Thursday, March 19, 2020

हमने आजादी प्राप्त नहीं की अपितु अंग्रेजों से भीख में मिली है!!

       भारत के भ्रष्ट नेता कितना ही यह राग अलापते रहें कि हमने भारत को आजादी दिलवाई, गांधी ने बिना खड़ग व ढाल के भारत को आजाद करवा दिया (हालांकि 1947 के आसपास आजादी के नाम पर 10 लाख लोगों का कत्लेआम हुआ था), हमने आजादी की प्राप्ति हेतु अंग्रेजों द्वारा दिए अनेक दुख सहे, हम अनेकों बार जेलों की यात्रा पर गए (हालांकि अनेक नेता बलात्कार, लूटपाट व चोरी-जारी के कुकर्मों के कारण जेलों में गए थे तथा बाद में उन्हें ‘स्वतंत्रता सेनानी’ की पैंशन भी सम्मान स्वरूप मिली), हमने भारत की आजादी हेतु अपना घर-बार व गृहस्थी बर्बाद कर दी, हम दर-दर की ठोकरें खाते रहे आदि-आदि कितनी ही बातें भारत की आजादी के संबंध में नेता लोग विभिन्न मंचों से सुनाते रहते हैं लेकिन सच यह है कि अंग्रेजों से हमने भारत को आजाद नहीं करवाया अपितु उन्होंने हमें स्वयं की बेहूदी शर्तों पर आजादी प्रदान की भी । वे ऐसा करने को विवश हुए इसमें भी सुभाषचन्द्र, सावरकर, श्री अरविंद, लाला लाजपतराय, विपिनचंद्र पाल, बाल गंगाधर तिलक, भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु तथा अन्य अनेक गुमनाम शहीद वीरों का खौफ काम कर रहा था । नरम दल वाले नेताओं के वैभव-विलास का जीवन जीने वाले जमावड़े ने पूरे मन से कभी नहीं चाहा कि अंग्रेज भारत छोड़कर ब्रिटेन में वापिस चले जाएं । इसीलिए आज भी कांग्रेस की सारी राज-काज की नीतियां दुष्ट अंग्रेजों वाली ही है । लूट मची है पूरे देश में । घोटाले पर घोटाले करके राष्ट्र का धन विदेशों में जमा करवाया जा रहा है । खरबों के घोटाले करने वाले भी दो-चार महीने जेल में आराम करके संसद भवन में खड़े दिखाई देते हैं । कानून की मार गरीब पर ही पड़ती है जबकि अंग्रेजी भक्त 2-4 प्रतिशत लोगों की सुरक्षा करने को सारा तंत्र सदैव तत्पर रहता है । गर्म दल ने पूरे मन से भारत की आजादी हेतु कार्य किया था लेकिन आश्चर्य देखिए कि न तो उनका कोई नाम लेवा बचा है तथा न ही उनका कोई वारिस समकालीन राजनीति में है । नरम दल वाले यानि कि गांधीवादी जिन्होंने पूरे मन से कभी आजादी चाही ही नहीं, 1947 से सत्ता का भोग कर रहे है, को कुछ कहें तो राजद्रोह या सांप्रदायिक का ठप्पा लगाकर जेल में ठोक देंगे । हां, राष्ट्रतोड़क इस्लामी उग्रवादियों की पांच सितारा सेवा खूब की जाती है ताकि मुसलमानों के वोट अपने कब्जे में रहे । क्या होगा इस देश का?
    जिस वक्त देश आजाद हुआ उस वक्त राष्ट्र को आजाद करवाने का कोई भी आन्दोलन नहीं चल रहा था, फिर अंग्रेजों ने इस देश को क्यों आजादी दे दी? - इस प्रश्न के उत्तर में अनेक षड्यंत्रों का भांडाफोड़ हो सकता है । किसी अंग्रेजी या कांग्रेस समर्थक नेता के पास इसका कोई जवाब हैं क्या? जवाब नहीं है अपितु हो-हल्ला जरूर हो जाएगा । राष्ट्रवादी क्रांतिकारी गर्म दल के नेता तो 1947 से पूर्व ही अधिकांशतः या तो देहत्याग कर चुके थे या नरम दल वालों की गद्दारी ने उनको मौत के मुंह में पहुंचा दिया था या एक-दो बचे हुए नेता अज्ञातवास में जा चुके थे । गांधीवादी नरम दल