कर्म करो लेकिन फल की चिंता मत करो। यदि समय पर मनचाहा फल नहीं मिल रहा है या कभी भी फल मिलने की आशा नहीं है,तो धैर्य रखो।आपको किये कर्मों का फल अवश्य मिलेगा। दिन-रात अथक मेहनत, प्रयास और परिश्रम करते रहो लेकिन फल की चिंता मत करो।बस, निरंतर धैर्य बनाये रखो, शांति बनाये रखो और प्रतीक्षा करते रहो।यह जानने की कोशिश भी मत करो कि दिन- रात की गई कठिन मेहनत का अब तक कोई परिणाम क्यों नहीं आया है।यह भी जानने की कोशिश मत करो कि कर्जा लेकर खेतों में, विश्वविद्यालयों में या कोचिंग सेंटर में की गई हाड़तोड़ मेहनत का मनचाहा परिणाम आने में कौन लोग बाधा बने हुये हैं या फिर कौनसे सिस्टम के भ्रष्टाचार की वजह से समय पर कर्मों का फल नहीं मिल पा रहा है। कर्म और कर्मफल के संबंध में इस प्रकार के उपदेश देने वाले लोग अपने आपको वेद, मनुस्मृति,उपनिषद्, मीमांसा, श्रीमद्भगवद्गीता आदि का ज्ञाता मानते हैं। लेकिन हकीकत यह है कि कि ये लोग जमीनी वास्तविकता से बिल्कुल अनभिज्ञ हैं। इनको शास्त्रों के रहस्य का ज्ञान बिल्कुल भी नहीं है।ये लोग शास्त्रों के रट्टू लोग हैं। ये लोग भ्रष्ट राजनीतिक सिस्टम के पोषक हैं। ये लोग लूटेरी पूंजीपति व्यवस्था के समर्थक हैं।कर्म -व्यवस्था की इस प्रकार की सतही,उथली,शोषक और पथभ्रष्ट व्याख्या करने वाले ये लोग भ्रष्ट सिस्टम के लिये काम करने वाले लोग हैं। भौतिक संसार में कर्म और कर्मफल एक दूसरे से जुड़े हुये होते हैं।इनको अलग नहीं किया जा सकता है। शिक्षा, स्वास्थ्य, खेती-बाड़ी, राजनीति, चिकित्सा, खेलकूद आदि हरेक क्षेत्र में दिन- रात मेहनत से कर्म करने वाले व्यक्ति को उसके फल की आशा बड़ी तत्परता से करनी चाहिये।यह उसके मनुष्य होने का लक्षण है।यह उसकी जीवित होने का लक्षण है।यह उसके सजग होने का लक्षण है।यह उसके जागरूक नागरिक होने का लक्षण है। यदि कर्मरुपी मेहनत करके कोई व्यक्ति उसका समय पर उचित फल मिलने की नहीं सोचेगा तो कर्म -व्यवस्था का किला ही ढह जायेगा।इस प्रकार की सोच अव्यवस्था को जन्म देने में सहायक बन जायेगी।जो लोग यह उपदेश करते हैं कि कर्म करो और फल की आशा बिल्कुल मत करो।फल मिलने में देरी हो सकती है-धैर्य बनाये रखो, प्रतीक्षा करते रहो। ऐसे लोग यह जवाब दे सकते हैं कि मेहनतकश व्यक्ति मेहनत का फल प्राप्त करने के लिये कब तक धैर्य, प्रतीक्षा और शांति बनाये रखें? इसकी कोई समय सीमा है या यों ही हवा में शब्दों की लाठियां घुमाई जा रही हैं?हर कर्मशील मेहनतकश व्यक्ति को यह जानने का अधिकार है कि उस द्वारा किये गये मेहनत, परिश्रम और कर्म का उचित फल मिलने में कौन व्यवस्था या कौन लोग बाधा बन रहे हैं? केवल पूर्वजन्मों में किये गये कर्मों को इसका कारण मानकर चुपचाप नहीं बैठा जा सकता है। ध्यान रहे श्रीमद्भगवद्गीता की उल्टी-पुल्टी, मनमानी और भ्रष्ट सिस्टम के अनुसार व्याख्या करने वाले नेता, धर्मगुरु, प्रचारक, गीतामनीषी कथाकार, सुधारक और विद्वान लोग मानवता के तो दुश्मन हैं ही, इसके साथ वो शास्त्रों के भी दुश्मन हैं।
