मैनीफैस्टेशन करने और करवाने वालों की सोशल मीडिया पर भीड़ लगी हुई है। इसके माध्यम से जीवन और जगत् में कुछ भी भौतिक, मानसिक और आध्यात्मिक मिलने के लिये प्रलोभन दिये जा रहे हैं। मैनीफैस्टेशन किया और चमत्कार हो गया - ऐसी तसल्ली दी जा रही है। हालांकि यदि यह बात पूरी तरह से सच होती तो सर्वप्रथम मैनीफैस्टेशन करवाने वाले अपने आपको ही करोड़पति/अरबपति बना लेते।जिस तरह से मैनीफैस्टेशन के संबंध में प्रचार किया जा रहा है,अब तक उसका अभ्यास करके ये खुद ही विधायक, सांसद, कुलपति, एसपी, आईएएस बन जाते। इसके अभ्यास द्वारा ये खुद ही दयानंद, विवेकानंद,ओशो, कृष्णमूर्ति,प्रभुपाद, श्रीराम शर्मा आचार्य, जग्गी वासुदेव, रामदेव आदि बन जाते। दूसरे टाटा, बिड़ला,अडानी, अंबानी, गोदरेज,जिंदल आदि को पैदा करके सिद्ध करो। गांधी, नेहरू, सुभाष,पटेल, इंदिरा आदि को बनाकर दिखलाओ। मैनीफैस्टेशन के माध्यम से नये- नये आविष्कार करने का दावा करने वाले पाश्चात्य जगत् ने अनेक दूसरे मैस्मर, निकोला टेस्ला, मर्फी एटकिंसन ,गोडार्ड, हिल, वाटेल्स, हार्नेल, बर्न, हिक्स, डिस्पेंजा,वेन,प्राक्टर,डायर आदि पैदा क्यों नहीं कर लिये? मैनीफैस्टेशन के द्वारा दूसरे डार्विन,आइंस्टीन, मैक्स प्लांक, न्यूटन, क्यूरी, पाश्चर आदि पैदा करके दिखलाओ।जिस प्रकार से मैनीफैस्टेशन को प्रचारित किया जा रहा है,वह धंधा अधिक और सृजन कम है। यदि यह सब करना संभव नहीं है तो मैनीफैस्टेशन से चमत्कार संभव करने वालो को पकड़ो और उन पर कार्रवाई करवाओ। एकाग्रता से हिप्नोसिस या निर्विचारता आदि पैदा करके मैनीफैस्टेशन से अस्तित्व को पुकार लगाकर चमत्कार करके दिखलाओ। यदि अपने आपको तार्किक चिंतन, तार्किक बुद्धि, वैज्ञानिक बुद्धि और तार्किक सोच का समर्थक और प्रचारक कहते हो,तो मैनीफैस्टेशन के द्वारा यह सब सिद्ध करके दिखलाओ। आज तक जो बड़े-बड़े दार्शनिक, विचारक, वैज्ञानिक, काउंसलर , मनोवैज्ञानिक, साहित्यकार, आविष्कारक, अन्वेषक, नेता, सुधारक, धर्माचार्य,संत, मुनि , योगी आदि हुये हैं; वो हो सकता है कि किन्हीं अन्य कारणों से प्रसिद्धि को प्राप्त हुये हों।हो सकता है कि उन्होंने मैनीफैस्टेशन की बजाय अपने जीवन में प्रसिद्धि की ऊंचाई को किन्हीं अन्य योग्यताओं, संभावनाओं और विशेषताओं से अर्जित किया हो।
Acharya Shilak Ram The Writer
आर्यावर्त चिंतन भारतीय दर्शन, सांस्कृतिक विमर्श और राष्ट्रचेतना पर केंद्रित एक वैचारिक एवं शोधपरक डिजिटल मंच है। यह मंच आचार्य शीलक राम जी के वैदिक-दार्शनिक चिंतन, सांस्कृतिक विश्लेषण और समकालीन सामाजिक-राजनीतिक प्रश्नों पर आधारित दृष्टिकोण को सुव्यवस्थित रूप में प्रस्तुत करता है। यहाँ प्रस्तुत सामग्री में — * भारतीय दार्शनिक परंपराओं का विश्लेषणात्मक अध्ययन * आधुनिक शिक्षा और नैतिक विमर्श का आलोचनात्मक परीक्षण * राष्ट्र और समाज से संबंधित जटिल प्रश्नों का तर्कसंगत विवेचन * परंपरा और आधुनिकता
Thursday, November 5, 2026
मैनीफैस्टेशन के रहस्य को श्रीमद्भगवद्गीता से जानें (Learn the secret of manifestation from the Bhagavad Gita)
श्रीमद्भगवद्गीता के इस श्लोक को यदि ध्यान से समझ लिया जाये तो सोशल मीडिया पर मौजूद मैनीफैस्टेशन करवाने वालों की भीड़ का भांडाफोड हो जाये। लेकिन हमारे यहां तो पाश्चात्य कूड़ा-कर्कट पर अंधभक्ति करने का बुखार चढ़ा हुआ है। श्लोक का अवलोकन कीजिये -
सत्त्वानुरुपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत।
श्रद्धामय: अयं पुरुषो यो यच्छृद्ध: स एव स:।।(17/3)
इसमें कहा गया है कि हरेक मनुष्य की श्रद्धा उसके अंतःकरण के अनुरूप होती है। जैसे संस्कार उसके चित् पर मौजूद हैं, उसके अनुरूप उस व्यक्ति की श्रद्धा निर्मित होती है। मनुष्य का निर्माण उसकी श्रद्धा यानी उसके स्वभाव यानी उसके संस्कारों के अनुसार होता है।जैसे संस्कार, वैसा ही व्यक्ति।जैसे संस्कार,वैसी श्रद्धा। जैसे संस्कार, वैसा व्यक्तित्व। फिर आगे उस श्रद्धा को महर्षि वेदव्यास ने सात्विक, राजसिक और तामसिक प्रकार की कथन किया है।इस श्लोक की व्याख्या करते हुये शंकराचार्य,रामानुजाचार्य, श्री अरविन्द, ओशो रजनीश आदि सभी ने यह कहा है कि मनुष्य जो कुछ भी आज है; वह अपने संस्कारों, भावनाओं, विचारों, अनुभवों, स्मृतियों आदि का संग्रहमात्र है। और ये सब उस मनुष्य के चित्त के गहरे तलों पर मौजूद हैं। इनसे स्वतंत्र होकर सोचना,विचारना, चिंतन करना,भाव करना, कल्पना करना तथा मैनीफैस्टेशन आदि करना इतना सरल नहीं है, जितना सरल सोशल मीडिया पर मौजूद मैनीफैस्टेशन करवाने वाले, काउंसलर,हीलर, हिप्नोटिस्ट और मनोचिकित्सक बतला रहे हैं।निज प्रकृति के विरोध में जाकर कुछ भी करना इतना सहज नहीं होता है। मनुष्य अपनी प्रकृति को साथ में लेकर जन्मता है। प्रकृति के बंधन को तोड़कर इसकी कारागार से बाहर आना केवलमात्र गहरे योगाभ्यास से ही संभव हो सकता है।ऐसा नहीं है कि श्वास को धीमा करके, किसी भी अनाप-शनाप विचार का रिपीटेशन करके, कल्पना करके,विज्युलाईजेशन करके और इसके साथ स्वयं के अहसास को जोड़ने से यह संभव हो जायेगा। यदि यह सब करना इतना सरल और सहज होता तो कोई भी ऐसा करके कुछ भी सफलता, पद, प्रतिष्ठा, प्रसिद्धि आदि पा लेता। इसके विज्ञान को यदि श्रीमद्भगवद्गीता, योग वाशिष्ठ, अष्टावक्र गीता और योगसूत्र के अनुसार समझा जाये,तो अनेक रहस्यों का उद्घाटन हो सकता है।
दर्शनशास्त्र दर्शनशास्त्र होता है (Philosophy is Philosophy)
Wednesday, November 4, 2026
पतंजलि, गोरखनाथ, स्वात्माराम, घेरंड और श्रीनिवासभट्ट द्वारा प्रदत्त प्राणायाम का बिगडता स्वरूप : एक विवेचना
1.)योगाभ्यास की हरेक परंपरा में प्राण के महत्व को स्वीकार किया है।प्राण की उपेक्षा करके योगाभ्यास की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। विभिन्न संप्रदायों में योगाभ्यास की सैकड़ों पद्धतियां विद्यमान हैं। अब्राहमिक कल्चर के अंतर्गत पारसी, यहुदी,ईसायत, इस्लाम तथा इनसे प्रेरित विभिन्न मतों में योगाभ्यास की अवधारणा मौजूद नहीं है।भारत में भी पिछले 100-150 वर्षों के दौरान केवल किसी गुरु द्वारा नामदान आदि से मुक्ति की अवधारणा पर चलने वाले पचासों मत पैदा हो गये हैं। इनके लिये किसी अनुशासन,संयम,तप, योगाभ्यास,आहार -विहार आदि की कोई आवश्यकता नहीं है।बस किसी ढोंगी, अपराधी,जेल की सजा काट रहे तथाकथित स्वघोषित संत से नामादि ले लो। फिर कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं है। इनमें से हरेक स्वघोसित संत के लाखों की संख्या में चेले -चेलियां मौजूद हैं। इन्होंने खुद को परमात्मा मानकर पूजवाना शुरू कर दिया है।
2.)सनातन- धर्म में ऐसा कभी भी नहीं होता है। इसमें आचरण,संयम, त्याग, तपस्या, अनुशासन, आहार- विहार,निद्रा,दिनचर्या,ऋतुचर्या आदि सबका महत्व होता है। भारत में अब्राहमिक शैली पर चलने वाले पचासों मत पैदा हो गये हैं।ये वास्तव में सभी के सभी नास्तिक हैं।ये संसार को संचालित करने वाली किसी शक्ति को न मानकर बस अपने गुरु को ही परमात्मा मानते हैं।इनकी कोई न कोई बांसुरी या शब्द वाणी या पुस्तक या गुरु पूजन पद्धति या नामदान विधि या मंत्र या धुन या तीर्थ -स्थली आदि अवश्य होते हैं। इन सबने सनातन धर्म से ही कोई श्लोक या शिक्षा या पंक्ति चोरी करके अपने अपने पंथों का अलग से निर्माण किया हुआ है। क्योंकि अलग से अपनी पंथिक दुकानदारी चलाना है, इसलिये सनातन धर्म के विरोध में बोलना इन सबमें सामान्यतः पाया जाता है। बारहवीं से लेकर सत्रहवीं सदी के कालखंड में कबीर,दादू,नानक आदि संतों ने सनातन धर्म की रक्षा करने के लिये उत्तम प्रयास किये थे, लेकिन उन्नसवीं -बीसवीं सदी के कालखंड में इन्होंने संत, गुरु, सद्गुरु आदि पदवियों की आड़ लेकर सनातन -धर्म को तो कमजोर किया ही, इसके साथ राष्ट्रवासियों से उनके बल,पौरुष,क्षत्रियत्व और राष्ट्र -रक्षा के जज्बे भी समाप्त करने का काम किया है। इन्होंने उन धूर्त और विश्वासघाती विदेशी हमलावरों के साथ आये धर्मांध मिशनरियों के सामने एकतरफा प्रेम, सौहार्द और भाईचारे के गीत गाते रहकर भारतवर्ष को एक आसान टारगेट बनाने का काम किया है।आज भी ये वहीं कर रहे हैं। इनको दुश्मनों की पहचान बिल्कुल भी नहीं है।
3.)संत परंपरा के अधिकांश गुरुओं ने राजयोग,हठयोग,तंत्रयोग में मौजूद विभिन्न शुद्धिकरण योगाभ्यास आदि का खंडन इसलिये किया था, क्योंकि इसकी आड़ में शोषण शुरू हो गया था। वास्तव में उनके मन में इन सबके प्रति भरपूर सम्मान मौजूद था।बाद के तथाकथित नकली गुरुओं ने उपरोक्त संतों की आधी बात को पकड़ लिया और आधी को छोड़ दिया।आज भी यह पागलपन चल रहा है। कुछ अपवादों को छोड़कर बारहवीं सदी से लेकर इक्कीसवीं सदी के कालखंड में मौजूद रहे किसी भी सद्गुरु या संत या फकीर या नामदानी गुरु ने अफगान,तुर्क,मुगल,मंगोल, फ्रांसीसी,ब्रिटानी हमलावरों से यह पूछने का दुस्साहस नहीं किया कि आप अपने देश में जाकर क्यों नहीं रहते हो-आप हमारे देश में आकर शासन क्यों कर रहे हो -आप हमारे लाखों वर्षों पुरातन सनातन धर्म और संस्कृति को नष्ट करने पर क्यों लगे हो- हमारे भारत पर हम शासन करेंगे,तुम विदेशी नहीं? एकतरफा भाईचारे, सौहार्द,प्रेम, करुणा और भक्ति की पीपनी बजाते रहे। उनके पदचिन्हों पर चलने वाले आजादी के पश्चात् भारत में पचासों तथाकथित संत मौजूद हैं।इनकी विभिन्न सरकारों, पूंजीपतियों से सांठगांठ रहती आई है। ये नेताओं के लिये एकमुश्त वोट का इंतजाम करते हैं तो नेता इनके लिये जैड सुरक्षा सहित अनेक सुविधाएं प्रदान करते हैं।ये कभी भी किसान, मजदूर और बेरोजगार युवाओं के समर्थन में नहीं खड़े हुये हैं। इन्होंने कभी भी भ्रष्टाचार के विरोध में आंदोलन नहीं किये हैं।धर्म, नैतिकता, अनुशासन,विवेक, जागरुकता और होश जैसा इनके पास कुछ भी मौजूद नहीं होता है।ये पूरी तरह से करोड़ों लोगों का एक साथ माईंडवाश करके नेताओं के लिये वोट का जुगाड करने का साधन बनकर रह गये हैं। राष्ट्रभक्ति, राष्ट्रप्रेम और राष्ट्र बलिदान जैसा इनमें कुछ भी नहीं होता है।
4.) संत परंपरा के सैकड़ों गुरु लोग यदि राजयोग के प्राणायाम के साथ हठयोग के प्राणायाम की साधना को भी स्वीकार करके अपने अनुयायियों को तैयार करते तो भारत बहुत शीघ्र स्वतंत्र हो जाता। बौद्ध मतानुयायियों की विनाशकारी उन्मुक्त भोगवादी जीवन-शैली से भारतीयों को सावधान करके नाथ परंपरा के नाथों ने सनातन भारतीय योगानुसार मौजूद राजयोग के साथ हठयोग की प्राणायाम प्रणाली को भी भरपूर महत्व प्रदान करके भारत की युवाशक्ति को जहां सत्य योगाभ्यास में लगाया था, वहीं पर सैनिक शक्ति को खड़ा करने में भी मदद की थी। इन्होंने बलिष्ठ भुजदंड वाले राष्ट्ररक्षक लाखों सैनिकों को भी तैयार करने में मदद की थी। अपने दुश्मनों से एकतरफा शान्ति,सह- अस्तित्व, संतुलन,प्रेम, करुणा,सर्वपंथसमभाव और भाईचारे की बातें करने की प्रवृत्ति ने भारत को दुनिया का सबसे अधिक असुरक्षित राष्ट्र बनाने में सहायता की है।
