Wednesday, December 13, 2023

मार्गदर्शक ही भटका हुआ है..

        गरीब व्यक्ति के कोई अधिकार नहीं होते हैं उनके सिर्फ कर्तव्य होते हैं...कमोबेश हर देश की यही हालत है....अधिकांशतः राजनीति, कानून, व्यवस्था, सिस्टम, न्याय, सुविधाओं, विकास, सुख-भोग, शिक्षा, स्वास्थ्य, संविधान आदि पर नेता, धर्मगुरु, अमीर, संपन्न, जुगाडी, अपराधी, आततायी, जान पहचान रखने वाले तथा शैतान वृत्ति के लोगों का ही एकाधिकार रहा है...जीवन में सुख सुविधाओं का भोग यही व्यक्ति करते हैं बाकी गरीब लोग सिर्फ व सिर्फ वोट डालने के लिए, रैलियों में भीड दिखलाने के लिए, दंगे फसाद करवाने के लिए, दिन रात मेहनत करने के लिए,सेवा करने के लिए, नारेबाजी करने के लिए या फिर अंधभक्त बनकर शोषण करवाने के लिए, रोने-धोने के लिए, तडप-तडपकर  मरने के लिए होते हैं...भारत की हालत अन्य देशों की अपेक्षा कुछ अधिक ही खराब है...प्रकृति प्रदत्त एक विकसित राष्ट्र के पास जो होना चाहिए वह सभी भारत के पास उपलब्ध है लेकिन इसके बावजूद भी ‌भारत पिछले सात दशक से दुखी, त्रस्त,गरीब, बदहाल, पिछड़ा हुआ, असुरक्षित, अशिक्षित, भूखा, प्यासा, नेताओं -धर्मगुरूओं का अंधानुयायी बनकर चल रहा है...यहाँ नैतिक, सही, न्यायसंगत व उचित वही है जिसे सुविधासंपन्न नेता, धर्मगुरु व अमीर लोग करते हैं...जिस देश में व्यवस्था की कमियाँ बतलाने वालों को देशद्रोही, पाकिस्तानी व खालिस्तानी कहा जाता हो; वह देश तरक्की कभी नहीं कर सकता, वह देश कभी आगे नहीं बढ सकता, वह देश सदा पिछड़ा हुआ ही रहेगा...अमीर,धर्मगुरु, प्रैस व न्यायविद् आदि अपने धार्मिक व आर्थिक साम्राज्य को हानि पहुंचने के डर से विरोध नहीं कर रहे हैं तो मध्यमवर्गीय लोग अपनी रोजी रोटी के पचडों से ही समय नहीं निकाल पा रहे हैं....रही बात गरीब की, गरीब व्यक्ति के पास सत्ता को धमकाने,उसकी कमियाँ निकालने व उस पर दबाव बनाने की ऊर्जा ही नहीं बचती है...गरीब व्यक्ति की सारी ऊर्जा नमक -तेल-आटा-लकड़ी-गैस-झाडफूंक आदि का जुगाड़ करने में ही बर्बाद हो जाती है.. यही सिस्टम पिछले कयी दशक से चल रहा है...पहले अग्रेजों सहित बाहरी आतताइयों ने जमकर लूटा और आजादी के बाद अपने ही अपनों को लूट रहे हैं...नेताओं का तो लूट का धंधा रहा है लेकिन सबसे आश्चर्यजनक तो यह है कि हमारे धर्मगुरु, सुधारक, न्यायविद्, स्वामी, संन्यासी, संत, मौलवी, पादरी, ग्रंथी, भिक्षु, मुनि भी इस पर कुछ नहीं बोलते हैं...सारे के सारे मिलकर जनता जनार्दन को बेवकूफ़ बनाकर लूट रहे हैं...इसका सबसे अधिक नुकसान भारत के गरीब को होता आया है...भारत का जमीन से जुडा हुआ बहुसंख्यक किसान मजदूर छोटे काम धंधे करने वाला पुरुषार्थी मेहनतकश वर्ग सर्वाधिक प्रताड़ित व दुखी है...