Acharya Shilak Ram The Writer
आर्यावर्त चिंतन भारतीय दर्शन, सांस्कृतिक विमर्श और राष्ट्रचेतना पर केंद्रित एक वैचारिक एवं शोधपरक डिजिटल मंच है। यह मंच आचार्य शीलक राम जी के वैदिक-दार्शनिक चिंतन, सांस्कृतिक विश्लेषण और समकालीन सामाजिक-राजनीतिक प्रश्नों पर आधारित दृष्टिकोण को सुव्यवस्थित रूप में प्रस्तुत करता है। यहाँ प्रस्तुत सामग्री में — * भारतीय दार्शनिक परंपराओं का विश्लेषणात्मक अध्ययन * आधुनिक शिक्षा और नैतिक विमर्श का आलोचनात्मक परीक्षण * राष्ट्र और समाज से संबंधित जटिल प्रश्नों का तर्कसंगत विवेचन * परंपरा और आधुनिकता
Saturday, November 7, 2026
अकेलापन और विश्वासघात
दर्द,पीड़ा,दुःख,अकेलापन और विश्वासघात जब अति पर पहुंच जाते हैं,तो व्यक्ति के सामने कयी स्थितियां उत्पन्न होती हैं। ऐसा व्यक्ति या तो आत्महत्या कर लेता है या खुंखार अपराधी बन जाता है या कवि बन जाता है या कोई करोड़ों में एक आध्यात्मिक यात्रा पर निकल जाता है।इनकी पीड़ा को कोई अन्य व्यक्ति नहीं समझ सकता है।जिसको फटे न बिवाई,वो क्या जाने पीर पराई? ऐसे व्यक्ति को वही व्यक्ति समझ सकता है,जो स्वयं ऐसी स्थिति से गुजरा हो। यहां पर मेरा आशय सड़कछाप तुकबंदी करने वाले तथाकथित कवियों, भाड़े पर कागज काले करने वाले बिकाऊ लेखकों,छुटभय्ये अपराधियों और टीक्कडपाड नशेड़ी साधुओं से बिल्कुल भी नहीं है।दर्द, पीड़ा और विश्वासघात की अति को स्पर्श करने वाले व्यक्ति का चेहरा अलग ही आकर्षण और दिव्यता लिये हुये होता है। उपरोक्त वर्णित व्यक्ति के सामने उपरोक्त बुरी स्थितियां उसके स्वयं द्वारा कम और उन द्वारा जानबूझकर अधिक पैदा की जाती हैं,जिनकी उस व्यक्ति ने निःस्वार्थ भाव से सदैव सहायता ही की होती है।ऐसा व्यक्ति यदि आपको कहीं पर मिल जाये,तो उसका संग -साथ करके उसके साथ कुछ पल व्यतीत करके देखना।आपको जीवन का फलसफा हासिल होगा। आपका जीवन का दर्शनशास्त्र मालूम पड़ेगा। ऐसे व्यक्ति की वाणी से जो बोल निकलते हैं, उनमें अनुभव का सार निहित होता है। उसमें जीवन की वास्तविकता का सबक़ मौजूद होता है। ऐसे व्यक्ति कोई संत या योगी तो नहीं होते हैं लेकिन वो इनसे कम भी नहीं होते हैं। संतों के सत्संग, कथाकारों की कथा और एक योगी की योग- कक्षा से चूक जाना लेकिन यदि हो सके तो ऐसे व्यक्तियों के पास अवश्य बैठना। आपका जीवन सफल होने की ओर अग्रसर होगा।
'तर्क' से 'विचार' करके निष्पक्षता से देखो तो (If you look at it objectively, with 'reason' and 'think'...)