5.)प्राणायाम करने की कुंभक वाली शैली और आते -जाते -रुकते प्राण को सिर्फ देखते रहने की शैली परस्पर जुड़ी हुई हैं।ये एक -दूसरे की विरोधी न होकर परस्पर पूरक हैं।बिना कुंभक किये प्राण को साक्षीभाव से देखते रहकर विचार,मन, अहंकार, बुद्धि,चित्त तक की यात्रा नहीं हो सकती। ऐसा व्यक्ति कभी भी अपने आत्मस्वरुप में स्थित नहीं हो सकता है। यदि देह में अस्थिरता या कोई किसी प्रकार की दिक्कत हो,तो व्यक्ति देह में ही अटका रहेगा। उसके लिये देह से पार जाना असंभव हो जाता है। ठीक इसी तरह यदि श्वास-, प्रश्वास में कोई दिक्कत हो,तो भी साधक का सर्वप्रथम अपने श्वास- प्रश्वास को ठीक करना आवश्यक होता है।इसको किये बगैर कोई भी साधक श्वास- प्रश्वास से आगे नहीं जा सकता।वह श्वास प्रश्वास पर ही अटका रहेगा। इससे उसकी देह भी अनेक रोगों से ग्रस्त हो जायेगी।भारत में देह को निरोग रखने के लिये आसन, व्यायाम और युद्धक कलाओं का विकास किया गया है।श्वास -प्रश्वास को ठीक करने के लिये प्राणायाम का विकास किया गया है।इन दोनों यानी देह और श्वास -प्रश्वास वाले हिस्सों को संतुलित,सही और आत्मस्थ होने के योग्य बनाने के लिये प्रयास और अप्रयास वाली विधियों का प्रयोग लाखों वर्षों से होता आ रहा है।केवल प्रयास या अप्रयास वाले हिस्से को पकड़कर बैठ जाना खतरनाक सिद्ध होता है।
6.)यदि कोई व्यक्ति शारीरिक व्यायाम, खेलकूद, परिश्रम,सैर या अन्य शारीरिक हरकतें नहीं करेगा,तो उसके शरीर का बिमारियों का घर बन जाना अवश्यंभावी है। केवल इसलिये योगाभ्यास के अंतर्गत विभिन्न प्रकार के आसनों और मार्शल आर्ट्स का विकास किया गया है। ठीक इसी तरह ही श्वास और प्राण के शरीर में भरपूर मात्रा मात्रा होने को सुनिश्चित करने के लिये विभिन्न प्रकार के प्राणायाम का विकास हुआ है।इन प्राणायामों में रेचक,पुरक के साथ कुंभक का सर्वाधिक महत्त्व होता है। योगाभ्यास करने के अनिच्छुक और चेले -चेलियों की भीड़-भाड़ बढ़ाने में रुचि रखने वाले तथाकथित गुरुओं ने प्राणायाम में 'कुंभक' का विरोध करके केवल श्वास- प्रश्वास को देखते रहने पर जोर दिया है।इसे किसी ने सहजयोग,किसी ने लययोग, किसी ने प्राणापान, किसी ने आनापानसति, किसी ने विपस्सना तथा किसी ने अन्य बेढंगे और अव्यावहारिक नामों से संबोधित किया है। स्वयं सिद्धार्थ बुद्ध ने कयी योगाचार्यों,सांख्याचार्यों और हठयोगाचार्यों के मार्गदर्शन में योगाभ्यास करके निर्वाण को प्राप्त किया था। लेकिन उनके देहावसान
के पश्चात् उनके अनुयायियों ने अज्ञानता या जानबूझकर वास्तविक योगाभ्यास को तिलांजलि देकर एकतरफा आनापान और विपस्सना जैसी विधियों पर जोर देकर युवाशक्ति के जोश को ठंडा करके सैनिक शक्ति के रूप में भारतवर्ष को कमजोर और आलसी बनाने में मदद की। भारतवर्ष सैनिक शक्ति के रूप में उसी समय से कमजोर होना शुरू हो गया था।सैनिक शक्ति के रूप में कायरता,भगौडेपन,पलाययनवाद की तरफ जाने का बीजवपन तभी हो गया था।हालांकि सनातनधर्मी और स्वयं बौद्ध शासकों ने इन शिक्षाओं की उपेक्षा करके सैनिक शक्ति के रूप में युवाशक्ति को इस प्रकार की एकतरफा योग विधियों से दूरी बनाने की कोशिशें जारी रखी थीं। लेकिन बाद में बौद्ध शासक भी इस बिमारी से नहीं बच पाये और इसी के परिणामस्वरूप विदेशी हमलावरों का सामना नहीं कर पाने की वजह से भारत में बौद्ध मत के विनाश का कारण भी बने। सनातनधर्मी शासकों ने इस प्रकार की बेतुकी शिक्षाओं से दूरी बनाकर रखी थी, इसलिये वो बहादुरी से विदेशी हमलावरों का आखिरी तक बहादुरी से सामना करते रहे थे। लेकिन जो नुकसान युवाशक्ति में पौरुष और बल को बढ़ाने वाली बौद्ध भिक्षुओं की आनापान,विपस्सना और उन्मुक्त भोग विलास की तांत्रिक विधियों ने किया था,उसका कुछ प्रभाव तो सनातनधर्मी शासकों और युवाशक्ति पर पड़ना ही था। आदि शंकराचार्य के पश्चात् उनके अद्वैतवादी आचार्यों में इस संसारविरोध की पलायनवादी बिमारी ने प्रवेश कर लिया।बाद में इसका प्रभाव बहुत से संतों पर भी पड़ा था। एकतरफा भिक्षुवाद के रूप में संसार विरोध,संन्यास,निवृत्तिवाद ,मायावाद आदि तथा अपने दुश्मनों को नहीं पहचानकर एकतरफा आदर्शवादी मूल्यों करुणा, सौहार्द,प्रेम और भाईचारे का प्रभाव ऊपर वर्णित पचासों समकालीन तथाकथित गुरुओं और भारतीय राजनीतिक परिवेश पर पूरी तरह से मौजूद है।
7.) योगाभ्यास में राजयोग, तंत्रयोग, हठयोग के अंतर्गत कुंभक की उपेक्षा करने और स्वाभाविक रूप से चल रही श्वास का अवलोकन करते रहने की एकतरफा शिथिलीकरण की विधियों ने भारत को नपुंसक, कमजोर, नाकारा और पाखंड बनाकर रख छोड़ा है।इस समय भी अधिकांश योगाचार्य, योग-शिक्षक,नामदानी तथाकथित गुरु तथा अष्टावक्र गीता,श्रीमद्भगवद्गीता और सांख्य को मानने वाले आचार्य लोग योगाभ्यास के अंतर्गत प्रामाणिक पातंजल प्राणायाम (बाह्यवृत्ति,आभ्यंतरवृत्ति,स्तंभ शवृत्ति, बाह्याभ्यन्तरविषयाक्षेपी) तथा प्रामाणिक हठयौगिक प्राणायाम
(रेचक पुरक कुंभक) की घोर उपेक्षा कर रहे हैं। इसलिये योगाभ्यास के कोई रुपांतरणकारी परिणाम नहीं आ पा रहे हैं। शारीरिक ,मानसिक और भावनात्मक तल पर बिमारियों और बिमारों की संख्या दिन दोगुनी और रात चोगुनी बढ़ोतरी हो रही है।'कुंभक' के माध्यम से शरीर में प्राण -ऊर्जा को बढ़ाकर जहां पर शरीर और मन को मजबूती प्रदान करना है, वहीं पर यह आत्मसाक्षात्कार में भी भूमिका तैयार करता है।हठयोगी श्रीनिवासन भट्ट हठरत्नावली में कहते हैं -
विचित्र कुंभकाभ्यासात् विचित्रां सिद्धिमाप्नुयात्।।(2/4)
अर्थात् कुंभक के अभ्यास से योगाभ्यास में ऊंचाईयां आनुभूत होती हैं।
8.) महर्षि घेरंड ने घेरंड संहिता में आठ प्राणायामों को कुंभक के भेद कहा है -
सहित: सूर्यभेदश्च उज्जायी शीतली तथा। भस्त्रिका भ्रामरी मूर्च्छा केवली चाष्टकुंभका:।।
अर्थात् सहित, सूर्यभेदी,उज्जायी,शीतली, भस्त्रिका, भ्रामरी,मूर्च्छा,केवली- ये आठ कुंभक हैं।
हठयोगप्रदीपिका में स्वात्माराम योगी कुंभक के महत्व को समझाते हुये कहते हैं -
तत्र सिद्धये विधानज्ञाश्छित्रान्कुर्वंति कुंभकान।
विछित्र कुंभकाभ्यासाद्विछित्रां सिद्धिमाप्नुयात्।।(2/43)
अर्थात् प्राणायाम के विधान को जानने वाले योगी योगाभ्यास में आगे बढ़ने के लिये विभिन्न प्रकार के कु़भकों का अभ्यास करते हैं।इन विचित्र प्रकार के कु़भकों के अभ्यास से योगी साधक योग में सिद्धि प्राप्त करते हैं।
9.)आज से साढ़े पांच हजार वर्षों पहले महर्षि पतंजलि 'योगसूत्र' में कुंभक के संबंध में कहते हैं -
बाह्याभ्यांतरस्तंभवृत्तिर्देशकालसंख्याभि: परिदृष्टो दीर्घसुक्ष्म:।।(2/50)
अर्थात् देश,काल, संख्या का ध्यान रखते हुये बाह्यवृत्ति, आभ्यंतरवृत्ति,स्तंभवृत्ति प्राणायाम के अभ्यास से प्राण सूक्ष्म,लंबा,सहज और शिथिल हो जाता है। इसके करने से मन शांत होने लगता है। विचारों के भंवर उठना बंद हो जाता है।इस सूत्र में बाह्य कुंभक,अंत: कुंभक और कहीं भी कुंभक को देश,काल,संख्या के गणित से करने के माध्यम से मन पर नियंत्रण को समझाया गया है।
10.) आज भारत के सैकड़ों विश्वविद्यालयों में स्थित योग- विभागों, सैकड़ों प्रसिद्ध योग- आश्रमों तथा हजारों छोटे स्तर के योग -केंद्रों में जहां आसनों को व्यायाम और एक्सरसाइज की तरह किया और करवाया जा रहा है, वहीं पर विभिन्न प्राणायामों को डिप ब्रीदिंग की तरह किया और करवाया जा रहा है।इस प्रकार से आसनों और प्राणायामों का अभ्यास शास्त्रीय मर्यादा के प्रतिकूल है।इस तरह से अभ्यास करने से लाभ की बजाय हानि अधिक हो रही है।मन को शांत करने या मन को साक्षीभाव से देखना कभी भी संभव नहीं होगा। जो थोड़ा -बहुत इससे प्राण -ऊर्जा का जागरण होता है,वह भी जनमानस की नकारात्मकता में बढ़ोतरी करके हिंसक कृत्यों को बढ़ाने में सहयोगी बन रहा है।इस तरह के शास्त्रविरोधी योगाभ्यास से मनुष्य के शरीर,प्राण, विचार,मन,भाव आदि स्तरों पर विकृति उत्पन्न होकर उसे आत्मस्थ होने से रोक रहा है। इससे मानसिक तनाव,चिंता, घृणा, द्वेष, इर्ष्या, कामुकता, बदले की भावना और हिंसक वृत्तियों में वृद्धि होती जा रही है। शांति, संतुष्टि,संतुलन,सौहार्द, प्रेम,करुणा , भाईचारा और संवेदनशीलता को प्राप्त होना तो बहुत दूर की बात हो जाती है। इससे जहां पर जनमानस का आध्यात्मिक, भावनात्मक,आर्थिक शोषण हो रहा है; वहीं पर योगाश्रमों और योगाचार्यों के व्यापार में हजारों गुना बढ़ोतरी हो रही है। ऋषि प्रदत्त योग और योगाभ्यास की बदनामी का माध्यम उपरोक्त तंत्र बनता जा रहा है।इस रोकथाम होना चाहिये। इसके लिये शास्त्रीय मानकों पर आधारित योग और योगाभ्यास को प्रचलन में लाया जाना आवश्यक है।यह आश्चर्यजनक है कि शास्त्रीय योग और योगाभ्यास के प्रचार -प्रसार में उपरोक्त तथाकथित योगाचार्य और योगशिक्षक ही अधिक जिम्मेदार हैं।
.........
डॉ. शीलक राम आचार्य
दर्शनशास्त्र -विभाग
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय
कुरुक्षेत्र-136119
Monday, July 6, 2026
धर्म नियम सर्व सृष्टि
धर्म नियम सर्व सृष्टि
.........
यहां क्या नहीं धंधा
हर कोई बना अंधा।
सब धंधा कर रहे हैं
भ्रष्टाचरण दे कंधा।।
बड़ा धंधा काव्य है
अनर्गल संभाव्य है।
बेचने को उत्सुक
हवा हवाई वायव्य है।।
यहां बिक रही शिक्षा
धंधा हो चुकी परीक्षा।
शोध सरेआम बिकता
लुप्तप्राय है अन्वीक्षा।।
धंधा थिसिस लिखना
बिना किसी परखना।
उच्च-शिक्षित बिक रहे
कहीं भी नहीं है मना।।
प्यार प्रेम भी बिक रहे
बस धोखेबाज टिक रहे।
लिव-इन रिलेशनशिप
समलिंगी भी ठीक रहे।।
यहां क्या नहीं बिकाऊ
कोई संबंध नहीं टिकाऊ।
दोस्ती बिकती हर कदम
अधिकांश बने हुये खाऊ।।
हर कोने में दुकान है
बिक रहा श्मशान है।
कफ़न भी बना धंधा
सम्मान भी सामान है।।
राजनीति धंधा बनी
सबसे बड़े यही धनी।
सरेआम खरीदारी हो
खरीद लो देकर मनी।।
बिक रहे न्यायाधीश
न्याय मिले बख्शीश।
बोली लगती सरेआम
धन दौलत परवरिश।।
यौवन बिकता बाजार
पूरी मददगार सरकार।
जो चाहो वही मिलेगा
काला गौरा हर प्रकार।।
रिश्ते-नाते भी धंधा बने
रहें नजदीकी जले-भुने।
कौन नहीं बिका लालच
अहंकार भरे हुये अपने।।
धंधा बनी योग-साधना
भगवान् बन आराधना।
लेकिन 'योग' नहीं धंधा
विवेक होश जब जागना।।
गुण-दोष न्याय करना
तर्क प्रमाण पथ गुजरना।
सबको एक लाठी हांककर
मतना पाप का घट भरना।।
धर्म कभी धंधा न होता
सार्वभौमिक ऋत गोता।
धर्म की आड़ ले मजहब
पंथ, रिलीजन को ढोता।।
धर्म नियम सर्व -सृष्टि
न्यायपूर्णता की दृष्टि।
वाद,मत की कट्टरता
धंधा बांध निज मुष्टि।।
.......
डॉ. शीलक राम आचार्य
वैदिक योगशाला
तर्क, विचार, चिंतन पर हावी होते हुये अंधविश्वास और अंधभक्ति (Superstition and blind devotion overpowering logic, thought and thinking.)
