Thursday, November 5, 2026

मैनीफैस्टेशन के रहस्य को श्रीमद्भगवद्गीता से जानें (Learn the secret of manifestation from the Bhagavad Gita)


श्रीमद्भगवद्गीता के इस श्लोक को यदि ध्यान से समझ लिया जाये तो सोशल मीडिया पर मौजूद मैनीफैस्टेशन करवाने वालों की भीड़ का भांडाफोड हो जाये। लेकिन हमारे यहां तो पाश्चात्य कूड़ा-कर्कट पर अंधभक्ति करने का बुखार चढ़ा हुआ है। श्लोक का अवलोकन कीजिये -
सत्त्वानुरुपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत।

 
श्रद्धामय: अयं पुरुषो यो यच्छृद्ध: स एव स:।।(17/3)

इसमें कहा गया है कि हरेक मनुष्य की श्रद्धा उसके अंतःकरण के अनुरूप होती है। जैसे संस्कार उसके चित् पर मौजूद हैं, उसके अनुरूप उस व्यक्ति की श्रद्धा निर्मित होती है। मनुष्य का निर्माण उसकी श्रद्धा यानी उसके स्वभाव यानी उसके संस्कारों के अनुसार होता है।जैसे संस्कार, वैसा ही व्यक्ति।जैसे संस्कार,वैसी श्रद्धा। जैसे संस्कार, वैसा व्यक्तित्व। फिर आगे उस श्रद्धा को महर्षि वेदव्यास ने सात्विक, राजसिक और तामसिक प्रकार की कथन किया है।इस श्लोक की व्याख्या करते हुये शंकराचार्य,रामानुजाचार्य, श्री अरविन्द, ओशो रजनीश आदि सभी ने यह कहा है कि मनुष्य जो कुछ भी आज है; वह अपने संस्कारों, भावनाओं, विचारों, अनुभवों, स्मृतियों आदि का संग्रहमात्र है। और ये सब उस  मनुष्य के चित्त के गहरे तलों पर मौजूद हैं। इनसे स्वतंत्र होकर सोचना,विचारना, चिंतन करना,भाव करना, कल्पना करना तथा मैनीफैस्टेशन आदि करना इतना सरल नहीं है, जितना सरल सोशल मीडिया पर मौजूद मैनीफैस्टेशन करवाने वाले, काउंसलर,हीलर, हिप्नोटिस्ट और मनोचिकित्सक बतला रहे हैं।निज प्रकृति के विरोध में जाकर कुछ भी करना इतना सहज नहीं होता है। मनुष्य अपनी प्रकृति को साथ में लेकर जन्मता है। प्रकृति के बंधन को तोड़कर इसकी कारागार से बाहर आना केवलमात्र गहरे योगाभ्यास से ही संभव हो सकता है।ऐसा नहीं है कि श्वास को धीमा करके, किसी भी अनाप-शनाप विचार का रिपीटेशन करके, कल्पना करके,विज्युलाईजेशन करके और इसके साथ स्वयं के अहसास को जोड़ने से यह संभव हो जायेगा। यदि यह सब करना इतना सरल और सहज होता तो कोई भी ऐसा करके कुछ भी सफलता, पद, प्रतिष्ठा, प्रसिद्धि आदि पा लेता। इसके विज्ञान को यदि श्रीमद्भगवद्गीता, योग वाशिष्ठ, अष्टावक्र गीता और योगसूत्र के अनुसार समझा जाये,तो अनेक रहस्यों का उद्घाटन हो सकता है।

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