इससे यह भी चमत्कार हो सकता है कि हम स्वयं का सम्मान करने में ही दूसरों का सम्मान करने के रहस्य में पारंगत हो सकेंगे।जब इस सच्चाई को समझने से लोग दूर भागते हैं तो वहीं से उनके जीवन में दोगलापन शुरू हो जाता है।
सांसारिक जीवन में किसी भी व्यक्ति के लिये सर्वप्रथम अपनी निजता की सुरक्षा,अपना निजी हित या स्वार्थ पूरा करना महत्वपूर्ण होता है।
दूसरों से संपर्क में आने पर मन के गहरे तलों में यही विचार और भावना महत्वपूर्ण होते हैं कि स्वयं को कैसे स्थापित किया जाये या स्वयं के सम्मान की रक्षा कैसे की जाये या स्वयं को चहुंओर के परिवेश में कैसे दूसरों के सामने बड़ा दिखलाया जाये।
सच्चाई कभी भी कड़वी नहीं होती है अपितु हमने सच्चाई का सामना करना छोड़ दिया है, इसलिये सच्चाई कड़वी लगती है। यह एक कड़वी सच्चाई है कि जहां तक भौतिक संसार की बात है मित्रता, दोस्ती,प्यार,प्रेम,स्नेह, दांपत्य जीवन, राष्ट्रप्रेम, बलिदान,शहादत,मजहबी विश्वास आदि सभी में व्यक्ति का स्वयं का सम्मान, स्वयं का होना, स्वयं का स्थान मुख्य होता है।
लेकिन सभी व्यक्ति दिखावा यह करते हैं कि वो अपने दोस्तों के लिये, अपनी प्रेमिका के लिये, अपने प्रेमी के लिये, अपने मजहब के लिये, अपने राष्ट्र के लिये, अपनी संतान के लिये, अपने माता-पिता के लिये, अपने गुरुओं के लिये सम्मान की भावना रखते हैं। इसके लिये वो कुछ भी करने को तत्पर रहते हैं, इसके लिये वो कोई भी बलिदान कर सकते हैं।
वास्तव में यह सफेद झूठ है। कोई किसी के लिये कुछ नहीं करता है अपितु सभी अपने खुद के लिये कर रहे हैं। दूसरों के प्रति प्रेम, सेवा, सम्मान, इज्जत, सुरक्षा,बलिदान, भक्ति आदि करके वास्तव में वो भविष्य के लिये अपनी खुद की सुरक्षा, खुद के सम्मान और खुद की इज्जत का जुगाड कर रहे होते हैं।
दूसरों से मदद लेने पर, दूसरों द्वारा सम्मान किये जाने पर या दूसरों द्वारा इज्जत दिये जाने पर मन में एक हीनता की भावना घर बना लेती है।इस हीनता की भावना के साथ व्यक्ति खुद को छोटा महसूस करने लगता है। ऐसे में वह अवसर की तलाश में रहता है कि कैसे वह अपने आपको दूसरों की नजरों में बड़ा, सम्मानित और सर्वोच्च सिद्ध कर सकता है।
यहां कोई किसी से छोटा बनकर नहीं रह सकता है। ऐसा हो ही नहीं सकता।।आर्थिक,सामाजिक , राजनीतिक या शैक्षिक आदि क्षेत्रों में छोटा बनकर रहने की उसकी विवशता होती है;यह अलग बात है।
सभी खुद को स्थापित करने में लगे हुये हैं। कोई राजनीति से, कोई शिक्षा से, कोई ताकत से, कोई अपराध से, कोई भोग से, कोई बड़े मकान से, कोई बड़ी गाड़ी से, कोई सेवा से तथा कोई बलिदान करके खुद को बड़ा सिद्ध करने में लगे हुये हैं। तर्क के बल से विचार करके देखो -सांसारिक मनुष्य की वास्तविकता यही है।
दर्शनशास्त्र विषय आपको यह सब करने की दृष्टि प्रदान करता है। बशर्ते आप दर्शनशास्त्र विषय को पढकर तार्किक ढंग से सोचने, विचारने और निर्णय लेने में निष्ठा से लग सको।