1).सबको प्रथम स्थान प्राप्त आने या होने की पागल सनक सवार है। मजहब, संप्रदाय,मत, रिलीजन, राजनीति, व्यापार, शिक्षा, परीक्षा, प्रतियोगिता परीक्षा आदि सभी में प्रथम आने की होड़ लगी हुई है। कैसे भी करके प्रथम स्थान प्राप्त करना है।साम, दाम,दण्ड,भेद आदि कुछ भी करके प्रथम स्थान पर खड़ा होना है।इस प्रथम आने के पागलपन में बेशक चाहे जीवन की शांति, संतुष्टि, तृप्ति और सुख गायब हो जायें। प्रथम स्थान पर कुछ ही गिने चुने व्यक्ति हो सकते हैं। सभी तो प्रथम स्थान पर नहीं आ सकते। यदि सभी को प्रथम स्थान पर घोषित कर दिया जाये तो प्रथम होने का मजा ही किरकिरा हो जायेगा। किसी क्षेत्र में प्रथम स्थान पर खड़े होने का कोई मजा नहीं है,मजा है दूसरों का आपसे नीचे होना। किसी को इस नीचे होने या नीचे करने में ही सारा रहस्य छिपा हुआ है। यदि आपके सभी प्रतियोगी आपके साथ ही खडे हो जायें तो आपका मजा लुप्त ओ जायेगा। किसी को नीचे धकेलने, नीचे करने, नीचे की ओर टांग खींचने में ही सारा मजा निहित है। प्रथम आने का मजा प्रथम आने में नहीं अपितु किन्हीं हजारों लोगों को आपसे नीच कर देना है।हरेक क्षेत्र में यही चल रहा है। दक्षिण भारत की एक पत्रिका 'बसव मार्ग ' पढ़ रहा था। उसमें एक आलेख का शीर्षक है 'विश्व के प्रथम स्वतंत्र चिंतक बसवण्णा '। मुझे इस शीर्षक को पढ़कर लेखक की सोच पर करुणा आई कि किस किस तरह से अनुयायियों का माईंड वाश किया जा चुका है।इनको भारत के पूरे इतिहास में कोई स्वतंत्र चिंतक ही नहीं मिला और अपने आराध्य बसवण्णा को ही प्रथम स्वतंत्र चिंतक घोषित कर दिया।
2). इनके सिवाय सभी अज्ञानी,भटके हुये, पथभ्रष्ट और पशु समान हैं। इनसे पहले के सभी संत, मुनि,गुरु, संन्यासी, स्वामी और मार्गदर्शक संकीर्ण विचारधारा के थे, पूर्वाग्रहग्रस्त थे और एकपक्षीय थे।बस पहली बार इनके गुरु ही धरती पर स्वतंत्र चिंतक हुये हैं।हर मत,वाद,पंथ, संप्रदाय, मजहब, संगठन, राजनीतिक दल और विश्वास का व्यक्ति इसी तरह से सोच रहा है। स्वयं वह और उसके गुरु, नेता , आराध्य ही सब कुछ हैं; बाकी सभी नर्क के कीड़े मकोड़े हैं। भारत और भारत से बाहर मौजूद धार्मिक संप्रदायों में यही प्रतियोगिता लगी हुई है। उनके गुरु ही सबसे बडे पहुंचे हुये सिद्ध हैं, बाकी सभी के गुरु भटके हुये, अज्ञानी और बेहोश हैं।बात यही नहीं रुक जाती है, अपितु इससे आगे बढ़कर वो यह भी कहने लगते हैं कि जो किसी अन्य को गुरु बनायेगा,वह पाप का हिस्सेदार बनेगा।उसको हम जबरदस्ती करके अपने गुरु के सानिध्य में लेकर आयेंगे ताकि उसे भी मुक्ति मिल सके।इस कार्य के लिये अमीर घरानों और सत्ताधारी नेताओं से संपर्क साधकर उनसे करोड़ों अरबों रुपए का अनुदान, जमीन लिये जाते हैं, टैक्स माफ करवाये जाते हैं तथा गैरकानूनी धंधा करने की छूट मांगी जाती है। नेताओं को वोट चाहियें और गुरुओं को गैरकानूनी कुकृत्य करने पर कानूनी कार्रवाई करने से छूट चाहिये। रुपया इन्वेस्ट करने के लिये अमीर लोग आ जाते हैं। धुंआधार दुष्प्रचार करने के लिये बिकाऊ प्रैस आ जाती है। नेताओं की कुर्सी बची रहती है,अमीर घरानों और गुरुओं के गैर-कानूनी धंधे चलते रहते हैं।पिसता है जनमानस।मरता -पिटता है मेहनतकश वर्ग।पतन के गड्ढों में गिरती है जनता जनार्दन। चारों तरफ यही तो चल रहा है। 3.)अद्वैतवादी,द्वैतवादी,त्रैतवादी,
बहुत्ववादी, हिंदू ,पारसी, यहुदी, ईसाई, इस्लाम,जैन,बौद्ध,सिख,शैव, वैष्णव,सौर,शाक्त,कबीरपंथी, दादूपंथी,नित्यानंदपंथी,मीरापंथी,रविदासपंथी, राधास्वामी,इस्कान,ब्रह्माकुमारीज,
योगानंदपंथी,साईंपंथी,गुरमीतपंथी, रामपाली, धीरेंद्र शास्त्री आदि तथा इनके लाखों लाखों अनुयायी खुद के गुरु को सही और बाकी सबको गलत मानते हैं।जिसको हमने गुरु माना है,वही सही है तथा बाकी अन्यों के गुरु पथभ्रष्ट हैं।यह सोच सर्वत्र कायम है।नेताओं के अंधभक्तों का भी यही हाल है। उनके नेता सही हैं तथा बाकी जनता के नेता भ्रष्ट हैं।केवल उनके नेता राष्ट्रभक्त हैं तथा अन्यों के नेता भ्रष्ट, राष्ट्रविरोधी और नाकारा हैं।
4.)और आजकल तो आर्यसमाजी भी इस अंधभक्ति का शिकार हो चुके हैं।वो केवल खंडन में ही अपना प्रचार तलाश कर रहे हैं।वो कहीं भी समझौते के मूढ में नहीं दिखते हैं। हालांकि वो खुद महर्षि दयानंद सरस्वती की शिक्षाओं से बहुत दूर जा चुके हैं। इनके अनुसार महर्षि दयानंद सरस्वती ठीक हैं और बाकी सब गलत हैं। महर्षि दयानंद सरस्वती ने यह शैली कभी नहीं अपनाई थे।वो सर्वप्रथम खुद के आचरण सुधार पर जोर देते थे। उसके बाद में दूसरों के आचरण सुधार की बात करना उनके लिये सम्मत था। लेकिन आजकल तो गौमांसभक्षी, भ्रष्ट, निकम्मे और पदाकांक्षी ही सबसे अधिक समाज सुधार और प्रचार का शोर मचाते हैं। पिछले 200 वर्षो के दौरान सबसे क्रांतिकारी और राष्ट्रभक्त संगठन आज पतन के गर्त में जा चुका है। लेकिन अंधभक्त तो अंधभक्त होते हैं।वो किसी की भी नहीं सुनते हैं। उन्हें तो महाभ्रष्ट होकर भी समाज को आदर्शवादी बनाना है। आधुनिक युग में गौमाता को बचाने के लिये सर्वप्रथम प्रयास महर्षि दयानंद सरस्वती ने गौकरुणानिधि पुस्तक लिखकर,गोकृष्यादिरक्षिणी सभा बनाकर तथा उस समय की महारानी विक्टोरिया को लाखों गौभक्तों के गौहत्या रोकने के समर्थन में हस्ताक्षर करवाकर उनके पास भेजने के रुप किये थे।आज जब मुस्लिम वर्ग भी गौमाता को राष्ट्रीय पशु तथा शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद द्वारा गौमाता घोषित करने की आवाजें उठ रही हैं, ऐसे समय में एक राष्ट्रभक्त संगठन का चुप्पी साधकर बैठ जाना उनके महापतन की ओर संकेत करता है।
5.)ध्यान रहे कि जब कोई व्यक्ति यह कहता फिरता है कि मेरा गुरु,मेरा नेता,मेरा मजहब और मेरा संगठन ठीक है और बाकी सभी भटके हुये हैं तो सावधान हो जाना। ऐसे अंधभक्त लोग अप्रत्यक्ष रूप से यह घोषणा कर रहे होते हैं कि जिस गुरु, नेता, मजहब, संप्रदाय, संगठन को हमने स्वीकार किया हुआ है,वो सभी हमारे कारण सही,बड़े, महान या सर्वश्रेष्ठ हैं।वो खुद अपनी महानता की घोषणा कर रहे हैं।उनका अहंकार बोल रहा है। बड़प्पन की यह घोषणा उनके स्वयं के बड़प्पन की घोषणा है।कल को वो गुरु, नेता, राजनीतिक दल, संप्रदाय, मजहब आदि को बदल लेंगे तो फिर बाद वाले गुरु, नेता, राजनीतिक दल, संप्रदाय, मजहब आदि सही हो जायेंगे। यानी कहने का आशय यह है कि उनके कहीं पर होने या नहीं होने से कोई महान या भ्रष्ट बनता है। अंधभक्तों का मनोविज्ञान में विचित्र है। सच तो यह है कि अंधभक्तों से अधिक गिरा हुआ,पतित, निकृष्ट, घटिया,दोगला, भयभीत और स्वार्थी प्राणी अन्य कोई नहीं हो सकता।
6.) जब न्याय की सर्वोच्च संस्था ही यह कह रही है कि विवाह पूर्व शारीरिक संबंध अपराध नहीं है,तो फिर लड़कियों के साथ छेड़छाड़ और बलात्कार की घटनाएं तो बढ़ेंगी ही। पहले आग लगाओ और फिर उस पर पानी डालकर आग को बुझाने का ढोंग करो- यह कौनसी बुद्धिमत्ता है? पहले सड़कों पर कीचड फैलाओ और फिर क्रेन से वहां पर फंसी गाडियां निकालकर सेवा का ढोंग करो- यह कौनसी नैतिकता है? युवाओं के चरित्र को जानबूझकर भ्रष्ट करने के षड्यंत्र रचे जा रहे हैं। पहले मर्जी से शारीरिक संबंध बनाओ और फिर जाकर न्यायालय में खड़े हो जाओ कि इस युवा ने मेरे साथ जबरदस्ती से शारीरिक संबंध बनाये हैं। ऐसे पथभ्रष्ट युवाओं से गर्भनिरोधक और सैक्स पावर बढ़ाने की दवाईयां बेचकर एक तरफ डाक्टर रुपया बना रहे हैं और दूसरी तरफ वकीलों की फोज उनके मुकदमे लड़कर रुपया कमा रही है।देश का युवा बर्बाद हो रहा है।जिस आयु में युवाओं की पूरी ऊर्जा अपनी शिक्षा,परीक्षा और कैरियर बनाने में लगनी चाहिये थी,उस आयु में युवा वर्ग व्यर्थ के पचड़ों में फंसा हुआ है।यह जहां हमारे धर्माचार्यों की विफलता है, वही पर न्याय व्यवस्था की पोलखोल है। युवा वर्ग पढ़ लिखकर रोजगार न मांगे, इसलिये उसको विवाह पूर्व शारीरिक संबंध बनाने के लिये प्रेरित किया जा रहा है।
7.)जब विवाह पूर्व सहमति से शारीरिक संबंध बनाना अपराध नहीं है तो भारतीय ज्ञान परंपरा के पाठ्यक्रम में भी यह विषय जोड़ दो, ताकि युवा वर्ग जमकर शारीरिक संबंध बना सके।एक तरफ शिक्षा संस्थानों में नैतिकता की शिक्षा देने का नाटक करने और दूसरी तरफ युवाओं की कामवासना की पूर्ति के लिये सरल रास्ते उपलब्ध करवाने में कोई भी सामंजस्य और समझदारी नहीं है। आखिर हमारी न्याय व्यवस्था को हो क्या गया है?वह भारत को युरोप बनाने पर क्यों तुली हुई है। यदि युरोप ही बनाना है तो आर्थिक रूप से युरोप की बराबरी करो। यदि युरोप की बराबरी करना है तो भारत की 150 करोड़ आबादी को युरोप वाली मूलभूत आवश्यक सुविधाएं प्रदान करके दिखलाओ। न्यायधीश इस संबंध में कुछ क्रांति करके दिखलाओ। वायदाखिलाफी करने वाले लूटेरे नेताओं को न्यायालय में बुलाकर उन्हें आदेश दो कि इतने दिन में भारतीय जनमानस को मूलभूत सुविधाएं प्रदान करनी ही होंगी। लेकिन नहीं,वो ऐसा नहीं करेंगे।वो तो भारतीय जनमानस को शादा जीवन और उच्च विचार के उपदेश पिलाकर अय्याशी करने के लिये युरोप में छुट्टियां मनाने चले जायेंगे।
8.) भारत में इतने महात्मा,ज्ञानी,गीता- मर्मज्ञ, योगाचार्य,संत,मुनि,कथाकार, सुधारक,संन्यासी दिन- रात उपदेश करने में लगे हुये हैं।जगह- जगह सत्संग चल रहे हैं। जगह -जगह कथाएं हो रही हैं।योग -शिविर भी खूब चल रहे हैं। चरित्र -निर्माण शिविरों की तो बाढ सी आई रहती है।नाम, दीक्षा,शक्तिपात, कुंडलिनी जागरण आदि के अनुष्ठान बहुतायत से होते रहते हैं। आचार्य रजनीश के आने के पश्चात् तो लगभग सभी धर्माचार्यों ने उनकी नकल करते हुये अपने- अपने ध्यान-योग शिविर लगाने शुरू कर रखे हैं। अमरनाथ, बद्रीनाथ, केदारनाथ, हरिद्वार, ऋषिकेश,बालाजी मेहंदीपुर, तिरुपति बालाजी, कुरुक्षेत्र, अमृतसर,उज्जैन,प्रयाग,अजमेर, मक्का -मदीना, वेटिकन आदि की
तीर्थयात्राओं पर लोगों की भीड़ बढ़ती ही जा रही है। लेकिन दूसरी तरफ हिंसा, मारामारी, बदले की भावना, चोरी, भ्रष्टाचार, बलात्कार, छेड़छाड़,महंगाई, लड़ाई -झगडे और युद्धों की बाढ़ आई रहती है। स्वार्थ,लालच, अहंकार,काम,क्रोध, लोभ और बेहोशी में जनमानस आकंठ डूबे हुये हैं।यह सब क्यों हो रहा है?जब चहुंओर अच्छी शिक्षाएं मिल रही हैं तो यह अनाचरण और दोगलापन क्यों? सही बात तो यह है कि अधिकांश उपरोक्त तथाकथित महापुरुष कहे जाने वालों का स्वयं का आचरण, चरित्र, व्यक्तित्व और दिनचर्या ही ठीक नहीं है। जो खुद ही भ्रष्ट,पतित -चरित्र,चोर, बलात्कारी और पापी होगा,उसका किसी अन्य पर सृजनात्मक प्रभाव पड़ ही नहीं सकता है। इसके सिवाय अधिकांश भक्त लोग अपने गुरुओं, भगवानों, अवतारों, नेताओं, तीर्थस्थलों पर जाते ही अपने पापों और कुकर्मों को माफ करवाने के लिये या फिर कोई नयी डिमांड पूरा करवाने के लिये जाते हैं। इनमें भक्तिभाव रत्तीभर भी नहीं होता है। इनके गुरुओं, कथाकारों,भगवानों, सुधारकों और नेताओं ने इनको पट्टी पढा रखी है कि केवल हमारे सत्संग,कथा, शिविर, रैली आदि में सम्मिलित होने से तुम्हारा कल्याण हो जायेगा। वैसे भी कलयुग चल रहा है। कलयुग में योग, ध्यान,ज्ञान आदि प्रभावी न होकर केवल कैसी भी झूठी मूठी भक्ति ही कल्याणकारी सिद्ध होती है। इसके सिवाय किसी को कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं है।
9.)औपनिवेशिक सोच के लोगों ने जानबूझकर महर्षि मनु को बदनाम करने का अभियान चलाया हुआ है। उनके श्लोकों का गलत अर्थ किया जाता है, संदर्भ से हटकर अर्थ किया जाता है,केवल नकारात्मक श्लोकों को उद्धृत किया जाता है
तथा मिलावटी श्लोकों को आधार बनाकर अनाप-शनाप बाते की जाती हैं। औपनिवेशिक विचारक और लेखक विधायक मानसिकता के साथ काम न करके पूर्वाग्रह से काम करते आये हैं।नारी अस्मिता के रक्षार्थ मनु के इस श्लोक का गलत अर्थ लगाया जाता रहा है। देखिये -
पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने।
रक्षण्ति स्थविरे पुत्रा न स्त्री
स्वातंत्र्यमर्हति।।
