1).सबको प्रथम स्थान प्राप्त आने या होने की पागल सनक सवार है। मजहब, संप्रदाय,मत, रिलीजन, राजनीति, व्यापार, शिक्षा, परीक्षा, प्रतियोगिता परीक्षा आदि सभी में प्रथम आने की होड़ लगी हुई है। कैसे भी करके प्रथम स्थान प्राप्त करना है।साम, दाम,दण्ड,भेद आदि कुछ भी करके प्रथम स्थान पर खड़ा होना है।इस प्रथम आने के पागलपन में बेशक चाहे जीवन की शांति, संतुष्टि, तृप्ति और सुख गायब हो जायें। प्रथम स्थान पर कुछ ही गिने चुने व्यक्ति हो सकते हैं। सभी तो प्रथम स्थान पर नहीं आ सकते। यदि सभी को प्रथम स्थान पर घोषित कर दिया जाये तो प्रथम होने का मजा ही किरकिरा हो जायेगा। किसी क्षेत्र में प्रथम स्थान पर खड़े होने का कोई मजा नहीं है,मजा है दूसरों का आपसे नीचे होना। किसी को इस नीचे होने या नीचे करने में ही सारा रहस्य छिपा हुआ है। यदि आपके सभी प्रतियोगी आपके साथ ही खडे हो जायें तो आपका मजा लुप्त ओ जायेगा। किसी को नीचे धकेलने, नीचे करने, नीचे की ओर टांग खींचने में ही सारा मजा निहित है। प्रथम आने का मजा प्रथम आने में नहीं अपितु किन्हीं हजारों लोगों को आपसे नीच कर देना है।हरेक क्षेत्र में यही चल रहा है। दक्षिण भारत की एक पत्रिका 'बसव मार्ग ' पढ़ रहा था। उसमें एक आलेख का शीर्षक है 'विश्व के प्रथम स्वतंत्र चिंतक बसवण्णा '। मुझे इस शीर्षक को पढ़कर लेखक की सोच पर करुणा आई कि किस किस तरह से अनुयायियों का माईंड वाश किया जा चुका है।इनको भारत के पूरे इतिहास में कोई स्वतंत्र चिंतक ही नहीं मिला और अपने आराध्य बसवण्णा को ही प्रथम स्वतंत्र चिंतक घोषित कर दिया।
2). इनके सिवाय सभी अज्ञानी,भटके हुये, पथभ्रष्ट और पशु समान हैं। इनसे पहले के सभी संत, मुनि,गुरु, संन्यासी, स्वामी और मार्गदर्शक संकीर्ण विचारधारा के थे, पूर्वाग्रहग्रस्त थे और एकपक्षीय थे।बस पहली बार इनके गुरु ही धरती पर स्वतंत्र चिंतक हुये हैं।हर मत,वाद,पंथ, संप्रदाय, मजहब, संगठन, राजनीतिक दल और विश्वास का व्यक्ति इसी तरह से सोच रहा है। स्वयं वह और उसके गुरु, नेता , आराध्य ही सब कुछ हैं; बाकी सभी नर्क के कीड़े मकोड़े हैं। भारत और भारत से बाहर मौजूद धार्मिक संप्रदायों में यही प्रतियोगिता लगी हुई है। उनके गुरु ही सबसे बडे पहुंचे हुये सिद्ध हैं, बाकी सभी के गुरु भटके हुये, अज्ञानी और बेहोश हैं।बात यही नहीं रुक जाती है, अपितु इससे आगे बढ़कर वो यह भी कहने लगते हैं कि जो किसी अन्य को गुरु बनायेगा,वह पाप का हिस्सेदार बनेगा।उसको हम जबरदस्ती करके अपने गुरु के सानिध्य में लेकर आयेंगे ताकि उसे भी मुक्ति मिल सके।इस कार्य के लिये अमीर घरानों और सत्ताधारी नेताओं से संपर्क साधकर उनसे करोड़ों अरबों रुपए का अनुदान, जमीन लिये जाते हैं, टैक्स माफ करवाये जाते हैं तथा गैरकानूनी धंधा करने की छूट मांगी जाती है। नेताओं को वोट चाहियें और गुरुओं को गैरकानूनी कुकृत्य करने पर कानूनी कार्रवाई करने से छूट चाहिये। रुपया इन्वेस्ट करने के लिये अमीर लोग आ जाते हैं। धुंआधार दुष्प्रचार करने के लिये बिकाऊ प्रैस आ जाती है। नेताओं की कुर्सी बची रहती है,अमीर घरानों और गुरुओं के गैर-कानूनी धंधे चलते रहते हैं।पिसता है जनमानस।मरता -पिटता है मेहनतकश वर्ग।पतन के गड्ढों में गिरती है जनता जनार्दन। चारों तरफ यही तो चल रहा है। 3.)अद्वैतवादी,द्वैतवादी,त्रैतवादी,