लेकिन फिर वही बात सामने आ जाती है। व्यक्ति यदि यहां पर भी अपने आपको केंद्र में रखकर तार्किक चिंतन करके निर्णय लेगा तो सारा दर्शनशास्त्र व्यर्थ हो जायेगा।पूर्व हो या पश्चिम हो-ऐसा ही हो रहा है। शिक्षा के केन्द्र विश्वविद्यालय विशेष रूप से दर्शनशास्त्र-विभागों के शिक्षक इसक सर्वाधिक शिकार हैं।
भारत और भारत से बाहर
दर्शनशास्त्र विषय को केंद्र में रखकर कितने विभाग,कितनी अकादमियां,कितनी परिषदें, कितने शोध केंद्र, कितने क्लब आदि बने हुये हैं -निष्पक्षता से अवलोकन करके देखो,जानो और निर्णय लो। वहां पर क्या हो रहा? दर्शनशास्त्र तो शायद ही कहीं पर होगा। तार्किक चिंतन तो शायद ही कहीं पर मौजूद होगा।
यहां कोई किसी के लिये नहीं रोता
यहां कोई किसी के लिये नहीं रोता है। संसारीजन अपने सुख,सुविधाओं और सुरक्षा का रोना रोते हैं। माता-पिता,भाई -बहन, पति-पत्नी आदि में से किसी के भी बिमार होने, मरणासन्न होने या फिर देहावसान होने पर लोगों का रोने -धोने का ड्रामा देखने लायक होता है।वो आंसू और रोना -धोना केवल अपने लिये होते हैं।वो आंसू और रोना स्वार्थ से भरे हुये होते हैं।
कितने ही परिवारों में किसी के माता-पिता के गंभीर रूप से बिमार होने या देहांत हो जाने पर जमीन, जायदाद,मकान, बैंक बैलेंस,जेवर आदि के लिये निकटतम संबंधियों को लड़ते, झगड़ते,सिर फुटौव्वल करते और कोर्ट कचहरी करते हुये देखा जा सकता है।
औलाद के स्वार्थी व्यवहार से प्रताड़ित होकर अनेक घरों में बूढ़े माता-पिता वृद्धाश्रमों में रहने को विवश होते हैं। अनेक माता- पिता ऐसे हैं ,जो वृद्धाश्रमों में भी नहीं जा पाते हैं लेकिन अपमानित होते, भूखे प्यासे और बात- बात पर गाली -गलौज को सहन करते हुये घरों में ही रहने को विवश होते हैं। जायें तो जायें कहां?
ऐसे माता- पिता के मरने पर भी संतानें रोने -धोने का नाटक करती
हैं। जीते जी माता -पिता को अच्छी तरह खाना नहीं खिलाया और मरने के बाद मृत्यु भोज का आयोजन होता है।यह सब भी औलादें माता -पिता के लिये नहीं अपितु अपने खुद के सम्मान, बड़ाई और प्रसिद्धि के लिये करती हैं।
जितनी घृणित सच्चाई किसी औलाद के बारे में है, उतनी ही घृणित सच्चाई माता -पिता के संबंध में भी है। माता-पिता भी संतानोत्पत्ति खुद की सेवा करवाने, बुढ़ापे में सहारा बनने,वंश आगे बढ़ाने और निज तृप्ति के लिये करते हैं।
यदि उन्हें पहले ही यह मालूम हो जाये कि उनकी संतान किसी भी हालत में बुढ़ापे में उनका सहारा नहीं बनेगी,सारी संपत्ति को बेच खायेगी तथा उन द्वारा वंश बेल बढ़ाने का कोई औचित्य नहीं है;तो कोई भी माता -पिता संतानोत्पत्ति नहीं करेंगे।विवाह तो कामवासना की पूर्ति के लिये करेंगे लेकिन संतानोत्पत्ति से बचकर रहेंगे।
संसार स्वार्थ आधारित है।सब अपने स्वार्थ के लिये पुरुषार्थ कर रहे हैं।वह स्वार्थ किसी भी रूप में हो सकता है।वह स्वार्थ निज संतुष्टि और तृप्ति भी हो सकता है।इसीलिये यह कहना सच है कि कोई किसी के लिये नहीं रोता है, अपितु सभी अपने लिये रो रहे हैं।बात सुनने में अहंकार को ठेस पहुंचाने वाली है, लेकिन पूरी तरह से वास्तविक है।
