्चात् गौडपाद,गोविंदपाद,कुमारिलभट्ट, मंडन मिश्र,शंकराचार्य आदि दार्शनिकों ने जन्म लेकर अपना कर्तव्य पूरा किया था।
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डॉ. शीलक राम आचार्य
दर्शनशास्त्र- विभाग
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय
कुरुक्षेत्र -136119
Thursday, January 15, 2026
'दर्शनशास्त्र' विषय स्थापित अव्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह लगाने का हौंसला देता है (The subject of 'Philosophy' gives courage to question the established order)
लूटेरे फिरंगियों से आजादी के पश्चात् भारत में सभी संप्रदायों में खुद को परस्पर एक -दूसरे संप्रदाय से पुराना सिद्ध करने की प्रतियोगिता चल रही है।जैसा पुराना होना सत्य होने की गारंटी बन गई हो। जैसे पुराना होना प्रामाणिक होने की कसौटी बन गई हो।जो जितना पुराना,वह उतना ही प्रामाणिक और प्रासंगिक।इस प्रकार की बेवकूफी जोरों से चल रही है। इनमें से अधिकांश को जीवनमूल्यों को आचरण में उतारने से कोई मतलब नहीं है।इनको अपने अनुयायियों के चरित्र,चाल, चेहरे, आचरण, व्यवहार से कोई भी लेना -देना नहीं है।बस, संख्या बल और पुराना होने का महत्व रहा गया है।जो जितना पुराना तथा जिसके पास जितनी अधिक संख्या हो,वह उतना ही अधिक प्रामाणिक और स्वीकार करने योग्य है। विभिन्न प्रकार के प्रमाणों को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत करने में अधिकांश संप्रदायों ने अनेकों व्यक्तियों को लगा रखा है।इनको भारी भरकम फीस दी जाती है।झूठे, भेदभावपूर्ण, पूर्वाग्रहग्रस्त और मनघड़ंत आंकडों को तैयार करके अंधभक्तों को सौंप दिया जाता है।ये अंधभक्त बिना कोई पारिश्रमिक लिये सोशल मीडिया पर इस तैयार बकवास की जुगाली करते रहते हैं।इन पर कोई रोक-टोक नहीं होती है। सनातन धर्म,संस्कृति,दर्शनशास्त्र, इतिहास,नीतिशास्त्र, तर्कशास्त्र,समाजशास्त्र,
चिकित्साशास्त्र, ज्योतिषशास्त्र,गणितशास्त्र,शिक्षा,पुरातन ग्रंथों और महापुरुषों के संबंध में अनाप-शनाप कुछ भी सोशल मीडिया पर परोसा जा रहा है। सिस्टम को क्योंकि सिर्फ अपने वोट बैंक से मतलब है - वह इस कुकर्म को होने दे रहा है। सिस्टम की निष्ठा सुशासन,स्वशासन और गुणशासन में न होकर लंबे समय तक खुद को सत्तासीन बनाये रखना है। जिन वायदों को चुनाव पूर्व में बार बार दोहराकर सिस्टम सत्ता पर कब्जा करने में सफल रहा था,सत्ता मिलने पर जानबूझकर उन वायदों की घोर उपेक्षा होती रही है। तथाकथित बड़े और विभिन्न संप्रदायों के अगुआ कहलवाने लोग हर तरह से भ्रष्ट सिस्टम से समझौता कर लेते हैं।हम तुम्हें थोक में अपने अंधभक्तों के वोट दिलवायेंगे और तुम हमें खुलकर भोग- विलास के साधन प्रदान कर देना। राष्ट्र, धर्म, संस्कृति,सुशासन, स्वशासन, स्वभाषा, नैतिकता, आचरण, सुरक्षा,शिक्षा, रोजगार आदि जायें भाड़ में।महाआश्चर्य तो तब होता है जब कल पैदा हुये कोई संप्रदाय के गुरु खुद को दुनिया का सबसे पुरातन संप्रदाय बताने लगते हैं। ध्यान रहे कि राजसत्ता,मजहबसत्ता और धनसत्ता का मजबूत समझौता भारत सहित पूरे एशिया महाद्वीप को बर्बाद किये दे रहा है।