वालों के राष्ट्र को आजाद करवाने के आन्दोलन 1942 में समाप्त हो चुके थे - इसी काल में अग्रेजों ने एकदम से भारत को आजाद करने की सोची तो क्यों? हम आजादी प्राप्त करते तो उसकी कोई गरिमा भी होती लेकिन अंग्रेजों ने तो अपनी मनमानी, बेहूदी, अपमानजनक एवं दयनीय शर्तों पर हमें आजादी भीख में प्रदान की थी । उस आजादी का खामियाजा हम पिछले छह दशक से भोग रहे हैं । हर तरफ लूट-खसोट, व्यभिचार, बलात्कार, अनाचार, बेईमानी, भ्रष्टाचार, गरीबी, बदहाली, कुकर्म, उपद्रव, आंतक, शोषण एवं गद्दारी का बोलबाला है । देश के 2-4 प्रतिशत लोग बाकी 98-96 प्रतिशत लोगों को गुलाम मानते हैं तथा अंग्रेजों जैसा कमीना व दुष्ट व्यवहार करते हैं । इस सब से शायद गांधी व विनोबा की आत्मा खुश हो सकती है लेकिन दयानंद, सावरकर, सुभाष, अरविंद एवं राष्ट्रवादी मूल भारतीय की नहीं । गांधी का नाम लेकर व गांधीवादी होने का दावा करने वाले क्या-क्या राष्ट्रद्रोहपूर्ण कृत्य नहीं कर रहे हैं और वह भी लोकशाही की छत्र-छाया में । सब कुछ होते हुए भी देश की हालत बदतर है । बिजली, पानी, स्वास्थ्य, रोजगार, खेल, किसान, मजदूर एवं राष्ट्र की अस्मिता हेतु 1947 के पश्चात् अन्य देशों की तुलना में हम कहीं नहीं हैं । हां, आंतकवाद, उपद्रव, भ्रष्टाचार, शोषण, तुष्टीकरण, विश्वासघात एवं गद्दारी में जरूर हमने कीर्तिमान स्थापित किए हैं ।
    आपको जानकर आश्चर्य होना चाहिए कि हमने आज भी ‘राष्ट्रमंडल’ की सदस्यता ग्रहण की हुई है । इस राष्ट्रमंडल में वे देश सम्मिलित हैं जो कभी ब्रिटेन के गुलाम थे । वे सारे देश आजाद होने के बावजूद भी इंग्लैण्ड की महारानी को अपनी महारानी उसी तरह मानते हैं जैसेकि आजादी से पहले मानते थे । यानि कि आज भी गुलामी की निशानी को इन्होंने जीवित रखा हुआ है । यह सब नरम दल वालों की साजिश है । ये अपने आपको इंग्लैण्ड का पढ़ा-लिखा तथा अन्य समस्त भारत को अपना गुलाम, अपनी जागीर या अपनी भोगलीला भूमि मानते हैं । इंग्लैण्ड की महारानी को भारत आने पर वीजा आदि की जरूरत नहीं पड़ती है जबकि भारत का राष्ट्रपति जब इंग्लैण्ड जाता है तो उसे वीजा आदि की सारी औपचारिकताएं पूरी करनी पड़ती हैं - इससे बड़ा और सबूत क्या होगा कि हम आज भी गुलाम हैं - अंग्रेजों के या उन द्वारा स्थापित प्रतिनिधियों के । यदि हमें अपनी शर्तों पर आजादी मिलती तो हम आज समृद्ध, विकसित, निर्भय, आंतकवादमुक्त, धनी, पूर्ण शिक्षित, ईमानदार एवं न्यायप्रिय होते । लेकिन भीख में मिली आजादी ने हमें कहीं का नहीं छोड़ा है । भारत, भारतीयता, भारतवाद एवं सनातन आर्य वैदिक हिन्दू जीवन-मूल्यों का पग-पग पर अपमान हो रहा है । जो इनकी बातें करता है, उसे किसी न किसी अपराध में फंसाकर जेल भेज दिया जाता है । कब होगा भारत का भाग्योदय? कब मिलेगी भारत को आजादी? कब श्वास लेंगे हम स्वतंत्र भारत में? इस संबंध में सोचें तथा भारत को बचाने में अपना योगदान दें । निष्टले बैठने से कुछ न होगा । सक्रियता, सचेतता एवं प्रतिशोध के विचारों की आशा में ‘प्रमाण’ त्रैमासिक रिसर्च जर्नल का यह नया अंक आपके हाथों में है ।
""आचार्य शीलक राम""
वैदिक योगशाला

मेरी मुस्कान......


