Friday, December 27, 2024

अनंत की यात्रा

 लडखडाते   पैर

हिलते हुये हाथ!

हर रिश्ते में जैसे

हो गये हैं अनाथ!!

 

झुकी हुई गर्दन

वाक्  मौन सी!

पूछने में अशक्त

जिंदगी कौनसी!!

 

सपने अधूरे से

हकीकत से दूर!

फिर भी आशा

बाकी   भरपूर!!

 

स्मरण   शक्ति

हुई  कमजोर!

जिसके मद में

कभी भावविभोर!!

 

अतीत  बचपन

स्वर्णिम मालूम!

लेकिन अब वह

हुआ   गुमसुम!!

 

अतीत चला गया

भावी अंधकारमय!

एक  विचित्र  सा

चहुंदिशि  भय!!

 

कोई भी सपना

हुआ  नहीं पूरा!

जान  पड़ता  है

सब कुछ अधूरा!!

 

जो भी आजीवन

मेहनत से कमाया!

अंत समय पर

काम नहीं आया!!

 

सभी चिंतारत हैं

कब तक मरेगा!

कब तक पता नहीं

हमें दुखी करेगा!!

 

मरने  से  पहले

सीख लो मरना!

आत्मस्थित होकर

अनंत पथ गुजरना!!

 

अन्यथा आवागमन

चलता ही रहेगा!

भौतिक   प्रकृति

जंजाल उभरेगा!!

 

द्रष्टा बनकर दृश्य

साक्षी पर आना!

परमात्मस्वरुप फिर

कण कण भर जाना!!

........

आचार्य शीलक राम

वैदिक योगशाला

कुरुक्षेत्र

Thursday, December 19, 2024

डॉ. राकेश चक्र, मुरादाबाद, (उत्तर प्रदेश) मिला प्रथम स्थान (Dr. Rakesh Chakra, Moradabad, (Uttar Pradesh) got first place)

                                    डॉ. राकेश चक्र 

हरियाणा की प्रसिद्ध दार्शनिक, साहित्यिक, धार्मिक, राष्ट्रवाद, हिन्दी के प्रचार-प्रसार को समर्पित तथा लेखक, कवि, आलोचक तथा 50 से ज्यादा क्रांतिकारी पुस्तकों के लेखक आचार्य शीलक राम द्वारा संचालित व चिन्तन अन्तर्राष्ट्रीय मुल्यांकित त्रैमासिक रिसर्च जर्नल्स (आईएसएसएन : 2229-7227) प्रमाण अन्तर्राष्ट्रीय मुल्यांकित त्रैमासिक रिसर्च जर्नल्स (आईएसएसएन : 2249-2976), हिन्दू अन्तर्राष्ट्रीय मुल्यांकित त्रैमासिक रिसर्च जर्नल्स (आईएसएसएन : 2348-0114), आर्य अन्तर्राष्ट्रीय मुल्यांकित त्रैमासिक रिसर्च जर्नल्स (आईएसएसएन : 2348 – 876X) व द्रष्टा अन्तर्राष्ट्रीय मुल्यांकित त्रैमासिक रिसर्च जर्नल्स (आईएसएसएन :  2277-2480) प्रकाशित करने वाली संस्था *आचार्य अकादमी चुलियाणा*, रोहतक (हरियाणा) द्वारा आयोजित *38वें*  राष्ट्रीय साप्ताहिक कविता प्रतियोगिता प्रदत विषय *आहार विहार* के परिणामों की घोषणा कर दी गई है। विजेताओं के नाम निम्न प्रकार से हैं-

पहला स्थान* - डॉ राकेश चक्र, मुरादाबाद (उत्तर प्रदेश)

दूसरा स्थान* - नफे सिंह योगी मालड़ा, महेंद्रगढ़ (हरियाणा)

तीसरा स्थान* - विजयशंकर मिश्र 'भास्कर', लखनऊ, (उत्तर प्रदेश)

चौथा स्थान*  - अनिल ओझा, इंदौर (मध्य प्रदेश)

पाचवां स्थान* - अशोक कुमार जाखड़, झज्जर (हरियाणा)

छठा स्थान* - बलबीर सिंह ढाका, सूंडाणा, रोहतक (हरियाणा)

सातवां स्थान* - बी के शर्मा, इंदौर (मध्य प्रदेश)

आठवां स्थान* - डॉ अखण्ड प्रकाश, कानपुर (उत्तर प्रदेश)

नौवां स्थान* - गौतम इलाहाबादी, रेवाड़ी (हरियाणा)

दसवां स्थान* - गोविंद पाल, भिलाई (छत्तीसगढ़)

*इसके अलावा प्रतियोगिता के विशिष्ट पुरस्कृत कवि निम्न प्रकार से हैं*-

श्रीनिवास यन (आँध्रप्रदेश)

सभी विजेताओं को *आचार्य अकादमी चुलियाणा, रोहतक* के अध्यक्ष *आचार्य शीलक राम* व पूरी टीम की ओर से बहुत-बहुत बधाई।

Wednesday, December 11, 2024

(‘गीता जयंती महोत्सव’ के उपलक्ष्य में) क्या श्रीमद्भगवद्गीता में सभी समस्याओं का समाधान मौजूद है? (On the occasion of ‘Gita Jayanti Mahotsav’) Is there a solution to all the problems in Shrimadbhagvadgita?

          


          आजादी के पश्चात् हमारे धर्माचार्यों को भी धर्म की अपेक्षा राजनीति में रस अधिक लग रहा है! इसीलिये तो धर्माचार्य धर्म और अध्यात्म को छोडकर राजनीति में आ रहे हैं! धर्म, अध्यात्म और योग बेडा बेड़ा गर्क करके अब ये राजनीति का बेड़ा गर्क करने में लगे हैं! इससे यह भी सिद्ध होता है कि धर्म और अध्यात्म से अधिक फायदा अब राजनीति में है! परमात्मा, आत्मा, मोक्ष आदि में क्या रखा है? राजनीति में पद, प्रतिष्ठा, पैसा आदि भरपूर मौजूद हैं! जिसको देखो वही राजनीति में भाग्य आजमा रहा है! धर्माचार्यों का राजनीति में धडल्ले से आने का सिलसिला सनातन धर्म में सर्वाधिक है! ईसायत और इस्लाम में यह कम देखने को मिल रहा है! सनातन के तो अधिकांश धर्माचार्य या तो विधायक, सांसद, मंत्री आदि बने बैठे हैं या फिर धूर्त नेताओं के लिये वोट मांगकर राजनीति के माध्यम से अपना लूटपाट और धोखाधड़ी का जुगाड़ करने में मेहनत कर रहे हैं! सही बात तो यह है कि इन्होंने राजनीति और धर्म दोनों को विषाक्त करके भ्रष्टाचार का अड्डा बनाने में मदद ही की है! भारतीय जनमानस की बिजली, पानी, सिंचाई, आवास, सडक, चिकित्सा, बेरोजगारी, शिक्षा आदि की समस्याओं के समाधान में हमारे धर्माचार्यों की कोई रुचि नहीं है! जनमानस की खून पसीने की गाढ़ी कमाई पर पलने वाले धर्मगुरुओं को जनमानस की जमीनी समस्याओं से कोई सरोकार नहीं रह गया है! सनातन धर्म और संस्कृति में संन्यासी, स्वामी, ऋषि, मुनि, योगी, शंकराचार्य, सिद्ध, नाथ आदि की जो भूमिका और मर्यादा निर्धारित की गई है,उससे इनका कोई लेना देना नहीं है! बस, सभी जनमानस को धर्म,अध्यात्म, योग आदि की आड लेकर अपनी अय्याशी का जुगाड़ करने पर लगे हुये हैं!
        दर्शनशास्त्र एक ऐसा विषय रहा है जिसमें धर्म, अध्यात्म, योग, राजनीति, अर्थव्यवस्था, व्यापार, वाणिज्य, विज्ञान, खेतीबाड़ी, रक्षा आदि सभी विषयों को तर्क और युक्ति के तराजू पर तोलकर स्वीकार या अस्वीकार किया जाता है! लेकिन जानबूझकर इस विषय को बर्बाद कर दिया गया है! वजह केवल यही है ताकि अपनी लूटपाट और धोखाधड़ी को निर्बाध चलाये रखा जा सके! इसीलिये इस समय भारत में दर्शनशास्त्र विषय सर्वाधिक उपेक्षित है!

        हालात इतने बुरे हो चुके हैं कि आज के सनातनी कहलवाने वाले धर्मगुरु जनता जनार्दन की सेवा नहीं कर रहे हैं अपितु उल्टे जनता जनार्दन से सेवा करवा रहे हैं!ईसाई धर्मगुरु इस मामले में बेहतर कार्य कर रहे हैं! सात समुन्द्र पार से आकर भारत के दुर्गम पहाड़ी, जंगली और दूरदराज के इलाकों में सेवा करना कोई हंसी खेल नहीं है! हमारे सनातनी धर्मगुरु, मठाधीश,शंकराचार्य,भिक्षु, महंत,स्वामी, योगी, मुनि भारतीय होते हुये भी सेवा का कार्य नहीं कर रहे हैं!इनकी अकड सातवें आसमान से ऊंची है!इनको जब तक अपमानित नहीं किया जाता है, तब तक ये अपने महलनूमा आश्रमों, मठों,विहारों, गुरुकुलों, सत्संग घरों से बाहर नहीं निकलते हैं! जिन सहिष्णुता, समन्वय, करुणा,सर्वे भवन्तु सुखिनः आदि गुणों के कारण सनातन भारतीय संस्कृति धरा पर अग्रणी मार्गदर्शक रही है, वे गुण आज नदारद हैं!