नारी के लिये कुमारी अवस्था में उसका पिता,यौवनावस्था में उसका पति, वृद्धावस्था में उसका पुत्र उसके लिये रक्षा-कवच बनता है।नारी को कभी भी बिना किसी संरक्षण के स्वतंत्र और उन्मुक्त नहीं छोड़ना चाहिये। इसमें नारी की कमजोरी या उसकी गुलामी का भाव न होकर पुरुष से उसकी सुरक्षा करने का भाव निहित है। एकांत में या निरीह अवस्था में या बिना सहारे के नारी को छोड़कर देख लो। पुरुषों द्वारा उसके साथ दुर्व्यवहार होगा ही होगा। इसमें नारीवादी कार्यकर्ता कहेंगे कि ऐसे में तो सुधार पुरुष में होना चाहिये,नारी को किसी के आश्रित क्यों करते हो?हमारी सारी शिक्षा, दीक्षा, परीक्षा और मनोरंजन में संयम,अनुशासन, सम्मान, मूल्य पालन आदि न होकर उन्मुक्त भोग को बढ़ावा देने पर जोर है।टीवी, अखबार, मोबाइल आदि सभी में कामवासना भड़काने वाले कार्यक्रम मौजूद हैं।हर प्रकार के नशे को सिस्टम द्वारा बढ़ावा दिया जा रहा है।न्यायालय भी विवाहेतर शारीरिक संबंधों को अपराध या अनैतिक नहीं मानता है।इसका फायदा उठाकर कामवासना भडके हुये लोग खुलेआम कुछ भी करने के लिये घूम रहे हैं। ऐसे पुरुषों से नारी के रक्षार्थ महर्षि मनु का उपरोक्त श्लोक है। इसमें नारी निंदा नहीं अपितु नारी गरिमा मौजूद है।ऐसी विषम स्थिति में लड़कियों के साथ कुछ अनहोनी हो जाती है तो वो शोर मचाती हैं कि हमें बचाओ। यदि आप अपने आपको इतना समर्थ मानते हो तो करो अपनी रक्षा स्वयं ही।आपको तो पिता,भाई,पति, पुत्र आदि किसी की ढाल नहीं चाहिये।यह दोगलापन छोडना होगा।
10.) भारत में चोरी करके थिसिस तैयार कर जमा करवाकर पीएचडी की उपाधि प्राप्त करना एक आम बात है। लेकिन जब से विभिन्न विश्वविद्यालयों ने पश्चिम की शैली में आनलाईन मोड में कोर्स शुरू किये हैं,चोरी से नोट्स तैयार करवाकर आईएसबीएन सहित प्रकाशित करवाकर छात्रों को उपलब्ध करवाना आम बात हो गई है। और यह सब कुछ 'नयी शिक्षा नीति', के अंतर्गत हो रहा है।इन कोर्सेज में फीस बहुत अधिक होती है, इसलिये बिना किसी पूर्व तैयारी के विश्वविद्यालयों ने रुपया कमाने के लिये आनन फानन में अनेक कोर्स शुरू कर दिये हैं। बच्चों को नोट्स उपलब्ध करवाना अनिवार्य है।समय इतना होता नहीं है, इसलिये संबंधित प्रोफेसर को कम से कम समय में नोट्स तैयार करके विश्वविद्यालय को उपलब्ध करवाना अनिवार्य कर दिया जाता है। प्रामाणिक नोट्स तैयार करना एक समयसाध्य कार्य है। इनको लिखने,टंकित करवाने, अशुद्धियां ठीक करने और प्रकाशित करवाने में सयय लग जाता है। संबंधित शिक्षक भी क्या करें - वो यहां वहां से पुस्तकें उठाकर उनसे चोरी से स्टडी मैटीरियल की हु-ब-हू नकल करके नोट्स तैयार करवाकर विश्वविद्यालयों को सौंप रहे हैं।इन नकल किये हुये नोट्स में गहनता, तार्किकता,प्रामाणिकता,स्तरीयता,
विषय -संबद्धता का बिल्कुल अभाव होता है। आनलाइन शिक्षा प्रणाली तो विदेशों से ले ली है लेकिन छात्रों और शिक्षकों को विदेशों वाली सुविधाओं को कौन उपलब्ध करवायेगा? बस, विद्यार्थियों से रुपया हड़पो और भाग जाओ। शिक्षा का आनलाइन सिस्टम पूरी तरह से फर्जीवाड़ा है। इसमें शत- प्रतिशत चोरी चलती है। पहले से ही ध्वस्त हो चुकी भारतीय शिक्षा इससे शिक्षा और भी अधिक बर्बाद हो जायेगी। यदि आनलाइन के लिये तैयार पुस्तक रुप में नौट्स की छानबीन करवाई जाये तो भारतीय शिक्षा व्यवस्था का एक बहुत बहुत फर्जीवाड़ा उजागर हो सकता है।भारत को विश्वगुरु बनाने के हर प्रयास के पीछे भारत को विश्वगरीब बनाने का षड्यंत्र छिपा हुआ है।न प्रोफेसर,न कक्षाएं,न भवन,न पुस्तकालय,न प्रयोगशालाएं,न स्तरीय पुस्तकें,न नकलरहित परीक्षाएं तथा न ही कोई दूरदर्शी सोच।बस, धड़ाधड़ आनलाइन के नाम पर महालूट चल रही है।
11.)किसी लेखक की रचना का मूल्यांकन करने या समीक्षा करने के लेखन -कर्म में साहित्यिक प्रतिमानों के अनुसार निष्पक्षता से गुण और दोष दोनों को उजागर करना होता है। किसी लेखक की कृति की केवल एकतरफा प्रशंसा करना,लंबी गुणावली बतलाना और जो लेखक की रचना में मौजूद भी नहीं होता है, उसका श्रेय भी जबरदस्ती से लेखक को प्रदान कर देना न तो पुस्तक समीक्षा कहला सकती है,न ही उसे किसी प्रकार का मूल्यांकन कहा जा सकता है तथा न ही ऐसा करना एक अच्छे,भले और निष्पक्ष समीक्षक की पहचान ही कहला सकती है।ऐसा करना साहित्य का पतन कहलाता है। स्वतंत्रता के पश्चात् भारती हिंदी सहित अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के साहित्य में जहां आत्मप्रशंसा की चाह में बढ़ोतरी हुई है, वहीं पर किसी न किसी विचारधारा, राजनीतिक दल या जातिवादी संगठन की चापलूसी,चारणगिरी के साथ- साथ मानवीय चेतना से दूरी,स्वार्थपरता,तर्कहीनता,सिद्धा़तहीनता, महत्वाकांक्षा और पुरस्कार की कामना आदि में निरंतर बढ़ोतरी होती गई है। बहुत से तथाकथित लेखकों और समीक्षकों में पहले ही बातचीत हो जाती है कि किस तरह से क्या- क्या लिखना है। साहित्यिक क्षेत्र में ऐसी कृतियां और ऐसी कृतियों की समीक्षाएं कूड़ा-कर्कट से अधिक महत्व की नहीं हैं। ऐसे लेखकों द्वारा ऐसा कितना महान साहित्य सृजित हो रहा है कि उसमें केवल गुण ही गुण मौजूद हैं तथा दोष कोई भी नहीं हैं? कालिदास,भारवि,माघ, तुलसीदास,कबीर, रविदास,दिनकर, पंत, प्रेमचंद, लखमीचंद,बाजेभगत, मेहरसिंह, मांगेराम,धनपत सिंह आदि की रचनाओं की समीक्षा करते हुये भी गुण और दोष दोनों को बतलाया जाता रहा है।हरियाणवी साहित्य में यह प्रवृत्ति कुछ अधिक ही उभरकर सामने आ रही है। पहले तो सिस्टम ने ही हरियाणवी और हरियाणवी में मौजूद साहित्य को बर्बाद करने मे कमी नहीं छोड़ रखी है, ऊपर से झूठी और एकतरफा समीक्षाएं लिखने वाले ये तथाकथित समीक्षक महोदय- पता नहीं हरियाणा राज्य के लेखन को कहां ले जाकर छोड़ेंगे?
12.) व्यापारी, उद्योगपति,कोरपोरेट्स घराने, बड़े -बड़े माल के मालिक, दुकानदार, शोरूम संचालक, निजी शिक्षा -संस्थान,फिल्म -निर्माता आदि सभी अपना उपभोक्ता सामान बेचने के लिये हिप्नोसिस तकनीक का प्रयोग नहीं अपितु दुरुपयोग कर रहे हैं। घटिया सामान और धुआंधार प्रचार।बस, उपभोक्ता इनके बनाये जाल में फंसकर गुणवत्ता रहित सामान को भी खुशी -खुशी खरीदकर घर ले आता है। घटिया से घटिया सामान तैयार करके उसके साथ में किसी अर्धनग्न अभिनेत्री को खड़ी कर देते हैं। उपभोक्ता की कामुकता भड़काकर उसकी एकाग्रता को खरीदे जाने वाले सामान से हटाकर अर्धनग्न अभिनेत्री पर केंद्रित कर देते हैं। और फिर इसके साथ -साथ एकाग्र हुये मन पर किसी प्रभावी वाक्य एकदभ से दोहराने की चालाकी की जाती है। उपभोक्ता जब सामान खरीदने जायेगा तो सब कुछ भूलाकर उसे ही याद करेगा तथा वही सामान खरीदकर घर लायेगा। चाहे उस सामान की गुणवत्ता कितना ही घटिया, हानिकारक और सेहत के प्रतिकूल हो। उपभोक्ता सामान निर्माता खरबों की मालिक बहुराष्ट्रीय कंपनियां, बड़े व्यापारिक घराने, राजनीतिक दल, निजी शिक्षा -संस्थान आदि इसी तरह से उपभोक्ताओं से छल और धोखाधड़ी करके अपना कूड़ा-कर्कट सामान बेचकर मालामाल होती जा रही हैं। आधुनिक विकसित कहे जाने वाले युग के वैज्ञानिक, प्रोफेसर, शोधार्थी,शिक्षाविद्,नीति- निर्माता, सुधारक, धर्माचार्य,नीतिशास्त्री आदि सभी इस वैश्विक धोखाधड़ी पर चुप्पी साधे बैठे हैं। बहुराष्ट्रीय कंपनियों और उद्योगपतियों ने आरोग्यता की दृष्टि से घटिया,विषयुक्त,घातक,रसायनयुक्त, पर्यावरण- प्रदुषक उपभोक्ता सामान को बेच- बेचकर दुनियावासियों को बिमारियों का घर बना दिया है तथा धरती के पर्यावरण को बर्बाद कर डाला है। विज्ञापनों के द्वारा रिपीटीशन, एकाग्रता,चोंकाकर, प्रलोभन देकर, मन को भटकाकर उपभोक्ताओं में हिप्नोसिस पैदा की जाती है।इस अवस्था में कूड़ा-कर्कट, विषयुक्त,घातक रसायनयुक्त सामान धड़ल्ले से बिकता है।सारी आधुनिकता, वैज्ञानिकता, नैतिकता, तार्किक चिंतन गया तेल लेने।
13.) किसी राजनीतिक दल, संगठन, मजहब, संप्रदाय, मत आदि का सदस्य बनने पर यदि आपकी प्रश्न करने, अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने और कमियां बतलाने की शक्ति को छीन लिया जाये तो आप मान लेना कि वह राजनीतिक दल, संगठन, मजहब, संप्रदाय,मत आदि आपके लिये गुलामी और दासता का फंदा बन गया है। भारत में हालात ऐसे ही बन चुके हैं। अपनी जीवन जीने की स्वतंत्रता को किसी राजनीतिक दल, मजहब, संप्रदाय,मत,वाद या जातीय भीड़ को गिरवी रखकर बड़े -बड़े धुरंधर कहलाने वाले लेखक,कवि, साहित्यकार,विचारक,शिक्षक, दार्शनिक,समाज सुधारक, योगी और धर्माचार्य पतन को प्राप्त हो रहे हैं।
14.)सनातन धर्म को बदनाम करने का इससे अधिक घटिया प्रयास क्या हो सकता है कि गाय को माता मानकर वोट मांगने वाले नेता सत्ता मिलने पर यह कहने लगते हैं कि गाय तब तक माता है जब तक वो गर्भवती नहीं होती है। गर्भवती होने के पश्चात् गाय माता नहीं रहती है तथा उसका मांस खाया जा सकता है।कुछ नेता ऐसा बोल रहे हैं कि चौदह वर्ष से ऊपर की गाय को मांस के लिये इस्तेमाल किया जा सकता है। और कुछ बुद्धि के कोल्हू नेता ऐसा बोल रहे हैं कि मणिपुर, नागालैंड, मिजोरम,गोवा, मध्यप्रदेश आदि की गाय को मांस के लिये खाया जा सकता है क्योंकि इन राज्यों की गाय गौमाता नहीं होती है।कुछ घोंचू ऐसा बोलते रहे हैं कि विदेशों में गौमांस खाया जा सकता है तथा कुछ ऐसा बोल रहे हैं कि घर के भीतर गौमांस खाना पाप नहीं है,घर के बाहर बाहर गौमांस खाना पाप होता है। और विडंबना देखिये कि कुछ को छोड़कर अधिकांश सनातन धर्म के धर्माचार्य, महामंडलेश्वर, शंकराचार्य, योगाचार्य, कथाकार,संत आदि इस प्रकार के सनातन धर्म विरोधी कुकृत्यों पर मौन धारण किये बैठे हैं। और फिर यही बेहरुपिये यह बोलते रहते हैं कि सनातन धर्म खतरे में है। वास्तविकता तो यह है कि सनातन धर्म को सबसे बड़ा खतरा इन बेहरुपियों से ही है।
15.) जो घोंचू कल तक हमारे पडौस में कुछ निठल्ले शराबी -कबाबी -शबाबियों की चिल्म भरने का काम करता था,आज एक इस्तिहार से पता चला कि वह तो सीनियर प्रोफेसर बन गया है। क्या बात है?भारत ने कितना विकास कर लिया है कि बिना किसी विषय की पूर्व योग्यता के आवारा, निकम्मे, गालीबाज और चिल्म भरने वाले लोग भी प्रोफेसर बन रहे हैं।बताओ और कितना विकास करवाओगे भारत का?जब राजा ही आठवीं फेल हो और वह अपनी फेल होने वाली डिग्री भी नहीं दिखला रहा हो, उस देश में पढे -लिखे, तार्किक चिंतन करने वाले, पीएचडी- डी-लिट करने वालों और रचनात्मक लेखन करने वालों का क्या काम है? ऐसे देश में न तो किसी ढंग के विश्वविद्यालय की आवश्यकता है,न प्रयोगशालाएं बनाने की आवश्यकता है ,न तकनीकी संस्थान बनाने की आवश्यकता है,न पुस्तकालय खोलने की आवश्यकता है तथा न ही प्रामाणिक शोध करने करवाने की आवश्यकता है।बस, किसी ऐरे -गेरे- नत्थू -खैरे अपराधी नेता की चिल्म भरो, उसके पैर दबाओ,उसकी शारीरिक संतुष्टि करो, मूढ़ों की भीड़-भाड़ रैलियों के लिये जुटाओ तथा उसके लिये शराब -कबाब -शबाब की बढ़िया व्यवस्था करो। सफलता के लिये यही काफी है। बाकी क्यों किताबों में माथापच्ची करना। क्यों किसी प्रयोगशाला में प्रयोग आदि करना। क्यों बढ़िया साहित्य सृजन करना। विश्वगुरु नहीं अपितु अब तो विश्वमहागुरु बनने की ओर अग्रसर हैं।
16.) किसी भी उपदेश ,समस्या, परिस्थिति, व्यक्ति, वस्तु, स्थान, विचारधारा, सिद्धांत, निर्णय पर तार्किक ढंग से सोच -विचारकर निर्णय पर पहुंचने से रोकना सनातन धर्म और संस्कृति के अनुसार सही नहीं है। अब्राहमिक और ब्राहमिक सोच में यही तो अंतर है। पहले वाली मानने पर आधारित है तो दूसरे वाली तार्किक चिंतन करके जानने पर आधारित है। मानने पर जोर देने वाली सोच वास्तव में कोई सोच न होकर निरा अंधविश्वास है।इसे सोच नहीं कह सकते।सोच में तो तर्क से सोचना,विचारना, चिंतन करना आवश्यक होता है। अब्राहमिक में सोचना बिल्कुल निषेध है। सोचने में पहले से कुछ भी निर्धारित नहीं होता है अपितु विभिन्न पक्षों पर निष्पक्षता से सोच -विचार करने के पश्चात् ही निर्णय लिया जाता है। मानने या अंध विश्वास करने में पहले से ही निर्णय लिया हुआ होता है। ध्यान रहे कि अंधविश्वास या मानना न तो विश्वास है,न श्रद्धा है,न आस्था है,न भक्ति है तथा न ही कोई समर्पण है।यह तो एक गुलामी और दासता है।मानव प्राणियों को गुलाम बनाकर रखने का यह कुछ धूर्त लोगों का सोचा समझा हुआ षड्यंत्र होता है। ऐसे लोगों के खुद के पास तो इतना सोचना और समझना तो होता ही है कि जिससे जनता जनार्दन को सोचने, विचारने,तर्क करने से दूर करके अंधे,बहरे,गूंगे, लंगड़े लोगों की भीड़ पर एकछत्र शासन करके अपनी जिंदगी को हर तरह से खुशहाल बनाया जा सके।
पहले तो इस षड्यंत्र में केवल धर्माचार्य और शासक ही सम्मिलित थे लेकिन पिछले 200-300 वर्षों से इसमें अब जातिवादी सुधारक,उद्योगपति,कोरपोरट घराने,शिक्षा संस्थान, न्याय व्यवस्था,दवा निर्माता कंपनियां और बहुराष्ट्रीय कंपनियां भी सम्मिलित हो गई हैं।ये सभी जनता जनार्दन को गुलाम और दास बनाकर रखने में एक साथ मिलकर काम कर रहे हैं।ये सभी मीडिया का भरपूर सहयोग ले रहे हैं। उपरोक्त सभी षड्यंत्रकारी जनमानस को तर्क, विचार, चिंतन, न्याय, मीमांसा,कारणकार्य और प्रमाणों की शिक्षा से दूर रखने में अपनी पूंजी का एक बहुत बड़ा हिस्सा खर्च कर रहे हैं।इस सुंदर धरती ग्रह के लिये अन्य बड़े खतरों के साथ यह भी एक बड़ा खतरा उभरकर सामने आया है।
.........