मेरी मुस्कान तो
तुम्हारे अधरों पर थी
खो गई जाने कहां
तुम्हारे जाने के बाद,
तुम्हारे चलने से
गति पाता मेरा
अनुरागी मन
कौन बांधे मेरे
उन्मुक्त विचारों को
अब तुम्हारे जाने के बाद
मेरे ह्रदय के स्पंदन में
धडकन तुम्हारी जुड जाती
गाती एक ही धुन
दो धडकने
कौन बजाये मीठी धुन
अब तुम्हारे जाने के बाद.........  
                  ........अरुणा

Wednesday, March 18, 2020

प्रेम व्रेम कुछ.....

जानू जानवर , क्यूटी कुत्ती
एक दिन तो,बन ही जाना है।
स्वार्थ के ही सभी रिश्ते नाते
काम निकला ,जुत्ते खाना है।।
जानू,बाबू,हमदम,प्रियवर सब
स्वार्थ की नींव पर खड़े हुए हैं।
अपना अपना काम निकालने
परस्पर गर्दनों पर चढ़े हुए हैं।।
किसी के यहां आने - जाने से
किसी को फर्क नहीं पड़ता है।
हताशा, चिंता व झूठे प्रेम से
नूर चेहरे का झड़ता जाता है।।
होली आए या आए दुलहंडी
बसंत ऋतु की मदमस्त बहार।
चौदह फरवरी प्रेम दिवस कोई
सच्चा जग में कोई विरला यार।।
जीवन जी लो,दिखावा छोड़कर
सच्चा प्रेम कुछ,बस हो जाने दो।
कुछ नहीं रखा है अकड़ में प्यारे
पहाड़ सम अहं को खो जाने दो।।

व्यवस्था के नाम अव्यवस्था....



जीवन बस एक उलझन है।
कोई सज्जन,कोई दुर्जन है।
जितना भोगना हो भोग लो,
यही अपना केवल धन है।।
वहीं खर्चेगा जो कमाएगा।
साथ में कुछ नहीं जाएगा।
कोई अन्य करेगा अय्यासी,
अपने हाथ क्या रह पाएगा।।
ये दुनिया बड़ी हरामखोर है।
यहां कमानेवाला ही चोर है।
निठल्ले बैठे हुक्म चलाएं,
प्रतिभावान का नहीं दौर है।।
विश्वविद्यालय बुद्धि छीन रहे।
बुद्धिमान बस कूड़ा बीन रहे।
न्यायालयों में अन्याय होता,
नेता,धर्मगुरु,अमीर तीन रहे।।
प्रतिभावान होना यहां पाप है।
लूटने में यहां हर कोई बाप है।
घुट-घुटकर मरना जीवन है बस,
मरणासन्न की शायद पदचाप है।।