        हमारे अधिकांश सनातनी धर्मगुरुओं की सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक, नैतिक, आध्यात्मिक क्षेत्रों में आवश्यक जीवन-मूल्यों में अरुचि होने के कारण जनमानस का इनसे विश्वास उठ गया है!इन अय्यास,अनैतिक, निठल्ले और आचरण भ्रष्ट धर्मगुरुओं की दुष्ट जीवन शैली के कारण जनमानस का इनके ऊपर से भरोसा समाप्त हो गया है!पिछले दशकों में आमतौर पर भारतीय साधु ,संतों, गीता मनीषियों,गीता मर्मज्ञों, स्वामियों, संन्यासियों, नाथों और सिद्धों को आवारा, अपराधी, निठल्ले और कामचोर समझा जाने लगा है!ऐसा क्यों हुआ? क्योंकि हमारे साधु संतों ने सनातन धर्म और संस्कृति के जीवन मूल्यों को छोडकर धर्म और संस्कृति को दुकानदारी बना दिया है! इन्हें अपना पेट भरने से मतलब रह गया है! बस, जैसे जैसे अपना स्वार्थ पूरा हो जाये! भारत में एक करोड़ ऐसे निठल्ले साधुओं की भीड़ मौजूद है! इनका मानव सेवा, समाज सेवा, धर्म सेवा, संस्कृति सेवा, राष्ट्र सेवा से कोई भी लेना देना नहीं है! बस, आवारा घूमते रहते हैं, नशा करते हैं चोरी करते हैं तथा अनैतिक कामों में लिप्त पाये जाते हैं! इन करोड़ में मुश्किल से एक लाख ऐसे होंगे जिनके पास आलीशान महलनूमा मठ,आश्रम,योग केंद्र, डेरे, सत्संग घर,नाम केंद्र,मजार आदि उपलब्ध हैं! इनका जीवन राजकुमार,राजा, महाराजा, सम्राटों जैसा भव्यता लिये हुये आधुनिक सुविधाओं से संपन्न विलासितापूर्ण है! कहाँ हमारे यहाँ संन्यासी के लिये एक स्थान पर तीन दिन से अधिक नहीं रुकने का विधान था और कहाँ आज के ये अय्याशी करने वाले तथाकथित नकली साधु, महात्मा,पीर ,फकीर आदि? सच तो यह है कि जनमानस ने थोड़ा बहुत सनातन धर्म और संस्कृति को अपने निज प्रयास से बचाकर रखा हुआ है! इन नकली, निठल्ले, अय्याशी करने वाले साधु महात्माओं ने तो सनातन धर्म और संस्कृति को समाप्त करने के सारे जुगाड़ कर रखे हैं! वेद, उपनिषद्, दर्शनशास्त्र, स्मृति, धर्मसूत्र, व्याकरण,निघंटु, निरुक्त, महाकाव्य, आयुर्वेद, ज्योतिष , श्रीमद्भगवद्गीता आदि के अध्ययन अध्यापन करने करवाने की तो इन साधु महात्माओं को स्वप्न में भी नहीं सुझती है!पूरे भारत में कोई एक भी विश्वसनीय और विश्व स्तरीय विश्वविद्यालय मौजूद नहीं है, जिसमें सनातन धर्म और संस्कृति की पढ़ाई, लिखाई ,अभ्यास आदि हो सके!ईसाईयत और इस्लाम को मानने वालों ने अपने मजहब की शिक्षाओं के प्रचार प्रसार के लिये विश्व स्तरीय आलीशान विश्वविद्यालय खोले हुये हैं! लेकिन भारत में सनातन धर्म और संस्कृति के अध्ययन और अध्यापन के लिये ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है! न हमारे इन तथाकथित नकली साधु महात्माओं को इसकी चिंता है तथा न ही नेताओं को! कुरुक्षेत्र में इस समय चलने वाले गीता जयंती महोत्सव में आपको श्रीमद्भगवद्गीता की शिक्षाओं के लिये अनुकरणीय कुछ भी देखने और जानने को नहीं मिलेगा! पूरे ब्रह्मसरोवर पर दुकानदारी ही दुकानदारी तथा सरकार का प्रचार ही देखने को मिल रहा है! इन मूढों से कोई पूछे तो कि यह गीता जयंती महोत्सव किस दृष्टिकोण से है?

        सैमिनार, गोष्ठी, संत सम्मेलन आदि के नाम पर वही घिसी-पिटी ऊबाऊ बातें तथा वही राजनीति, धर्म,संस्कृति की आड में दुकानदारी चलाने वाले शोषक चेहरे!श्रीमद्भगवद्गीता जैसे कालजयी भगवान् श्रीकृष्ण के उपदेश को साधु महात्माओं और जनमानस द्वारा आचरण में उतारने के लिये पूरे आयोजन में कोई उत्साह और व्यवस्था नहीं है!

        गीता जयंती महोत्सव में तथाकथित गीता मनीषी,साधु, संन्यासी, स्वामी, योगी, प्रोफेसर वही भैंस जुगाली वाली रटी हुई पंक्तियों को दोहराते हुये मिल जायेंगे कि गीता में दुनिया की सभी समस्याओं के कारण और निवारण समाधान मौजूद हैं! इनसे कोई पूछे तो कि यदि यह सच है तो गीता की मदद से भारत से बेरोजगारी,अशिक्षा, बेकारी, भूखमरी, आवास, बिजली, पानी, सिंचाई, कुपोषण, भ्रष्टाचार, अपराध की समस्याओं का समाधान ही कर दो!किसानों की समस्याओं का समाधान कर दो! किसान कुरुक्षेत्र के समीप ही एक वर्ष से धरना दे रहे हैं!गीता की मदद से कुरुक्षेत्र का बाईपास ही बनवा दो! कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय की हालत ही सुधार दो! स्वयं ब्रह्मसरोवर की दयनीय हालत को ही ठीक कर दो! इस समय चल रही गीता जयंती की ट्रैफिक की जर्जर हो चुकी समस्या को ही ठीक करवा दो! और तो और श्रीमद्भगवद्गीता की शिक्षाओं को जनमानस और साधु महात्माओं के आचरण में उतारने को ही सार्थक करवा दो! गीता के आधार पर इनमें से किसी समस्या का समाधान तो करवाकर दिखलाओ! बस, तोतों की तरह गीता के श्लोक दोहराने से कुछ भी सार्थक, रचनात्मक धार्मिक नहीं होनेवाला है! कुरुक्षेत्र में ही स्थित भारत के प्रसिद्ध विश्वविद्यालय में गीता अध्ययन केंद्र तथा बाकी विश्वविद्यालय में श्रीमद्भगवद्गीता पर एक भी ढंग की शोधपरक पुस्तक, व्याख्या या भाष्य नहीं लिखा गया है! क्या गीता में इसका कोई समाधान मौजूद है?
दिखिये-

1) गीता, 3/8 में ‘नियतं कुरु कर्म’ कहा है!
2) गीता, 6/25 में ‘शनै:शनैरुपरमेद बुद्ध्या धृतिगृहीतया’ कहा है! 3) गीता, 6/34 में’ चंचलं हि मन: कृष्णा: प्रमाथि बलवद्दृढम्’ कहा है!
4) गीता, 2/41 में ‘व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह’ कहा है!
5) गीता, 2/48 में ‘योगस्थ: कुरु कर्माणि संग त्यक्त्वा धनंजय’ कहा है!
6)गीता, 9/29 में ‘समो हं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्यो स्ति न प्रिय:’ कहा है!
7) गीता, 3/21 में ‘ यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवोतरो जन:’ कहा है!
8) गीता, 2/3 में ‘क्लैब्यं मा सम गम: पार्थ नैतत्वय्युपपद्यते’ कहा है!
9) गीता, 2/48, 49 में ‘सिद्धयसिद्धयो: समो भूत्वा’ तथा ‘कृपणा फलहेतव:’कहा है!
10)गीता, 2/59 में ‘परं दृष्ट्वा निवर्तते’ कहा है!
11)गीता, गीता का सातवां पूरा अध्याय ‘ आत्मसंयमयोग’ शीर्षक से है!
12)गीता, 4/38 में ‘न हि सदृशं पवित्रमिह विद्यते’ कहा है!
13)गीता, 6/5 में ‘उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मामवसादयेत्’ कहा है!
14)गीता, 1/32 में ‘न कांक्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च’ कहा है!
15)गीता, 2/48 में ‘सुखेदुखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ’ कहा है!
16)गीता, 18/67 में ‘इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन’ कहा है!
17) गीता,18/2 में ‘सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षण:’ कहा है!
18) गीता, 18/63 में ‘विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु’ कहा है!

        श्रीमद्भगवद्गीता की उपरोक्त सीख कोई भी साधु, महात्मा, कथाकार, गीता मनीषी अपने आचरण में उतारने को तत्पर नहीं दिखाई देता है! इसके विपरीत सभी मिलकर भारत की बहुसंख्यक मेहनतकश पुरुषार्थी किसान और मजदूर आबादी का शोषण करने में लगे हुये हैं! प्रतिभाशाली युवा वर्ग उपेक्षा का शिकार होकर निराशा के गर्त में डूबा हुआ है!गिने चुन हुये लोग सत्ता के सहयोग से भारत की अधिकांश पूंजी, सुख सुविधाओं तथा संसाधनों पर कब्जा किये बैठे हैं!गीता का मुख्य उपदेश अन्याय, अव्यवस्था और अधर्म के विरोध में लडना है!लेकिन जब उपेक्षित लोग अपने साथ हो रहे जुल्म,भेदभाव,शोषण आदि का विरोध करते हैं तो ये तथाकथित गीता मनीषी, गीता मर्मज्ञ, कथाकार, स्वामी, संन्यासी, साधु, महात्मा और महामंडलेश्वर आदि कौरवों के पक्ष में खड़े नजर आते हैं! अपने अधिकार के लिये लडने वाले, स्वधर्म का पालन करने वाले तथा फल की चिंता न करके कर्म करने वाले किसान, मजदूर, बेरोजगार युवा तथा सैनिक को गद्दार, पाकिस्तानी,खालिस्तानी, देशद्रोही आदि की उपाधि देते हैं! शायद इन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता के किसी एक श्लोक को भी ध्यान से नहीं पढा होगा!

