Wednesday, October 2, 2024

'चार्वाक' को पैदा करने के लिये हम ही जिम्मेदार हैं (We are responsible for creating 'Charvaka')

        धर्मगुरुओं द्वारा जब -जब धर्म, अध्यात्म, योग, कर्मकांड की आड में पाखंड, ढोंग, शोषण, भेदभाव, ऊंच -नीच का गंदा खेल खेला जायेगा, तब-तब विरोचन,बृहस्पति, लोकायत,चार्वाक,गोशाल, वेलट्टिपुत्त, कात्यायन, महावीर,सिद्धार्थ आदि के भौतिकवाद, अनित्यवाद,भाग्यवाद, उन्मुक्त भोगवाद आदि विचारधाराओं को उठ खड़े होने का मौका मिल ही जायेगा!इसे रोकना नामुमकिन है! समकालीन ओशो रजनीश को पैदा करने के लिये हम और हमारे धर्मगुरु ही जिम्मेदार हैं!गुर, ग्रंथ, विधि आदि को नकारने वाले कृष्णमूर्ति को पैदा करने के लिये परिस्थितियों को मंगल ग्रह ने पैदा नहीं किया था, अपितु हमने और हमारे धर्मगुरुओं ने ही पैदा किया था!स्वामी दयानंद सरस्वती को पैदा होने में धर्म, अध्यात्म, योग, दर्शनशास्त्र, पूजापाठ, मूर्तिपूजा, बलि प्रथा, वेदों की उपेउ और मनमानी व्याख्याएं जिम्मेदार हैं! पिछले 150 वर्षों के दौरान अपने आपको परमात्मा का दलाल मानने वाले  विभिन्न नकली बाबा, भगवान्,गुरु, पुरोहित, संन्यासी, स्वामी, मुनि आदि क्यों पैदा हो गये हैं? ये सारे मिलकर सनातन को नष्ट करने पर लगे हुये हैं! इन सनातन विरोधी तथाकथित धर्मगुरुओं के पैदा होने के लिये कोई बाहरी शक्ति नहीं अपितु हमारी धरातलीय पृष्ठभूमि जिम्मेदार है! सनातन धर्म और संस्कृति को इतना नुकसान यवन, मंगोल, मुगल, अंग्रेज भी नहीं पहुंचा पाये थे, जितना नुकसान पिछले 150 वर्षों के दौरान पैदा हुये नामदानियों,भक्तिमार्गियों,अद्वैतवादियों, शून्यवादियों, मायावादियों, गीतावादियों, भागवतवादियों, श्रीराम-श्रीकृष्ण कथाकारों, मुरलीवादियों,  झाडफूंकियों,  तांत्रिकों, ज्योतिषियों,योगाभ्यास की आड में शारीरिक उछलकूद सिखाने वाले व्यापारी बाबाओं तथा इन सबसे साठगांठ करके सत्ता पर कब्जा करने वाले नेताओं ने बहुत अधिक नुकसान पहुंचाया है!भारतीय विश्वविद्यालयों में कहीं भी सनातन परंपरा के दर्शनशास्त्र, तर्कशास्त्र,नीतिशास्त्र, अध्यात्म, योगाभ्यास, साधना  तथा संस्कृति और भारती हिंदी आदि भाषाओं के अध्ययन, अध्यापन, शोधादि की व्यवस्था नहीं है!

        जब हरेक क्षेत्र में भारत का माहौल इतना खराब है तो फिर सनातन धर्म और संस्कृति के बचने की संभावना कहीं भी नजर नहीं आती है! जो भी सत्ता पर कब्जा कर लेता है, वही पश्चिम का अंधानुकरण करके भारत और भारतीयता की पीठ में खंजर घोंपने लगता है! और तो और हिन्दू हितकारी कहे जाने वालों ने तो सनातन के विरोध की सारी सीमाओं को तोड दिया है! दुनिया के सबसे बडे और कमाऊ मंदिर कहे जाने वाले तिरुपति तथा अयोध्या में भी गाय,गधे, घोड़े, खच्चर, भेड, बकरी, मछली की चर्बी से बने प्रसाद को खिला दिया है! हिन्दू हितैषियों के शासनकाल में यह सब अनाचार होता रहा है! लेकिन इसके लिये कोई जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं है! देश के साथ में कांग्रेस भाजपा का खेल खेला जा रहा है! इस मिलावट को पूजारी नहीं बतला पाये, लेकिन विज्ञान ने बतला दिया है! इस तरह के घृणित ढंग से सनातन धर्म और संस्कृति को बर्बाद किया जा रहा है!बर्बादी को करने वाले सभी हमारे अपने ही लोग या नेता या अधिकारी हैं!