बहुत्ववादी, हिंदू ,पारसी, यहुदी, ईसाई, इस्लाम,जैन,बौद्ध,सिख,शैव, वैष्णव,सौर,शाक्त,कबीरपंथी, दादूपंथी,नित्यानंदपंथी,मीरापंथी,रविदासपंथी, राधास्वामी,इस्कान,ब्रह्माकुमारीज,
योगानंदपंथी,साईंपंथी,गुरमीतपंथी, रामपाली, धीरेंद्र शास्त्री आदि तथा इनके लाखों लाखों अनुयायी खुद के गुरु को सही और बाकी सबको गलत मानते हैं।जिसको हमने गुरु माना है,वही सही है तथा बाकी अन्यों के गुरु पथभ्रष्ट हैं।यह सोच सर्वत्र कायम है।नेताओं के अंधभक्तों का भी यही हाल है। उनके नेता सही हैं तथा बाकी जनता के नेता भ्रष्ट हैं।केवल उनके नेता राष्ट्रभक्त हैं तथा अन्यों के नेता भ्रष्ट, राष्ट्रविरोधी और नाकारा हैं।
4.)और आजकल तो आर्यसमाजी भी इस अंधभक्ति का शिकार हो चुके हैं।वो केवल खंडन में ही अपना प्रचार तलाश कर रहे हैं।वो कहीं भी समझौते के मूढ में नहीं दिखते हैं। हालांकि वो खुद महर्षि दयानंद सरस्वती की शिक्षाओं से बहुत दूर जा चुके हैं। इनके अनुसार महर्षि दयानंद सरस्वती ठीक हैं और बाकी सब गलत हैं। महर्षि दयानंद सरस्वती ने यह शैली कभी नहीं अपनाई थे।वो सर्वप्रथम खुद के आचरण सुधार पर जोर देते थे। उसके बाद में दूसरों के आचरण सुधार की बात करना उनके लिये सम्मत था। लेकिन आजकल तो गौमांसभक्षी, भ्रष्ट, निकम्मे और पदाकांक्षी ही सबसे अधिक समाज सुधार और प्रचार का शोर मचाते हैं। पिछले 200 वर्षो के दौरान सबसे क्रांतिकारी और राष्ट्रभक्त संगठन आज पतन के गर्त में जा चुका है। लेकिन अंधभक्त तो अंधभक्त होते हैं।वो किसी की भी नहीं सुनते हैं। उन्हें तो महाभ्रष्ट होकर भी समाज को आदर्शवादी बनाना है। आधुनिक युग में गौमाता को बचाने के लिये सर्वप्रथम प्रयास महर्षि दयानंद सरस्वती ने गौकरुणानिधि पुस्तक लिखकर,गोकृष्यादिरक्षिणी सभा बनाकर तथा उस समय की महारानी विक्टोरिया को लाखों गौभक्तों के गौहत्या रोकने के समर्थन में हस्ताक्षर करवाकर उनके पास भेजने के रुप किये थे।आज जब मुस्लिम वर्ग भी गौमाता को राष्ट्रीय पशु तथा शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद द्वारा गौमाता घोषित करने की आवाजें उठ रही हैं, ऐसे समय में एक राष्ट्रभक्त संगठन का चुप्पी साधकर बैठ जाना उनके महापतन की ओर संकेत करता है।
5.)ध्यान रहे कि जब कोई व्यक्ति यह कहता फिरता है कि मेरा गुरु,मेरा नेता,मेरा मजहब और मेरा संगठन ठीक है और बाकी सभी भटके हुये हैं तो सावधान हो जाना। ऐसे अंधभक्त लोग अप्रत्यक्ष रूप से यह घोषणा कर रहे होते हैं कि जिस गुरु, नेता, मजहब, संप्रदाय, संगठन को हमने स्वीकार किया हुआ है,वो सभी हमारे कारण सही,बड़े, महान या सर्वश्रेष्ठ हैं।वो खुद अपनी महानता की घोषणा कर रहे हैं।उनका अहंकार बोल रहा है। बड़प्पन की यह घोषणा उनके स्वयं के बड़प्पन की घोषणा है।कल को वो गुरु, नेता, राजनीतिक दल, संप्रदाय, मजहब आदि को बदल लेंगे तो फिर बाद वाले गुरु, नेता, राजनीतिक दल, संप्रदाय, मजहब आदि सही हो जायेंगे। यानी कहने का आशय यह है कि उनके कहीं पर होने या नहीं होने से कोई महान या भ्रष्ट बनता है। अंधभक्तों का मनोविज्ञान में विचित्र है। सच तो यह है कि अंधभक्तों से अधिक गिरा हुआ,पतित, निकृष्ट, घटिया,दोगला, भयभीत और स्वार्थी प्राणी अन्य कोई नहीं हो सकता।