…………
आचार्य शीलक राम
दर्शनशास्त्र -विभाग
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय
कुरुक्षेत्र -136119

Saturday, December 7, 2024

आधुनिक समय पर श्रीमद्भगवद्गीता की कर्मफल व्यवस्था : भागो नहीं अपितु लडो (Karmphal system of Srimad Bhagavad Gita in modern times: Do not run but fight)


धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सव:! 
मामका: पांडवाश्च किम् कुर्वत् संजय!!

         यह श्रीमद्भगवद्गीता का प्रथम श्लोक है! इसमें धृतराष्ट्र ने संजय से यह पूछा है कि युद्धभूमि पर लडने के लिये उत्सुक मेरे और पांडू के पुत्रों ने क्या किया? 

        यहाँ पर धृतराष्ट्र ने युद्धभूमि को धर्मक्षेत्र कहा है,अधर्म क्षेत्र नहीं!यहाँ पर धृतराष्ट्र ने युद्धभूमि को पुण्यभूमि कहा है, पापक्षेत्र नहीं! यहाँ पर धृतराष्ट्र ने युद्धभूमि को हिंसाभूमि नहीं अपितु न्याय क्षेत्र कहा है! गांधीजी की तरह इस श्लोक को तोडमरोडकर इसका कोई भी अहिंसापरक या करुणापरक या अध्यात्मपरक अर्थ निकाल लो! लेकिन इससे अधर्म, अन्याय,अव्यवस्था आदि से त्रस्त जनमानस की पीड़ा और विरोध को झुठलाया नहीं जा सकता है!माना कि जुल्म और अत्याचार के खात्मे के लिये युद्ध कोई प्रथम और आवश्यक विकल्प नहीं है, लेकिन जब पानी सिर से ऊपर चला जाये तो युद्ध ही एकमात्र विकल्प बचता है! माना कि युद्ध से हिंसा,नरसंहार,विनाश, पर्यावरण प्रदूषण आदि होकर प्राकृतिक/आध्यात्मिक संतुलन बिगड़ जाता है, लेकिन दूसरी तरफ अंतिम विकल्प के रूप में प्राकृतिक/आध्यात्मिक संतुलन को बनाये रखने के लिये ही युद्ध आवश्यक हो जाता!यह कतई आवश्यक नहीं
कि वह युद्ध विनाशकारी हथियारों के बल पर ही हो! वह युद्ध विरोध/असहमति/धरना/प्रदर्शन/असहयोग आदि के रूप में भी हो सकता है! गांधीजी ने युद्ध के इसी पहलू पर जोर दिया था! इस पहलू से भी हिंसा होती है लेकिन वह हिंसा थोड़ा सुक्ष्म तल पर होती है! इस सूक्ष्म तल वाली हिंसा को अधिकांश जनमानस समझ नहीं पाता है तथा केवल तीर कमान, तलवार, भाले, बम, मिसाइल, फाईटर विमानों वाली हिंसा को ही हिंसा समझने की भूल कर बैठता है!

        जब किसी योग्य, मेहनतकश, प्रतिभाशाली व्यक्ति को अव्यवस्था के कारण भौतिक संसार में किये हुये कर्मों का फल नहीं मिले तो उसे क्या करना चाहिये? श्रीमद्भगवद्गीता इस संबंध में क्या कहती है?क्या उसे  केवल भाग्य का खेल मानकर चुप बैठ जाना चाहिये? 'भाग्य में होता तो मिल जाता' -क्या उसे यह स्वीकार करके अव्यवस्था के विरोध में कोई आवाज़ नहीं उठाना चाहिये? 'सफलता मेरे भाग्य में नहीं है'- क्या यह कर्मयोग के अंतर्गत पुरुषार्थ करने को हतोत्साहित करना तो नहीं है? और फिर किसी को यह कैसे मालूम हो सकता है कि उसके भाग्य में क्या है?क्या कोई निश्चित रूप से इस संबंध में दावा कर सकता है?
        ध्यान रहे कि भौतिक संसार में ऐसा कुछ भी नहीं है! भौतिक संसार में यदि पुरुषार्थ करने के बाद भी यदि सफलता नहीं मिलती है तो इसके लिये भाग्य नहीं अपितु उस -उस राष्ट्र में व्याप्त अव्यवस्था और भ्रष्टाचार जिम्मेदार होते हैं!धर्मगुरु, मौलवी, ग्रंथी, पादरी,भिक्षु आदि सृष्टि की आध्यात्मिक व्यवस्था को बीच में लाकर केवल पूंजीपतियों, अमीर घरानों, बहुराष्ट्रीय कंपनियों और नेताओं की लूटखसोट की ढाल बनने का काम करते हैं! होना तो यह चाहिये था कि धर्म और अध्यात्म जगत् के लोग किसी भी राष्ट्र में व्याप्त अन्याय,विषमता, अव्यवस्था और भ्रष्टाचार का विरोध करके मेहनतकश जनमानस को उसके कर्मों का उचित पारिश्रमिक दिलवाने के लिये आवाज उठाते! लेकिन संसार में कहीं भी ऐसा नहीं हो रहा है!मजहबी क्षेत्र के तथाकथित धर्मगुरु लोग मेहनतकश जनमानस को भाग्य के जाल में उलझाये रखते हैं ताकि वह पूंजीपतियों, अमीर घरानों, नेताओं और उच्च -अधिकारियों द्वारा की जाने वाली लूटखसोट और अय्याशी को सेफ जोन उपलब्ध हो सके!सच यही है! 

        क्या किसी ने कभी विभिन्न मजहबों के धर्मगुरुओं को राष्ट्र में व्याप्त बेरोजगारी, बदहाली, अभाव, गरीबी, अव्यवस्था, अन्याय, अशिक्षा को समाप्त करने के लिये सडकों पर धरना प्रदर्शन करते हुये देखा है? ऐसा कभी नहीं होता है! एक तरफ तो ये मजहबी धर्माचार्य लोग पूंजीपतियों की लूटखसोट, धींगामस्ती भ्रष्टाचार और अय्याशी के लिये माहौल तैयार करते हैं तो दूसरी तरफ उपरोक्त के फलस्वरूप उत्पन्न भूखमरी और बिमारी को मिटाने के लिये मुफ्त भोजन और चिकित्सा की व्यवस्था करने का ढोंग करते हैं! यह अपने कुकर्मों और पापों पर पर्दा डालना है! यदि इन तथाकथित धर्माचार्यों में थोड़ी भी हिम्मत, नैतिकता, धार्मिकता और करुणा बची है तो देश -विदेश में व्याप्त भ्रष्टाचार, अव्यवस्था, अन्याय, अधर्म, अनैतिकता, जुल्म, तानाशाही और कानून की आड़ में की जाने वाली धींगामस्ती के विरोध में सडकों पर विरोध करके दिखलायें! 

        लूटेरी बहुराष्ट्रीय कंपनियों, शोषक पूंजीपतियों,स्वार्थी अमीर घरानों और धूर्त नेताओं की मदद करके पहले तो मेहनतकश जनमानस को भूख और बिमारियों से ग्रस्त किया जाता है! और फिर मानवता की सेवा के नाम पर भोजन और चिकित्सा के शिविर लगाये जाते हैं! रात के अंधेरे में सडक पर पानी डालकर कीचड़ कर देते हैं और दिन में वहाँ पर फंसने वाली गाडियों को निकालने के लिये क्रेन की व्यवस्था करके दौलत कमाते हैं! इनकी इस धूर्तता को क्या नाम दें? इनके अनुसार अमीर लोग अपने भाग्य के कारण अमीर हैं तथा मेहनतकश,गरीब, बेरोजगार,बिमार लोग अपने भाग्य के कारण इस दयनीय हालत में हैं! 

        सच मानिये कि सनातन धर्म और संस्कृति के पुरातन ग्रंथों में ऐसा कहीं भी नहीं कहा गया है! वेद तो यहाँ तक कहता है कि मेरे एक हाथ में पुरुषार्थ है तो दूसरे हाथ में सफलता है!

        अथर्ववेद में आता है कि 'कृतं मे दक्षिणे हस्तो जयो मे सव्य आहित' अर्थात् मेरे दायें हाथ में कर्म है और बायें हाथ में सफलता!महाभारत के युद्ध में पांडव अपने साथ हो रहे अधर्म, अन्याय और अव्यवस्था को अपना भाग्य मानकर चुप नहीं बैठ गये थे, अपितु उन्होंने शांति के सभी मार्ग बंद हो जाने पर युद्ध के मार्ग को चुना था! आजकल का कोई भी साधु, महात्मा ,संत, कथाकार, ज्योतिषी,फादर, मौलवी, ग्रंथी, भिक्षु  जनमानस को इसकी सीख नहीं देता है कि यदि भौतिक क्षेत्र में कोई भेदभाव, विषमता, अन्याय, बेरोजगारी,भ्रष्टाचार, अशिक्षा, बिमारी, बदहाली आदि होने पर सिस्टम के विरोध में संघर्ष करो!लडाई लडो! युद्ध करो! धरने प्रदर्शन करो! भूख हड़ताल करो!ये तथाकथित सारे धर्म और अध्यात्म के पहरेदार अमीर घरानों, पूंजीपतियों, कोरपोरेट्स, नेताओं और भ्रष्टाचारियों के साथ खड़े दिखाई देते हैं!लेकिन सर्व ज्ञान विज्ञान का आदि मूल वेद और श्रीमद्भगवद्गीता जैसा कालजयी ग्रंथ तो अधर्म, अन्याय, अव्यवस्था अनैतिकता, भ्रष्टाचरण के विनाश के लिये युद्ध करने तक का उपदेश करते हैं!
भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा है-

कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्! 
अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन!! 