Wednesday, October 16, 2019

आजादी व गुलामी के मध्य झूलता भारत

            समकालीन युग के एक विचारक श्री यशदेव शल्य का मैं एक आलेख पढ़ रहा था जिसमें इन्होंने भारत की मानसिक गुलामी की भयावहता को रेखांकित करने का प्रयास किया है । राजनीतिक आजादी के सात दशक पश्चात् भी हम मानसिक रूप में गुलाम हैं । यदि मैं शल्य जी की ही बात को आगे बढ़ाऊं तो यह कहना सही रहेगा कि भारत की राजनीतिक आजादी भी एक छलावे के अतिरिकत कुछ नहीं है । राजनीति के शीर्ष पर हमारे भारत में सन् 1947 ई॰ से ही इंडियावालों का कब्जा है । इंडिया वालों की कुरीतियों, कमियों, मूढ़ताओं, मूर्खताओं एवं आंधी प्रतियोगिताओं को स्वीकार करने में भी हम अपने आपको गौरवान्वित महसूस करते रहे हैं । पश्चिम की विकृतियां भी हमारे लिए आदरणीय बनी हैं तथा अब भी बन रही हंै। पश्चिम का कूड़ा-कर्कट भी हमारे लिए स्वर्ण है । पश्चिम की अंधी नकल ही हमारे लिए सृजनात्मक के रूप में मूर्तिमान है । कितनी बड़ी विडम्बना है यह कि जिस भारतवर्ष ने सम्पूर्ण धरा को लाखों वर्ष जीवन जीना, विचार करना, तर्क करना, चिन्तन करना, खोज करना, चिकित्सा करना, व्यापार करना, खेतीबाड़ी करना एवं शिक्षा देना सिखाया, इस सब को सिखाने के पश्चात् भी जो हमारे ऋषि शान्त नहीं बैठे अपितु नीति व धर्म के सर्वसमन्वयकारी विश्वबंधुत्व के रहस्य समझाए तथा परमानन्द की इसी जन्म में अनुभूत करने हेतु योग के सूत्रों को दिया-उन्हीं ऋषियों के सुपुत्र इतने कुपुत्र सिद्ध होंगे कि वे अन्धी नकल को ही सृजन समझने की महामूढ़ता करेंगे। सन् 1947 ई॰ के पश्चात् यही सब हो रहा है । जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अन्धभक्ति, अन्धी नकल, चापलूसी एवं अन्धानुकरण व्याप्त है और कहा जाता है कि महाजन जिस रास्ते पर चलते हैं साधारणजन भी उसी पथ का अनुकरण करते हैं । क्या महाजन, क्या उच्च शिक्षित, क्या सभ्य, क्या उच्चाधिकारी, क्या राजनेता, कया धर्मगुरु, क्या वैज्ञानिक, क्या शिक्षाशास्त्री, क्या भाषास्त्री या क्या सुधारक- सभी के सभी नकलची बन्दर सिद्ध हो रहे हैं और इसके बावजूद भी बड़े-बड़े मंचों पर यह चिन्तन-मनन होता है कि आजादी के सात दशक पश्चात् भी भारत इंडिया व भारत में क्यों विभाजित हो गया है पूरी तरह से ? वहां सात दशक से लगाचार यह शोध हो रही है कि भारत अब तक भी गरीब, जाहिल, नकलची, पिछड़ा हुआ एवं गुलाम क्यों बना हुआ है? अब इन विचार के कोल्हुओं को यह सीधी सपाट बात समझ में क्यों नहीं आती की किसी भी राष्ट्र का चहुंमुखी विकास उस राष्ट्र की अपनी भूमि, जीवनमूल्यों, दर्शनशास्त्र, शिक्षा, धर्म आदि से जुड़े रहकर ही हो सकता है । अपनी जड़ों से उखड़कर कोई भी राष्ट्र आज तक उन्नति नहीं कर पाया है । और तो और हम आज के अति भौतिकवादी कहे जाने वाले देश अमरीका, आस्ट्रेलिया, जापान, फ्रांस, जर्मनी, इंग्लैंड, इजरायल आदि ने जो इतनी चमत्कारिक उन्नति कर रखी है वह सब हवा में नहीं की अपितु अपनी भूमि, अपनी संस्कृति, अपने जीवनमूल्यों, अपने दर्शनशास्त्र, अपने आचार-विचार, अपनी शिक्षा-प्रणाली, अपनी चिकित्सा, अपनी प्रयोगशालाओं एवं अपने धर्म से जुड़कर ही की है । इस समय इस धरा पर शायद भारत ही अकेला ऐसा देश है जो खुलेरूप में धडल्ले से अपने स्वयं की पृष्ठभूमि को ही नष्ट किए दे रहा है । हम जिस डाल पर बैठे हैं उसी को अपने हाथों से ही काट रहे हैं और यह महामूढ़ता करने के लिए हमने अनेक तर्क एकत्र करके रखे हुए हैं । क्या लाभ है ऐसे में बड़े-बड़े राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय मंचों पर भारत के पिछड़ेपन एवं यहां की गरीबी पर चिन्तन-मनन करने का । नारों के सम्मोहन से ही यदि किसी व्यक्ति, समाज, राज्य या राष्ट्र की प्रगति हो सकती होती तो काफी राष्ट्र कब के समृद्ध हो गए होते । भारत तो अब तक विश्वगुरु बन जाना चाहिए था । गरीबी