        चार्वाक के सहारे के बिना अध्यात्म एक ढोंग बनकर रह जाता है! अध्यात्म की फसल चार्वाक की भूमि पर ही बोई जाती है! यदि चार्वाक फसल के लिये भूमि है तो अध्यात्म फल और फूल है! व्यक्ति की भौतिक जरुरतों के पूरा हुये बिना अध्यात्म की तरफ गति नहीं हो सकती! पेट में जब तक अन्न नहीं जायेगा, तब तक अध्यात्म के बारे में विचार करना भी बेवकूफी है! भूखे भजन न होई गोपाला, ये लो अपनी कंठी माला!जो लोग बेरोजगारी, भूखमरी और अर्थाभाव के कारण मारे मारे घूम रहे हैं, पहले उनकी इन प्राथमिक जरुरतों का पूरा किया जाना आवश्यक है! हमारे तथाकथित बाबा, संत, योगी ,धर्मगुरु आदि सभी मिलकर अमीर, गरीब, भूखे लोगों को अध्यात्म में दीक्षित कर रहे हैं! यह कोरी मूढता है! यह सिर्फ संप्रदाय को बढाने का प्रयास है! यह सिर्फ भीड को बढाना है! यह सिर्फ निठल्ले लोगों के लिये टाईमपास है!जो कुछ भी नहीं कर सकते हैं, वो बाबाओं के पास आकर दीक्षा ले लेते हैं!ऐसे निठल्ले लोगों की भीड भारत की अर्थव्यवस्था पर एक बोझ है!किसी भी प्रकार के उत्पादन में इस भीड का कोई योगदान नहीं है! भारत में ऐसे निठल्ले भोजनभट्ट लोगों की तादाद दस करोड़ के आसपास है!लेकिन इनका अध्यात्म से दूर दूर तक भी कोई लेना देना नहीं है! 140 करोड़ की आबादी के भारत में दस करोड़ निठल्ले लोगों की भीड़ भारत की अर्थव्यवस्था को बर्बाद करने के लिये काफी है! राजनीतिक अव्यवस्था और नासमझी की वजह से भारत में वैसे भी रोजगार नहीं हैं! ऊपर से अध्यात्म और धर्म की आड में बाबाओं, संतों,भगवानों,स्वामियों, संन्यासियों द्वारा दीक्षित किये गये निठल्ले लोगों की यह भूखी भीड? धार्मिक आजादी का यह तो मतलब नहीं है कि इस तरह से निठल्ले पेटुओं की भीड को तैयार कर लिया जाये! लेकिन भारत में यह सब हो रहा है! झाडफूंक, नामदान,शब्द धुन,नादानुसंधान,  सचखंड, अनाहत, मुरली, कपालभाति, शक्तिपात, संन्यास, दीक्षा, कनफूंक, कनकट, सेवा, मोक्ष आदि की आड लेकर तमाशा करने न तो राष्ट्र की सेहत के लिये ठीक है तथा न ही व्यक्ति के बाहरी भीतरी विकास के लिये सही है!
        जब इस तरह की मूढताएं, बेवकूफियां, पागलपन, पाखंड, ढोंग आदि प्रचलित हो जाते हैं तो इनको उखाडने के लिये चार्वाक, लोकायत, महावीर,गौतम बुद्ध का पैदा होना आवश्यक हो जाता है! ढोंगी बाबा लोग फिर भी चुप नहीं बैठते हैं! अपितु प्रचार करने लगते हैं कि सनातन धर्म और संस्कृति खतरे में हैं! फिर ये सनातन धर्म और संस्कृति को बचाने की आड में अपना धंधा शुरू कर देते हैं! धूर्त नेताओं का इन्हें भरपूर सहयोग मिलता है!ऐसे विषम हालात में फिलहाल भारतभूमि चार्वाक दर्शनशास्त्र की उपजाऊ भूमि है! भारतीय राजनीतिक,धार्मिक, नैतिक परिवेश में अध्यात्म के फूल नहीं अपितु उन्मुक्त भोगवादी उपयोगितावादी परिवेश तैयार हो गया है! लोग पागलों की तरह डोंकी से विदेशों में रोजगार की तलाश में घूम रहे हैं! मिलती है सिर्फ प्रताडना!मिलता है सिर्फ धोखा! केवल भौतिकता की उपजाऊ भूमि पर ही अध्यात्म की ऊंचाइयों को जाना जा सकता है!पाश्चात्य लोग भौतिकता के लिये पागल हैं तो भारतीय लोग अध्यात्म की आड लेकर एक अन्य ढंग से भौतिकता के ही दीवाने हैं! दोनों बाहरी जगत् में आसक्त हैं! और जो बाहरी जगत् यानि इंद्रियों के भोगों में आसक्त हैं, वही तो चार्वाक हैं! पूर्व और पश्चिम सभी चार्वाक बने बैठे हैं!  लेकिन यहाँ भी यह ध्यान रखने की बात है कि इन्होंने चार्वाक के पाखंड और ढोंग का विरोध करने वाले पक्ष को विस्मृत कर दिया है! केवल भोग वाले पक्ष को ही प्रधानता दी है!
आचार्य शीलक राम
दर्शनशास्त्र -विभाग
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय
कुरुक्षेत्र - 136119

नवरात्रि का भौतिक महत्व (Physical importance of Navratri)