6.) जब न्याय की सर्वोच्च संस्था ही यह कह रही है कि विवाह पूर्व शारीरिक संबंध अपराध नहीं है,तो फिर लड़कियों के साथ छेड़छाड़ और बलात्कार की घटनाएं तो बढ़ेंगी ही। पहले आग लगाओ और फिर उस पर पानी डालकर आग को बुझाने का ढोंग करो- यह कौनसी बुद्धिमत्ता है? पहले सड़कों पर कीचड फैलाओ और फिर क्रेन से वहां पर फंसी गाडियां निकालकर सेवा का ढोंग करो- यह कौनसी नैतिकता है? युवाओं के चरित्र को जानबूझकर भ्रष्ट करने के षड्यंत्र रचे जा रहे हैं। पहले मर्जी से शारीरिक संबंध बनाओ और फिर जाकर न्यायालय में खड़े हो जाओ कि इस युवा ने मेरे साथ जबरदस्ती से शारीरिक संबंध बनाये हैं। ऐसे पथभ्रष्ट युवाओं से गर्भनिरोधक और सैक्स पावर बढ़ाने की दवाईयां बेचकर एक तरफ डाक्टर रुपया बना रहे हैं और दूसरी तरफ वकीलों की फोज उनके मुकदमे लड़कर रुपया कमा रही है।देश का युवा बर्बाद हो रहा है।जिस आयु में युवाओं की पूरी ऊर्जा अपनी शिक्षा,परीक्षा और कैरियर बनाने में लगनी चाहिये थी,उस आयु में युवा वर्ग व्यर्थ के पचड़ों में फंसा हुआ है।यह जहां हमारे धर्माचार्यों की विफलता है, वही पर न्याय व्यवस्था की पोलखोल है। युवा वर्ग पढ़ लिखकर रोजगार न मांगे, इसलिये उसको विवाह पूर्व शारीरिक संबंध बनाने के लिये प्रेरित किया जा रहा है।
7.)जब विवाह पूर्व सहमति से शारीरिक संबंध बनाना अपराध नहीं है तो भारतीय ज्ञान परंपरा के पाठ्यक्रम में भी यह विषय जोड़ दो, ताकि युवा वर्ग जमकर शारीरिक संबंध बना सके।एक तरफ शिक्षा संस्थानों में नैतिकता की शिक्षा देने का नाटक करने और दूसरी तरफ युवाओं की कामवासना की पूर्ति के लिये सरल रास्ते उपलब्ध करवाने में कोई भी सामंजस्य और समझदारी नहीं है। आखिर हमारी न्याय व्यवस्था को हो क्या गया है?वह भारत को युरोप बनाने पर क्यों तुली हुई है। यदि युरोप ही बनाना है तो आर्थिक रूप से युरोप की बराबरी करो। यदि युरोप की बराबरी करना है तो भारत की 150 करोड़ आबादी को युरोप वाली मूलभूत आवश्यक सुविधाएं प्रदान करके दिखलाओ। न्यायधीश इस संबंध में कुछ क्रांति करके दिखलाओ। वायदाखिलाफी करने वाले लूटेरे नेताओं को न्यायालय में बुलाकर उन्हें आदेश दो कि इतने दिन में भारतीय जनमानस को मूलभूत सुविधाएं प्रदान करनी ही होंगी। लेकिन नहीं,वो ऐसा नहीं करेंगे।वो तो भारतीय जनमानस को शादा जीवन और उच्च विचार के उपदेश पिलाकर अय्याशी करने के लिये युरोप में छुट्टियां मनाने चले जायेंगे।
8.) भारत में इतने महात्मा,ज्ञानी,गीता- मर्मज्ञ, योगाचार्य,संत,मुनि,कथाकार, सुधारक,संन्यासी दिन- रात उपदेश करने में लगे हुये हैं।जगह- जगह सत्संग चल रहे हैं। जगह -जगह कथाएं हो रही हैं।योग -शिविर भी खूब चल रहे हैं। चरित्र -निर्माण शिविरों की तो बाढ सी आई रहती है।नाम, दीक्षा,शक्तिपात, कुंडलिनी जागरण आदि के अनुष्ठान बहुतायत से होते रहते हैं। आचार्य रजनीश के आने के पश्चात् तो लगभग सभी धर्माचार्यों ने उनकी नकल करते हुये अपने- अपने ध्यान-योग शिविर लगाने शुरू कर रखे हैं। अमरनाथ, बद्रीनाथ, केदारनाथ, हरिद्वार, ऋषिकेश,बालाजी मेहंदीपुर, तिरुपति बालाजी, कुरुक्षेत्र, अमृतसर,उज्जैन,प्रयाग,अजमेर, मक्का -मदीना, वेटिकन आदि की