या तो आप इस गठबंधन के गठबंधन में सम्मिलित हो जाओ या फिर चुप बैठे रहो। यदि आपने इसका विरोध किया तो आपकी खैर नहीं है। किसी को पता नहीं आपके साथ क्या दुर्व्यवहार किया जायेगा। किसी को मालूम नहीं कि आपको कहां अधमरा करके फेंक दिया जायेगा।पता नहीं आपकी कब किसी सड़क दुर्घटना में मौत हो जाये। अपने मजहब, अपने संप्रदाय, अपने मत और अपने विश्वास को अंधविश्वास में बदलकर उसे सबसे पुराना और वैज्ञानिक सिद्ध करने पर पूरा जोर लगा दो। किसी की भी मत सुनो।एक ही झूठ को बार -बार दोहराओ। अपने वर्ग,जाति और विश्वास के लोगों का माईंड वाश करने का इससे बढ़िया कोई तरीका नहीं है।आपके ऊपर धनवर्षा,आशीर्वचन वर्षा और भोगसामग्री की मूसलाधार वर्षा होने लगेगी। यदि वास्तव में आपमें प्रतिभा, बुद्धि, तार्किकता, संवेदनशीलता और बुराई का विरोध करने की क्षमता है,तो सच मानिये कि मौजूदा व्यवस्था में आपकी बर्बादी सुनिश्चित है।
किसी व्यक्ति, वस्तु,स्थान,पूजा- स्थल,संस्था, संगठन,खेल पुरस्कार,खेल मैदान आदि का नाम बदलने मात्र से कोई आमूल बदलाव या क्रांति या परिवर्तन या सृजनात्मक परिणाम आ जायेगा? अच्छे,भले, सदाचारी, नैतिक, आदर्शवादी नाम रखने का अपना महत्व होता है, इससे मना करना भी बेवकूफी होगी। लेकिन केवलमात्र नाम को बदलने या अच्छा नाम रखने मात्र से भी तो सब कुछ नहीं हो जानेवाला है।नाम के अनुकूल कर्म भी तो करने चाहियें। काम तो कोई करना नहीं,बस अच्छे नाम रखकर ही अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लो। इससे कुछ भी सार्थक परिणाम नहीं आयेगा।हां,भ्रम में रहना जरुर शुरू हो जायेगा।नाम बड़े और दर्शन छोटे,सारे आचरण खोटे ही खोटे। जनमानस को बेवकूफ बनाने, जमीनी समस्याओं से जनमानस का ध्यान हटाने तथा वाहियात के कार्यों में जनमानस की ऊर्जा को व्यर्थ गंवाने के लिये यदि पुराने नामों की जगह पर नये नाम रखे जायेंगे,तो इसे धोखाधड़ी ही कहा जायेगा। इसे राष्ट्रघात ही कहा जायेगा। जनता -जनार्दन को यह लगते रहना चाहिये कि सिस्टम कुछ न कुछ विकास के काम कर रहा है। केवल इसके लिये भवनों, इमारतों,कार्यालयों,खेल मैदानों,खेल पुरस्कारों,साहित्यिक पुरस्कारों, संगठनों,विश्वविद्यालयों आदि के नाम बदलना राष्ट्र की जनता के साथ विश्वासघात है। अब्राहम की जगह पर मनु,जरथुष्ट्र की जगह पर श्रीराम,ईसा की जगह पर श्रीकृष्ण,महापद्मनंद की जगह पर चंद्रगुप्त मौर्य,सिकंदर की जगह पर समुद्रगुप्त,बाबर की जगह पर महाराणा सांगा, औरंगजेब की जगह पर शिवाजी, मैकाले की जगह पर ऋषि दयानंद, मैक्समूलर की जगह पर श्री अरविन्द तो होना ही चाहिये। लेकिन मनु,श्रीराम, श्रीकृष्ण, चंद्रगुप्त मौर्य,समुद्रगुप्त, महाराणा सांगा, शिवाजी, ऋषि दयानंद और श्री अरविन्द जैसे काम भी तो करके दिखलाओ।केवल खोखले वायदे करने और नाम बदलने से किसी प्रकार का कोई भी विकास नहीं होने वाला है। हां, कुछ समय के लिये जनमानस को बेवकूफ अवश्य बनाया जा सकता है।रावण का नाम राम करने से क्या रावण राम बन जायेगा?सूअर का नाम गाय रखने से क्या सूअर गाय बन जायेगा? बर्बादी का नाम विकास रख़ने से क्या बर्बादी विकास बन जायेगी?कालू नाम के व्यक्ति का नाम गौरा रखने से क्या कालू गौरा बन जायेगा?
