Saturday, November 7, 2026

'तर्क' से 'विचार' करके निष्पक्षता से देखो तो (If you look at it objectively, with 'reason' and 'think'...)

 
 

 
भौतिक संसार में कोई किसी का सम्मान नहीं करता है।जब आपको लगता है कि कोई आपका सम्मान कर रहा है,तो ध्यान रखना वह आपका नहीं अपितु स्वयं का सम्मान कर रहा होता है। यदि इस सच्चाई को समझ लिया जाये तो बहुत सी गलतफहमियां दूर हो सकती हैं।

 इससे यह भी चमत्कार हो सकता है कि हम स्वयं का सम्मान करने में ही दूसरों का सम्मान करने के रहस्य में पारंगत हो सकेंगे।जब इस सच्चाई को समझने से लोग दूर भागते हैं तो वहीं से उनके जीवन में दोगलापन शुरू हो जाता है। 

सांसारिक जीवन में किसी भी व्यक्ति के लिये सर्वप्रथम अपनी निजता की सुरक्षा,अपना निजी हित या स्वार्थ पूरा करना महत्वपूर्ण होता है।
 दूसरों से संपर्क में आने पर मन के गहरे तलों में यही विचार और भावना महत्वपूर्ण होते हैं कि स्वयं को कैसे स्थापित किया जाये या स्वयं के सम्मान की रक्षा कैसे की जाये या स्वयं को चहुंओर के परिवेश में कैसे दूसरों के सामने बड़ा दिखलाया जाये।

 सच्चाई कभी भी कड़वी नहीं होती है अपितु हमने सच्चाई का सामना करना छोड़ दिया है, इसलिये सच्चाई कड़वी लगती है। यह एक कड़वी सच्चाई है कि जहां तक भौतिक संसार की बात है मित्रता, दोस्ती,प्यार,प्रेम,स्नेह, दांपत्य जीवन, राष्ट्रप्रेम, बलिदान,शहादत,मजहबी विश्वास आदि सभी में व्यक्ति का स्वयं का सम्मान, स्वयं का होना, स्वयं का स्थान मुख्य होता है। 

लेकिन सभी व्यक्ति दिखावा यह करते हैं कि वो अपने दोस्तों के लिये, अपनी प्रेमिका के लिये, अपने प्रेमी के लिये, अपने मजहब के लिये, अपने राष्ट्र के लिये, अपनी संतान के लिये, अपने माता-पिता के लिये, अपने गुरुओं के लिये सम्मान की भावना रखते हैं। इसके लिये वो कुछ भी करने को तत्पर रहते हैं, इसके लिये वो कोई भी बलिदान कर सकते हैं।

 वास्तव में यह सफेद झूठ है। कोई किसी के लिये कुछ नहीं करता है अपितु सभी अपने खुद के लिये कर रहे हैं। दूसरों के प्रति प्रेम, सेवा, सम्मान, इज्जत, सुरक्षा,बलिदान, भक्ति आदि करके वास्तव में वो भविष्य के लिये अपनी खुद की सुरक्षा, खुद के सम्मान और खुद की इज्जत का जुगाड कर रहे होते हैं।

दूसरों से मदद लेने पर, दूसरों द्वारा सम्मान किये जाने पर या दूसरों द्वारा इज्जत दिये जाने पर मन में एक हीनता की भावना घर बना लेती है।इस हीनता की भावना के साथ व्यक्ति खुद को छोटा महसूस करने लगता है। ऐसे में वह अवसर की तलाश में रहता है कि कैसे वह अपने आपको दूसरों की नजरों में बड़ा, सम्मानित और सर्वोच्च सिद्ध कर सकता है।

 यहां कोई किसी से छोटा बनकर नहीं रह सकता है। ऐसा हो ही नहीं सकता।।आर्थिक,सामाजिक , राजनीतिक या शैक्षिक आदि क्षेत्रों में छोटा बनकर रहने की उसकी विवशता होती है;यह अलग बात है।

 सभी खुद को स्थापित करने में लगे हुये हैं। कोई राजनीति से, कोई शिक्षा से, कोई ताकत से, कोई अपराध से, कोई भोग से, कोई बड़े मकान से, कोई बड़ी गाड़ी से, कोई सेवा से तथा कोई बलिदान करके खुद को बड़ा सिद्ध करने में लगे हुये हैं। तर्क के बल से विचार करके देखो -सांसारिक मनुष्य की वास्तविकता यही है।

 दर्शनशास्त्र विषय आपको यह सब करने की दृष्टि प्रदान करता है। बशर्ते आप दर्शनशास्त्र विषय को पढकर तार्किक ढंग से सोचने, विचारने और निर्णय लेने में निष्ठा से लग सको।

लेकिन फिर वही बात सामने आ जाती है। व्यक्ति यदि यहां पर भी अपने आपको केंद्र में रखकर तार्किक चिंतन करके निर्णय लेगा तो सारा दर्शनशास्त्र व्यर्थ हो जायेगा।पूर्व हो या पश्चिम हो-ऐसा ही हो रहा है। शिक्षा के केन्द्र विश्वविद्यालय विशेष रूप से दर्शनशास्त्र-विभागों के शिक्षक इसक सर्वाधिक शिकार हैं। 

भारत और भारत से बाहर 
दर्शनशास्त्र विषय को केंद्र में रखकर कितने विभाग,कितनी अकादमियां,कितनी परिषदें, कितने शोध केंद्र, कितने क्लब आदि बने हुये हैं -निष्पक्षता से अवलोकन करके देखो,जानो और निर्णय लो। वहां पर क्या हो रहा? दर्शनशास्त्र तो शायद ही कहीं पर होगा। तार्किक चिंतन तो शायद ही कहीं पर मौजूद होगा।

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