        अर्थात् हे अर्जुन, इस विषम समय में तुम्हें यह मोह कहाँ से आने लगा! ऐसे समय में इस प्रकार का मोह आर्य लोगों के लिये अनजाना है! सुखकर नहीं है! कीर्ति पर धब्बा लगाने वाला है! 

        प्रत्येक भारतवासी सहित विश्व के उन मेहनतकश प्रतिभाशाली योग्य लोगों को ,जिनके साथ सिस्टम ने धोखाधड़ी करके उनको बेरोजगार, गरीब, बिमार, बदहाल, भूखमरी से ग्रस्त बना दिया है उनको श्रीमद्भगवद्गीता के इस श्लोक से शिक्षा लेकिन भाग्य के भरोसे बैठने की अपेक्षा अपने अधिकारों के लिये भ्रष्ट और लूटेरे सिस्टम से लडना चाहिये!

        ध्यान रहे कि महाभारत का युद्ध कोई विरोधी वृति्तयों का आध्यात्मिक संघर्ष न होकर भौतिक संसार में लडा जानेवाला युद्ध था! यह युद्ध हरेक मनुष्य,संगठन, परिवार, समाज, राज्य और राष्ट्र को लडते रहना चाहिये! हमारी सुंदर धरती पर प्राकृतिक संसाधनों, धन, धान्य,फल, फूल,औषधि, जंगल, नदियों, पहाडों, वर्षा, धूप, हवा और प्राणवायु की कोई कमी नहीं है! धरती के मुट्ठी भर इन तथाकथित बडों की साजिश को समझ लो!मेहनतकश ,प्रतिभाशाली, ऊर्जावान और निष्ठावान जनमानस जब तक उपरोक्त तथाकथित बडों के षड्यंत्र को नहीं समझेगा, तब तक वह इसी तरह से गरीब, बेरोजगार, बदहाल, बिमार, भूखा,प्रताड़ित और जुल्म का शिकार बनता रहेगा! 

        हमारे सबके सनातन धर्म के ग्रंथों वेद, उपनिषद्, दर्शनशास्त्र और श्रीमद्भगवद्गीता में कहीं भी यह नहीं लिखा है कि केवल भाग्य के भरोसे बैठकर गुलामों, दासों, बिमारों, भूखों और प्रताडितों का नारकीय जीवन जीते रहो!भगवान् श्रीकृष्ण ने तो मेहनतकश पुरुषार्थी लोगों को दैवी संपदा से संपन्न माना है तथा भ्रष्टाचार में लिप्त लूटेरों को आसुरी कहा है! लेकिन समय का फेर देखिये कि भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे लूटेरों ने अपने आपको धर्म और अध्यात्म का पहरेदार घोषित करके लूटखसोट करने वाले भ्रष्ट नेताओं, पूंजीपतियों, अमीर घरानों की मदद करना शुरू कर दिया! दैवी संपत्ति के स्वामी मेहनतकश लोगों के लिये भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन से श्रीमद्भगवद्गीता श्लोक 16/5  में कहा है-

दैवी संपद् विमोक्षाय
निबंधायासुरी मता! 
मा शुच: संपदं   दैविमभिजातो अस्मि पांडव:!! 

  •         अर्जुन आजकल के मेहनतकश प्रतिभाशाली लोगों के प्रतिनिधि कर्मयोगी हैं!अर्जुन के माध्यम से भगवान् ने आजकल के मेहनतकश जनमानस को अव्यवस्था, अधर्म, अन्याय, भेदभाव और विषमता के विरोध में लडने को कहा है! भाग्य के भरोसे बैठकर प्रतीक्षा करने के लिये नहीं कहा है! इसलिये भौतिक क्षेत्र पर हरेक कर्मशील व्यक्ति को भाग्य के भरोसे बैठकर अपने आपको गरीबी, बदहाली, अभाव, भूखमरी और बेरोजगारी के नरक में नहीं डाले रखना चाहिये! अधिकार प्राप्ति के लिये राजनीति,मजहब,सिस्टम, न्याय और अर्थव्यवस्था में बैठे हुये लूटेरों से लडाई लडते रहना आवश्यक है! 

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आचार्य शीलक राम
दर्शनशास्त्र- विभाग
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय
कुरुक्षेत्र -136119

प्रेम में सफलता और विफलता (Success and Failure in Love)