हटाओ, मनरेगा, नरेगा, अटल पेंशन, बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ, मेक इन इंडिया, डिजीटल इंडिया आदि आदि की भारतीय जन-मानस को सम्मोहित करके रखे जाने की तथा पिछड़ेपन में धकेलने की अनेक लोकलुभावनी योजनाएं सन् 1977 ई॰ के पश्चात् बनीं व चली हैं । इन सबके बावजूद भी भारत और बदहाली की तरफ गया है । तरक्की हुई है हमारे भारत में लेकिन वह मात्र इंडिया वालों की हुई है। भारत की दस प्रतिशत आबादी की तो खूब तरक्की हुई है । उस दस प्रतिशत की आबादी की प्रतिव्यक्ति आय या उनकी कुल सम्पत्ति सन् 1947 ई॰ के पश्चात् लाखों गुना बढ़ी है लेकिन बाकी बची 90 प्रतिशत आगादी तब भी गरीब व बदहाल थी और वह आज भी अभावग्रस्त एवं बेरोजगार है। गान्धी व नेहरु से लेकर आज के नरेन्द्र मोदी जी तक सबने सम्मोहन से काम लिया है । गान्धी, नेहरु, अम्बेडकर, इन्दिरा, मोरार जी, चरणसिंह, राजीव, अटल बिहारी ने नारे तो खूब दिए लेकिन विकास हुआ सिर्फ उस दस प्रतिशत आबादी का जो चुनावों में वोट तक डालना मूर्खता का कृत्य समझती है । वोट डालें कोई लेकिन विकास हो किन्हीं अन्यों का । वोट डाले सामान्य जन लेकिन विकास हो सिर्फ उद्योगपतियों, नेताओं एवं उच्चाधिकारियों का । लोकतन्त्र के पहरेदार सामान्यजन लेकिन यह लोकतान्त्रिक व्यवस्था सामान्यजन का गला घोंटकर विकास उनका करे कि जो इस लोकतन्त्र को गरीबों के शोषण व उनकी गुलामी की रस्सी समझते हैं । यही होता आया है हमारे भारत व उनके इंडिया में पिछले सात दशक से और यदि आपने कुछ सत्य कहा तो आपकी खैर नहीं । सामान्यजन की स्वतन्त्रता वहीं तक है जहां तक कि दस प्रतिशत इंडियावालों के अधिकारों में कोई हस्तक्षेप न होता हो । यदि आपने सत्य कहा तो स्वामी दयानन्द की तरह आपको अपने ही जहर देकर मौत के घाट उतार देंगे । यदि आपने तर्कबुद्धि का प्रयोग करके कुछ कथन कर दिया तो सुभाष चन्द्र बोस की तरह आपको खामोश कर दिया जाऐगा। यदि आपने वास्तव में ही इंडियावालों की कुर्सी के सम्बन्ध में सोचने की हिमाकत की तो आपको लाल बहादुर शास्त्री की तरह विष देकर मौत की निद्रा में धकेल दिया जायेगा । यदि आपने विवेक से काम लेकर वास्तव में ही इंडिया का विरोध करके भारत को भारत तथा फिर इसे विश्वगुरु बनाने हेतु भागीरथ प्रयास किया तो आपको राजीव भाई दीक्षित की तरह परलोक की यात्रा पर आपके अपने महान कहे जाने वाले ही भेज देंगे। यदि आपने वास्तव में ही सनातन आर्य वैदिक ऋषियों वाले उस भारत के स्वप्न को साकार करने हेतु पुरुषार्थ करने की सोची कि जिससे भारत को एक सनातन यात्रा सहस्रादियों से कहा जाता रहा है तो आपको ओशो रजनीश की तरह वहीं लोग देहत्याग को विवश कर देंगे कि जो अब विश्वशान्ति के ठेकेदार बने हुए हैं । कितना बड़ा पाखण्ड चल रहा है हमारे भारत में और पाखण्ड भी पूरे तामझाम व पूर्वी व्यवस्था से । राजनेता, धर्मनेता, धननेता, अधिकारीनेता आदि सभी मिले हुए हैं । स्वयं का विकास तो हो ही रहा है -बाकी देश जाए भाड़ में । राजनीतिक दल व नेता पहले तो अपनी सरकारों को सत्ता में लाने हेतु संघर्ष करते हैं और जब सरकार बन जाती है तो पूरे पांच वर्ष उस सरकार को बचाने में लगे रहते हैं । बीच-बीच में जो समय मिलता है उसमं इनके खुद के वैभव-विलास का जुगाड़ करने हेतु अरबों-खरबों की दौलत जोड़ने का कुकर्म किया जाता है । देश का विकास हो भी तो कब व कैसे हो? यदि लोग रोजगार आदि की आवाज उठाएं भी तो आरक्षण आदि का झुनझुना पकड़ा दिया जाता है । रोजगार से ध्यान हटाने का आरक्षण एक अचूक हथियार है। हर दल ने इस हथियार का भरपूर प्रयोग किया है । क्या कांग्रेस, क्या वामपंथी व क्या दक्षिणपंथी कही जाने वाली भाजपा-सबके सब आरक्षण की महामूर्खता का प्रयोग करने में प्रवीण हैं । विकास जाए तेल लेने-बस किसी तरह जनता को रोके रखा जाए । यह कुनीति सभी दलों की रही है । मोदी जी से काफी आशाएं थीं लेकिन ये महोदय