संसारियों का यह संसार प्रेम से नहीं अपितु स्वार्थ के धागे से जुड़ा हुआ है।जिस डोर ने संसारियों को परस्पर बांधा हुआ है,वह डोर स्वार्थ से निर्मित है।
संसार में कितने व्यक्ति ऐसे हैं,जो प्रेमवश और करुणावश एक -दूसरे पर अत्याचार करने से बचते हैं? एक- दूसरे का सामान चोरी करने से बचते हैं।एक दूसरे की बहन -बेटी का सम्मान करते हैं।ऐसे संवेदनशील व्यक्ति बहुत कम मिलेंगे। ऐसे व्यक्ति विरले ही होते हैं। यदि आपकी नजर कोई ऐसा व्यक्ति हो तो उसके पास बैठकर उससे जीवन की सीख अवश्य ले लेना।उसका सत्संग अवश्य करना।
इनके सिवाय सभी व्यक्ति स्वार्थवश या भयवश एक दूसरे के काम आते हैं।एक -दूसरे का ख्याल रखते हैं। मुसीबतों में एक- दूसरे की मदद करते हैं। मैं किसी के काम आऊंगा तो दूसरे मेरे काम आयेंगे।यह एक शुद्ध सौदा है। जीने के लिये यह आवश्यक है।
समाज -दर्शन में इसी को तो 'समाज' कहा गया है। संसारियों के लिये समाज एक समझौता होता है। इसमें अध्यात्म आदि को घुसेड़ना मूल समस्या से मुंह चुराना कहा जायेगा। आचारशास्त्र में इसका खूब गुणगान हुआ है। इथिक्स आचारशास्त्र का ही विकृत रूप है।
Thursday, November 5, 2026
तार्किक बनो, अंधभक नहीं (Be logical, not blind)
मैनीफैस्टेशन करने और करवाने वालों की सोशल मीडिया पर भीड़ लगी हुई है। इसके माध्यम से जीवन और जगत् में कुछ भी भौतिक, मानसिक और आध्यात्मिक मिलने के लिये प्रलोभन दिये जा रहे हैं। मैनीफैस्टेशन किया और चमत्कार हो गया - ऐसी तसल्ली दी जा रही है। हालांकि यदि यह बात पूरी तरह से सच होती तो सर्वप्रथम मैनीफैस्टेशन करवाने वाले अपने आपको ही करोड़पति/अरबपति बना लेते।जिस तरह से मैनीफैस्टेशन के संबंध में प्रचार किया जा रहा है,अब तक उसका अभ्यास करके ये खुद ही विधायक, सांसद, कुलपति, एसपी, आईएएस बन जाते। इसके अभ्यास द्वारा ये खुद ही दयानंद, विवेकानंद,ओशो, कृष्णमूर्ति,प्रभुपाद, श्रीराम शर्मा आचार्य, जग्गी वासुदेव, रामदेव आदि बन जाते। दूसरे टाटा, बिड़ला,अडानी, अंबानी, गोदरेज,जिंदल आदि को पैदा करके सिद्ध करो। गांधी, नेहरू, सुभाष,पटेल, इंदिरा आदि को बनाकर दिखलाओ। मैनीफैस्टेशन के माध्यम से नये- नये आविष्कार करने का दावा करने वाले पाश्चात्य जगत् ने अनेक दूसरे मैस्मर, निकोला टेस्ला, मर्फी एटकिंसन ,गोडार्ड, हिल, वाटेल्स, हार्नेल, बर्न, हिक्स, डिस्पेंजा,वेन,प्राक्टर,डायर आदि पैदा क्यों नहीं कर लिये? मैनीफैस्टेशन के द्वारा दूसरे डार्विन,आइंस्टीन, मैक्स प्लांक, न्यूटन, क्यूरी, पाश्चर आदि पैदा करके दिखलाओ।