'सफल सांसारिक प्रेम' नाम का अस्तित्व में कुछ भी नहीं होता है!
यह एक कोरा भ्रम है!
प्रेम और सफल हो जाये, यह तो हो ही नहीं सकता!यह नहीं हो सकता!
दुनिया की कोई भी ताकत इसे संभव नहीं कर सकती है!
लेकिन प्रेमी हैं कि इसे सफल करने में अपनी जिंदगी गंवा देते हैं!
यह प्रेमियों की सबसे बड़ी मूढताओं में से एक है!
प्रेम और सफलता?
ये दोनों शब्द ही परस्पर विरोधाभासी हैं!
इन शब्दों में परस्पर कोई तालमेल नहीं है!
प्रेम की शुरुआत भी विफलता, प्रेम का मध्य भी विफलता तथा प्रेम का अंत भी विफलता!
यही प्रेम का सच है!
जितना जल्दी प्रेम का यह सच समझ में आ जायेगा, उतना ही प्रेम करने वालों के लिये शुभ रहेगा!
बाहरी प्रेम में कोई स्थायित्व नहीं होता है!
स्थायित्व तो मुर्दा वस्तुओं में ही हो सकता है!
कुर्सी, मेज, चारपाई आदि जैसे दस दिन पहले थे, वैसे ही आज भी मौजूद हैं!
मूर्दा, बेजान, जड और नीरस से!
प्रेम तो उत्सव है!
प्रेम तो उल्लास है!
प्रेम तो पर्व है!
प्रेम तो आनंद की अभिव्यक्ति है!
बाहरी प्रेम कभी सफल नहीं होता है तथा अंतस का प्रेम कभी विफल नहीं होता है!
प्रेमी और प्रेमिका परस्पर बेजान वस्तुओं की तरह व्यवहार करते हैं और फिर चाहते हैं कि उनका प्रेम कभी मरे नहीं!
यह नहीं हो सकता है!
ऐसा प्रेम एक दिन उदासी, विफलता, हताशा, अकेलापन तथा तनाव लेकर अवश्य आयेगा!
ऐसे प्रेमी और प्रेमिकाओं की शुरुआत ही गलत है!
गलत शुरुआत कभी भी सफलता में समाप्त नहीं हो सकती है!
लेकिन फिर भी लोग अंधाधुंध लगे हुये हैं!
इसीलिये सभी प्रेमी और प्रेमिकाओं को रोते- बिलखते- शिकायतें करते हुये पाओगे!
सांसारिक प्रेम में धोखे मिलना निश्चित है!
आज नहीं तो कल, कल नहीं तो परसों, परसों नहीं तो नरसों!
वैसे भी वासना प्रेम नहीं है!
वासना तो सतही होती है! वासना तो विषयपरक होती है!
वासना तो किसी के प्रति होती है!
वासना तो ऊर्जा का बहिर्गमन होती है!
वासना तो भोग प्रधान होता है!
जबकि प्रेम विषयपरक नहीं  अपितु विषयीपरक होता है!
प्रेम तो बस होता है!
बिना किसी आकांक्षा के, आशा के, चाहत के और बिना किसी वासना के!
प्रेम तो सुगंध की तरह है! प्रेम तो चंद्रमा की किरणों की तरह है!
प्रेम तो बहती हुई हवा की तरह है!
प्रेम तो भास्कर प्रकाश की तरह है!
प्रेम तो बहती नदी की तरह है!
प्रेम तो एक सहजता है!
प्रेम तो 'स्व -भाव' में ठहर जाना है!
प्रेम तो हमारा आत्मा का आचरण है!
प्रेम तो चैतन्य है!
प्रेम पर अमीर,गरीब, धन, दौलत, सुविधा, असुविधा, लाभ, हानि, स्वार्थपूर्ति, श्वेत, अश्वेत, भारतीय, युरोपीय आदि के होने या नहीं होने से कोई फर्क नहीं पडता है!
जो पल -प्रतिपल सदैव वर्तमान में संभव है, वह तो सदैव ताजा होता है!
सजीव गुलाब के फूल की ताजगी पल- प्रतिपल होती है!
 गुलाब उत्पन्न होता है, कुछ दिन सुगंध देता है और मर जाता है!
लेकिन प्लास्टिक के फूल सदैव ताजगी का भ्रम उत्पन्न करते हैं क्योंकि वो मृत हैं!
क्योंकि वो मृण्मय हैं!
बाहरी स्थायित्व की आस केवल मुर्दा वस्तुओं से हो सकती है, सजीव से नहीं, जीवंत से नहीं!
प्रेमी - प्रेमिका सोचते हैं कि बस हमारी प्रेमिका या हमारा प्रेमी बस हमारा ही है!
एकाधिकार, गुलामी और मै- मेरा -मेरी में पडकर प्रेम अपनी ताजगी खोकर मृत हो जाता है!
प्रेम तो निज स्वभाव है!
प्रेम तो बस होना है!
प्रेम तो बस साक्षी है!
प्रेम तो बस अस्तित्व के साथ रहना है!
प्रेम तो बस आनंद है!
प्रेम बस होने में होना है!
प्रेम में कोई शिकायत नहीं होती है!
प्रेम में भूतकाल,भविष्यकाल नहीं होते हैं!
प्रेम तो बस अभी, इसी क्षण और यही होता है!
वास्तव में प्रेम समयावधि की अपेक्षा रखता ही नहीं है!
प्रेम समयातीत है!
समय में होते ही आकांक्षा, आशा, चाहत, सफलता, विफलता, सुख, दुख आदि आने लगते हैं!
प्रेम को खंड -खंड करके उसे विषाक्त कर देना है!
ऐसे में प्रेम प्रेम न रहकर वासना बन जाता है!
वासना अस्थायी होती है!
वासना जन्मती, मौजूद रहती और मरती है!
प्रेम तो शाश्वत है!
प्रेम तो अखंडित है!
प्रेम तो चिन्मय है!
समकालीन दार्शनिक और रहस्य ऋषि आचार्य रजनीश ने इस विषय प्रेम और वासना को सर्वाधिक और सर्वश्रेष्ठ ढंग से व्याख्या दी है!
लेकिन 'अंधेर नगरी, चौपट राजा' के आधुनिक एकतरफा उपयोगितावादी युग में उनको गलत ही समझा गया है!
वासना और राजनीति में आसक्त सारे नकली प्रेमी, धर्माचार्य और नेता हाथ धोकर उनके पीछे पड गये!
संसार का हरेक व्यक्ति खुद को किसी न किसी का सच्चा प्रेमी,भक्त और निष्ठावान सिद्ध करने में लगा हुआ है!
लेकिन फिर भी सबको सबसे यही शिकायत है कि मेरे साथ धोखा हुआ है!
सोचने की बात यह है कि जब सब सबके प्रति प्रेमपूर्ण हैं तो फिर धोखा और विश्वासघात कहाँ से आ गये हैं?
हकीकत यह नहीं है!
हकीकत तो यह है कि सबका प्रेम मांग पर आधारित है!
कोई किसी से प्रेम नहीं कर रहा है!
अपितु सब एक दूसरे से प्रेम मांग रहे हैं!
सब प्रेम करने का ढोंग कर रहे हैं!
सब सबके सामने प्रेम पाने की चाहत में झोली फैलाये खड़े हैं!
यदि वास्तव में ही लोग परस्पर प्रेम करते तो यह धरती स्वर्ग बन गयी होती!
समस्त धरती आज आनंद से सराबोर हो गयी होती!
लेकिन धरती पर तो सर्वत्र आतंकवाद, उग्रवाद और युद्धों का बोलबाला है!
वासना, कामुकता और आसक्ति मन सहित इंद्रियों के माध्यम से अभिव्यक्ति पाते हैं!
इनके द्वारा प्राप्त सुख या तृप्ति अस्थायी होते हैं!
इनमें स्थायित्व की खोज करना विफलता को आमंत्रित करना है!
इस वासना,कामुकता और आसक्ति को प्रेम कहना गलत है!
प्रेम तो आत्मा की खुशबू है!
प्रेम तो चैतन्य का आलोक है!
प्रेम तो स्वयं के पास आना है!
प्रेम तो आत्मस्थिति है!
प्रेम तो बस होता है!
प्रेम विषयासक्त न होकर सर्व -विषयों से विमुक्ति होकर स्व -साक्षात्कार है!
इंद्रियासक्त और विषयासक्त सांसारिक लोग ऐसा ही प्रेम करते हैं!
इस प्रेम का विफल होना निश्चित है!
इस प्रेम में दूरी बनी रहती है!
यह दूरी ही एक दिन विफलता में परिवर्तित हो जाती है!
स्थूल इंद्रियां सत्य,शाश्वत, सनातन, दिव्य प्रेम को अनुभूत करने में असमर्थ हैं!
सांसारिक प्रेमी इंद्रियों से परे जाने की सोच भी नहीं सकते हैं!
ये तो बाहरी रंग, रुप, आकार, प्रकार, गोलाई, बनावट, हुस्न,चितवन पर आधारित होते हैं!
इस तरह के सांसारिक प्रेम में विफलता मिलना निश्चित है!
आजकल के प्रेमी और प्रेमिका अपनी -अपनी मांगों खालीपन और वासना  को लिये एक दूसरे के सामने खड़े रहते हैं!
लेकिन ध्यान रहे कि प्रेमी और प्रेमिकाओं के भीतर के खालीपन को कोई भी बाहरी प्रेम  या आकर्षण भर नहीं सकता है!
प्रेम करते हुये प्रेमियों की मानसिकता परस्पर एक दूसरे को गुलाम बनाये रखने की होती है!
लेकिन सत्य प्रेम तो स्वतंत्र है!
सत्य प्रेम स्वतंत्रता देता है, गुलामी नहीं!
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आचार्य शीलक राम
दर्शनशास्त्र- विभाग
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय
कुरुक्षेत्र -136119

दर्शनशास्त्र की मौत (Death of Philosophy)

        पिछले कुछ समय से प्रति वर्ष नवंबर महीने के तीसरे वीरवार को 'विश्व दर्शनशास्त्र दिवस' मनाया जाता रहा है!इस वर्ष 2024 में इक्कीस नवंबर को 'युनैस्को' की तरफ से 'विश्व दर्शनशास्त्र दिवस' के रूप में मनाया गया!आज सर्व -विषयों के आदि मूल विषय दर्शनशास्त्र, दर्शनशास्त्र -विभागों तथा दर्शनशास्त्र विषय से संबंधित विभिन्न सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं के लिये यह चिंतन, मनन, विचार, विश्लेषण का अवसर है कि आजादी के सात दशक पश्चात् भारतीय विश्वविद्यालयों में यह विषय मरणासन्न,गैर जरूरी और बेरोजगारी का पर्याय क्यों और कैसे बन गया है? इसके लिये कौन जिम्मेदार है? यह किसने किया है?विदेशी जीवन-शैली के बोझ तले कराहती हुयी हमारी राजनीतिक, प्रशासनिक, शैक्षणिक और वैचारिक दुरावस्था इसके लिये जिम्मेदार है ? या फिर हमारे निठल्ले, नाकारा, नाकाम और आजीविका भोगी शिक्षक इसके लिये जिम्मेदार हैं? या हमारे धर्मगुरु,धार्मिक प्रचारक, कथाकार,संत,योगी,मुनि और सुधारक इसके लिये जिम्मेदार हैं? या फिर हमारा उच्छृंखल उन्मुक्त पाश्चात्य जीवन- शैली का अंधानुकरण इसके लिये जिम्मेदार है? आज के दिन उपरोक्त सभी प्रश्नों पर विचार विमर्श करके समाधान तलाश करके उन्हें जमीनी धरातल पर लागू करने की आवश्यकता है!

        वर्ष में केवल एक दिन औपचारिकता निभाने के लिये इस प्रकार के आयोजन करना स्वतंत्र वैचारिकी से नाक -भौं सिकोडने वाले लकीर के फकीर सुविधाभोगी तथाकथित शिक्षकों के लिये चोंचले,क्षणिक रोमांच और अपने उच्च- अधिकारियों को प्रश्न करने के लिये किसी विभागीय एक्टीवेटी से अधिक नहीं होते हैं!बस, इस बहाने उदरपूर्ति के लिये कुछ खाना -पीना भी हो जाता है! मन में कुछ तसल्ली हो जाती है कि हमने भी कुछ किया है!

        भारत सहित वैश्विक पटल पर मेहनतकश जनता -जनार्दन के मध्य व्याप्त विषमता,विफलता,गरीबी,अभाव, बेरोजगारी,तनाव, अकेलेपन,आतंकवाद और युद्ध के काल में सामाजिक भेदभाव को दूर करने को इस वर्ष के दर्शनशास्त्र दिवस को समर्पित किया गया है! युनैस्को सहित विभिन्न वैश्विक संस्थाएं एक तरफ तो खुद उपरोक्त समस्याओं को बढ़ावा दे रही हैं तथा दूसरी तरफ सामाजिक भेदभाव को समाप्त करने का ढोंग कर रही हैं!उपेक्षित और मरणासन्न दर्शनशास्त्र विषय को अन्य विषयों की तरह यथोचित सम्मान आज तक क्यों नहीं मिल पाया है? यह हमारी चर्चा, चिंता और कार्यनीति का केंद्र होना चाहिये!