         पुरातन काल में जब भी कोई युवा गुरुकुल से शिक्षित होकर वापस घर लौटता था तो उससे यह प्रश्न अवश्य पूछा जाता था कि क्या आपने उस तत्व को जान लिया है जो सब प्रकार के जानने, देखने,सुनने, स्पर्श करने, गंध लेने, स्वाद लेने के पीछे निहित होता है? इस तरह के  ये संवाद लंबे चलते थे! इन संवादों के माध्यम से ऋषि लोग शिक्षार्थियों  को जीवन और जगत् के सत्यों से अवगत करवाते थे!उपनिषद् इस शैली के लिये जगत् प्रसिद्ध हैं! हमारा उद्देश्य यहाँ पर अन्न ग्रहण करने तथा उपवास करने से संबंधित है!आंखें बंद किये व्यक्ति को रुप का,कान बंद किये हुये व्यक्ति को शब्द का, भूखे व्यक्ति को भोजन का का अधिक ख्याल रहता है! जिसके पास जिसका अभाव है, उसे उसी अभाव के महत्व का पता चलता है! जो हमारे पास मौजूद है, हम उसे भूला देते हैं! उसे महत्व नहीं देते हैं! उसकी उपेक्षा कर देते हैं! उपवास किये व्यक्ति को भोजन ही सब कुछ लगने लगता है! ऐसे व्यक्ति के लिये भोजन ही ब्रह्म हो जाता है! हजारों वर्षों पहले तैत्तिरीय उपनिषद्  ने  महर्षि भृगु और उनके पुत्र वरुण की कथा के माध्यम से इस सत्य को उजागर करते हुये कहा था कि अन्न भी ब्रह्म है, प्राण भी ब्रह्म है, मन भी ब्रह्म है, विज्ञान भी ब्रह्म है तथा आनंद भी ब्रह्म है!इनमें से किसी का भी अपमान न करें! मानव चेतना के ये पांच स्तर हैं, जिन पर वह जीवन को जीता है! ये पांच कोश हैं!अन्नमय,प्राणमय,मनोमय, विज्ञानमय तथा आनंदमय पांच कोश प्रसिद्ध हैं! ये पांच कोश पंचकोशीय साधना में भी बदल सकते हैं! लेकिन इसके लिये चेतना के हरेक  में ब्रह्म के दर्शन करने होंगे! न अन्न की उपेक्षा, न प्राण की उपेक्षा, न मन की उपेक्षा, न चित्त की उपेक्षा तथा न आंनद की उपेक्षा! इन स्तरों पर जीवन की उपेक्षा नहीं अपितु यह साक्षात् करना होगा कि हर स्तर पर सूक्ष्म रूप से ब्रह्म ही वर्तमान है! किसी भी स्तर की उपेक्षा करने से हम वहीं पर उलझकर रह जाते हैं! नवरात्रि का पर्व इन पांचों स्तरों में से हरेक स्तर पर ब्रह्म का साक्षात्कार करने की साधना है! इसके अंतर्गत देहशुद्धि, पप्राणशुद्धि, मनशुद्धि, चित्तशुद्धि करते हुये ब्रह्म साक्षात्कार करना है! यहाँ पर हम नवरात्रि के भौतिक/शारीरिक/आयुर्वेदिक पहलू पर चर्चा करेंगे!

तैत्तिरीय उपनिषद् के भृगु वल्ली के अंतर्गत अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात, प्राणो ब्रह्मेति व्यजानात, मनो ब्रह्मेति व्यजानात, विज्ञानं ब्रह्मेति व्यजानात तथा आनंदो ब्रह्मेति व्यजानात कहकर अन्न, प्राण, मन, विज्ञान और आनंद की प्रशंसा की गई है! इसके पश्चात् अन्नं न निंदात, तद् व्रतम् आदि कहकर इन सभी के पीछे निहित परमपिता परमात्मा को जानने की सीख दी है!यानि समस्त जगत् में कुछ भी निंदनीय नहीं है! सबके भीतर सूक्ष्म रूप से परमात्मा वर्तमान है! सनातनी को यह रहस्य ज्ञात होना चाहिये!

यदि हमारा शरीर निरोग है तो हम संसार की हरेक भोग्य वस्तु का भोग कर सकते हैं! यदि हमारा शरीर व्याधिग्रस्त है तो संसार का कोई भी भोग हमें अच्छा नहीं लगेगा! इसलिये भोग विलास के लिये शरीर का निरोगी होना बेहद आवश्यक है! एक महत्वपूर्ण तथ्य और भी है! यदि हमारा शरीर व्याधिग्रस्त है तो हम शरीर से चिपके रहेंगे! शरीर से ऊपर उठकर देखना हमारे लिये असंभव हो जायेगा! निरोगी व्यक्ति ही शरीर से ऊपर उठकरचेतना के अन्य तलों का साक्षात्कार करके शांत, सुरक्षित, सहज और सह अस्तित्व को अनुभूत कर सकता है!संसार में तो हालात ऐसे बन गये हैं कि उपवास करने वाले और भोजनभट्ट दोनों ही प्रकार के लोग शरीर पर अटके पडे हैं! और जो जिनका जीवन शरीर तक सीमित है, वो व्यक्ति पशुओं के समान हैं! उनके भीतर प्रेम, करुणा, सौहार्द, सह अस्तित्व की अपेक्षा घृणा, इर्ष्या, द्वेष, स्वार्थ, आपाधापी, हिंसा, शोषण आदि बढते जाते हैं! आज सारा संसार बारुद के ढेर पर खड़ा है! हर तरफ हिंसा, बदले की भावना,स्वार्थ और उन्मुक्त भोग का नंगा नाच चल रहा है! भौतिकवादी लोग इसे बेभय होकर सरेआम कर रहे हैं तो तथाकथित आध्यात्मिक लोग इसे छिपकर कर रहे हैं!इसमें भौतिकवादी लोग अधिक ईमानदार लगते हैं क्योंकि वो कुछ छिपा नहीं रहे हैं!लेकिन आध्यात्मिक लोग बेईमान हैं क्योंकि वो इस प्रकार के अनैतिक कुकर्म छिपकर कर रहे हैं! सरकारी सरंक्षण भी इनको उपलब्ध है! अन्यथा बलात्कार और हत्या के अपराध में आजावन सजा काट रहा कोई बलात्कारी और हत्यारा गुरु हर बार चुनाव के समय कैसे पैरोल पर जेल से बाहर आ जाता है? सनातन धर्म में वर्षभर में चार संधियों में तीन तीन महीने के अंतराल पर चार नवरात्रि पर्व आते हैं! दो नवरात्रि पर्व सभी के लिये होते हैं तो दो गुप्त नवरात्रि पर्व सिर्फ तांत्रिक साधकों के लिये होते हैं! इस समय शारदीय नवरात्रि पर्व चल रहा है!संधिकाल में व्यक्ति की पाचनशक्ति कमजोर हो जाती है! शरीर में पहले से मौजूद विषों की सफाई का काम इस दौरान होता है!ये विष शरीर में ही नहीं अपितु पूरी प्रकृति में भी प्रबल हो जाते हैं! अतः यह आवश्यक हो जाता है कि प्रकृति का सहयोग करते हुये हम व्यक्ति भी अपने शरीर का शोधन और साफ सफाई का कार्य करें! इसके लिये सर्वप्रथम तो यह आवश्यक है कि हम भारी, गरिष्ठ, दुपाच्य,तला हुआ, मिर्च मसालेदार,तीखा, मांसाहार आदि का त्याग करके केवल हल्का भोजन फल,सब्जी,नारियल पानी,गर्म जल आदि ही कम से कम ग्रहण करें! यानि इस दौरान उपवास करें! उपवास करने से हमारे शरीर को साफ सफाई करने का सही अवसर मिल जाता है! इस समय नया अन्न ग्रहण न करें क्योंकि यह भी पचने में गरिष्ठ होता है! नौ दिन तक केवल सीधे ही पेड -पौधो से आया हुआ वह भोजन ग्रहण करें, जोकि बिलकुल प्राकृतिक हो! फलाहार या फलों का रस निकाल कर ले सकते हैं! नारियल पानी पी सकते हैं! गर्म पानी अधिक से अधिक पीयें! यह शरीर की सफाई का काम सहज कर देता है! खाली पेट चाय आदि न पीकर गर्म पानी, नारियल पानी और फलों का रस सेवन करें! केवल मौसमी फलों का प्रयोग करें! ये सस्ते और सुपाच्य दोनों ही होते हैं!