इस्ट इंडिया कंपनी जब भारत आई तो अपने व्यापारिक ठिकानों की सुरक्षा के लिये उसने कयी दशकों तक अपनी प्राइवेट आर्मी बनाये रखी थी। भारत पर कब्ज़ा करने के पश्चात् उसने अन्य आर्मी का निर्माण किया था,जो व्यापारिक ठिकानों की सुरक्षा के साथ भारतीय राज्यों के शासकों के साथ युद्ध लडकर उनसे मनमाना व्यवहार करके लूट-खसोट करने लगी थी।इसी लूट-खसोट के बल पर ब्रिटेन का आर्थिक ढांचा खड़ा किया गया तथा दुनिया के अनेक देशों में युद्ध अभियान संपन्न किये गये।इस प्रकार की प्राइवेट आर्मी अब दोबारा से खडी हो रही हैं। बड़े बड़े उद्योगपति और कोरपोरेट घरानों ने अपनी निजी सेनाएं सुरक्षा एजैंसियों के नाम पर खडी करना शुरू कर दिया है।भारत में भी यह परंपरा फिर से शुरू हो गई है। भारतीय उद्योगपति और कोरपोरेट इस प्रकार की निजी सुरक्षा एजेंसियां खडी कर रहे हैं।अनेक बड़े बड़े कारखाने, बंदरगाह, खदानें और शिक्षा संस्थानों पर इस प्रकार की सुरक्षा एजेंसियों की तैनाती को देखा जा सकता है।यह फिर से ईस्ट इंडिया कंपनी जैसी कंपनियों की शुरुआत लगती है।सच तो यह है कि उद्योगपति और कोरपोरेट घरानों के लिये व्यापार मुख्य होता है। इनके लिये राष्ट्रवाद, राष्ट्रसेवा, राष्ट्र विकास और मानवीयता जैसे शब्दों का कोई मतलब नहीं होता है। इन्हें सिर्फ और सिर्फ अपने व्यापारिक हितों की चिंता होती है।इन व्यापारिक हितों के रास्ते में जो भी आता है,ये उसकी आवाज को दबाने के लिये किसी भी सीमा तक जा सकते हैं।इन पर मैक्यावली,मैकाले, मैक्समूलर,मिल और बैंथम आदि की विचारधारा हावी रहती है।एक समय ऐसा आता है कि ये सरकारी निर्णयों को भी प्रभावित करने लगते हैं। सरकारें इनके संकेतों पर नाचने लगती हैं। ठीक को गलत और गलत को ठीक सिद्ध करने के लिये ऐसे धनाढ्य लोग लोकतंत्र के चौथे खंभे प्रैस को भी अपने प्रभाव में कर लेते हैं।प्रैस भी इनकी कारगुजारियों पर खुलकर कुछ भी नहीं लिख सकता है।एक अवसर ऐसा आता है कि ऐसे लोग लूटेरी इस्ट इंडिया कंपनी का रुप धारण कर लेते हैं। क्योंकि आधुनिक विकास की वजह से विज्ञान और तकनीक का चमत्कारी विकास हुआ है, अतः ये लोग इस्ट इंडिया कंपनी से भी हजारों गुना अधिक खु़ंखार,जुल्मी, लूटेरे, भ्रष्ट,अत्याचारी और राष्ट्रविरोधी सिद्ध होते हैं। ध्यान रहे कि गुलामी कभी भी पुरानी वेशभूषा में नहीं आती है।गुलामी हर बार नयी वेशभूषा और नये ढंगों से आकर अपना नंगा नाच दिखलाती है।अंधभक्ति के आवेश में आकर अंधभक्त स्वयं तो बर्बाद होते ही हैं, इसके साथ - साथ अन्यों को भी लेकर डूबते हैं।तीसरी दुनिया के देशों में ऐसे ही हालात उत्पन्न हो गये हैं। लूटपाट और भ्रष्टाचार का समर्थन करने वाले अंधभक्त लोगों को बहुत बाद में यह मालूम होता है कि वो गुलाम बन चुके हैं। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।जो बर्बादी होनी होती है,वह हो चुकी होती है।अब पछताये होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत?