        यहाँ तो हमारे नेताओं के हालात ऐसे बन चुके हैं कि जब उन्हें वोट चाहियें तो  हिन्दू बना देते हैं लेकिन चुनाव होने के बाद वोट देने वाले उन्हीं हिंदुओं द्वारा ज्योंही जमीनी समस्याओं को उठाया जाता है तो पिछवाड़े पर लाठियां,छाती में गोलियां और कानून से जेल की सलाखें मिलती हैं! यही है भारतीय लूटतंत्र की वास्तविकता!इनको इतना भी मालूम नहीं है कि विचार स्वातंत्रय सनातन भारतीय दर्शनशास्त्र की सर्वप्रथम और सर्वप्रमुख विशेषता है! इन्हें न तो उपनिषदों के अध्यात्म का ज्ञान है, न षड्दर्शन के पूर्व पक्ष और उत्तर पक्ष का ज्ञान है, न श्रीमद्भगवद्गीता का श्रीकृष्ण अर्जुन संवाद याद है, न अष्टावक्र गीता का ज्ञान है, न योग वाशिष्ठ का ज्ञान है, न षड्दर्शन पर किये गये सैकड़ों भाष्य ग्रंथों का ज्ञान है, न ब्रह्मसूत्र पर विभिन्न वादों का ज्ञान है, न भौतिकवाद व्यवहारिक चार्वाक,आजीवक, संजय वेलट्टिपुत्त,मक्खली गौशाल, प्रक्रुध कात्यायन,वात्स्यायन आदि के दर्शनशास्त्र का ज्ञान है! बस, अपने निहित स्वार्थ के लिये जनमानस का माईंडवाश करते रहते हैं! भारतीय दर्शनशास्त्र का इन्होंने बहुत अधिक अहित किया है!

        नयी शिक्षा-नीति में तार्किक सोच को बढ़ावा देने का बार बार जिक्र हुआ है! लेकिन इन्हें यह कौन बतलाये कि नवयुवा छात्र- छात्राओं में तार्किक सोच का विकास केवल मात्र दर्शनशास्त्र विषय से ही हो सकता है? जिनकी सत्ता के गलियारों में पहुँच है, वो वरिष्ठ दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर पता नहीं क्या कर रहे हैं? वो समझाते क्यों नहीं हमारे शिक्षाशास्त्रियों,  नीति- निर्माताओं, नेताओं और धर्माचार्यों को कि तार्किक सोच का विकास दर्शनशास्त्र विषय के अध्ययन अध्यापन शोध आदि से ही हो सकता है!केवल एक दिन के लिये दर्शनशास्त्र दिवस मनाने से कुछ नहीं होनेवाला है! हरियाणा राज्य में तो हालत यह है कि यहाँ के विभिन्न राजनीतिक दलों और सत्ताधारी दल के विधायकों, सांसदों, मंत्रियों और मुख्यमंत्री तक को यह पता नहीं है कि दर्शनशास्त्र नाम का भी कोई विषय होता है! दर्शनशास्त्र का नाम सुनते ही मुंह बिचकाने लगते हैं और बडी बेरुखी से कहते हैं कि यह भी कोई विषय होता है? हरियाणा में महाविद्यालयों और एकमात्र विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर की भर्ती हुये शायद 23-24 वर्ष हो चुके हैं!जब पढाने वाले ही नहीं होंगे तो दर्शनशास्त्र विषय को कोई विद्यार्थी क्यों चयन करेगा? बाकी इस विषय में रोजगार शून्य है! यह भी इस विषय के गर्त में जाने का एक कारण है!

        जहाँ तक विद्यार्थियों में तार्किक सोच का विकास करने की बात है, यह कोरा दिखावा है! राजनीति सत्ता, मजहब सत्ता, न्याय सत्ता, धन सत्ता और प्रशासन सत्ता को तार्किक सोच के भारतीय चाहिये ही नहीं! उन्हें तो केवल जी हुजूरी करने, हाँ जी- हाँ जी करने ,चापलूसी करने और चरण वन्दना करने वाले लोटपोटूओं की जरूरत है! ज्यों ही कोई तार्किक सोच का प्रयोग करेगा तो सर्वप्रथम वह अपने अधिकारों की प्राप्ति के लिये आवाज उठायेगा!रोजगार, शिक्षा,आवास, बिजली, पानी,चिकित्सा और फसलों के उचित भाव के लिये आवाज उठाने  वालों के साथ कैसे दुर्व्यवहार किया गया था, यह पूरा विश्व जानता है! अधिकारों के लिये आवाज उठाने वालों को पाकिस्तानी, खालिस्तानी और देशद्रोही कहकर उनकी जबान को बंद करना सत्ताधारियों को बखूबी आता है! तो यह तो भूल ही जाईये कि भारत में कोई नेता, धर्माचार्य, पूंजीपति, उच्च अधिकारी, सुधारक आदि तार्किक सोच को महत्व देना चाहेगा! जनमानस को गुलाम और दास बनाने के लिये सर्वप्रथम उसकी तार्किक सोच को ही समाप्त करना पड़ता है!नेता और धर्माचार्य ही नहीं अपितु साम्यवादी सत्ता तक में भी यही हुआ है!

        सृष्टि में सर्वप्रथम दर्शनशास्त्र विषय के अंतर्गत तार्किक सोच के बीज वेदों में निहित 'नासदीय सूक्त' और 'पुरुष सूक्त' में उपलब्ध होते हैं!यह निसंकोच कहा जा सकता है कि दर्शनशास्त्र के अंतर्गत तार्किक सोच का मानवता के लिये सर्वाधिक महत्वपूर्ण योगदान धनबल,सत्ताबल और मजहब बल द्वारा फैलाये जा रहे पाखंड, ढोंग, शोषण, दिखावे और लूटखसोट के खात्मे और अपने मूलभूत अधिकारों की प्राप्ति के लिये है! शायद इसीलिये जानबूझकर उपरोक्त प्रभावी लोग तार्किक सोच को बढावा देने वाले  दर्शनशास्त्र जैसे विषय को समाप्त करने पर उतारु हैं!जिनको भी सत्ता मिल जाती है, वही मेहनतकश जनमानस पर धींगामस्ती करना शुरू कर देता है!दर्शनशास्त्र- विभागों के प्रमुखों तक में यह महामारी फैली हुई है!इनमें खुद ही तार्किक सोच का टोटा है तो फिर ये अपने विद्यार्थियों में तार्किक सोच का विकास क्या खाक करेंगे? कम या अधिक सभी दर्शनशास्त्र के शिक्षक वैचारिक संकीर्णता का शिकार होकर बुद्धिवाद, अनुभववाद, समीक्षावाद, तार्किक अणुवाद,अस्तित्ववाद, नारीवाद,रोमांचवाद, परमाणुवाद, विकासवाद, सृष्टिवाद,उच्छृंखल भोगवाद, साम्यवाद, समाजवाद, ईश्वरवाद, निरिश्वरवाद, यदृच्छावाद, कर्मवाद,अनिश्चयवाद, वास्तववाद,शून्यवाद, विज्ञानवाद आदि की एकतरफा भुलभूलैया में उलझे पडे हैं!

    भारत में दर्शनशास्त्र से जुड़े हुये पूर्व राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन जैसे व्यक्ति बडे -बडे पदों पर आसीन होकर भी इस विषय के कल्याणार्थ कुछ रचनात्मक क्यों नहीं कर पाये, यह भी एक अलग से शोध का विषय है!इस पर भी गहनता से निष्पक्ष मंथन किये जाने की आवश्यकता है! यदि इनके पास कुछ क्रांतिकारी और रचनात्मक करने का संकल्प और इच्छाशक्ति होती तो बहुत कुछ कर सकते थे!

भारतीय विश्वविद्यालयों के दर्शनशास्त्र -विभागों में आजादी से पहले और इसके बाद संदर्भ के रूप में पढे जाने वाली सर्वपल्ली राधाकृष्ण,एस.एन. दासगुप्ता, जदूनाथ सिन्हा,चंद्रधर शर्मा,राहुल सांकृत्यायन,उमेश चंद्र,  रामनाथ शर्मा,जगदीश चंद्र मिश्र,याकूब मसीह,बलदेव उपाध्याय,दयाकृष्ण, देवीप्रसाद, गैरोला, हिरियन्ना तथा पाश्चात्य मैक्समूलर, डायसन, कीथ, वैबर,राथ,जैकोबी, गार्बे, रीज डैविड, श्री मती रीज डैविड, ओल्डनबर्ग, सुजूकी, सोजेन चार्ल्स इलियट, बार्थ, ब्लूमफील्ड, होपकिंस, कोलब्रुक, बूहलर, फर्क्यूहर आदि की पुस्तकों में सनातन भारतीय दर्शनशास्त्र का सत्य,तार्किक, जमीनी,निष्पक्ष,पूर्वाग्रहमुक्त  पक्ष बिलकुल गायब है! इन्होंने भारतीय शिक्षा- संस्थानों में दर्शनशास्त्र विषय के प्रचार और प्रसार हेतु कभी भी रचनात्मक प्रयास नहीं किया!बस, अपनी प्रसिद्धि और प्रतिष्ठा के लिये काम करते रहे!समकालीन युग में स्वामी दयानंद द्वारा स्थापित तार्किक संस्था आर्यसमाज ने अकेले ही भारतीय दर्शनशास्त्र पर पचासों मौलिक विचारक दिये हैं!उन्नीसवीं सदी में शस्थापित किसी भी संस्था ने यह काम नहीं किया! आर्यसमाज ने स्वामी दर्शनानंद, आर्यमुनि,उदयवीर शास्त्री,गुरुदत्त,आचार्य बैद्यनाथ शास्त्री,आचार्य प्रशांत, जयदेव विद्यालंकार, रामचंद्र देहलवी,स्वामी विद्यानंद,युधिष्ठिर मीमांसक, ब्रह्मदत्त जिज्ञासु,प्रो. सुरेन्द्र कुमार, आचार्य अग्निव्रत जैसे मौलिक विचारक प्रदान किये हैं! लेकिन विडम्बना है कि दर्शनशास्त्र- विभागों में इन विचारकों की पुस्तकों को कोई महत्व नहीं दिया जाता है!आजकल खुद आर्यसमाजी भी तार्किकता को खोकर पौराणिक अंधभक्त बनते जा रहे हैं!यशदेव शल्य विश्वविद्यालयीन शिक्षा से दूर रहने के कारण अपनी मौलिक प्रतिभा को बचाकर रख सके! इनकी कृतियों के अध्ययन से यह आभास होता है!