इसके दुख, अभाव, प्रताड़ना, अन्याय, भेदभाव, बेरोजगारी, अत्याचार व कर्म का फल नहीं मिलने पर कोई व्यवस्था, संविधान, सिस्टम, न्याय व्यवस्था आदि कुछ नहीं बोल रहा है...बस प्रैस व मंचों से झूठे वायदे करके बहुसंख्यक गरीब वर्ग को बेवकूफ बनाते रहो....बैंकिंग सिस्टम, टैक्स, बहुसंख्यक वर्ग की मेहनत, व्यापार आदि का रुपया पता नहीं कहाँ पर गायब हो जाता है...आजादी के बाद खुले व निष्पक्ष रुप से सनातन भारतीय दर्शनशास्त्र व इसके अंतर्गत नीतिशास्त्र विषय में इस पर कभी भी विचार नहीं किया गया है...बस पुरातन सिद्धांतों, मतों, वादों, अवधारणाओं, विचारों को ही घुमा-फिराकर कथन करने या व्याख्यायित करने या अंध-समर्थन करने या अंध-विरोध करने की परिपाटी सी बन गयी है...हमारे यहाँ पिछली दो सदियों के दौरान सैकड़ों प्रसिद्ध स्वामी, संन्यासी, संत, मुनि, योगी, धर्मगुरु, शंकराचार्य, विचारक, दार्शनिक आदि हो चुके हैं लेकिन इनमें से कितने ऐसे हैं जिन्होंने धरातल पर उतरकर मेहनतकश पुरुषार्थी जनमानस के रोजगार, शिक्षा, शोध,स्वास्थ्य, आवास,जल, पर्यावरण, न्याय, भोजन, खेतीबाड़ी, नीति, धार्मिकता संबंधित अधिकारों की बात की है?...अधिकांश ने इस बहुसंख्यक वर्ग को अपनी प्रसिद्ध होने की लालसा को पूरा करने का माध्यम माना व जाना है...बहुसंख्यक वर्ग को जब भी जरूरत हुई तो यह संत, मुनि, संन्यासी, शंकराचार्य, धर्मगुरु,विचारक, दार्शनिकों का वर्ग सदैव लूटेरे नेताओं के समर्थन में ढाल बनकर खड़ा मिला है...चार्वाक ने 'पठितव्यम् तदपि मर्तव्यम्, न पठितव्यम् तदपि मर्तव्यम्, दंत कटाकटेति किम् कर्तव्यम्'  कहकर इस लूटेरे वर्ग का विरोध इसीलिए किया था तथा आधुनिक युग में मार्क्स ने धर्म को अफीम घोषित करके चार्वाक का ही समर्थन किया है...पिछले 200 वर्ष के इतिहास में स्वामी दयानंद, ओशो, राजीव भाई आदि उंगलियों पर गिनने योग्य  दार्शनिक, विचारक व सुधारक हुए हैं जिन्होंने जमीनी जनमानस के जीवन-दर्शन से संबंधित हरेक पहलू पर विचार भी किया है, नये ढ़ग से सोचा भी है तथा क्रूर व शोषक सत्ता का मुखर विरोध करके धरातल पर उतरकर इस सबको जीवन-दर्शन बनाने का पुरुषार्थ भी किया है....समस्त धरा का सबसे पुरातन, सनातन, अधुनातन व क्रांतिकारी भारतीय दर्शनशास्त्र पिछली दो सदियों के दौरान न तो जीवन-दर्शन  बन सका  है तथा न ही इसमें कोई अभिनव कार्य होने या करने  की हिम्मत कहीं पर दिखलाई पड रही है...इसलिए भारतीय शिक्षा संस्थानों में यह विषय उपेक्षित होकर मृत विषय बनने की कतार में खड़ा है...इस विषय के शिक्षकों की मानसिकता का तो कुछ पुछिये ही मत...