तीर्थयात्राओं पर लोगों की भीड़ बढ़ती ही जा रही है। लेकिन दूसरी तरफ हिंसा, मारामारी, बदले की भावना, चोरी, भ्रष्टाचार, बलात्कार, छेड़छाड़,महंगाई, लड़ाई -झगडे और युद्धों की बाढ़ आई रहती है। स्वार्थ,लालच, अहंकार,काम,क्रोध, लोभ और बेहोशी में जनमानस आकंठ डूबे हुये हैं।यह सब क्यों हो रहा है?जब चहुंओर अच्छी शिक्षाएं मिल रही हैं तो यह अनाचरण और दोगलापन क्यों? सही बात तो यह है कि अधिकांश उपरोक्त तथाकथित महापुरुष कहे जाने वालों का स्वयं का आचरण, चरित्र, व्यक्तित्व और दिनचर्या ही ठीक नहीं है। जो खुद ही भ्रष्ट,पतित -चरित्र,चोर, बलात्कारी और पापी होगा,उसका किसी अन्य पर सृजनात्मक प्रभाव पड़ ही नहीं सकता है। इसके सिवाय अधिकांश भक्त लोग अपने गुरुओं, भगवानों, अवतारों, नेताओं, तीर्थस्थलों पर जाते ही अपने पापों और कुकर्मों को माफ करवाने के लिये या फिर कोई नयी डिमांड पूरा करवाने के लिये जाते हैं। इनमें भक्तिभाव रत्तीभर भी नहीं होता है। इनके गुरुओं, कथाकारों,भगवानों, सुधारकों और नेताओं ने इनको पट्टी पढा रखी है कि केवल हमारे सत्संग,कथा, शिविर, रैली आदि में सम्मिलित होने से तुम्हारा कल्याण हो जायेगा। वैसे भी कलयुग चल रहा है। कलयुग में योग, ध्यान,ज्ञान आदि प्रभावी न होकर केवल कैसी भी झूठी मूठी भक्ति ही कल्याणकारी सिद्ध होती है। इसके सिवाय किसी को कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं है।
9.)औपनिवेशिक सोच के लोगों ने जानबूझकर महर्षि मनु को बदनाम करने का अभियान चलाया हुआ है। उनके श्लोकों का गलत अर्थ किया जाता है, संदर्भ से हटकर अर्थ किया जाता है,केवल नकारात्मक श्लोकों को उद्धृत किया जाता है
तथा मिलावटी श्लोकों को आधार बनाकर अनाप-शनाप बाते की जाती हैं। औपनिवेशिक विचारक और लेखक विधायक मानसिकता के साथ काम न करके पूर्वाग्रह से काम करते आये हैं।नारी अस्मिता के रक्षार्थ मनु के इस श्लोक का गलत अर्थ लगाया जाता रहा है। देखिये -
पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने।
रक्षण्ति स्थविरे पुत्रा न स्त्री
स्वातंत्र्यमर्हति।।
नारी के लिये कुमारी अवस्था में उसका पिता,यौवनावस्था में उसका पति, वृद्धावस्था में उसका पुत्र उसके लिये रक्षा-कवच बनता है।नारी को कभी भी बिना किसी संरक्षण के स्वतंत्र और उन्मुक्त नहीं छोड़ना चाहिये। इसमें नारी की कमजोरी या उसकी गुलामी का भाव न होकर पुरुष से उसकी सुरक्षा करने का भाव निहित है। एकांत में या निरीह अवस्था में या बिना सहारे के नारी को छोड़कर देख लो। पुरुषों द्वारा उसके साथ दुर्व्यवहार होगा ही होगा। इसमें नारीवादी कार्यकर्ता कहेंगे कि ऐसे में तो सुधार पुरुष में होना चाहिये,नारी को किसी के आश्रित क्यों करते हो?हमारी सारी शिक्षा, दीक्षा, परीक्षा और मनोरंजन में संयम,अनुशासन, सम्मान, मूल्य पालन आदि न होकर उन्मुक्त भोग को बढ़ावा देने पर जोर है।टीवी, अखबार, मोबाइल आदि सभी में कामवासना भड़काने वाले कार्यक्रम मौजूद हैं।