भी इंडिया की सेवा करने में व्यस्त हो गए हैं। तो यह कथन करने में कोई अतिश्योक्ति नहीं है कि भारत न तो राजनीतिक रूप से आजाद हुआ है, न मानसिक रूप से आजाद हुआ है, न आर्थिक-शैक्षणिक-व्यावसायिक रूप से ही । गान्धी व नेहरु ने सन् 1947 ई॰ के आसपास तथा इससे पूर्व के 20-25 वर्षों तक जो स्वतन्त्रता का ढिंडोरा पीटा था । वह एक ढोंगमात्र था । यह सब अब सिद्ध भी हो चुका है । एक नए प्रकार की गुलामी की नींव तो भारत में उसी दिन रख दी गई थी जब कांग्रेसियों के प्रयासों से गान्धी ने अफ्रीका से लौटकर भारत की भूमि पर प्रथम कदम रखे थे । क्रान्तिकारियों को दफन करने का जो कुचक्र कांग्रेसियों ने गान्धी को भारत में बुलाकर रचा था उसमें वे सफल रहे । अरविन्द, सुभाष, पटेल, भगत सिंह, चन्द्रशेखर आजाद, सावरकर जैसे क्रान्तिकारियों को गुमनामी के अन्धेरे में धकेलने में ये पूरी तरह सफल रहे हैं । अब सात दशक बाद सुभाष चन्द्र बोस की फाईलों के आंशिक उजागर होने से इसकी पुष्टि हो जाती है तो कहने का तात्पर्य यही है कि भारत की आजादी का सिर्फ ढिंडोरा पीटा जाता रहा है। सम्मोहित करके रखा हुआ है भारतीयों को । किसी को नारों से, कोई भाषणों से, कोई फूट डालने से, कोई आरक्षण से या फिर कोई विदेशी गुलाम शिक्षा से सम्मोहित करके रखा हुआ है ताकि उनको सत्य के दर्शन ही न हो सकें । इस क्रम में धार्मिक कहे जाने वाले काफी महानुभावों ने भी अपनी प्रसिद्धि की रक्षा हेतु तथा माया के साम्राज्य खड़ा करने के कुकर्मस्वरूप भारत के साथ गद्दारी करने में कोई कसर बाकी नहीं रखी । जब सन् 1925ई॰ से लेकर सन् 1947 ई॰ के 22 वर्ष के लम्बे काल में गान्धी व नेहरु का सहारा लेकर कांग्रेसी भारत का बेड़ा गर्क करने में लगे हुए थे तो ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ क्या कर रहा था? उस समय क्रान्तिकारियों को एकजूट करके एक विशाल आन्दोलन गान्धी-नेहरु की काट हेतु क्यों नहीं खड़ा किया इस संगठन ने? हिन्दू महासभा व आर्यसमाज नामक संगठन भी थे उस समय। कितने देशद्रोही अंग्रेजों को मौत के घाट उतारा इस संगठन ने? मुझे तो लगता है कि या तो इस संगठन का क्रान्तिकारी गतिविधियों में सन् 1947 ई॰ से पूर्व कोई योगदान नहीं रहा था या फिर इसने गांधी-नेहरुवादी नकली आजादी के आन्दोलन में ही थोड़ा-बहुत सहयोग किया होगा । भारत की मानसिक गुलामी जो पिछली बारह शदी से निरन्तर चल रही थी उस गुलामी के बन्धन तोड़ने हेतु कोई विशेष प्रयास नहीं किया गया। ‘अहिंसा परमो धर्मः धर्महिंसा तदेव चः’ की महाभारत की सीख को इस संगठन ने अपनी चर्चा का अंग क्यों नहीं बनाया। हमारे  देश के लोग तो आज भी इतने गुलाम हैं कि ये अब तक भी नाथू राम गौड़से को हत्यारा कहकर पुकारते हैं । जिन वीर क्रान्तिकारियों ने भारत विरोधियों की हत्याएं की हैं हम उन सबको क्रान्तिकारी वीर बलिदानी कहकर पुकारते हैं लेकिन नाथूराम गौड़से को...?
              हमारे दुर्भाग्य की कोई सीमा इसीलिए नहीं है कि क्योंकि हम सत्य को न तो जानने के इच्छुक हैं तथा अधिकांश में झूठे नारों व तसलियों के भरोसे भारत को विश्वगुरु बनाना चाहते हैं । हमारी धरा आज भी इंडिया व भारत के मध्य पिस रही है । हमारी धरा आज भी विदेशी अन्धी नकल के बोझ तले दबकर कराह रही है । हमारी भारत भूमि आज सम्वत् 2072 में भी अपने चिन्तन, अपने विचार, अपने तर्क एवं अपने दर्शनशास्त्र से रहित है। आज भी हमारे बुद्धिजीवी, धनजीवी, धर्मजीवी शिक्षाजीवी, व्यापारजीवी, खेलजीवी व मनोरंजनजीवी सभी के सभी पश्चिम की अन्धी एवं भौंड़ी नकल एवं पूर्वाग्रहों के दास बनकर भारतभूमि को चिढ़ा रहे हैं । लेकिन गुलामी, पूर्वाग्रहों, नकल, सम्मोहन, नारों की चीखों एवं अन्धानुकरण के घटाघोप अन्धेरे से बाहर हम शीघ्र ही आजादी की खुली-ताजी हवा में श्वास अवश्य लेंगे ।
आचार्य (डा) शीलक राम
वैदिक योगशाला
कुरुक्षेत्र (हरियाणा)