जिस प्रकार से मैनीफैस्टेशन को प्रचारित किया जा रहा है,वह धंधा अधिक और सृजन कम है। यदि यह सब करना संभव नहीं है तो मैनीफैस्टेशन से चमत्कार संभव करने वालो को पकड़ो और उन पर कार्रवाई करवाओ। एकाग्रता से हिप्नोसिस या निर्विचारता आदि पैदा करके मैनीफैस्टेशन से अस्तित्व को पुकार लगाकर चमत्कार करके दिखलाओ। यदि अपने आपको तार्किक चिंतन, तार्किक बुद्धि, वैज्ञानिक बुद्धि और तार्किक सोच का समर्थक और प्रचारक कहते हो,तो मैनीफैस्टेशन के द्वारा यह सब सिद्ध करके दिखलाओ। आज तक जो बड़े-बड़े दार्शनिक, विचारक, वैज्ञानिक, काउंसलर , मनोवैज्ञानिक, साहित्यकार, आविष्कारक, अन्वेषक, नेता, सुधारक, धर्माचार्य,संत, मुनि , योगी आदि हुये हैं; वो हो सकता है कि किन्हीं अन्य कारणों से प्रसिद्धि को प्राप्त हुये हों।हो सकता है कि उन्होंने मैनीफैस्टेशन की बजाय अपने जीवन में प्रसिद्धि की ऊंचाई को किन्हीं अन्य योग्यताओं, संभावनाओं और विशेषताओं से अर्जित किया हो।
मैनीफैस्टेशन के रहस्य को श्रीमद्भगवद्गीता से जानें (Learn the secret of manifestation from the Bhagavad Gita)
श्रीमद्भगवद्गीता के इस श्लोक को यदि ध्यान से समझ लिया जाये तो सोशल मीडिया पर मौजूद मैनीफैस्टेशन करवाने वालों की भीड़ का भांडाफोड हो जाये। लेकिन हमारे यहां तो पाश्चात्य कूड़ा-कर्कट पर अंधभक्ति करने का बुखार चढ़ा हुआ है। श्लोक का अवलोकन कीजिये -
सत्त्वानुरुपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत।
श्रद्धामय: अयं पुरुषो यो यच्छृद्ध: स एव स:।।(17/3)
इसमें कहा गया है कि हरेक मनुष्य की श्रद्धा उसके अंतःकरण के अनुरूप होती है। जैसे संस्कार उसके चित् पर मौजूद हैं, उसके अनुरूप उस व्यक्ति की श्रद्धा निर्मित होती है। मनुष्य का निर्माण उसकी श्रद्धा यानी उसके स्वभाव यानी उसके संस्कारों के अनुसार होता है।जैसे संस्कार, वैसा ही व्यक्ति।जैसे संस्कार,वैसी श्रद्धा। जैसे संस्कार, वैसा व्यक्तित्व। फिर आगे उस श्रद्धा को महर्षि वेदव्यास ने सात्विक, राजसिक और तामसिक प्रकार की कथन किया है।इस श्लोक की व्याख्या करते हुये शंकराचार्य,रामानुजाचार्य, श्री अरविन्द, ओशो रजनीश आदि सभी ने यह कहा है कि मनुष्य जो कुछ भी आज है; वह अपने संस्कारों, भावनाओं, विचारों, अनुभवों, स्मृतियों आदि का संग्रहमात्र है। और ये सब उस मनुष्य के चित्त के गहरे तलों पर मौजूद हैं। इनसे स्वतंत्र होकर सोचना,विचारना, चिंतन करना,भाव करना, कल्पना करना तथा मैनीफैस्टेशन आदि करना इतना सरल नहीं है, जितना सरल सोशल मीडिया पर मौजूद मैनीफैस्टेशन करवाने वाले, काउंसलर,हीलर, हिप्नोटिस्ट और मनोचिकित्सक बतला रहे हैं।निज प्रकृति के विरोध में जाकर कुछ भी करना इतना सहज नहीं होता है। मनुष्य अपनी प्रकृति को साथ में लेकर जन्मता है। प्रकृति के बंधन को तोड़कर इसकी कारागार से बाहर आना केवलमात्र गहरे योगाभ्यास से ही संभव हो सकता है।ऐसा नहीं है कि श्वास को धीमा करके, किसी भी अनाप-शनाप विचार का रिपीटेशन करके, कल्पना करके,विज्युलाईजेशन करके और इसके साथ स्वयं के अहसास को जोड़ने से यह संभव हो जायेगा। यदि यह सब करना इतना सरल और सहज होता तो कोई भी ऐसा करके कुछ भी सफलता, पद, प्रतिष्ठा, प्रसिद्धि आदि पा लेता। इसके विज्ञान को यदि श्रीमद्भगवद्गीता, योग वाशिष्ठ, अष्टावक्र गीता और योगसूत्र के अनुसार समझा जाये,तो अनेक रहस्यों का उद्घाटन हो सकता है।