यह वास्तविकता है कि जिनको भी किसी राष्ट्र पर लंबे समय तक शासन करना होता है,उनको जनता -जनार्दन से शिक्षा का अधिकार छीन लेना पड़ता है। उनको जनमानस से दार्शनिकीकरण,तार्किकता, जिज्ञासा, प्रश्न करने की शक्ति छीन लेना पड़ता है। यदि लोग दर्शनशास्त्र,तर्कशास्त्र और विज्ञान जैसे विषयों की पढ़ाई- लिखाई करके वर्तमान में व्याप्त राजनीतिक अव्यवस्था पर प्रश्न चिन्ह लगायेंगे तो किसी राजा का शासन लंबे समय तक चल पाना असम्भव हो जायेगा।बस,इसीलिये धुर्त, लूटेरे,शोषक और तानाशाह किस्म के शासक सर्वप्रथम जनमानस को उपलब्ध शिक्षा के ढांचे पर चोंट करते हैं।जब लोग शिक्षित ही नहीं होंगे तो वो प्रश्न ही नहीं उठायेंगे। ऐसे में लंबे समय तक शासन करना संभव हो जाता है।इसके लिये मजहब, संप्रदाय,मत, विश्वास,जाति,भाषा, क्षेत्र आदि को केंद्र में रखकर बहुसंख्यकों की भावनाओं से खिलवाड़ करने को भी माध्यम बनाया जाता है।
संस्कृत में मनुष्य के लिये कहा गया है ' मननात् मनुष्य:' अर्थात् जो मनन करे,वह मनुष्य कहलाता है।जो मनन नहीं करता है, उसे मनुष्य नहीं कहा गया है।ऐसा व्यक्ति पशु समान है। ऐसा व्यक्ति क्योंकि अपने मन से मनन करके तथा बुद्धि से निर्णय करने की अपेक्षा दूसरे के संकेतों पर चलकर जीवन यापन करता है।इसीलिये उसे पशु कहा गया है।वह पाश से बंधा हुआ होता है।वह दूसरों के बतलाये गये,सुझाये रास्तों पर चलता है। जैसे पशु दूसरों के संकेतों पर गुलामी का जीवन जीता है।वेद की शिक्षा है कि 'मनुर्भव'। लेकिन ऐसे व्यक्ति तो मनुष्य बनने की राह से भटके हुये होते हैं।शोषक धर्माचार्यों, तानाशाह शासकों और सस्ते मजदूर चाहने वाले उद्योगपतियों को तार्किक विश्लेषण करके निर्णय पर पहुंचने वाले नागरिक नहीं चाहियें। ऐसे नागरिक राष्ट्र में किसी भी स्तर पर मौजूद कमियों और अव्यवस्था पर प्रश्न उठाते हैं।भारत सहित यूरोप,अमरीका,रुस,चीन आदि सभी देशों में मौजूद उपरोक्त तार्किक किस्म के लोग सदैव स्थापित भ्रष्ट राजसत्ता, मजहबसत्ता और धनसत्ता के लिये खतरा बने रहते हैं।
उन्नीसवीं सदी में धार्मिक स्तर पर व्याप्त पाखंड, ढोंग और गुरुडम पर प्रश्न उठाने पर ऋषि दयानंद के साथ कैसा दुर्व्यवहार किया गया? राजनीतिक, आर्थिक, व्यापारिक और चिकित्सीय स्तर पर व्याप्त भ्रष्टाचार और लूटपाट पर प्रश्न करने पर राजीव भाई दीक्षित के साथ क्या किया गया?योग,अध्यात्म,मजहब,संप्रदाय, राजनीति,शिक्षा,राष्ट्रवाद की आड़ में चल रहे छल,प्रपंच और दिखावे पर प्रश्नचिन्ह लगाने पर ओशो रजनीश के साथ भारत सहित समस्त संसार के देशों ने किस प्रकार से जुल्म किये? उपरोक्त उदाहरण अधिक पुराने नहीं हैं। प्रश्न उठाने वालों से सभी भय खाते हैं।इसीलिये एक विचारक,चिंतक या दार्शनिक के चारों तरफ कुछ भी निश्चित नहीं होता है। स्थापित व्यवस्था उसके कारण अस्त-व्यस्त हो जाती है।या तो संसार के धर्माचार्य, नेता और पूंजीपति सुधर जायें या फिर अव्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह लगाने वाले प्रबुद्ध लोग इसी तरह से असमय मारे जाते रहेंगे।
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डॉ. शीलक राम आचार्य
दर्शनशास्त्र- विभाग
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय
कुरुक्षेत्र-136119
आज की नेतागिरी
आज की नेतागिरी