डॉ. शीलक राम आचार्य
दर्शनशास्त्र -विभाग
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय
कुरुक्षेत्र -136119
'योग और योगाभ्यास' पर अयोग्य योग-शिक्षकों का कब्जा ('Yoga and Yoga Practice' is taken over by unqualified yoga teachers)
'योग और योगाभ्यास' पर अयोग्य योग-शिक्षकों का कब्जा
1.)सामुहिक रुप से योगाभ्यास एक छलावा है। भीड़-भाड़ एकत्र करके कुछ शारीरिक व्यायाम करवाना किसी भी दृष्टिकोण से योगाभ्यास नहीं है।वार्म अप, सुक्ष्म क्रियाएं, हल्के व्यायाम या फिर सूक्ष्म व्यायाम शारीरिक निरोगता के लिये लाभकारी होते हैं, लेकिन इसे योगाभ्यास नहीं कहा जा सकता है। वैसे तो देश विदेश में वर्ष भर योग शिविर,योग कक्षाएं, योगाभ्यास कक्षाएं या ध्यान शिविर वगैरह चलते रहते हैं लेकिन 21 जून के आसपास इसका जुनून विशेष रूप से देखने को मिलता है।जिसे देखो वही मैट या चद्दर या योग साधक की चदरिया ओढ़े दिखाई पड़ता है।पार्क,उद्यान,हाल,योग संस्थान,झील, तालाब आदि के आसपास लोगों की भीड़-भाड़ योगाभ्यास की आड़ में शारीरिक तोड़-मरोड़ करती देखी जा सकती है। लेकिन यह सब करना योगाभ्यास नहीं है।मोटे पेट, थुलथुल पेट,भारी भरकम कमर, चलने में अशक्त, पेंट शर्ट बैल्ट धारण किये,जीभ के गुलाम, अनुशासनहीन,क्रोध की साक्षात् मूर्ति, मांस -मीट- अंडाभक्षी, जींसधारी, शराबी,शबाबी आदि सभी योगाभ्यास के लाभ गिनवाते हुये या योगाभ्यास की आड़ में हल्की कसरतें करते हुये देखे जा सकते हैं।
2.) योगाभ्यास भारतवर्ष की पुरातन सनातन वैदिक विद्या है।यह एक अनुशासन है।यह किसी शास्त्र को रटना न होकर शुद्ध रूप से संयम है।यह योग संबंथी पुस्तकों, ग्रंथों और योगियों की जीवनियों का अध्ययन मात्र न करके एक प्रायोगिक चेतना का विज्ञान है।यह केवल कोई सिद्धांत,वाद,मत, विचार आदि न होकर एक साधना द्वारा अनुभूति का शास्त्र है।यह जीवन जीने की कला है।यह जीवन का विज्ञान है।यह चेतना का विज्ञान है।यह केवल परीक्षा का विषय न होकर दीक्षा, साधना और स्वानुभूति है।यह निज स्वरूप में ठहलना है।यह होश, जागरण, सजगता और विवेक का तप है।यह निर्विचार चेतना में होना है।यह विचारों पर नियंत्रण है।यह स्वयं के चित्त को मल ,विकार और अशुद्धियों से खाली करके स्वयं की चेतना को पारदर्शी बनाना है।योग कोई दिखावा नहीं अपितु दिखावा करने वाले मन को समझना है।योग केवल शुष्क तर्क - वितर्क न होकर तर्कातीत की यात्रा है। इसमें तर्क- वितर्क का भी सम्मान है लेकिन वहां से आगे जाना भी है।योग संसार विरोध नहीं अपितु संसार रहते हुये भी निर्विकार,निश्छल और निस्पंद होना है।योग अपनी सोई शक्तियों का जागरण करके उनका सृजनात्मक उपयोग है।योग विभूतियों और सिद्धियों का प्रदाता है लेकिन इन्हीं में फंसकर नहीं रह जाना है।
योग 'स्व' और 'पर' में सामंजस्य है।योग संसार और अध्यात्म में समन्वय है।योग इहलोक और परलोक में मैत्री है।योग संयोग और वियोग में समरसता है।योग चित्त वृत्तियों को समझकर उन पर नियंत्रण है।योग चित्त की वृत्तियों का प्रबोध है।योग चित्तवृत्तिनिरोध और चित्तवृत्तिप्रबोध में रहते हुये निष्कंप चेतना में होना है।योग वर्तमान में होना है। बाहरी सभी पहचान से आगे बढ़कर स्वयं को जानना योग है।परिधि और केंद्र, बाहर और भीतर,तुम और मैं - इनमें एकसूत्रता समझकर अद्वैतानुभूति योग है।एक व्यक्ति के अस्तित्व के जितने भी स्तर हैं,उन सबको शुद्ध करते हुये परम चेतना में होना योग है।समाज, व्यक्ति,शरीर,श्रास- प्रश्वास,प्राण, विचार, भावना आदि से होशपूर्ण जुड़ाव रखते हुये अस्तित्व से जुड़ाव करना योग है।जीवन में मौजूद टूटन,बिखराव,अकेलेपन को जानकर अपने मूल स्थान का साक्षात्कार योग है। उपरोक्त दी गई परिभाषाओं में शारीरिक तोड़-मरोड़ को किसी ने योग की संज्ञा नहीं दी है। व्यायाम या सूक्ष्म क्रियाओं को किसी ने भी योग नहीं कहा है।दिखावे को किसी ने योग नहीं कहा है।केवल मैट,लोवर,ढीले वस्त्र और योग साधक या योग शिक्षक लिखी गई बनियान पहनने को किसी ने भी योग नहीं कहा है। भीड़-भाड़ में जाकर गप्पें मारने को किसी ने योग नहीं कहा है। किसी योगी का अंधभक्त बनने को भी किसी न योग नहीं कहा है।
3.)भारत और भारत से बाहर जितना भी योग -केंद्रों का पंजीकरण बढता जा रहा है, उतना ही योग की आड़ में पाखंड, ढोंग, दिखावा, शोषण और दुकानदारी बढते जा रहे हैं। भारत में योग और योगाभ्यास की आड़ में राजनीति भी खूब की जा रही है।एक प्रसिद्ध व्यापारी बाबा ने तो एक पार्टी विशेष को सत्ता में लाने के लिये अपने अंधभक्त अनुयायियों को उस पार्टी के समर्थन में करोड़ों की संख्या में वोट डालने के लिये विवश किया था। पैंतीस रुपये प्रति लीटर पैट्रोल और डीजल,सस्ती रसोई गैस , विदेशी बैंकों से लाखों करोड़ का काला धन वापसी, राष्ट्रवाद की स्थापना,भारत को विश्वगुरु बनाने , शिक्षा के स्वदेशीकरण आदि के बड़े,-बड़े महाझूठ बोलने का घृणित कुकृत्य एक योगी कहलाने वाला व्यक्ति कैसे कर सकता है? लेकिन भारत में हमने यह सब होते हुये भी देख लिया है। ध्यान रहे कि यह न तो योग है,न भोग है,न संयोग है,न उद्योग (सद्कर्म) है, अपितु यह हमारे भारत के लिये कैंसर,तपेदिक और कोरोना से भी खतरनाक महारोग है। अपने व्यापारिक हित साधने के लिये ऐसे नकली और ढोंगी योगियों ने इस देश को खूब मूर्ख बनाया हुआ है। इनसे सावधान रहने की आवश्यकता है।इनकी पहुंच हमारे राजनीतिक, प्रशासनिक,विधिक सिस्टम में बहुत ऊपर तक है।
4.)योग और योगाभ्यास के सूत्र सर्वप्रथम वेदों में मौजूद हैं। वहीं से प्रेरणा पाकर ऋषियों ने योग संबंधित शास्त्रों की रचना समय -समय पर की है।दो सो से अधिक उपनिषद् योग, योगाभ्यास, साधना और अध्यात्म के ही पुराने साक्ष्य हैं।कुछ उपनिषद् तो दस हजार - बीस हजार वर्षों से भी अधिक पुराने हैं। औपनिवेशिक सोच के कारण इनको नया सिद्ध किया जा रहा हो,यह उनका सनातन धर्म और संस्कृति के प्रति द्वेषभाव है। पिछले साढ़े पांच हजार वर्षों के दौरान योग संबंधित अनेक ग्रंथ लिखे गये थे लेकिन यवन, ईसाई और इस्लामी हमलावरों के हमलों में काफी ग्रंथ नष्ट कर दिये गये। महर्षि पतंजलि रचित 'योगसूत्र' फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथ मौजूद है। इसमें 195 सूत्र और चार पाद मौजूद हैं।इसी ग्रंथ के अनुकरण पर विभिन्न धाराओं के योगियों यथा श्रमण, स्वामी,संन्यासी, भिक्षु, मुनि और योग- साधक आदि ने अपने -अपने मतों में योगाभ्यास की विभिन्न विधियों को विकसित किया। सबका मूल महर्षि पतंजलि के ग्रंथ 'योगसूत्र' में मिल जायेगा।इसी का अनुकरण और अनुसरण करते हुये अष्टांगयोग,सप्तांगयोग,षडंगयोग,
राजयोग,हठयोग,प्राणयोग,जपयोग,मंत्रयोग, कुंडलिनी योग, कर्मयोग,भक्तियोग,ज्ञानयोग,तंत्रयोग,ध्यानयोग,सहजयोग,सूरतशब्दयोग आदि सैकड़ों प्रकार के योग -मतों का प्रचलन हुआ है।
5.)योगसूत्र के प्रथम तीन सूत्र बड़े महत्व के हैं। बाकी योगसूत्र में इन तीन सूत्रों का विस्तृत व्याख्यान मात्र है।प्रथम सूत्र में योग को अनुशासन कहा गया है। अनुशासन के सिवाय योग कुछ नहीं है।योग की शुरुआत,योग का पथ,योग की उपलब्धि और योग उसके पश्चात् का जीवन -इन सभी स्तरों पर अनुशासन ही प्रधान है। यदि अनुशासन नहीं तो योग नहीं। बिना अनुशासन के योग एक भ्रम है।जो लोग अपनी दिनचर्या, जीवनचर्या,आहार -विहार, खान-पान, निद्रा और जागरण तथा योगाभ्यास में अनुशासन का पालन नहीं करते,वो योगाभ्यास में एक कदम भी आगे नहीं रख सकते हैं।योग के प्रथम तीन सूत्र इस प्रकार से हैं -
अथ योगानुशासनम्।।
योगश्चित्तवृत्तिनिरोध:।।
तदा द्रष्टु स्वरूप अवस्थानम्।।(योगसूत्र, समाधिपाद,1-3)
इनका अर्थ है कि अब योग के अनुशासन को बतलाया जाता है।
योग चित्त की वृत्तियों पर नियंत्रण है। योगाभ्यास से द्रष्टा की अपने स्वरूप में स्थिति हो जाती है। यदि चहुंओर दृष्टि को किया जाये तो मालूम होगा कि लोग स्वयं अनुशासित न होकर केवल अन्यों को अनुशासित होने की सीख देते मिल जायेंगे। लेकिन जो व्यक्ति स्वयं अनुशासित नहीं है,वह दूसरों को अनुशासित होने की सीख कैसे दे सकता है? और यदि वह ऐसा करेगा भी तो उसकी सीख का किसी पर कोई प्रभाव पड़ने वाला नहीं है।सब सबको अनुशासन सिखला रहे हैं लेकिन स्वयं उच्छृंखल बने हुये हैं।जिनका स्वयं के आहार,विहार,पोशाक,सोने,जागने, चरित्र,आचरण,संवाद, शिक्षा, स्वाध्याय आदि में कोई अनुशासन नहीं है,वो योगाभ्यास में एक कदम भी आगे नहीं बढा सकते हैं।यह अनुशासन कहीं दुकानों पर रुपये देकर नहीं मिलता है अपितु इससे प्रतिदिन अपने आचरण में स्थान देने का तप करना पड़ता है। किसी दूसरे का अनुशासन केवल उसके हित के लिये होता है।इसे कहीं से उधार भी नहीं लिया जा सकता है।यह किसी गुरु से भी नहीं मिलता है।यह पद, प्रतिष्ठा और बैंक बैलेंस से भी नहीं मिलता है। तथाकथित बड़े कहे जाने वाले लोगों का यह भ्रम रहता है कि उनको अनुशासन की आवश्यकता नहीं है। लेकिन उनका यह सोचना महामूर्खता है।
6.) योगाभ्यास में सफलता पाने के लिये किसी पाखंडी गुरु का सामीप्य और उससे नामदान या दीक्षा आदि लेना,कोई बड़ा प्रशासनिक पद, सामाजिक -राजनीतिक प्रतिष्ठा और बैंक बैलेंस आदि का महत्व बिल्कुल गौण यानी न के समान है।इस प्रकार की मूढताओं से बचना आवश्यक है। किसी योग्य और समर्थ गुरु के मार्गदर्शन में सतत् अभ्यास और अनासक्ति से साधना करते रहें। अभ्यास और अनासक्ति स्वयं ही करने होते हैं।कोई दूसरा आपके लिये यह सब नहीं कर सकता है।यह कोई ऐसा अनुष्ठान या कर्मकांड नहीं है जिसको करे कोई अन्य और फल आपको मिल जाये।ऐसा असंभव है। यहां सिफारिश नहीं चलती है। यहां चापलूसी और धनाढ्य होने की अकड़ नहीं चलती है।इसीलिये इसको शुरू में ही स्पष्ट करते हुये महर्षि पतंजलि कहते हैं -
अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोध:।। (योगसूत्र, समाधिपाद,12)
यानी सतत् अभ्यास और अनासक्ति से चित्त की वृत्तियों पर नियंत्रण हो सकता है।
7.) 'योग' कोई व्यायाम,कसरत, शारीरिक तोड़-मरोड़,सैर, प्रतियोगिता या खेल नहीं है।यह किसी से आगे जाने या किसी से पीछे होना नहीं है।यह स्वयं के द्वारा,स्वयं के ऊपर और स्वयं में रुपांतरण का विज्ञान है।पिछले कुछ वर्षों से 'योग' को एक खेल के रूप में प्रचलित करके एक प्रतियोगिता कहा जा रहा है।यह ठीक नहीं है। प्रतियोगिताओं के रूप में जो भी आजकल 21 जून को या योग केंद्रों और शिक्षा संस्थानों में किया जा रहा है,वह न तो योगासन है,न योगाभ्यास है बल्कि एक प्रकार की व्यायामासन खेल प्रतियोगिता है।इसका सनातन भारतीय योगाभ्यास से कोई भी संबंध नहीं है। इसके अतिरिक्त देश- विदेशों में योगाभ्यास की आड़ में जो हाटयोग,स्काईयोग, म्यूजिकयोग,
रोपयोग,रिदमयोग,वार्मअप योग,उछल-कूद योग,आईसयोग,वैपरयोग,बाबायोग,जग्गीयोग, श्री श्री योग आदि विभिन्न प्रकार के मूढतापूर्ण प्रयोग करवाये जा रहे हैं, उनका भी सनातन भारतीय योगाभ्यास से कोई लेना-देना नहीं है।इन सबसे साधकों को कुछ शारीरिक लाभ और गुरुओं को प्रसिद्धि के साथ धन- दौलत अवश्य मिल जाते हैं, लेकिन वृत्तियों के नियंत्रण में इनका कोई योगदान नहीं है।