Monday, October 30, 2017

एक भारत प्रेमी की व्यथा...



प्रेम करने में भी इस जग सुनो
लगता है आरक्षण हो गया है!
जिसकी हमें चाहत थी यहां
पता नहीं वह कहां खो गया है!!
रुपये पैसे का सब खेल बावले
जिसके पास वह करे अय्यासी!
मेदांता, एसकोर्ट सपने ही सपने
फूटा कौडी नहीं यहां खुर्रा खांसी!!
राष्ट्रवाद कोई सैक्युलर नाम पर
भारत लूट के सुनो तरीके हैं सारे!
दुनिया के पास खर्चने को जगह नहीं
यहां रुपये मिलते नहीं मांगे से उधारे!!
निठल्ले जहां पर हों आदरणीय
जात पूछे कोई प्रतिभावान की!
भूख, भय, गरीबी वहां निश्चित हों
इज्जत हो जहां मूढ, नादान की!!
केवल उपदेश नहीं किसी काम के
वायदे, आयोजन, घोषणाएं धोखा!
पेट भरना सुनो यहां हर रोज दिवाली
नहीं गिनती यहां कमती या चोखा!!
प्यार, प्रेम सुनो अमीरों के चोंचले
जीने का भी यहां जुगाड है मुश्किल!
कैसा, किसका, कब, कहां होता है
पैर, घुटने, पेट, सिर कहां पर है दिल!!
गुलाम, गुलाम, गुलाम हैं यहां पर
गुलामी ही लगता भाग्य हमारे!
अपने पास अपना कुछ कहने को
हम फकीर बाकी अमीर यहां सारे!!
आचार्य शीलक राम
वैदिक योगशाला