        भारतीय दर्शनशास्त्र पर पाश्चात्य लेखकों द्वारा लिखित विपुल साहित्य एक मिशनरी साजिश का हिस्सा है! मूढता देखिये कि भारतीय दर्शनशास्त्र का अकादमिक जगत् इस सच्चाई को आज भी स्वीकार करने से परहेज कर रहा है!पाश्चात्य सोच के गुलाम विचारक आज भी इस गलतफहमी का शिकार हैं कि भारत में कभी कोई दर्शनशास्त्र रहा ही नहीं है!इनके मत से यहाँ तो केवल सांप, सपेरे, नट, जादू, टोना,पशुबलि, मूर्ति पूजा, झाडफूंक करने वालों का प्राधान्य रहा है! जयपुर दर्शन प्रतिष्ठान से प्रकाशित 'उन्मीलन' पत्रिका को छोडकर दर्शनशास्त्र विषय को केंद्रित करके भारत में कोई भी स्तरीय शोध-पत्रिका मौजूद नहीं है!और तो और दर्शनशास्त्र की अखिल भारतीय अकादमिक संस्था पर या तो पूरी तरह से पाश्चात्य सोच और भाषा हावी है या फिर उस पर कुंडली मारे बैठे वरिष्ठ शिक्षक केवल सरकार ग्रांट पर सैर-सपाटे करने या फिर औपचारिकतावश गोष्ठियाँ या कांफ्रेंस करने को ही अपना कर्तव्य समझते हैं!अधिकांशतः केवल अंग्रेजी भाषा में संपादित पुस्तकें प्रकाशित करने तथा परस्पर एक दूसरे की पुस्तकों को पुरस्कृत करने के सिवाय इनको कुछ भी नहीं सूझता है! इन द्वारा संपादित और प्रकाशित महंगी पुस्तकों को जबरदस्ती करके दर्शनशास्त्र-विभागों में ठूंस दिया जाता है! इनको शायद ही कोई विद्यार्थी, शोधार्थी या शिक्षक पढता होगा!
        भारतीय दर्शनशास्त्र पर आज तक हिंदी भाषा में कोई स्तरीय पढने-पढाने योग्य विश्वकोश उपलब्ध नहीं है! जबकि गुलामी के प्रतीक कार्ल पोटर और मैक्समूलर आदि द्वारा संपादित भारतीय दर्शनशास्त्र के विद्यार्थियों में हीनता की भावना भर देने वाला कूड़ा-कर्कट 'सेकर्ड बुक्स आफ द इस्ट' हर विश्वविद्यालय में उपलब्ध है! दिल्ली सहित भारत के विभिन्न शहरों में स्थित विभिन्न प्रकाशन संस्थान अब भी केवल अंग्रेजी भाषा में लिखी पुस्तकों को प्रकाशित करने पर गर्व महसूस करते हैं!

        विश्वविद्यालयों के विभिन्न दर्शनशास्त्र- विभागों के वरिष्ठ शिक्षकों के बारे में यह कहावत प्रचलित है कि ये खुद दर्शनशास्त्र -विषय और दर्शनशास्त्र विभागों को मृतप्राय करने के लिये जिम्मेदार हैं!इन्हें दर्शनशास्त्र विषय को आगे बढाने,कक्षाएं लेने, स्तरीय शोध करने -करवाने, स्तरीय विश्लेषणात्मक पुस्तकें और शोध-आलेख लिखने तथा दर्शनशास्त्र विषय में कुछ क्रांतिकारी और अभिनव करने आदि से कोई मतलब नहीं है! इनका अधिकांश समय परस्पर टांग खिंचाई करने, राजनीति करने, पद हासिल करने, शोधकर्ताओं को हतोत्साहित करने तथा उच्च अधिकारियों की चापलूसी करने में ही व्यतीत होता है! तनख्वाह लाखों में लेकिन काम धेले का नहीं!ऐसे ही शिक्षक जब 'फिलासफी डे' मनाते हैं तो रोने के साथ पीड़ा होती है! जिनको मोटी तनख्वाह मिलती है वो काम नहीं करते तथा जो कम तनख्वाह के आजीवन ठेके के गुलाम शिक्षक होते हैं, वो अपमानित और प्रताड़ित होकर बंधुआ मजदूरों की तरह काम करते हैं!शिक्षक भर्ती में आयोजित साक्षात्कार देने के लिये यदि स्वयं स्वामी दयानंद, स्वामी विवेकानंद, आचार्य रजनीश, जिद्दू कृष्णमूर्ति और राधाकृष्णन् भी आ जायें तो उनको भी भर्ती के अयोग्य घोषित कर दिया जायेगा! जुगाडू, सिफारशी, मंदबुद्धि, बंदबुद्धि  घोंचुओं को पिछले दरवाजे से भर्ती किया जा रहा है तथा प्रतिभाशाली योग्य युवाओं की उपेक्षा हो रही है!

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आचार्य शीलक राम
दर्शनशास्त्र- विभाग
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय
कुरुक्षेत्र- 136119

पूजा-स्थलों की तोडफोड और साहित्य में मिलावट की शुरुआत बौद्धकाल में (Demolition of places of worship and adulteration in literature began during the Buddhist period.)

        समकालीन युग के सर्वाधिक निर्भिक और निराले दार्शनिक और धर्मगुरु आचार्य रजनीश ने कहा है कि सच कर्कश और कडवा नहीं होता है, बल्कि सच को सुनने और उसे पचाने का संसार के लोगों का अभ्यास ही नहीं है! एक अन्य स्थान पर उन्होंने एक और क्रांतिकारी बात कही है! उनके अनुसार सिद्धार्थ गौतम बुद्ध ने सनातन धर्म के ग्रंथ वेद,यज्ञ और आर्य वैदिक धर्म की कभी भी आलोचना या विरोध नहीं किया! वे तो स्वयं ही आर्य वैदिक धर्मी ऋषि थे! उन्होंने तो वेद, यज्ञ और पूजापाठ की आड़ में हो रही अनैतिकता, अमानवीयता और पाखंड का विरोध किया था! यह काम तो आधुनिक युग में आर्यसमाज के संस्थापक महर्षि दयानंद सरस्वती ने भी किया है! तो क्या हम स्वामी दयानंद सरस्वती को वेद विरोधी, यज्ञविरोधी और सनातन प्रतीकों का विरोधी कह देंगे? नहीं,हम ऐसा नहीं कह सकते!

        जब भी हम सनातन धर्म और संस्कृति का जिक्र करते हैं तो कुछ बातें ख्याल में रखना आवश्यक है! भारत और भारत से बाहर एक भी पारसी, यहुदी,  बौद्ध ,इस्लामी पूजा- स्थल ऐसा नहीं मिलेगा जोकि हिन्दू पूजा स्थलों, भवनों,महलों, आवासों, गुरुकुलों और मंदिरों को तोडकर नहीं बनाया गया है! गडे मूर्दे तो उखडने ही चाहियें!एकतरफा नहीं अपितु चहुंदिशा यह काम होना चाहिये! सर्वप्रथम और एक सांप्रदायिक भावना को लेकर पूजा स्थलों के तोडफोड की शुरुआत बौद्ध मत से दीक्षित राजाओं से हुई थी! इसके बाद हिन्दू राजाओं और फिर मुगल राजाओं ने यह तोडफोड का यह कार्य धडल्ले से किया!निष्पक्षता से यदि पूजा स्थलों की खुदाई की जाये तो हरेक बौद्ध स्तुप, मस्जिद और चर्च के नीचे हिन्दू पूजा स्थलों के चिन्ह मिलेंगे! सर्वाधिक तोडफोड का काम बौद्ध राजाओं के काल में तथा मुगल आदि विदेशी आक्रांताओं के काल में हुआ था! बौद्ध काल के पश्चात् हिन्दू राजाओं ने भी उन बौद्ध स्थलों को तोडकर हिन्दू पूजा स्थल बनाये,जहाँ पर पहले बौद्ध राजाओं ने तोडफोड की थी!कुल मिलाकर सर्वाधिक तोडफोड हिन्दू पूजा स्थलों के साथ ही हुई है! लेकिन इस समय भारत में हिंदुओं, बौद्धों, ईसाईयों, मुसलमानों, नव बौद्धों, साम्यवादियों और संघियों में और यहाँ तक कि आर्यसमाजियों में भी अंधभक्ति चरम पर है! कोई किसी को समझने के लिये तैयार नहीं है!सबको अपनी दुकानदारी की चिंता है! जिसका, जब और जैसे भी दांव लग जाता है, वही सत्ताधारी राजनीतिक दल के नेताओं से साठगांठ करके अपनी दुकानदारी को आगे बढाने के लिये जुगाड़ करने पर लग जाता है! इससे सनातन धर्म और संस्कृति का अहित हो रहा है!

    तो इस समय सर्वाधिक आवश्यक यह है कि बौद्ध, हिन्दू,ईसाई और इस्लामी  पूजा स्थलों की खुदाई के साथ- साथ हिन्दू, बौद्ध,ईसाई, इस्लामी,साम्यवादी, संघी, आर्यसमाजी और नव -बौद्ध अंधभक्तों की खोपडी की खुदाई भी होना ही चाहिये!भारत से सांप्रदायिक गंदगी को साफ करने के लिये यह बेहद आवश्यक है!इसके लिये अब एक नया मंत्रालय बना दिया जाना चाहिये! बेरोजगारी, अपराध, भ्रष्टाचार, बिमारी, गरीबी, बिजली, पानी, सिंचाई, खेती किसानी तो हमारे नेताओं और धर्मगुरुओं के लिये कोई समस्या ही नहीं है! इनकी तरफ़ तो इन्होंने ध्यान देना ही छोड दिया है!