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छल- प्रपंच न निज आये चरित्र में।
इर्ष्या - द्वेष नहीं भरे हों भीतर में।।
नेता बनने में सबसे बड़ी बाधा है।
उपरोक्त गुणों को अभी नहीं साधा है।।
वायदों की झड़ी लगाने का दम हो।
झूठ बोलने का साहस हरदम हो।।
कहीं गई बात से पलटने की कला।
ऐसा व्यक्ति नेता क्यों न बने भला।।
बात- बात पर अहंकार प्रदर्शन हो।
कभी पद्मासन, कभी शीर्षासन हो।।
कुटिल हंसी हंसने में पूरा प्रवीण हो।
चरित्र -चाल- चलन जीर्ण- शीर्ण हो।।
राजनीति में प्रवेश बेशक कर दो।
भूख- भय- बिमारी भरपूर डर दो।।
गिरगिट से ले लो बस रंग बदलना।
शियार लोमड़ी से छलपूर्वक चलना।।
घाघ नेता तुम शीघ्र बन जाओगे।
राष्ट्रप्रसिद्ध अवश्य ही कहलाओगे।।
चलकर आयेंगे खुद ही पुरस्कार।
प्रतिभावानों की गर्दन होकर सवार।।
अभी इतना जल्दी नहीं करना है।
पुलिस गीदड़ भभकी नहीं डरना है।।
धरना प्रदर्शन तोड़फोड़ भी जरुरी।
नेता बनने के लिये यह भी मजबूरी।।
खामखां के सभी मुद्दों को उठाओ।
जनता-जनार्दन भाषण भड़काओ।।
विरोधियों की कमियों को गिनाओ।
अपनी तो बस खुबियां ही बतलाओ।।
फिर भी लोग यदि नहीं आते हों।
तुम्हारे पास आने से घबराते हों।।
जाति-मजहब की बारूद को लाओ।
वैमनस्य की उसमें अग्नि सुलगाओ।।
इससे भी काम यदि नहीं बनता हो।
बातों को कोई भी नहीं सुनता हो।।
पूजा-स्थलों पर मांस फिंकवा दो।
एक दो मजहबी पुस्तक जलवा दो।।
एक ही झूठ को बार-बार दोहराओ।
सौ -सौ बार जोर-जोर से चिल्लाओ।।
भीड़ अवश्य ही एकत्र होने लगेगी।
छुक छुक राजनीति की गाड़ी चलेगी।।
अभी तो तुम्हारी बस शुरुआत है।
ऐसी कोई विशेष बनी नहीं बात है।।
बहुत दांव-पेंच अभी सीखने बाकी।
बड़े-बड़ों के नाक कान काटो ताकि।।
धोखाधड़ी व आवश्यक चापलूसी।
मित्र,प्यारे और दुश्मन कानाफूसी।।
निज रहस्य किसी को न बतलाना।
दूसरों के रहस्य सबको ही जनाना।।
रुपवती नवयौवनाओं के संग-संग।
महसूस करना भोग-विलास-उमंग।।
भीतर,भीतर ही यह सब करना है।
नैतिक रुप से कभी नहीं सुधरना है।।
मुंह फेर लेना काम निकालकर।
गरीब की कभी न संभाल कर।।
धन-दौलत खर्च वैभव विलास।
बाप पर भी नहीं करना विश्वास।।
फ्री में किसी का काम न करना।
भ्रष्टाचरण में प्रतिदिन उभरना।।
कमीशनखोरी समझना अधिकार।
लूट-खसोट करते रहना हर प्रकार।।
करनी -कथनी में रखना भेदभाव।
शराब-शबाब-कबाब भोगना चाव।।
त्राहि-त्राहि जनता जनार्दन करती।
कल मरती है बेशक आज मरती।।
मंचों से जनमानस बरगलाना।
ऊंचे -ऊंचे सपने बहुत दिखलाना।।
धरातल पर कोई काम नहीं करना।
चलता रहेगा जन्मना मरते जाना।।
जब भी राजनीति धीमी पड़ जाये।
लोगों की रीढ खड़ी हो अकड़ जाये।।
नये-नये लोकलुभावन प्रपंच रचना।
अंधभक्तों की अंधभक्ति परखना।।
राजनीति कभी सेवा मत जानना।
भोली जनता टैक्स भार तानना।।
माई़ंडवाश लोगों का करते जाना।
दुर्व्यवहार फिर कोई भी मनमाना।।
विधायक और सांसद तोड़फोड़।
अकड़ वालों की दूर करना मरोड़।।
जो कोई भी रस्ते की बनता बाधा।
काट- छांट कर करना उसे आधा।।
राजनीति,जंग,प्रेम में सब जायज।
होता नहीं यहां कुछ भी नाजायज।।
अंधेर नगरी और चोपट सा राजा।
टके सेर भाजी और टके सेर खाजा।।
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डॉ.शीलक राम आचार्य
वैदिक योगशाला
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