8.) महर्षि पतंजलि ने एक महत्वपूर्ण सूत्र 'चित्तवृत्तिनिरोध' से भिन्न चित्त की अवस्था के संबंध में कहा है।जब चित्त की वृत्तियों पर द्रष्टा यानी किसी साधक या व्यक्ति का नियंत्रण नहीं होता है तो चित्त काम, क्रोध ,लोभ,मोह,द्वेष, ईर्ष्या, कामुकता, बदले की भावना,प्रेम, घृणा आदि वृत्तियों जैसा ही हो जाता है।चित्त के कार्य करने की प्रक्रिया जैसे जटिल विषय को इतनी सरलता और सहजता से आज तक किसी भी योगी और मनोविद् ने नहीं समझाया है। इससे एक विषयासक्त और इंद्रियजयी,भोगी और योगी व्यक्ति में भेद-रेखा स्पष्टता से पहचान में आ जाती है। भौतिकविद् भौतिक पदार्थ पर काम करते हैं जबकि अध्यात्मविद् चेतना पर काम करते हैं। आचार्य रजनीश ने महर्षि पतंजलि को चेतना का वैज्ञानिक कहा है। लाखों वर्षों के कालखंड में दस प्रसिद्ध भारतीय मनीषियों में उन्होंने महर्षि पतंजलि को भी गिनवाया है। चित्तवृत्तिनिरोध से भिन्न चित्त के संबंध में महर्षि पतंजलि कहते हैं -
वृत्तिसारुप्यमितरत्र।।( समाधिपाद,4)
9.) योग - महाविज्ञान में मौजूद श्वास और मन के परस्पर संबंध के रहस्य को उद्घाटित करते हुये हठयोगी स्वात्माराम ने कहा है-
चले वाते चलं चितं निश्चले निश्चलं भवेत्।
योगी स्थाणुत्वमाप्नोति ततो वायुं निरोधयेत्।।
( हठयोग प्रदीपिका,2/2)
इसका अर्थ है कि जब श्वास -प्रश्वास चलती है तो मन भी चलता है और जब श्वास -प्रश्वास पर नियंत्रण हो जाता है तो मन पर भी नियंत्रण हो जाता है। श्वास -प्रश्वास पर नियंत्रण होने से योगाभ्यासी को अचल मन: स्थिति प्राप्त हो जाती है। वह अडिग बन जाता है। बाहरी विषय उसे परेशान नहीं कर सकते। विषयों की ओर जाते हुये मन पर उसका पूर्ण नियंत्रण हो जाता है।इस श्लोक से यह पूरी तरह से समझ में आता है कि या तो श्वास -प्रश्वास पर नियंत्रण कर लो या फिर मन पर नियंत्रण कर लो। पहले वाले योग साधक को प्राणयोगी तथा दूसरे वाले योग साधक को राजयोगी कहा गया है। सीधे ही मन पर या विचारों पर नियंत्रण लगभग असम्भव है, इसलिये सर्वप्रथम यम,नियम, आसन वाले तीन अनुशासन में पारंगत होकर प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिये। प्राणायाम महर्षि पतंजलि के अष्टांगयोग में चौथा अनुशासन है।
10.) यहां पर ध्यान देने योग्य बात यह है कि चारों तरफ जो योग -केंद्रों, पार्कों,बाग- बगीचों, सरकारी कार्यालयों और शिक्षा -संस्थानों में योगाभ्यास करने वालों की भीड़-भाड़ दिखाई दे रही है,वह किस प्रकार का योगाभ्यास कर रही है?इस योगाभ्यास में महर्षि पतंजलि प्रोक्त योग के चौथे अनुशासन 'प्राणायाम' या हठयोग के ग्रंथों में वर्णित आठ प्रकार के प्राणायामों का सही तरीके से अभ्यास किया या करवाया जा रहा है या नहीं? भारत और विदेशों में स्थित लाखों योग -केंद्रों में से गिनती के योग केंद्र ऐसे होंगे, जहां पर सनातन शास्त्रीय मर्यादा अनुसार प्राणायाम का अभ्यास किया और करवाया जाता है। अधिकांश जगहों पर प्राणायाम की आड़ में सिर्फ गहरी श्वसन क्रिया का अभ्यास हो रहा है। सही तरीके से प्राणायाम करने के लिये सर्वप्रथम यम, नियमों को आचरण में स्थान देकर घंटे आधे घंटे तक एकासन में अविचल बैठने का अभ्यास आवश्यक है। आजकल के आपाधापी और व्यापार के युग में किसी के पास न तो इतना समय ही है तथा न ही किसी के पास इतना संयम और तप है। बड़े बड़े धुरंधर अंतरराष्ट्रीय योगी कहलाने वाले लोग भी प्राणायाम के नाम पर सिर्फ श्वास- प्रश्वास का अभ्यास कर और करवा रहे हैं।यही कारण है कि इस प्रकार के नकली प्राणायाम का कोई गहरा और स्थायी प्रभाव साधकों के शरीर, प्राण, विचार,मन और भावनाओं पर नहीं पड़ रहा है। और इसीलिये आजकल के इन प्रसिद्ध योगाचार्यों, संतों, बाबाओं और योग महर्षियों को या तो अपने आयुर्वेदिक उत्पाद के रूप में चूर्ण, चटनी,टाफी,जूस, च्यवनप्राश, हैल्थ ड्रिंक,जींस,कच्छे, बनियान,सैक्सवर्धक गोलियां
बनाकर बेचने पड़ रहे हैं या फिर गंडे, ताबीज़, कड़े,माला,धागे,भभूत, नारियल, मूर्तियां,लाकेट,अंगुठियां, रुद्राक्ष और मिट्टी आदि बेचने पड़ रहे हैं। इनके नकली योगाभ्यास , जल्दी सफलता पाने की महत्वाकांक्षा, धन- दौलत की चाह,अंधभक्तों की भीड़-भाड़, आलीशान आश्रमों का लालच और महंगी गाड़ियों की वासना और विज्ञापन की धूमधाम के कारण यह सब हो रहा है। यदि ऐसे उच्छृंखल भोगी लोगों को योगी या योगाचार्य कहोगे तो अभ्यास, वैराग्य, संयम, त्याग, तपस्या, करुणा , अपरिग्रह, संतोष, अहिंसा,सत्य, ब्रह्मचर्य,शौच, स्वाध्याय आदि का आचरण करने वाले योगियों को क्या कहोगे?
11.)पिछले 100-125 वर्षों के दौरान आसन को व्यायाम के रूप में प्रचलित करने में अनेक योगाचार्य सम्मिलित हैं।आसन के द्वारा शारीरिक सौष्ठव, सौंदर्य और देहयष्टि को सुडौल बनाने पर जोर देकर इन्होंने योग साधकों को'चित्तवृत्तिनिरोध' से दूर ले जाने में सहयोग करके योग के मूल-भाव को जनमानस से लुप्त सा कर दिया है।रह रहकर ये योगाचार्य मन नियंत्रण की बातें भी करते रहे लेकिन जनमानस में शरीर और इंद्रियों के प्रति सहज राग होने के कारण उन्हें योग का यह विकृत और आधा अधुरा रुप ही ठीक लगा। 'महाजनों येन गत: स पंथा' की सीख को शिरोधार्य करके इन्होंने इसे ही वास्तविक योग स्वीकार कर लिया। पाश्चात्य औपनिवेशिक विचारकों का भी यही लक्ष्य था कि किसी तरह मन नियंत्रण वाली इस सनातन योग विद्या को अब्राहमिक भौतिकवादी जडवादी उपयोगितावादी रुप दे दिया जाये। योगेन्द्र,कुवलयानंद,कृष्णामाचार्य, अयंगर, भारतीय योग संस्थान,आर्य वीर दल, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और बाद में रामदेव आदि द्वारा इसी को खूब प्रचारित किया गया।आज यह शारीरिक तोड़-मरोड़ वाला व्यायाम,कसरत और खेल ही योग बनकर रह गया है। लेकिन यह पूरी तरह से भटकाव है। आश्चर्यजनक है कि इनमें से आर्यसमाज को छोड़कर किसी संगठन ने भी भारत की स्वतंत्रता के संग्राम में हिस्सा नहीं लिया। पता नहीं किसलिये ये अपने शरीरों को मजबूत बना रहे थे?21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मनाने में भी योग की यही आधकचरी अवधारणा प्रचारित हो गई है।
12.) महर्षि पतंजलि ने अपने 5500 वर्षों पुरातन 'योगसूत्र' में आसन को अष्टांगयोग में तीसरा अनुशासन कहा है। इसमें आसन को देह की स्थिरता, सहजता,दृढता आदि के रूप में लिया है।आसन को स्पष्ट करते हुये महर्षि पतंजलि ने तीन सूत्र दिये हैं -
स्थिरसुखमासनम्।।
प्रयत्नशैथिल्यअनंतसमाप्तिभ्याम्।।
ततो द्वंद्वान्भिघात:।।
(योगसूत्र,साधनपाद,46-48)
इनका अर्थ है स्थिरता और सुखपूर्वक बैठना आसन है।आसन में इस प्रकार बैठने से शरीर की सभी हलचल समाप्त होकर साधक अपने निज स्वरूप में स्थित होने की ओर अग्रसर होता है। इससे सुख- दुख, सर्दी- गर्मी और मौसम परिवर्तन को सहने की योग्यता अर्जित हो जाती है। इसके पश्चात् ही कोई योग- साधक योग के चौथे अनुशासन 'प्राणायाम' का अभ्यास करने में समर्थ होता है। ध्यान रखने की बात यह है कि इस प्रकार से आसन का अभ्यास शायद ही कोई योग -केंद्र या योगाश्रम करवाता होगा। वास्तविकता यह है कि आसन की जिस अवधारणा को आजकल प्रचलित कर दिया गया है,वह अवधारणा पुरातन काल में नटों और युद्धक कला का अभ्यास करने वालों के लिये होती थी।इसे आजकल 'मार्शल आर्ट' कह दिया जाता है।भारत की पुरातन युद्धक कला 'कलारीपयट्टू' से ही संसार की सभी मार्शल आर्ट का विकास हुआ है।
13.) 'योगा फार हैल्दी एजिंग' का लक्ष्य केवल कसरत करने, व्यायाम करने, शारीरिक तोड़-मरोड़ करने और नटबाजी से कैसे हासिल होगा?इस पर विचार न करके अरबों रुपए प्रचार -प्रसार पर उडाये जा रहे हैं।कसरत और व्यायाम करना तो पहले से ही मौजूद है। क्या ऐसे लोगों का बुढ़ापा सुखप्रद और आरोग्यप्रद होता है? कहीं ऐसा दिखाई तो नहीं दे रहा है।हर तरफ चिकित्सकों के वहां पचास-साठ वर्ष के लोगों की भीड़ लगी रहती है।अस्थमा,श्वास ,शूगर, खांसी,घूटनों की खराबी, जोड़ों में दर्द,लीवर सूजन,गूर्दो में विकार, मोतियाबिंद आदि भयंकर बिमारियों से ग्रस्त बुजुर्ग लोगों की चिकित्सा या इन बिमारियों की रोकथाम क्या कसरत, व्यायाम, नटबाजी रुपी नकली योगाभ्यास से हो जायेगी?साक्ष्य आधारित विज्ञान का युग होने का दंभ भरने वाले शिक्षक, प्रोफेसर, चिकित्सक, योगाचार्य, वैज्ञानिक, शोधार्थी भी इस विषय पर प्रश्न, जिज्ञासा, संदेह नहीं कर रहे हैं। चापलूसी,अंधभक्ति, हां जी - हां जी करके मूंडी हिलाने वाली मंदबुद्धि भीड़ सनातन- विद्या 'योग और योगाभ्यास' का कल्याण कैसे करेगी? किसी को भी इसकी चिंता नहीं है। सभी अपने- अपने नंबर बनाने, फोटो खिंचवाने और सर्टिफिकेट लेने में लगे हुये हैं।
14.)छुटभय्ये वैज्ञानिक भी होते हैं।अधकचरे वैज्ञानिक भी होते हैं।प्रकृति को केवल भोग की वस्तु मानने वाले वैज्ञानिक ही होते हैं। सुंदर धरती ग्रह को अधिकांश जीव- जंतुओं के लिये नारकीय बना देने वाले भी वैज्ञानिक ही होते हैं। एकतरफा तथ्य को महत्व देकर सत्य के विरोधी भी वैज्ञानिक होते हैं। मनुष्य में मौजूद अनेक प्रकार की शक्तियों में से केवल विचार को प्रधान मानकर भाव के विरोधी भी वैज्ञानिक ही होते हैं।स्वार्थ और बस उपयोगिता की प्रधानता।यूज एंड थ्रो और डिवाईड एंड रूल।तोडते जाओ और तोड़ते जाओ।गुरुओं और वैज्ञानिकों का यह धंधा बन चुका है। दोनों एक ही नाव में सवार हैं। समझे बिना स्वीकार मत करो। और यदि समझ गये तो स्वीकार अस्वीकार व्यर्थ हो जायेंगे। किसी को पकड़ा तो धोखा खाओगे और यदि नहीं पकड़ा तो पश्चाताप रहेगा कि पकड़ लेते तो पता नहीं कौनसी क्रांति हो जाती।सब कुछ अधकचरा, अपरिपक्व और सतही सा है।इन सबके बीच में हमारी स्वयं की समझ साथ निभाती है। लेकिन उस पर विश्वास न करके किसी गुरु, वैज्ञानिक, ग्रंथ, संप्रदाय पर विश्वास करने की ओर बढ जाते हैं। आज हालात यह हो गई है कि स्वयं की समझ को उजागर करने में हमारे गुरु और भौतिकविद् दोनों बाधा बने हुये हैं। इसमें जिस विषय से सर्वाधिक मदद मिल सकती है,उस विषय 'योग और योगाभ्यास' का कबाड़ा कर दिया गया है। जहां भौतिक विज्ञान के अपने नियम और अनुशासन होते हैं, वहीं पर 'योग- महाविज्ञान' के अपने नियम, अनुशासन,संयम, तपस्या और सावधानियां आदि होते हैं। लेकिन महीना दो महीना शारीरिक कसरत और उठा-पटक करवाकर लोगों को प्रामाणिक योग शिक्षक के सर्टिफिकेट लाखों की संख्या में वितरित किये जा रहे हैं। जिनको इस योग विद्या का क ख ग भी नहीं आता है,वो भी भारत प्रसिद्ध योगाचार्य और योग -विशेषज्ञ बनकर लाखों लोगों को योगाभ्यास करवा रहे हैं।
15.)आगे को बढी और नीचे लटकी हुई बड़ी- बड़ी तोंद, भारी- भरकम कमर,आंखों पर बड़े -बड़े चश्मे,टाईट पोशाक,चमड़े की धारण की हुई टाईट बैल्ट और धन- दौलत -पद- प्रतिष्ठा- प्रधानी की हिमालय समान अकड़ - आज के अधिकांश योग- शिक्षकों और योगाभ्यास के हिमायतियों की यही पहचान है। कोई कुछ टिप्पणी कर दे तो देशद्रोही, पाकिस्तानी, खालिस्तानी घोषित कर देंगे।इनकी हरेक तर्कहीन और उल्टी-सीधी बात को मान लो तो ठीक वरना आपकी खैर नहीं। ज्यों ही कोई विद्या या विषय या व्यक्ति प्रसिद्ध हुआ नहीं कि वोट के भूखे लूटरे नेता लोग वहां पर जबरदस्ती से प्रवेश करके सब गुड़ गोबर कर देते हैं। और आजकल के योगाचार्यों और धर्माचार्यों को मोह, माया,पद,प्रतिष्ठा,धन, दौलत से इतना अधिक लगाव है कि ये तुरंत धूर्त नेताओं से सांठगांठ कर लेते हैं।योग और योगाभ्यास जाये भाड़ में।बस भारत और भारत से बाहर यही चल रहा है।
......