खानापूर्ति करने, औपचारिकता निभाने, व्यर्थ पिष्टपेषण करने, पूर्व विचारों की जुगाली करने, तोतारट्टू बनने, अभिनव शोध का उपहास उड़ाने, टांगखिंचाई करने, अंधभक्त बनने, अब्राहमिक विजातीय धारा का अंधानुकरण करने के सिवा इनकी कोई योग्यता नहीं दिखलाई नहीं पडती है...और इनका खुद को वरिष्ठ मानने का अहम् तो हिमालय से भी भारी तथा प्रशांत महासागर से भी अधिक गहरा है...जिस गरीब-वर्ग की बात शुरू में ही हुई है उसके पास ही वास्तविक जीवन -दर्शन है लेकिन उसे तो हर तरह से दबाया -कुचला-उपेक्षित-भ्रमित किया  जा रहा है.. जिसके भी पास पावर, प्रैस, प्रैस्टिज,प्रिस्ट हैं उसका अनैतिक कर्म भी नैतिक है लेकिन जिसके पास यह सब नहीं है वह नैतिक होते हुए भी अनैतिक, गंवार, उज्जड व फिसड्डी है...भारत में तो जिनके पास पद, प्रतिष्ठा, पावर, अकादमी आदि हैं वो ही कुंडली मारकर बैठ जाते हैं...न खुद कुछ सृजनात्मक करना है तथा न ही किसी को कुछ अभिनव करने देना है...इनकी सारी ऊर्जा खुद को वरिष्ठ व इलियट सिद्ध करने तथा दूसरों को नाकारा व अयोग्य सिद्ध करने में खर्च हो जाती है...बाकी कुछ जो ऊर्जा बचती है वह अधिकारियों की चापलूसी करके अपने काम निकालने में लग जाती है...ऐसी विषम, विकट व भ्रष्ट परिस्थितियों में जमीन से जुडा हुआ बहुसंख्यक पुरुषार्थी गरीब जनमानस दर्शनशास्त्र व इसकी शाखा-प्रशाखाओं नीतिशास्त्र, तर्कशास्त्र, ज्ञानशास्त्र,अध्यात्मशास्त्र, आत्मशास्त्र, ब्रह्मशास्त्र,मायाशास्त्र, कर्मशास्त्र, समाजशास्त्र, विज्ञानशास्त्र आदि के बारे में ऊहापोह  कैसे-क्यों-कब- क्या करेगा ?...जिसका स्वयं का जीवन-दर्शनशास्त्र ही अस्त व्यस्त व षडयंत्रकारीयों के षड्यंत्र का शिकार हो वह क्या-क्यों-कब-कैसे के झंझट में नहीं पड सकता है...हरेक संस्कृति का अपना निज दर्शन, दर्शनशास्त्र व जीवन-दर्शनशास्त्र  होता है उसकी उपेक्षा कदापि नहीं होनी चाहिए...लेकिन हमारे यहाँ तो व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक, धार्मिक, नैतिक, वैज्ञानिक आधारित तरक्की का पैमाना ही आंग्ल अब्राहमिक विदेशीय हो गया है...भारतीय सनातन दर्शन, दर्शनशास्त्र व जीवन-दर्शनशास्त्र पर हर दिशा से प्रहार हो रहे हैं...सबसे छोटी पंचायत से लेकर सबसे बड़ी पंचायत यू एन ओ, यूनैस्को तक भारतीय दर्शन, दर्शनशास्त्र व जीवन-दर्शनशास्त्र की विकृत, विषाक्त, पूर्वाग्रहग्रस्त, कपोलकल्पित व मनघड़ंत विचारधारा व्याप्त है...दर्शन, दर्शनशास्त्र, धर्म व विज्ञान एक ही सत्ता का अपने-अपने ढंग से व्याख्यान कर रहे  हैं लेकिन फिलहाल हम इसमें कहीं भी नहीं हैं...यह स्थिति अति सोचनीय, भयावह तथा पीडादायी है!

                                                        -आचार्य शीलक राम

 

 

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