हर प्रकार के नशे को सिस्टम द्वारा बढ़ावा दिया जा रहा है।न्यायालय भी विवाहेतर शारीरिक संबंधों को अपराध या अनैतिक नहीं मानता है।इसका फायदा उठाकर कामवासना भडके हुये लोग खुलेआम कुछ भी करने के लिये घूम रहे हैं। ऐसे पुरुषों से नारी के रक्षार्थ महर्षि मनु का उपरोक्त श्लोक है। इसमें नारी निंदा नहीं अपितु नारी गरिमा मौजूद है।ऐसी विषम स्थिति में लड़कियों के साथ कुछ अनहोनी हो जाती है तो वो शोर मचाती हैं कि हमें बचाओ। यदि आप अपने आपको इतना समर्थ मानते हो तो करो अपनी रक्षा स्वयं ही।आपको तो पिता,भाई,पति, पुत्र आदि किसी की ढाल नहीं चाहिये।यह दोगलापन छोडना होगा।
10.) भारत में चोरी करके थिसिस तैयार कर जमा करवाकर पीएचडी की उपाधि प्राप्त करना एक आम बात है। लेकिन जब से विभिन्न विश्वविद्यालयों ने पश्चिम की शैली में आनलाईन मोड में कोर्स शुरू किये हैं,चोरी से नोट्स तैयार करवाकर आईएसबीएन सहित प्रकाशित करवाकर छात्रों को उपलब्ध करवाना आम बात हो गई है। और यह सब कुछ 'नयी शिक्षा नीति', के अंतर्गत हो रहा है।इन कोर्सेज में फीस बहुत अधिक होती है, इसलिये बिना किसी पूर्व तैयारी के विश्वविद्यालयों ने रुपया कमाने के लिये आनन फानन में अनेक कोर्स शुरू कर दिये हैं। बच्चों को नोट्स उपलब्ध करवाना अनिवार्य है।समय इतना होता नहीं है, इसलिये संबंधित प्रोफेसर को कम से कम समय में नोट्स तैयार करके विश्वविद्यालय को उपलब्ध करवाना अनिवार्य कर दिया जाता है। प्रामाणिक नोट्स तैयार करना एक समयसाध्य कार्य है। इनको लिखने,टंकित करवाने, अशुद्धियां ठीक करने और प्रकाशित करवाने में सयय लग जाता है। संबंधित शिक्षक भी क्या करें - वो यहां वहां से पुस्तकें उठाकर उनसे चोरी से स्टडी मैटीरियल की हु-ब-हू नकल करके नोट्स तैयार करवाकर विश्वविद्यालयों को सौंप रहे हैं।इन नकल किये हुये नोट्स में गहनता, तार्किकता,प्रामाणिकता,स्तरीयता,
विषय -संबद्धता का बिल्कुल अभाव होता है। आनलाइन शिक्षा प्रणाली तो विदेशों से ले ली है लेकिन छात्रों और शिक्षकों को विदेशों वाली सुविधाओं को कौन उपलब्ध करवायेगा? बस, विद्यार्थियों से रुपया हड़पो और भाग जाओ। शिक्षा का आनलाइन सिस्टम पूरी तरह से फर्जीवाड़ा है। इसमें शत- प्रतिशत चोरी चलती है। पहले से ही ध्वस्त हो चुकी भारतीय शिक्षा इससे शिक्षा और भी अधिक बर्बाद हो जायेगी। यदि आनलाइन के लिये तैयार पुस्तक रुप में नौट्स की छानबीन करवाई जाये तो भारतीय शिक्षा व्यवस्था का एक बहुत बहुत फर्जीवाड़ा उजागर हो सकता है।भारत को विश्वगुरु बनाने के हर प्रयास के पीछे भारत को विश्वगरीब बनाने का षड्यंत्र छिपा हुआ है।न प्रोफेसर,न कक्षाएं,न भवन,न पुस्तकालय,न प्रयोगशालाएं,न स्तरीय पुस्तकें,न नकलरहित परीक्षाएं तथा न ही कोई दूरदर्शी सोच।बस, धड़ाधड़ आनलाइन के नाम पर महालूट चल रही है।