हम जितना भी भोजन करते हैं, उसका बहुत कम हिस्सा हमारा शरीर पचाकर प्रयोग कर पाता है! खाया गया अधिकांश भोजन व्यर्थ चला जाता है! लेकिन हम भूख की बजाय आदत के गुलाम होकर भोजन करते हैं! कम से कम खायें तथा भलि तरह से चबा चबाकर ही खायें! इससे भोजन भी कम खाया जायेगा, पेट भी ठीक रहेगा,ऊर्जा भी मिलेगी, देह में विष भी एकत्र नहीं होने से बिमारियाँ भी नहीं आयेंगी! पानी को भी बैठकर शांति से घूंट घूंटकर पीयें!जल्दी का काम शैतानी का है! अपनी देह का सम्मान करें! यह देह हमारी खुद की है! इससे जितना प्रेम करेंगे, यह उतना ही हमारा ख्याल रखेगी! इससे हमारा सांसारिक जीवन सुखमय बनता जायेगा! बस, इसी उद्देश्य को अर्जित करने के लिये नवरात्रि पर्व मनाया जाता है! शारीरिक दृष्टिकोण से यह पूरी तरह से आयुर्वेदिक विज्ञान पर आधारित है!

नवरात्रि पर्व की नौ देवियों के नाम आयुर्वेदिक औषधियों के नाम भी हैं! ये सभी औषधियाँ व्यक्ति को वर्ष भर आरोग्य प्रदान करती हैं!शैलपुत्री यानि हरड! यह शरीर के शोधन में उपयोगी है!यह कई प्रकार की होती है!ब्रह्मचारिणी यानि ब्राह्मी! यह मस्तिष्क और पेशाब के अंगों हेतु लाभकारी है! चंद्रघंटा यानि चमसूर! यह चमड़ी के रोगों के लिये लाभकारी है! कुष्मांडा यानि पेठा! यह पित्त रोगों का शमन करती है! स्कंदमाता यानि अलसी! यह शरीर की रोग प्रतिरोधक शक्ति को बढाती है! कात्यायनी यानि मोईया, महुआ का फल! यह वात रोगों में लाभकारी होती है!कालरात्रि यानि नागदौन ! यह पाचन विकारों में बढिया काम करती है! महागौरी यानि तुलसी! तुलसी के औषधिय गुणों से सभी वाकिफ हैं! यह कई प्रकार की होती है! सिद्धिदात्री यानि शतावरी! यह रोग प्रतिरोधक शक्ति को बढाकर शरीर को पोषण प्रदान करती है! इन सभी औषधियों का आयुर्वेदिक महत्व है!

जो पेड -पौधे,कृत्य, पशु, आचरण मानव जीवन सहित संपूर्ण संसार के लिये हितकारी होते हैं, सनातन धर्म के ऋषियों ने उनको पौराणिक कथाओं के माध्यम से देवी देवताओं का रुप देकर हमारे नित्य प्रति के धार्मिक जीवन से जोड़ दिया है! इसका उद्देश्य यही था कि लोग धार्मिक होने की वजह से इनको अपने आचरण में उतारेंगे! लेकिन आजकल हालात बहुत खराब हो चुके हैं! अति स्वार्थी होने और पाश्चात्य जीवन शैली का अंधानुयायी होने की वजह से नवरात्रि पर्व एक कोरा कर्मकांड या दिखावा या फैशन बनकर रह गया है!पाखंड, ढोंग,व्यापार, दिखावे और इस पर्व के रहस्य को भूल जाने के कारण इस पर्व के माध्यम से होने वाले शारीरिक लाभों से हम सब वंचित ही रहते हैं!पुरोहितों ने तो इन पेड पौधो और औषधियों को दुर्गा देवी के रुपों का आकार देकर इनके नाम पर मंदिरों तक का निर्माण कर रखा है! शैलपुत्री का बारामूला में, ब्रह्मचारिणी का काशी में, कुष्मांडा का कानपुर में, स्कंदमाता का विदिशा आदि में, कात्यायनी का वृंदावन में, कालरात्रि का काशी, नया गाँव में, महागौरी का काशी में तथा सिद्धिदात्री देवी का छिंदवाडा में मंदिर बना हुआ है!