        खोपड़ियों की खुदाई और सफाई का काम योगाभ्यास के द्वारा ही संभव हो सकता है! लेकिन विडम्बना देखिये कि पिछले कुछ दशकों से सनातन भारतीय योगाभ्यास को भी व्यापारी तथाकथित धर्मगुरुओं द्वारा कसरतयोग,कपालभाति योग,आसनयोग,तीव्रश्वसनयोग, होटयोग,कोल्डयोग,सैक्सयोग,वमन-विरेचन-योग में परिवर्तित कर दिया है! तोडफोड करने वालों ने योगाभ्यास को भी नहीं छोड़ा है!अतीत में ऐसा ही घृणित कुकृत्य महर्षि पतंजलि के योगसूत्र, महर्षि कपिल के सांख्यसूत्र तथा महर्षि गौतम के न्यायसूत्र के साथ बौद्ध विद्वानों ने उनमें मिलावट करके या तोडमरोडकर या अर्थ का अनर्थ करके किया था!

        शास्त्रार्थ में हर तरफ से पराजित होने के पश्चात् सनातन धर्म, संस्कृति, दर्शनशास्त्र, महाकाव्यों, पुराणों और स्मृतियों में प्रक्षेप का घृणित कुकृत्य बौद्ध काल में बौद्ध राजाओं के सरंक्षण में सर्वाधिक रुप से हुआ था! इस तरह से साहित्यिक प्रक्षेप करके साहित्यिक प्रदुषण की शुरुआत ज्ञात इतिहास में बौद्धकाल में ही हुई थी! मैकाले, मैक्समूलर आदि के पाश्चात्य  चेले चपाटों ने तो यह साहित्यिक प्रदुषण का काम बहुत बाद में किया है!

        तो यह सांप्रदायिक तोडफोड का जिक्र करते समय यह ध्यान रखा जाना चाहिये कि इसकी शुरुआत सर्वप्रथम बौद्धों ने ही की थी तथा इसका सर्वाधिक नुकसान सनातन धर्म,संस्कृति, दर्शनशास्त्र और इसके पुरातन साहित्य का ही हुआ है!बौद्ध, ईसाई, इस्लामी,मंगोली, अफगानी  मुगलिया,फ्रैंच,जर्मन, ब्रिटानी,अमेरिकन,नव ईसाई, नव बौद्ध, साम्यवादी और संघी आदि सभी सनातन धर्म और संस्कृति के सभी पुरातन प्रतीकों के साथ आज भी तोडफोड करने पर लगे हुये हैं! सनातन धर्म और संस्कृति को छोडकर उपरोक्त सभी को राजनीतिक सरंक्षण प्राप्त है! सभी को अल्पसंख्यक का लाभ मिल रहा है! आधुनिक कहे जाने वाले वैज्ञानिक युग में भी सनातन धर्म और संस्कृति के साथ वही तोडफोड की जा रही है, जिसकी शुरुआत आज से पच्चीस सदी पूर्व बौद्ध काल में हुई थी!

        और तो और भारत में बौद्ध काल में ही चार्वाक, आजीवक,मक्खली गौशाल, संजय वेलट्टिपुत्त, प्रक्रुध कात्यायन आदि के मतों के भी पूजा स्थान और गुफाएं आदि बहुतायत से मौजूद थीं! उन सबकी तोडफोड बौद्ध राजाओं द्वारा हुयी! वहाँ पर बौद्ध गुफाओं और स्तूपों आदि का निर्माण किया गया!क्योंकि सनातन धर्म और संस्कृति सर्वाधिक पुरातन हैं, इसलिये पूजा स्थलों, शिक्षा स्थलों और  साहित्य के साथ जबरदस्ती से तोडफोड, मिलावट, प्रक्षेप और धींगामस्ती भी इन्हीं के साथ हुई है!

            सनातन धर्म के शास्त्रों वेद, उपनिषद्, दर्शनशास्त्र और पहले के पुराणों तक में अवतारवाद की वह अवधारणा मौजूद नहीं है जिसे पिछले दो हजार वर्षों के दौरान तथाकथित पंडितों, पुरोहितों, कथाकारों और धर्माचार्यों ने प्रचलित कर दिया है! सनातन शास्त्रों में महापुरुषों के समय समय पर धरती पर आकर मानव जगत् को उपदेश देने का तो जिक्र है लेकिन परमात्मा द्वारा अवतार लेकर धरती से अधर्म के विनाश और धर्म की स्थापना के उपदेश सनातन धर्म में कहीं भी नहीं हैं!श्रीमद्भगवद्गीता में भी यह अवधारणा मौजूद नहीं है! श्रीमद्भगवद्गीता की तोडमरोडकर की गयी व्याख्याओं के द्वारा अवतारवाद को घुसेड़ दिया गया है! मानवता के आचरण को परनिर्भर बना देने वाली यह अवतारवाद की निठल्ली अवधारणा भी सर्वप्रथम बौद्ध मत से ही आई है! बौद्ध मत से ही यह अवधारणा हिन्दू, ईसाईयत, इस्लाम, सिखी आदि में प्रचलित हुई है!सनातन धर्म में पूजा स्थलों का जो शोषक और मानवता के आचरण को पुरोहितगिरी से भर देने वाला रुप भी बौद्ध मत से ही आया है! आज ये अपने आपको कितना ही नास्तिक और अनात्मवादी कहें, लेकिन सच यही है कि समस्त धरा पर मौजूद विभिन्न संप्रदायों और मजहबों में शोषक,निठल्ली, अनैतिक, हिंसक, मांसाहार, मूर्तिपूजा की कुरीतियों का प्रचलन बौद्ध मत से आया है! अवतारवाद, पैगम्बर, ईश्वरपुत्र,मसीहा आदि की प्रवृत्ति का  मूल महायान की बुद्ध की मैत्रेय के रूप में आने की अवधारणा से ही हुआ है!

            विडम्बना देखिये कि इन्होंने बदनाम सनातन धर्म को कर दिया है लेकिन भारत में अधिकांश कुरीतियों के जिम्मेदार ये खुद ही हैं! स्वामी दयानंद सरस्वती ने अपनी पुस्तक सत्यार्थ प्रकाश में इसका संकेत करते हुये कहा है कि मूर्ति पूजा की शुरुआत जैन और बौद्ध मत से हुई है!

        पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अपनी पुस्तकों 'हिंदुस्तान की कहानी' और 'विश्व इतिहास की झलक' में मुर्ति पूजा की शुरुआत को जैन और बौद्ध मत से माना है! वेद, उपनिषद्, दर्शनशास्त्र आदि ग्रंथों में मूर्ति पूजा का कोई भी समर्थन नहीं है!वेद में तो न तस्य प्रतिमा अस्ति कहकर स्पष्ट रूप से मूर्ति पूजा का निषेध किया है!पुराण साहित्य में भी अनेकत्र मूर्ति पूजा की घोर निंदा की गयी है!आचार्य  चाणक्य तक ने मूर्ति पूजा का निषेध किया है!सनातन धर्म के शास्त्रों में सर्वत्र नारी को सर्वोच्च गरिमा प्रदान की गई है! लेकिन बौद्ध और जैन मत तो नारी को हिकारत की दृष्टि से देखा गया है! शुरू में सिद्धार्थ बुद्ध ने तो नारी को अपने मत में दीक्षित करने से ही मना कर दिया था! बहुत बडे संघर्ष और विरोध के बाद उन्होंने नारी को दीक्षा देना स्वीकार किया था! लेकिन नारी की निंदा करते हुये चेतावनी दी थी कि नारी को दीक्षा देने की वजह से जो बौद्ध मत 2000 वर्षों तक चलना था, वह केवल 500 वर्षों तक ही जीवित रह पायेगा! हुआ भी ठीक वैसा ही! फलस्वरूप आज सिद्धार्थ बुद्ध के मत के वास्तविक मत का कोई नामलेवा समस्त धरा पर मौजूद नहीं है! बस, उनकी आड लेकर मनमाने मत प्रचलित हैं! यही तक ही नहीं अपितु यह भी बड़ा दिलचस्प है कि बौद्ध मत ने अपने बलबूते एक भी महान दार्शनिक पैदा नहीं किया! महायान, हीनयान, वैभाषिक, सौत्रांतिक, विज्ञानवाद, शून्यवाद,स्वतंत्र विज्ञानवाद,वज्रयान आदि के अधिकांश दार्शनिक सनातन धर्म से मतांतरित हैं! बौद्ध मत के भिक्षुवाद और शून्यवाद तथा अद्वैत मत के मायावाद की गलत परंपरा ने भारत को विदेशी आक्रमणकारियों का साफ्ट टारगेट बनाकर भारत को असुरक्षित कर दिया! इस पर आज तक बहुत कम विचार हुआ है! भारत की 1300 वर्षों की गुलामी और बर्बादी में उपरोक्त का महत्वपूर्ण योगदान रहा है! पाश्चात्य विचारकों द्वारा दर्शनशास्त्र और इतिहास को मनमानी गलत दिशा दिये जाने के कारण इस संबंध में निष्पक्ष और सत्य लेखन न के बराबर हुआ है!अब समय आ चुका है कि सत्य का उद्घाटन होना चाहिये!

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आचार्य शीलक राम
दर्शनशास्त्र- विभाग
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय
कुरुक्षेत्र -136119