11.)किसी लेखक की रचना का मूल्यांकन करने या समीक्षा करने के लेखन -कर्म में साहित्यिक प्रतिमानों के अनुसार निष्पक्षता से गुण और दोष दोनों को उजागर करना होता है। किसी लेखक की कृति की केवल एकतरफा प्रशंसा करना,लंबी गुणावली बतलाना और जो लेखक की रचना में मौजूद भी नहीं होता है, उसका श्रेय भी जबरदस्ती से लेखक को प्रदान कर देना न तो पुस्तक समीक्षा कहला सकती है,न ही उसे किसी प्रकार का मूल्यांकन कहा जा सकता है तथा न ही ऐसा करना एक अच्छे,भले और निष्पक्ष समीक्षक की पहचान ही कहला सकती है।ऐसा करना साहित्य का पतन कहलाता है। स्वतंत्रता के पश्चात् भारती हिंदी सहित अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के साहित्य में जहां आत्मप्रशंसा की चाह में बढ़ोतरी हुई है, वहीं पर किसी न किसी विचारधारा, राजनीतिक दल या जातिवादी संगठन की चापलूसी,चारणगिरी के साथ- साथ मानवीय चेतना से दूरी,स्वार्थपरता,तर्कहीनता,सिद्धा़तहीनता, महत्वाकांक्षा और पुरस्कार की कामना आदि में निरंतर बढ़ोतरी होती गई है। बहुत से तथाकथित लेखकों और समीक्षकों में पहले ही बातचीत हो जाती है कि किस तरह से क्या- क्या लिखना है। साहित्यिक क्षेत्र में ऐसी कृतियां और ऐसी कृतियों की समीक्षाएं कूड़ा-कर्कट से अधिक महत्व की नहीं हैं। ऐसे लेखकों द्वारा ऐसा कितना महान साहित्य सृजित हो रहा है कि उसमें केवल गुण ही गुण मौजूद हैं तथा दोष कोई भी नहीं हैं? कालिदास,भारवि,माघ, तुलसीदास,कबीर, रविदास,दिनकर, पंत, प्रेमचंद, लखमीचंद,बाजेभगत, मेहरसिंह, मांगेराम,धनपत सिंह आदि की रचनाओं की समीक्षा करते हुये भी गुण और दोष दोनों को बतलाया जाता रहा है।हरियाणवी साहित्य में यह प्रवृत्ति कुछ अधिक ही उभरकर सामने आ रही है। पहले तो सिस्टम ने ही हरियाणवी और हरियाणवी में मौजूद साहित्य को बर्बाद करने मे कमी नहीं छोड़ रखी है, ऊपर से झूठी और एकतरफा समीक्षाएं लिखने वाले ये तथाकथित समीक्षक महोदय- पता नहीं हरियाणा राज्य के लेखन को कहां ले जाकर छोड़ेंगे?
12.) व्यापारी, उद्योगपति,कोरपोरेट्स घराने, बड़े -बड़े माल के मालिक, दुकानदार, शोरूम संचालक, निजी शिक्षा -संस्थान,फिल्म -निर्माता आदि सभी अपना उपभोक्ता सामान बेचने के लिये हिप्नोसिस तकनीक का प्रयोग नहीं अपितु दुरुपयोग कर रहे हैं। घटिया सामान और धुआंधार प्रचार।बस, उपभोक्ता इनके बनाये जाल में फंसकर गुणवत्ता रहित सामान को भी खुशी -खुशी खरीदकर घर ले आता है। घटिया से घटिया सामान तैयार करके उसके साथ में किसी अर्धनग्न अभिनेत्री को खड़ी कर देते हैं। उपभोक्ता की कामुकता भड़काकर उसकी एकाग्रता को खरीदे जाने वाले सामान से हटाकर अर्धनग्न अभिनेत्री पर केंद्रित कर देते हैं। और फिर इसके साथ -साथ एकाग्र हुये मन पर किसी प्रभावी वाक्य एकदभ से दोहराने की चालाकी की जाती है। उपभोक्ता जब सामान खरीदने जायेगा तो सब कुछ भूलाकर उसे ही याद करेगा तथा वही सामान खरीदकर घर लायेगा। चाहे उस सामान की गुणवत्ता कितना ही घटिया, हानिकारक और सेहत के प्रतिकूल हो। उपभोक्ता सामान निर्माता खरबों की मालिक बहुराष्ट्रीय कंपनियां, बड़े व्यापारिक घराने, राजनीतिक दल, निजी शिक्षा -संस्थान आदि इसी तरह से उपभोक्ताओं से छल और धोखाधड़ी करके अपना कूड़ा-कर्कट सामान बेचकर मालामाल होती जा रही हैं। आधुनिक विकसित कहे जाने वाले युग के वैज्ञानिक, प्रोफेसर, शोधार्थी,शिक्षाविद्,नीति- निर्माता, सुधारक, धर्माचार्य,नीतिशास्त्री आदि सभी इस वैश्विक धोखाधड़ी पर चुप्पी साधे बैठे हैं। बहुराष्ट्रीय कंपनियों और उद्योगपतियों ने आरोग्यता की दृष्टि से घटिया,विषयुक्त,घातक,रसायनयुक्त, पर्यावरण- प्रदुषक उपभोक्ता सामान को बेच- बेचकर दुनियावासियों को बिमारियों का घर बना दिया है तथा धरती के पर्यावरण को बर्बाद कर डाला है। विज्ञापनों के द्वारा रिपीटीशन, एकाग्रता,चोंकाकर, प्रलोभन देकर, मन को भटकाकर उपभोक्ताओं में हिप्नोसिस पैदा की जाती है।