कर्मकांड करने चाहियें, क्योंकि इनके माध्यम से जड चेतन जगत् के लिये उपयोगी हमारी परंपरायें  जीवित रहती हैं! लेकिन इनके वास्तविक रहस्यों को समझकर उन्हें अपने आचरण में स्थान देना सबसे अधिक महत्वपूर्ण है! इस सत्य को सनातनी लोग भूलते जा रहे हैं! धर्माचार्यों का इस संबंध में सबसे अधिक कर्तव्य बनता है कि वो जनता जनार्दन को इसके लिये प्रेरित करें! लेकिन विडम्बना है कि खुद धर्माचार्य ही पाखंड, ढोंग, दिखावे और व्यापार में उलझे हुये हैं!

 

आचार्य शीलक राम

दर्शनशास्त्र-विभाग

कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय

कुरुक्षेत्र-136119

Saturday, September 21, 2024

राष्ट्रीय साप्ताहिक प्रतियोगिता

 आचार्य अकादमी चुलियाणा, रोहतक (हरियाणा)
✍राष्ट्रीय साप्ताहिक प्रतियोगिता✍
आपको जानकर अतीव प्रसन्नता होगी कि भारत की प्रसिद्ध धर्म, दर्शन, योग व हिन्दी के प्रसार-प्रचार को समर्पित तथा अंतर्राष्ट्रीय शोध पत्रिका प्रंमाण  अन्तर्राष्ट्रीय मुल्यांकित त्रैमासिक शोध पत्रिका  (ISSN:2249-2976),  चिन्तन अन्तर्राष्ट्रीय मुल्यांकित त्रैमासिक शोध पत्रिका (ISSN:2229-7227), हिन्दू अन्तर्राष्ट्रीय मुल्यांकित त्रैमासिक शोध पत्रिका (ISSN : 2348-0114), आर्य अन्तर्राष्ट्रीय मुल्यांकित त्रैमासिक शोध पत्रिका (ISSN: 2348 – 876x) व द्रष्टा अन्तर्राष्ट्रीय मुल्यांकित त्रैमासिक शोध पत्रिका (ISSN: 2277-2480)  को प्रकाशित करने वाली संस्था आचार्य अकादमी चुलियाणा, रोहतक (हरियाणा) के तत्वावधान में निःशुल्क राष्ट्रीय 36वें साप्ताहिक कविता प्रतियोगिता का आयोजन किया जा रहा है ।
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विषय :   *'श्राद्ध'*
प्रतियोगिता की शर्तें:-
1. आपकी रचना देवनागरी लिपि में टंकित होनीं चाहिए।
2. दिए गए उपरोक्त विषय पर रचनाये स्वीकार की जाएंगी ।
3. रचना में किसी भी प्रकार के अश्लील, असामाजिक व राष्ट्र विरोधी शब्द नही होने चाहिए।
4. एक रचनाकार केवल एक ही रचना भेज सकता है।
5. रचना की उत्कृष्टता के आधार पर विजेताओं का चयन किया जाएगा।
6. चयन पैनल का निर्णय सर्वमान्य होगा।
7. रचना के नीचे रचनाकार की सामान्य जानकारियां जैसे- नाम, पता, सम्पर्क सूत्र, ई-मेल आदि अवश्य लिखी होनी चाहिए।
8. ग्रुप में किसी प्रकार का वाट्सएप व यूट्यूब लिंक ना पोस्ट करें l ऐसा करने पर उसे ग्रुप से बाहर कर दिया जाएगाl
9. रचना 29 सितंबर 2024 तक ग्रुप में भेज सकते हैं, उसके बाद किसी भी रचनाकार की रचना स्वीकार नही की जाएगी।
10. विजेताओं की घोषणा  ग्रुप में ही की जाएगी।
11. दस सर्वश्रेष्ठ कवियों को आचार्य अकादमी चुलियाणा, रोहतक (हरियाणा)  की ओर से प्रमाण-पत्र दिए जाएंगे॥
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पंजीकरण-शुल्क - निःशुल्क
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रचना भेजने के माध्यम:-
वाट्सएप ग्रुप :
https://chat.whatsapp.com/ILcr37glaFAFJX95PiuFhx
रचनाएं केवल हिन्दी कवि व कविताएं ग्रुप में ही स्वीकार की जाएंगी।
निवेदक :
आचार्य शीलक राम
अध्यक्ष आचार्य अकादमी चुलियाणा
रोहतक (हरियाणा)
वैदिक योग शाला
कुरूक्षेत्र (हरियाणा)

Thursday, September 19, 2024

निष्ठुर जिंदगी (cruel life)

जो बांटते जिंदगी में
हर दिन बस उजाले!
अंधेरा  ही अंधेरा है
उन्हें  कौन संभाले!!

देते जो दूसरों को
हर दिन बस फूल!
वही  लगे  रहते हैं
उन्हें मिलाने को धूल!!