डॉ. शीलक राम आचार्य
दर्शनशास्त्र-विभाग
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय
कुरुक्षेत्र -136119'योग और योगाभ्यास' पर अयोग्य योग-शिक्षकों का कब्जा
.........
1.)सामुहिक रुप से योगाभ्यास एक छलावा है। भीड़-भाड़ एकत्र करके कुछ शारीरिक व्यायाम करवाना किसी भी दृष्टिकोण से योगाभ्यास नहीं है।वार्म अप, सुक्ष्म क्रियाएं, हल्के व्यायाम या फिर सूक्ष्म व्यायाम शारीरिक निरोगता के लिये लाभकारी होते हैं, लेकिन इसे योगाभ्यास नहीं कहा जा सकता है। वैसे तो देश विदेश में वर्ष भर योग शिविर,योग कक्षाएं, योगाभ्यास कक्षाएं या ध्यान शिविर वगैरह चलते रहते हैं लेकिन 21 जून के आसपास इसका जुनून विशेष रूप से देखने को मिलता है।जिसे देखो वही मैट या चद्दर या योग साधक की चदरिया ओढ़े दिखाई पड़ता है।पार्क,उद्यान,हाल,योग संस्थान,झील, तालाब आदि के आसपास लोगों की भीड़-भाड़ योगाभ्यास की आड़ में शारीरिक तोड़-मरोड़ करती देखी जा सकती है। लेकिन यह सब करना योगाभ्यास नहीं है।मोटे पेट, थुलथुल पेट,भारी भरकम कमर, चलने में अशक्त, पेंट शर्ट बैल्ट धारण किये,जीभ के गुलाम, अनुशासनहीन,क्रोध की साक्षात् मूर्ति, मांस -मीट- अंडाभक्षी, जींसधारी, शराबी,शबाबी आदि सभी योगाभ्यास के लाभ गिनवाते हुये या योगाभ्यास की आड़ में हल्की कसरतें करते हुये देखे जा सकते हैं।
2.) योगाभ्यास भारतवर्ष की पुरातन सनातन वैदिक विद्या है।यह एक अनुशासन है।यह किसी शास्त्र को रटना न होकर शुद्ध रूप से संयम है।यह योग संबंथी पुस्तकों, ग्रंथों और योगियों की जीवनियों का अध्ययन मात्र न करके एक प्रायोगिक चेतना का विज्ञान है।यह केवल कोई सिद्धांत,वाद,मत, विचार आदि न होकर एक साधना द्वारा अनुभूति का शास्त्र है।यह जीवन जीने की कला है।यह जीवन का विज्ञान है।यह चेतना का विज्ञान है।यह केवल परीक्षा का विषय न होकर दीक्षा, साधना और स्वानुभूति है।यह निज स्वरूप में ठहलना है।यह होश, जागरण, सजगता और विवेक का तप है।यह निर्विचार चेतना में होना है।यह विचारों पर नियंत्रण है।यह स्वयं के चित्त को मल ,विकार और अशुद्धियों से खाली करके स्वयं की चेतना को पारदर्शी बनाना है।योग कोई दिखावा नहीं अपितु दिखावा करने वाले मन को समझना है।योग केवल शुष्क तर्क - वितर्क न होकर तर्कातीत की यात्रा है। इसमें तर्क- वितर्क का भी सम्मान है लेकिन वहां से आगे जाना भी है।योग संसार विरोध नहीं अपितु संसार रहते हुये भी निर्विकार,निश्छल और निस्पंद होना है।योग अपनी सोई शक्तियों का जागरण करके उनका सृजनात्मक उपयोग है।योग विभूतियों और सिद्धियों का प्रदाता है लेकिन इन्हीं में फंसकर नहीं रह जाना है।
योग 'स्व' और 'पर' में सामंजस्य है।योग संसार और अध्यात्म में समन्वय है।योग इहलोक और परलोक में मैत्री है।योग संयोग और वियोग में समरसता है।योग चित्त वृत्तियों को समझकर उन पर नियंत्रण है।योग चित्त की वृत्तियों का प्रबोध है।योग चित्तवृत्तिनिरोध और चित्तवृत्तिप्रबोध में रहते हुये निष्कंप चेतना में होना है।योग वर्तमान में होना है। बाहरी सभी पहचान से आगे बढ़कर स्वयं को जानना योग है।परिधि और केंद्र, बाहर और भीतर,तुम और मैं - इनमें एकसूत्रता समझकर अद्वैतानुभूति योग है।एक व्यक्ति के अस्तित्व के जितने भी स्तर हैं,उन सबको शुद्ध करते हुये परम चेतना में होना योग है।समाज, व्यक्ति,शरीर,श्रास- प्रश्वास,प्राण, विचार, भावना आदि से होशपूर्ण जुड़ाव रखते हुये अस्तित्व से जुड़ाव करना योग है।जीवन में मौजूद टूटन,बिखराव,अकेलेपन को जानकर अपने मूल स्थान का साक्षात्कार योग है। उपरोक्त दी गई परिभाषाओं में शारीरिक तोड़-मरोड़ को किसी ने योग की संज्ञा नहीं दी है। व्यायाम या सूक्ष्म क्रियाओं को किसी ने भी योग नहीं कहा है।दिखावे को किसी ने योग नहीं कहा है।केवल मैट,लोवर,ढीले वस्त्र और योग साधक या योग शिक्षक लिखी गई बनियान पहनने को किसी ने भी योग नहीं कहा है। भीड़-भाड़ में जाकर गप्पें मारने को किसी ने योग नहीं कहा है। किसी योगी का अंधभक्त बनने को भी किसी न योग नहीं कहा है।
3.)भारत और भारत से बाहर जितना भी योग -केंद्रों का पंजीकरण बढता जा रहा है, उतना ही योग की आड़ में पाखंड, ढोंग, दिखावा, शोषण और दुकानदारी बढते जा रहे हैं। भारत में योग और योगाभ्यास की आड़ में राजनीति भी खूब की जा रही है।एक प्रसिद्ध व्यापारी बाबा ने तो एक पार्टी विशेष को सत्ता में लाने के लिये अपने अंधभक्त अनुयायियों को उस पार्टी के समर्थन में करोड़ों की संख्या में वोट डालने के लिये विवश किया था। पैंतीस रुपये प्रति लीटर पैट्रोल और डीजल,सस्ती रसोई गैस , विदेशी बैंकों से लाखों करोड़ का काला धन वापसी, राष्ट्रवाद की स्थापना,भारत को विश्वगुरु बनाने , शिक्षा के स्वदेशीकरण आदि के बड़े,-बड़े महाझूठ बोलने का घृणित कुकृत्य एक योगी कहलाने वाला व्यक्ति कैसे कर सकता है? लेकिन भारत में हमने यह सब होते हुये भी देख लिया है। ध्यान रहे कि यह न तो योग है,न भोग है,न संयोग है,न उद्योग (सद्कर्म) है, अपितु यह हमारे भारत के लिये कैंसर,तपेदिक और कोरोना से भी खतरनाक महारोग है। अपने व्यापारिक हित साधने के लिये ऐसे नकली और ढोंगी योगियों ने इस देश को खूब मूर्ख बनाया हुआ है। इनसे सावधान रहने की आवश्यकता है।इनकी पहुंच हमारे राजनीतिक, प्रशासनिक,विधिक सिस्टम में बहुत ऊपर तक है।
4.)योग और योगाभ्यास के सूत्र सर्वप्रथम वेदों में मौजूद हैं। वहीं से प्रेरणा पाकर ऋषियों ने योग संबंधित शास्त्रों की रचना समय -समय पर की है।दो सो से अधिक उपनिषद् योग, योगाभ्यास, साधना और अध्यात्म के ही पुराने साक्ष्य हैं।कुछ उपनिषद् तो दस हजार - बीस हजार वर्षों से भी अधिक पुराने हैं। औपनिवेशिक सोच के कारण इनको नया सिद्ध किया जा रहा हो,यह उनका सनातन धर्म और संस्कृति के प्रति द्वेषभाव है। पिछले साढ़े पांच हजार वर्षों के दौरान योग संबंधित अनेक ग्रंथ लिखे गये थे लेकिन यवन, ईसाई और इस्लामी हमलावरों के हमलों में काफी ग्रंथ नष्ट कर दिये गये। महर्षि पतंजलि रचित 'योगसूत्र' फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथ मौजूद है। इसमें 195 सूत्र और चार पाद मौजूद हैं।इसी ग्रंथ के अनुकरण पर विभिन्न धाराओं के योगियों यथा श्रमण, स्वामी,संन्यासी, भिक्षु, मुनि और योग- साधक आदि ने अपने -अपने मतों में योगाभ्यास की विभिन्न विधियों को विकसित किया। सबका मूल महर्षि पतंजलि के ग्रंथ 'योगसूत्र' में मिल जायेगा।इसी का अनुकरण और अनुसरण करते हुये अष्टांगयोग,सप्तांगयोग,षडंगयोग,
राजयोग,हठयोग,प्राणयोग,जपयोग,मंत्रयोग, कुंडलिनी योग, कर्मयोग,भक्तियोग,ज्ञानयोग,तंत्रयोग,ध्यानयोग,सहजयोग,सूरतशब्दयोग आदि सैकड़ों प्रकार के योग -मतों का प्रचलन हुआ है।
5.)योगसूत्र के प्रथम तीन सूत्र बड़े महत्व के हैं। बाकी योगसूत्र में इन तीन सूत्रों का विस्तृत व्याख्यान मात्र है।प्रथम सूत्र में योग को अनुशासन कहा गया है। अनुशासन के सिवाय योग कुछ नहीं है।योग की शुरुआत,योग का पथ,योग की उपलब्धि और योग उसके पश्चात् का जीवन -इन सभी स्तरों पर अनुशासन ही प्रधान है। यदि अनुशासन नहीं तो योग नहीं। बिना अनुशासन के योग एक भ्रम है।जो लोग अपनी दिनचर्या, जीवनचर्या,आहार -विहार, खान-पान, निद्रा और जागरण तथा योगाभ्यास में अनुशासन का पालन नहीं करते,वो योगाभ्यास में एक कदम भी आगे नहीं रख सकते हैं।योग के प्रथम तीन सूत्र इस प्रकार से हैं -
अथ योगानुशासनम्।।
योगश्चित्तवृत्तिनिरोध:।।
तदा द्रष्टु स्वरूप अवस्थानम्।।(योगसूत्र, समाधिपाद,1-3)
इनका अर्थ है कि अब योग के अनुशासन को बतलाया जाता है।
योग चित्त की वृत्तियों पर नियंत्रण है। योगाभ्यास से द्रष्टा की अपने स्वरूप में स्थिति हो जाती है। यदि चहुंओर दृष्टि को किया जाये तो मालूम होगा कि लोग स्वयं अनुशासित न होकर केवल अन्यों को अनुशासित होने की सीख देते मिल जायेंगे। लेकिन जो व्यक्ति स्वयं अनुशासित नहीं है,वह दूसरों को अनुशासित होने की सीख कैसे दे सकता है? और यदि वह ऐसा करेगा भी तो उसकी सीख का किसी पर कोई प्रभाव पड़ने वाला नहीं है।सब सबको अनुशासन सिखला रहे हैं लेकिन स्वयं उच्छृंखल बने हुये हैं।जिनका स्वयं के आहार,विहार,पोशाक,सोने,जागने, चरित्र,आचरण,संवाद, शिक्षा, स्वाध्याय आदि में कोई अनुशासन नहीं है,वो योगाभ्यास में एक कदम भी आगे नहीं बढा सकते हैं।यह अनुशासन कहीं दुकानों पर रुपये देकर नहीं मिलता है अपितु इससे प्रतिदिन अपने आचरण में स्थान देने का तप करना पड़ता है। किसी दूसरे का अनुशासन केवल उसके हित के लिये होता है।इसे कहीं से उधार भी नहीं लिया जा सकता है।यह किसी गुरु से भी नहीं मिलता है।यह पद, प्रतिष्ठा और बैंक बैलेंस से भी नहीं मिलता है। तथाकथित बड़े कहे जाने वाले लोगों का यह भ्रम रहता है कि उनको अनुशासन की आवश्यकता नहीं है। लेकिन उनका यह सोचना महामूर्खता है।
6.) योगाभ्यास में सफलता पाने के लिये किसी पाखंडी गुरु का सामीप्य और उससे नामदान या दीक्षा आदि लेना,कोई बड़ा प्रशासनिक पद, सामाजिक -राजनीतिक प्रतिष्ठा और बैंक बैलेंस आदि का महत्व बिल्कुल गौण यानी न के समान है।इस प्रकार की मूढताओं से बचना आवश्यक है। किसी योग्य और समर्थ गुरु के मार्गदर्शन में सतत् अभ्यास और अनासक्ति से साधना करते रहें। अभ्यास और अनासक्ति स्वयं ही करने होते हैं।कोई दूसरा आपके लिये यह सब नहीं कर सकता है।यह कोई ऐसा अनुष्ठान या कर्मकांड नहीं है जिसको करे कोई अन्य और फल आपको मिल जाये।ऐसा असंभव है। यहां सिफारिश नहीं चलती है। यहां चापलूसी और धनाढ्य होने की अकड़ नहीं चलती है।इसीलिये इसको शुरू में ही स्पष्ट करते हुये महर्षि पतंजलि कहते हैं -
अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोध:।। (योगसूत्र, समाधिपाद,12)
यानी सतत् अभ्यास और अनासक्ति से चित्त की वृत्तियों पर नियंत्रण हो सकता है।
7.) 'योग' कोई व्यायाम,कसरत, शारीरिक तोड़-मरोड़,सैर, प्रतियोगिता या खेल नहीं है।यह किसी से आगे जाने या किसी से पीछे होना नहीं है।यह स्वयं के द्वारा,स्वयं के ऊपर और स्वयं में रुपांतरण का विज्ञान है।पिछले कुछ वर्षों से 'योग' को एक खेल के रूप में प्रचलित करके एक प्रतियोगिता कहा जा रहा है।यह ठीक नहीं है। प्रतियोगिताओं के रूप में जो भी आजकल 21 जून को या योग केंद्रों और शिक्षा संस्थानों में किया जा रहा है,वह न तो योगासन है,न योगाभ्यास है बल्कि एक प्रकार की व्यायामासन खेल प्रतियोगिता है।इसका सनातन भारतीय योगाभ्यास से कोई भी संबंध नहीं है। इसके अतिरिक्त देश- विदेशों में योगाभ्यास की आड़ में जो हाटयोग,स्काईयोग, म्यूजिकयोग,
रोपयोग,रिदमयोग,वार्मअप योग,उछल-कूद योग,आईसयोग,वैपरयोग,बाबायोग,जग्गीयोग, श्री श्री योग आदि विभिन्न प्रकार के मूढतापूर्ण प्रयोग करवाये जा रहे हैं, उनका भी सनातन भारतीय योगाभ्यास से कोई लेना-देना नहीं है।इन सबसे साधकों को कुछ शारीरिक लाभ और गुरुओं को प्रसिद्धि के साथ धन- दौलत अवश्य मिल जाते हैं, लेकिन वृत्तियों के नियंत्रण में इनका कोई योगदान नहीं है।