इस अवस्था में कूड़ा-कर्कट, विषयुक्त,घातक रसायनयुक्त सामान धड़ल्ले से बिकता है।सारी आधुनिकता, वैज्ञानिकता, नैतिकता, तार्किक चिंतन गया तेल लेने।
13.) किसी राजनीतिक दल, संगठन, मजहब, संप्रदाय, मत आदि का सदस्य बनने पर यदि आपकी प्रश्न करने, अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने और कमियां बतलाने की शक्ति को छीन लिया जाये तो आप मान लेना कि वह राजनीतिक दल, संगठन, मजहब, संप्रदाय,मत आदि आपके लिये गुलामी और दासता का फंदा बन गया है। भारत में हालात ऐसे ही बन चुके हैं। अपनी जीवन जीने की स्वतंत्रता को किसी राजनीतिक दल, मजहब, संप्रदाय,मत,वाद या जातीय भीड़ को गिरवी रखकर बड़े -बड़े धुरंधर कहलाने वाले लेखक,कवि, साहित्यकार,विचारक,शिक्षक, दार्शनिक,समाज सुधारक, योगी और धर्माचार्य पतन को प्राप्त हो रहे हैं।
14.)सनातन धर्म को बदनाम करने का इससे अधिक घटिया प्रयास क्या हो सकता है कि गाय को माता मानकर वोट मांगने वाले नेता सत्ता मिलने पर यह कहने लगते हैं कि गाय तब तक माता है जब तक वो गर्भवती नहीं होती है। गर्भवती होने के पश्चात् गाय माता नहीं रहती है तथा उसका मांस खाया जा सकता है।कुछ नेता ऐसा बोल रहे हैं कि चौदह वर्ष से ऊपर की गाय को मांस के लिये इस्तेमाल किया जा सकता है। और कुछ बुद्धि के कोल्हू नेता ऐसा बोल रहे हैं कि मणिपुर, नागालैंड, मिजोरम,गोवा, मध्यप्रदेश आदि की गाय को मांस के लिये खाया जा सकता है क्योंकि इन राज्यों की गाय गौमाता नहीं होती है।कुछ घोंचू ऐसा बोलते रहे हैं कि विदेशों में गौमांस खाया जा सकता है तथा कुछ ऐसा बोल रहे हैं कि घर के भीतर गौमांस खाना पाप नहीं है,घर के बाहर बाहर गौमांस खाना पाप होता है। और विडंबना देखिये कि कुछ को छोड़कर अधिकांश सनातन धर्म के धर्माचार्य, महामंडलेश्वर, शंकराचार्य, योगाचार्य, कथाकार,संत आदि इस प्रकार के सनातन धर्म विरोधी कुकृत्यों पर मौन धारण किये बैठे हैं। और फिर यही बेहरुपिये यह बोलते रहते हैं कि सनातन धर्म खतरे में है। वास्तविकता तो यह है कि सनातन धर्म को सबसे बड़ा खतरा इन बेहरुपियों से ही है।
15.) जो घोंचू कल तक हमारे पडौस में कुछ निठल्ले शराबी -कबाबी -शबाबियों की चिल्म भरने का काम करता था,आज एक इस्तिहार से पता चला कि वह तो सीनियर प्रोफेसर बन गया है। क्या बात है?भारत ने कितना विकास कर लिया है कि बिना किसी विषय की पूर्व योग्यता के आवारा, निकम्मे, गालीबाज और चिल्म भरने वाले लोग भी प्रोफेसर बन रहे हैं।बताओ और कितना विकास करवाओगे भारत का?