रखते जो दूसरों का
पल-प्रतिपल ख्याल!
उन्हीं से पूछते बस
सवाल  ही सवाल!!

दूसरों के दुख-दर्द में
आंसू  जो बहाते हैं!
उनके हिस्से में यहाँ
दुख-दर्द ही आते हैं!!

खुद भूखे रहकर भी
जो भरते भूखों का पेट!
वही भूखे लोग यहाँ
उनको करते मटियामेट!!

कितनी निष्ठुर जिंदगी
यहाँ कितने निष्ठुर लोग!
दुख हर दिन आते बस
नहीं सुख का संजोग!!
.........
आचार्य शीलक राम
वैदिक योगशाला
कुरुक्षेत्र

डॉं सुरेश कुमार हिन्दी सेवा 2024 से सम्मानित


दैनिक दि ग्राम टुडे न्यूज़ समूह द्वारा राजकीय महाविद्यालय सांपला, रोहतक में कार्यरत डॉं सुरेश कुमार, असिस्टेंट प्रोफेसर,  हिन्दी को "हिन्दी दिवस" के अवसर पर हिन्दी साहित्य के क्षेत्र में उनके द्वारा किए गए अमूल्य योगदान के लिए टीजीटी हिन्दी सेवा सम्मान 2024 से विभूषित किया गया है। डॉं सुरेश कुमार को इससे पहले अनेक संस्थाओं द्वारा उनके उल्लेखनीय कार्यों के लिए सम्मानित किया जा चुका है।  उनकी अब तक सात पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं तथा विभिन्न राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय शोध पत्रिकाओं में 40 से ज्यादा शोध पत्र भी प्रकाशित हो चुके हैं। गौरवत्व है कि वे भारतीय वायु सेना में भी बीस साल तक सेवाएं दे चुके हैं।

खुद से करो दोस्ती (make friends with yourself)

 खुद से करो दोस्ती

संवाद टूट चुका है!
संबंध छूट चुका है!
यही हकीकत जिंदगी,
भांडा फूट चुका है!!1

अनेक समस्या ऐसी!
कही नहीं जायें कैसी!
भीतर ही घूमती रहती हैं,
बड़ी हिमालय जैसी!!2

मतलब नहीं कहने का!
मजबूरी  में  सहने  का!
जिंदगी नरक भी स्वर्ग भी,
ढंग सीख लो सहने का!!3

बैठकर एक कोने में!
फायदा बहुत रोने में!
कहोगे तो उपहास करेंगे,
सीख लो इसी तरह होने में!!4

आंसू बहुत कुछ कहते!
दुख  में अविरल  बहते!
इनकी पीड़ा न कोई  समझे,
किस दुख-सागर में रहते!!5

खुद  का  खुद से नाता!
न कोई किसी को भाता!
करो सर्वप्रथम खुद से दोस्ती,
मुसीबत में न ब्याहा-ब्याहता!!6

                        आचार्य शीलक राम
                        वैदिक योगशाला
                        कुरुक्षेत्र

Friday, August 30, 2024

राजनीति और धर्म सेवा नहीं रहे (Politics and religion are no longer serviceable)

 

अन्य व्यवसायों की तरह ही राजनीति भी एक व्यवसाय है! राजनीति सेवा किसी भी कोण से नहीं है। कमाई, बैंक बैलेंस, लूटखसोट,भ्रष्टाचार, पूंजीवाद,मानसिकता, नेतागिरी, दुर्व्यवहार, हीनताग्रंथि,अंध-प्रतियैगिता,उपलब्धि, दादागिरी, बदमाशी,परिवारवाद, दलबदल आदि हरेक पहलू से राजनीति एक शुद्ध धंधा है, व्यापार है,छीनाझपटी है!जिनको राजनीति में आना होता है, उनको 'सेवा' की आड़ लेना पड़ता है! नाम सेवा का लेकिन खूलेआम लूटखसोट चलती है! अपवादस्वरूप एकाध कोई नेता सेवा के लिये राजनीति में आता होगा! बहुतायत से राजनीति में आनेवाले लोग धंधेबाजी करते हैं! और अपवाद कभी नियम नहीं होता है! आप सोचिये कि यदि राजनीति सेवा होती तो आज भारत विकास में कितनी ऊंचाइयों पर चला जाता! वास्तव राजनीति और नेताओं में सेवाभाव तो होता है लेकिन वह सेवाभाव जनता जनार्दन के प्रति नहीं अपितु अपने खुद के लिये होता है! पिछले सात दशक के दौरान राजनीति में मौजूद रहे हजारों विधायक, सांसद और नेताओं की गहराई से पडताल करके देख लो! अधिकांश नेता राजनीति में आते समय हजार पति ही मुश्किल से होंगे लेकिन एक दो योजना राजनीति में रहते ही करोडपति और अरबपति बन जाते हैं! उनके पास कयी -कयी कोठियां, प्लाट, जमीन, होटल, फैक्ट्रियां , कालोनियां आदि हो जाते हैं!विदेशों में भी प्रोपर्टी हो जाती है!शेयर बाजार में भी इन्वेस्टमेंट हो जाती है! कोरपोरेट जगत में भी हिस्सेदारी हो जाती है! आखिर इतनी धन दौलत कहाँ से और कैसे एकत्र हो जाती है? इतनी जल्दी करोडपति और अरबपति बनने का यह चमत्कारी फार्मूला नेता लोग जनता जनार्दन को क्यों नहीं बतलाते हैं? इनके इस फार्मूले से जनता भी तो अमीर बन सकती है!