8.) महर्षि पतंजलि ने एक महत्वपूर्ण सूत्र 'चित्तवृत्तिनिरोध' से भिन्न चित्त की अवस्था के संबंध में कहा है।जब चित्त की वृत्तियों पर द्रष्टा यानी किसी साधक या व्यक्ति का नियंत्रण नहीं होता है तो चित्त काम, क्रोध ,लोभ,मोह,द्वेष, ईर्ष्या, कामुकता, बदले की भावना,प्रेम, घृणा आदि वृत्तियों जैसा ही हो जाता है।चित्त के कार्य करने की प्रक्रिया जैसे जटिल विषय को इतनी सरलता और सहजता से आज तक किसी भी योगी और मनोविद् ने नहीं समझाया है। इससे एक विषयासक्त और इंद्रियजयी,भोगी और योगी व्यक्ति में भेद-रेखा स्पष्टता से पहचान में आ जाती है। भौतिकविद् भौतिक पदार्थ पर काम करते हैं जबकि अध्यात्मविद् चेतना पर काम करते हैं। आचार्य रजनीश ने महर्षि पतंजलि को चेतना का वैज्ञानिक कहा है। लाखों वर्षों के कालखंड में दस प्रसिद्ध भारतीय मनीषियों में उन्होंने महर्षि पतंजलि को भी गिनवाया है। चित्तवृत्तिनिरोध से भिन्न चित्त के संबंध में महर्षि पतंजलि कहते हैं -
वृत्तिसारुप्यमितरत्र।।( समाधिपाद,4)
9.) योग - महाविज्ञान में मौजूद श्वास और मन के परस्पर संबंध के रहस्य को उद्घाटित करते हुये हठयोगी स्वात्माराम ने कहा है-
चले वाते चलं चितं निश्चले निश्चलं भवेत्।
योगी स्थाणुत्वमाप्नोति ततो वायुं निरोधयेत्।।
( हठयोग प्रदीपिका,2/2)
इसका अर्थ है कि जब श्वास -प्रश्वास चलती है तो मन भी चलता है और जब श्वास -प्रश्वास पर नियंत्रण हो जाता है तो मन पर भी नियंत्रण हो जाता है। श्वास -प्रश्वास पर नियंत्रण होने से योगाभ्यासी को अचल मन: स्थिति प्राप्त हो जाती है। वह अडिग बन जाता है। बाहरी विषय उसे परेशान नहीं कर सकते। विषयों की ओर जाते हुये मन पर उसका पूर्ण नियंत्रण हो जाता है।इस श्लोक से यह पूरी तरह से समझ में आता है कि या तो श्वास -प्रश्वास पर नियंत्रण कर लो या फिर मन पर नियंत्रण कर लो। पहले वाले योग साधक को प्राणयोगी तथा दूसरे वाले योग साधक को राजयोगी कहा गया है। सीधे ही मन पर या विचारों पर नियंत्रण लगभग असम्भव है, इसलिये सर्वप्रथम यम,नियम, आसन वाले तीन अनुशासन में पारंगत होकर प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिये। प्राणायाम महर्षि पतंजलि के अष्टांगयोग में चौथा अनुशासन है।
10.) यहां पर ध्यान देने योग्य बात यह है कि चारों तरफ जो योग -केंद्रों, पार्कों,बाग- बगीचों, सरकारी कार्यालयों और शिक्षा -संस्थानों में योगाभ्यास करने वालों की भीड़-भाड़ दिखाई दे रही है,वह किस प्रकार का योगाभ्यास कर रही है?इस योगाभ्यास में महर्षि पतंजलि प्रोक्त योग के चौथे अनुशासन 'प्राणायाम' या हठयोग के ग्रंथों में वर्णित आठ प्रकार के प्राणायामों का सही तरीके से अभ्यास किया या करवाया जा रहा है या नहीं? भारत और विदेशों में स्थित लाखों योग -केंद्रों में से गिनती के योग केंद्र ऐसे होंगे, जहां पर सनातन शास्त्रीय मर्यादा अनुसार प्राणायाम का अभ्यास किया और करवाया जाता है। अधिकांश जगहों पर प्राणायाम की आड़ में सिर्फ गहरी श्वसन क्रिया का अभ्यास हो रहा है। सही तरीके से प्राणायाम करने के लिये सर्वप्रथम यम, नियमों को आचरण में स्थान देकर घंटे आधे घंटे तक एकासन में अविचल बैठने का अभ्यास आवश्यक है। आजकल के आपाधापी और व्यापार के युग में किसी के पास न तो इतना समय ही है तथा न ही किसी के पास इतना संयम और तप है। बड़े बड़े धुरंधर अंतरराष्ट्रीय योगी कहलाने वाले लोग भी प्राणायाम के नाम पर सिर्फ श्वास- प्रश्वास का अभ्यास कर और करवा रहे हैं।यही कारण है कि इस प्रकार के नकली प्राणायाम का कोई गहरा और स्थायी प्रभाव साधकों के शरीर, प्राण, विचार,मन और भावनाओं पर नहीं पड़ रहा है। और इसीलिये आजकल के इन प्रसिद्ध योगाचार्यों, संतों, बाबाओं और योग महर्षियों को या तो अपने आयुर्वेदिक उत्पाद के रूप में चूर्ण, चटनी,टाफी,जूस, च्यवनप्राश, हैल्थ ड्रिंक,जींस,कच्छे, बनियान,सैक्सवर्धक गोलियां
बनाकर बेचने पड़ रहे हैं या फिर गंडे, ताबीज़, कड़े,माला,धागे,भभूत, नारियल, मूर्तियां,लाकेट,अंगुठियां, रुद्राक्ष और मिट्टी आदि बेचने पड़ रहे हैं। इनके नकली योगाभ्यास , जल्दी सफलता पाने की महत्वाकांक्षा, धन- दौलत की चाह,अंधभक्तों की भीड़-भाड़, आलीशान आश्रमों का लालच और महंगी गाड़ियों की वासना और विज्ञापन की धूमधाम के कारण यह सब हो रहा है। यदि ऐसे उच्छृंखल भोगी लोगों को योगी या योगाचार्य कहोगे तो अभ्यास, वैराग्य, संयम, त्याग, तपस्या, करुणा , अपरिग्रह, संतोष, अहिंसा,सत्य, ब्रह्मचर्य,शौच, स्वाध्याय आदि का आचरण करने वाले योगियों को क्या कहोगे?
11.)पिछले 100-125 वर्षों के दौरान आसन को व्यायाम के रूप में प्रचलित करने में अनेक योगाचार्य सम्मिलित हैं।आसन के द्वारा शारीरिक सौष्ठव, सौंदर्य और देहयष्टि को सुडौल बनाने पर जोर देकर इन्होंने योग साधकों को'चित्तवृत्तिनिरोध' से दूर ले जाने में सहयोग करके योग के मूल-भाव को जनमानस से लुप्त सा कर दिया है।रह रहकर ये योगाचार्य मन नियंत्रण की बातें भी करते रहे लेकिन जनमानस में शरीर और इंद्रियों के प्रति सहज राग होने के कारण उन्हें योग का यह विकृत और आधा अधुरा रुप ही ठीक लगा। 'महाजनों येन गत: स पंथा' की सीख को शिरोधार्य करके इन्होंने इसे ही वास्तविक योग स्वीकार कर लिया। पाश्चात्य औपनिवेशिक विचारकों का भी यही लक्ष्य था कि किसी तरह मन नियंत्रण वाली इस सनातन योग विद्या को अब्राहमिक भौतिकवादी जडवादी उपयोगितावादी रुप दे दिया जाये। योगेन्द्र,कुवलयानंद,कृष्णामाचार्य, अयंगर, भारतीय योग संस्थान,आर्य वीर दल, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और बाद में रामदेव आदि द्वारा इसी को खूब प्रचारित किया गया।आज यह शारीरिक तोड़-मरोड़ वाला व्यायाम,कसरत और खेल ही योग बनकर रह गया है। लेकिन यह पूरी तरह से भटकाव है। आश्चर्यजनक है कि इनमें से आर्यसमाज को छोड़कर किसी संगठन ने भी भारत की स्वतंत्रता के संग्राम में हिस्सा नहीं लिया। पता नहीं किसलिये ये अपने शरीरों को मजबूत बना रहे थे?21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मनाने में भी योग की यही आधकचरी अवधारणा प्रचारित हो गई है।
12.) महर्षि पतंजलि ने अपने 5500 वर्षों पुरातन 'योगसूत्र' में आसन को अष्टांगयोग में तीसरा अनुशासन कहा है। इसमें आसन को देह की स्थिरता, सहजता,दृढता आदि के रूप में लिया है।आसन को स्पष्ट करते हुये महर्षि पतंजलि ने तीन सूत्र दिये हैं -
स्थिरसुखमासनम्।।
प्रयत्नशैथिल्यअनंतसमाप्तिभ्याम्।।
ततो द्वंद्वान्भिघात:।।
(योगसूत्र,साधनपाद,46-48)
इनका अर्थ है स्थिरता और सुखपूर्वक बैठना आसन है।आसन में इस प्रकार बैठने से शरीर की सभी हलचल समाप्त होकर साधक अपने निज स्वरूप में स्थित होने की ओर अग्रसर होता है। इससे सुख- दुख, सर्दी- गर्मी और मौसम परिवर्तन को सहने की योग्यता अर्जित हो जाती है। इसके पश्चात् ही कोई योग- साधक योग के चौथे अनुशासन 'प्राणायाम' का अभ्यास करने में समर्थ होता है। ध्यान रखने की बात यह है कि इस प्रकार से आसन का अभ्यास शायद ही कोई योग -केंद्र या योगाश्रम करवाता होगा। वास्तविकता यह है कि आसन की जिस अवधारणा को आजकल प्रचलित कर दिया गया है,वह अवधारणा पुरातन काल में नटों और युद्धक कला का अभ्यास करने वालों के लिये होती थी।इसे आजकल 'मार्शल आर्ट' कह दिया जाता है।भारत की पुरातन युद्धक कला 'कलारीपयट्टू' से ही संसार की सभी मार्शल आर्ट का विकास हुआ है।
13.) 'योगा फार हैल्दी एजिंग' का लक्ष्य केवल कसरत करने, व्यायाम करने, शारीरिक तोड़-मरोड़ करने और नटबाजी से कैसे हासिल होगा?इस पर विचार न करके अरबों रुपए प्रचार -प्रसार पर उडाये जा रहे हैं।कसरत और व्यायाम करना तो पहले से ही मौजूद है। क्या ऐसे लोगों का बुढ़ापा सुखप्रद और आरोग्यप्रद होता है? कहीं ऐसा दिखाई तो नहीं दे रहा है।हर तरफ चिकित्सकों के वहां पचास-साठ वर्ष के लोगों की भीड़ लगी रहती है।अस्थमा,श्वास ,शूगर, खांसी,घूटनों की खराबी, जोड़ों में दर्द,लीवर सूजन,गूर्दो में विकार, मोतियाबिंद आदि भयंकर बिमारियों से ग्रस्त बुजुर्ग लोगों की चिकित्सा या इन बिमारियों की रोकथाम क्या कसरत, व्यायाम, नटबाजी रुपी नकली योगाभ्यास से हो जायेगी?साक्ष्य आधारित विज्ञान का युग होने का दंभ भरने वाले शिक्षक, प्रोफेसर, चिकित्सक, योगाचार्य, वैज्ञानिक, शोधार्थी भी इस विषय पर प्रश्न, जिज्ञासा, संदेह नहीं कर रहे हैं। चापलूसी,अंधभक्ति, हां जी - हां जी करके मूंडी हिलाने वाली मंदबुद्धि भीड़ सनातन- विद्या 'योग और योगाभ्यास' का कल्याण कैसे करेगी? किसी को भी इसकी चिंता नहीं है। सभी अपने- अपने नंबर बनाने, फोटो खिंचवाने और सर्टिफिकेट लेने में लगे हुये हैं।
14.)छुटभय्ये वैज्ञानिक भी होते हैं।अधकचरे वैज्ञानिक भी होते हैं।प्रकृति को केवल भोग की वस्तु मानने वाले वैज्ञानिक ही होते हैं। सुंदर धरती ग्रह को अधिकांश जीव- जंतुओं के लिये नारकीय बना देने वाले भी वैज्ञानिक ही होते हैं। एकतरफा तथ्य को महत्व देकर सत्य के विरोधी भी वैज्ञानिक होते हैं। मनुष्य में मौजूद अनेक प्रकार की शक्तियों में से केवल विचार को प्रधान मानकर भाव के विरोधी भी वैज्ञानिक ही होते हैं।स्वार्थ और बस उपयोगिता की प्रधानता।यूज एंड थ्रो और डिवाईड एंड रूल।तोडते जाओ और तोड़ते जाओ।गुरुओं और वैज्ञानिकों का यह धंधा बन चुका है। दोनों एक ही नाव में सवार हैं। समझे बिना स्वीकार मत करो। और यदि समझ गये तो स्वीकार अस्वीकार व्यर्थ हो जायेंगे। किसी को पकड़ा तो धोखा खाओगे और यदि नहीं पकड़ा तो पश्चाताप रहेगा कि पकड़ लेते तो पता नहीं कौनसी क्रांति हो जाती।सब कुछ अधकचरा, अपरिपक्व और सतही सा है।इन सबके बीच में हमारी स्वयं की समझ साथ निभाती है। लेकिन उस पर विश्वास न करके किसी गुरु, वैज्ञानिक, ग्रंथ, संप्रदाय पर विश्वास करने की ओर बढ जाते हैं। आज हालात यह हो गई है कि स्वयं की समझ को उजागर करने में हमारे गुरु और भौतिकविद् दोनों बाधा बने हुये हैं। इसमें जिस विषय से सर्वाधिक मदद मिल सकती है,उस विषय 'योग और योगाभ्यास' का कबाड़ा कर दिया गया है। जहां भौतिक विज्ञान के अपने नियम और अनुशासन होते हैं, वहीं पर 'योग- महाविज्ञान' के अपने नियम, अनुशासन,संयम, तपस्या और सावधानियां आदि होते हैं। लेकिन महीना दो महीना शारीरिक कसरत और उठा-पटक करवाकर लोगों को प्रामाणिक योग शिक्षक के सर्टिफिकेट लाखों की संख्या में वितरित किये जा रहे हैं। जिनको इस योग विद्या का क ख ग भी नहीं आता है,वो भी भारत प्रसिद्ध योगाचार्य और योग -विशेषज्ञ बनकर लाखों लोगों को योगाभ्यास करवा रहे हैं।
15.)आगे को बढी और नीचे लटकी हुई बड़ी- बड़ी तोंद, भारी- भरकम कमर,आंखों पर बड़े -बड़े चश्मे,टाईट पोशाक,चमड़े की धारण की हुई टाईट बैल्ट और धन- दौलत -पद- प्रतिष्ठा- प्रधानी की हिमालय समान अकड़ - आज के अधिकांश योग- शिक्षकों और योगाभ्यास के हिमायतियों की यही पहचान है। कोई कुछ टिप्पणी कर दे तो देशद्रोही, पाकिस्तानी, खालिस्तानी घोषित कर देंगे।इनकी हरेक तर्कहीन और उल्टी-सीधी बात को मान लो तो ठीक वरना आपकी खैर नहीं। ज्यों ही कोई विद्या या विषय या व्यक्ति प्रसिद्ध हुआ नहीं कि वोट के भूखे लूटरे नेता लोग वहां पर जबरदस्ती से प्रवेश करके सब गुड़ गोबर कर देते हैं। और आजकल के योगाचार्यों और धर्माचार्यों को मोह, माया,पद,प्रतिष्ठा,धन, दौलत से इतना अधिक लगाव है कि ये तुरंत धूर्त नेताओं से सांठगांठ कर लेते हैं।योग और योगाभ्यास जाये भाड़ में।बस भारत और भारत से बाहर यही चल रहा है।
......
डॉ. शीलक राम आचार्य
दर्शनशास्त्र-विभाग
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय
कुरुक्षेत्र -136119