जब राजा ही आठवीं फेल हो और वह अपनी फेल होने वाली डिग्री भी नहीं दिखला रहा हो, उस देश में पढे -लिखे, तार्किक चिंतन करने वाले, पीएचडी- डी-लिट करने वालों और रचनात्मक लेखन करने वालों का क्या काम है? ऐसे देश में न तो किसी ढंग के विश्वविद्यालय की आवश्यकता है,न प्रयोगशालाएं बनाने की आवश्यकता है ,न तकनीकी संस्थान बनाने की आवश्यकता है,न पुस्तकालय खोलने की आवश्यकता है तथा न ही प्रामाणिक शोध करने करवाने की आवश्यकता है।बस, किसी ऐरे -गेरे- नत्थू -खैरे अपराधी नेता की चिल्म भरो, उसके पैर दबाओ,उसकी शारीरिक संतुष्टि करो, मूढ़ों की भीड़-भाड़ रैलियों के लिये जुटाओ तथा उसके लिये शराब -कबाब -शबाब की बढ़िया व्यवस्था करो। सफलता के लिये यही काफी है। बाकी क्यों किताबों में माथापच्ची करना। क्यों किसी प्रयोगशाला में प्रयोग आदि करना। क्यों बढ़िया साहित्य सृजन करना। विश्वगुरु नहीं अपितु अब तो विश्वमहागुरु बनने की ओर अग्रसर हैं।
16.) किसी भी उपदेश ,समस्या, परिस्थिति, व्यक्ति, वस्तु, स्थान, विचारधारा, सिद्धांत, निर्णय पर तार्किक ढंग से सोच -विचारकर निर्णय पर पहुंचने से रोकना सनातन धर्म और संस्कृति के अनुसार सही नहीं है। अब्राहमिक और ब्राहमिक सोच में यही तो अंतर है। पहले वाली मानने पर आधारित है तो दूसरे वाली तार्किक चिंतन करके जानने पर आधारित है। मानने पर जोर देने वाली सोच वास्तव में कोई सोच न होकर निरा अंधविश्वास है।इसे सोच नहीं कह सकते।सोच में तो तर्क से सोचना,विचारना, चिंतन करना आवश्यक होता है। अब्राहमिक में सोचना बिल्कुल निषेध है। सोचने में पहले से कुछ भी निर्धारित नहीं होता है अपितु विभिन्न पक्षों पर निष्पक्षता से सोच -विचार करने के पश्चात् ही निर्णय लिया जाता है। मानने या अंध विश्वास करने में पहले से ही निर्णय लिया हुआ होता है। ध्यान रहे कि अंधविश्वास या मानना न तो विश्वास है,न श्रद्धा है,न आस्था है,न भक्ति है तथा न ही कोई समर्पण है।यह तो एक गुलामी और दासता है।मानव प्राणियों को गुलाम बनाकर रखने का यह कुछ धूर्त लोगों का सोचा समझा हुआ षड्यंत्र होता है। ऐसे लोगों के खुद के पास तो इतना सोचना और समझना तो होता ही है कि जिससे जनता जनार्दन को सोचने, विचारने,तर्क करने से दूर करके अंधे,बहरे,गूंगे, लंगड़े लोगों की भीड़ पर एकछत्र शासन करके अपनी जिंदगी को हर तरह से खुशहाल बनाया जा सके।
पहले तो इस षड्यंत्र में केवल धर्माचार्य और शासक ही सम्मिलित थे लेकिन पिछले 200-300 वर्षों से इसमें अब जातिवादी सुधारक,उद्योगपति,कोरपोरट घराने,शिक्षा संस्थान, न्याय व्यवस्था,दवा निर्माता कंपनियां और बहुराष्ट्रीय कंपनियां भी सम्मिलित हो गई हैं।ये सभी जनता जनार्दन को गुलाम और दास बनाकर रखने में एक साथ मिलकर काम कर रहे हैं।ये सभी मीडिया का भरपूर सहयोग ले रहे हैं। उपरोक्त सभी षड्यंत्रकारी जनमानस को तर्क, विचार, चिंतन, न्याय, मीमांसा,कारणकार्य और प्रमाणों की शिक्षा से दूर रखने में अपनी पूंजी का एक बहुत बड़ा हिस्सा खर्च कर रहे हैं।इस सुंदर धरती ग्रह के लिये अन्य बड़े खतरों के साथ यह भी एक बड़ा खतरा उभरकर सामने आया है।
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डॉ. शीलक राम आचार्य
दर्शनशास्त्र -विभाग
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय
कुरुक्षेत्र -136119

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