ध्यान रहे कि सेवा से कोई व्यक्ति इतनी जल्दी अमीर नहीं बन सकता है!आज तक सेवा के माध्यम से कोई व्यक्ति करोडपति और अरबपति नहीं बन सका है! अरबों की संपत्ति कमाने के लिये सैकड़ों प्रकार की अन्य तिकडमबाजियां करनी पड़ती हैं!लोगों को धोखे देने पडते हैं! सिस्टम की कमजोरी का फायदा उठाकर काम निकालने पडते हैं! भ्रष्टाचार करना पडता है! काले और सफेद धन की अदला बदली करनी पडती है! अधिकारियों से साठगांठ करनी पडती है! रिश्वत देकर काम निकलवाने होते हैं! राजनीतिक दलों को भारी भरकम चंदे देने होते हैं! लाख रुपये दान करने की आड लेकर करोड़ों की कमाई करनी पडती है!अंधानुयायियों के थोक में वोट लेने के लिये धर्मगुरुओं को करोड़ों के चंदे देने पडते हैं! भोली -भाली जनता को कानोकान खबर न हो और देश को लूटते रहो! कुल जमा यही है राजनीति!नेताओं के समान झूठा, कपटी, धंधेबाज, धोखेबाज, भ्रष्टाचारी,अय्याश, बेहरूपिया, दलबदलू और रंगबदलू इस धरती पर अन्य कोई भी प्राणी नहीं है! लेकिन इस सबके बावजूद भी नेता अपने आपको बस एक अदना से सेवक के रूप में प्रचारित करता है!जितनी विनाशकारी तिकडमबाजियां नेताओं के पास होती हैं, उतना अन्य किसी  के  पास नहीं होती हैं!

जिस तरह से नेता अपने आपको राष्ट्रसेवक कहते हैं, ठीक उसी तर्ज पर धर्मगुरु अपने आपको धर्मसेवक कहते हैं!दोनों सेवा की आड में अपना लूटखसोट का धंधा चलाते हैं!

आज के हालात देखिये!राष्ट्रवादी कहे जाने वाले नैतिकता और धार्मिकता को तिलांजलि देकर अधिकांश आर्यसमाजी पौराणिक संघी बन चुके हैं!आखिर सत्ता, दौलत और प्रसिद्धि के नशे से कौन बच पाया है? शायद ही कोई विरला बचा होगा! कुछ समय पहले कथाकार कहे जाने वाले रामभद्राचार्य ने महर्षि दयानंद के बारे में वाहियात टिप्पणी की थी! कुछ समय तक आर्यसमाजी भाईयों ने सोशल मीडिया पर इस संबंध में खूब उछलकूद की!रामभद्राचार्य को माफी नहीं मांगने पर कोर्ट में घसीटने की धमकी भी दी! लेकिन रामभद्राचार्य पर संघ और सरकार की छत्रछाया है! उनका कौन क्या बिगाड़ सकता है?इन्होंने तो सारे शंकराचार्यों को ठिकाने लगा दिया है!और फिर महर्षि दयानंद तो संघ और भाजपा को कभी अच्छे ही नहीं लगे!रामभद्राचार्य द्वारा  महर्षि दयानंद का अपमान करने पर माफी मांगना तो दूर रहा, बाबा ने तो बीचबिचाला करके मामले को शांत करने आर्यविरोधी कोशिश को ही अंजाम दे दिया!और ये अपने आपको महर्षि दयानंद का परम भक्त भी कहता है! वास्तव में आर्यसमाज को गर्त में ले जाने के लिये इस बाबा का भी बहुत बड़ा हाथ है!इस बाबा को लताडने की कितने आर्यसमाजी भाईयों की हिम्मत है? वास्तव में रामदेव को आयुर्वेद और योग की आड़ में अपना व्यापार करना है तो रामभद्राचार्य को कथा के माध्यम से यही काम करना है!

ठीक ही कहा है कि गरीब की औलाद जब बिगडती है तो सारी सीमाओं को तोड देती है! आजकल के अधिकांश बाबा लोग इसी पृष्ठभूमि से आते हैं! ये अरबपति तो बाद में बने हैं! ये व्यापार चलायें या महर्षि दयानंद के सम्मान की रक्षा करें? इनको केवल व्यापार से मतलब है! व्यापार के लिये ये कुछ भी अनैतिक, अधार्मिक कार्य कर सकते हैं! अंधभक्ति आज भी बहुमत में है तथा तर्कबुद्धि अल्पमत में होकर लगभग गायब है!

नेताओं के छल का एक उदाहरण देखिये! प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी जब भी विदेश यात्राओं पर जाते हैं तो वहाँ पर विभिन्न मंचों से अपने संबोधनों में भारत को बुद्ध और गांधी का देश कहते हैं! उन्होंने कभी भी भारत को श्रीराम, श्रीकृष्ण, मनु, वेदव्यास, शंकराचार्य, दयानंद, अंबेडकर, हेडगेवार, सावरकर का देश नहीं कहा है! यह सब कौनसी मानसिकता के कारण हो रहा है- समझदार व्यक्ति इसे आसानी से समझ सकता है!यहाँ भारत में श्रीराम या उनके पूजास्थल के नाम से वोट मांगते हैं लेकिन विदेशों में इनका नाम अपनी जबान पर लाना उचित नहीं समझते! इसमें राजनीति है या धर्म है? इसमें वोट बैंक है या सनातन संस्कृति है? इसमें चालाकी है या हिंदुत्व के प्रति प्रेम? आखिर मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम, पूर्णावतार श्रीकृष्ण, प्रथम मानव संहिता प्रदान करने वाले मनु,ज्ञान के प्रतीक वेदव्यास, दार्शनिक चुडामणि शंकराचार्य, राष्ट्रवाद और स्वदेशी के प्रतीक दयानंद, समता और न्याय के प्रतीक अंबेडकर को विदेशी धरती पर याद करने से हमारे नेताओं को डर क्यों लगता है? यह डर हीनभावना का प्रतीक है या कोरी राजनीति है या भौतिकवादी विदेशी ताकतों को खुश करने का प्रयास है?वास्तव में नेताओं की कुटिल कुचालों को जनता जब तक समझ पाती है तब तक नेता और आगे निकलकर और भी घटिया दर्जे की हरकतें करने लगते हैं! नाम सेवा का लेकिन शुद्ध रूप से लूटखसोट चलती रहती है! राष्ट्रसेवा की आड़ में सारे कुकर्म छिप जाते हैं!वो दिन लद गये जब संघी भाई पैरों में चप्पल पहनते थे, पैदल या साईकिल पर चलते थे, तख्तों पर सोते थे, रुखी सूखी खाकर गुजारा करते थे! बिना पारिश्रमिक में सेवा करते थे! अब तो सबके पास महंगी गाडियां, भव्य आवास, हवाई हवाई यात्राएं, विदेशों में सैर सपाटा, बड़े -बड़े पद, आलीशान कार्यालय हो गये हैं! जमीनी भारत से ये पूरी तरह से कट चुके हैं! इनका लक्ष्य अब सेवा नहीं अपितु मेवा, अय्याशी, पद और प्रतिष्ठा हैं!

ध्यान रहे कि भ्रष्टाचार का शिकार हुये जनमानस को जब भी कोई पद मिलेगा तो वह जमकर भ्रष्टाचार करेगा! खेल,राजनीति, शिक्षा, बिजली, पानी, परिवहन,पुलिस,शासन- प्रशासन, उद्योग,विभिन्न पदों की भर्तियों तथा परीक्षाओं में खुलेआम भ्रष्टाचार हो रहा है!भ्रष्टाचार पहले भी होता था, लेकिन पिछले एक दशक के दौरान तो भ्रष्टाचार के सारे रिकॉर्ड टूट गये हैं!इस भ्रष्टाचार ने भारत की कमर तोड दी है! प्रतिभा पलायन का एक प्रमुख कारण यह भ्रष्टाचार ही है! फिसड्डी सिफारशी आगे निकल जाते हैं और बिना सिफारिश के प्रतिभावान या तो तिल तिलकर मर जाते हैं या जुगाड़ हुआ तो विदेशों में चले जाते हैं या माता -पिता- परिवार - रिश्तेदारों या पडौसियों की गालियाँ खाते रहते हैं! खेलों  में ब्लाक स्तर और स्कूल स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर और विश्वविद्यालय स्तर तक भाई- भतीजावाद व्याप्त है! 140 करोड़ के देश भारत में  अनगिनत खेल प्रतिभाएं हैं लेकिन अधिकांश में भ्रष्टाचार की भेंट चढ जाती हैं! ओलंपिक, राष्ट्रमंडल, विश्व प्रतियोगिताओं में मैडल इसीलिये नहीं आ रहे हैं! विनेश फोगाट,बजरंग आदि इसके ताजा उदाहरण हैं! भ्रष्ट सिस्टम से लडते -लडते प्रतिभाएं बर्बाद हो जाती हैं लेकिन सिस्टम और भी अधिक भ्रष्ट बनता जाता है! ऊपर से नीचे तक इस भ्रष्टाचार को सरकारी सरंक्षण प्राप्त है!और ये इस तरह के महा -भ्रष्टाचारी नेता, धर्मगुरु, शासक, प्रशासक, शिक्षक, कोच और खेल संघ आदि भारत को विश्वगुरु बनाने की घोषणा कर रहे हैं! हम भ्रष्टाचार में तो विश्वगुरु बन चुके हैं लेकिन विकास और समृद्धि में हम विश्वगरीब हैं!खेलों,विज्ञान, शिक्षा, तकनीक, शोध आदि में विश्व में हमारा कोई भी योगदान नहीं है! इस विविध प्रकार की बर्बादी और भ्रष्टाचार के बावजूद हमारे नेता और धर्मगुरु अपने आपको राष्ट्रसेवक और धर्मसेवक कह रहे हैं!बेशर्मी की सारी हदें टूट चुकी हैं!एक प्रकार के बेशर्म लूटेरे सत्ता से जाते हैं तो दूसरे प्रकार के बेशर्म लूटेरे सत्तासीन हो जाते हैं!अखबारी,इलेक्ट्रॉनिक, सोशल मीडिया तथा प्रचारी तंत्र वाला विकसित और समृद्ध भारत कहीं भी दिखाई नहीं देता है! जमीनी भारत की हालत अत्यधिक दयनीय,बदहाल,भ्रष्ट, अभावग्रस्त, बेरोजगार, बिमार, भूखमरी और कुपोषण से ग्रस्त है!अपने आपको राष्ट्रसेवक कहने वाले  राष्ट्र- लूटेरे बन चुके हैं तथा धर्मसेवक धर्म की आड़ में व्यापारी बन चुके हैं! दोनों ही सारे नियम, कानून, नैतिकता, धार्मिकता को छोडकर दौलत जोडने में लगे हुये हैं!

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आचार्य शीलक राम

दर्शनशास्त्र -विभाग

कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय

कुरुक्षेत्र 136119