Saturday, November 7, 2026

यहां कोई किसी के लिये नहीं रोता


यहां कोई किसी के लिये नहीं रोता है। संसारीजन अपने सुख,सुविधाओं और सुरक्षा का रोना रोते हैं। माता-पिता,भाई -बहन, पति-पत्नी आदि में से किसी के भी बिमार होने, मरणासन्न होने या फिर देहावसान होने पर लोगों का रोने -धोने का ड्रामा देखने लायक होता है।वो आंसू और रोना -धोना केवल अपने लिये होते हैं।वो आंसू और रोना स्वार्थ से भरे हुये होते हैं।

 कितने ही परिवारों में किसी के माता-पिता के गंभीर रूप से बिमार होने या देहांत हो जाने पर जमीन, जायदाद,मकान, बैंक बैलेंस,जेवर आदि के लिये निकटतम संबंधियों को लड़ते, झगड़ते,सिर फुटौव्वल करते और कोर्ट कचहरी करते हुये देखा जा सकता है। 

औलाद के स्वार्थी व्यवहार से प्रताड़ित होकर अनेक घरों में बूढ़े माता-पिता वृद्धाश्रमों में रहने को विवश होते हैं। अनेक माता- पिता ऐसे हैं ,जो वृद्धाश्रमों में भी नहीं जा पाते हैं लेकिन अपमानित होते, भूखे प्यासे और बात- बात पर गाली -गलौज को सहन करते हुये घरों में ही रहने को विवश होते हैं। जायें तो जायें कहां? 

ऐसे माता- पिता के मरने पर भी संतानें रोने -धोने का नाटक करती
हैं। जीते जी माता -पिता को अच्छी तरह खाना नहीं खिलाया और मरने के बाद मृत्यु भोज का आयोजन होता है।यह सब भी औलादें माता -पिता के लिये नहीं अपितु अपने खुद के सम्मान, बड़ाई और प्रसिद्धि के लिये करती हैं।

जितनी घृणित सच्चाई किसी औलाद के बारे में है, उतनी ही घृणित सच्चाई माता -पिता के संबंध में भी है। माता-पिता भी संतानोत्पत्ति खुद की सेवा करवाने, बुढ़ापे में सहारा बनने,वंश आगे बढ़ाने और निज तृप्ति के लिये करते हैं। 

यदि उन्हें पहले ही यह मालूम हो जाये कि उनकी संतान किसी भी हालत में बुढ़ापे में उनका सहारा नहीं बनेगी,सारी संपत्ति को बेच खायेगी तथा उन द्वारा वंश बेल बढ़ाने का कोई औचित्य नहीं है;तो कोई भी माता -पिता संतानोत्पत्ति नहीं करेंगे।विवाह तो कामवासना की पूर्ति के लिये करेंगे लेकिन संतानोत्पत्ति से बचकर रहेंगे।

संसार स्वार्थ आधारित है।सब अपने स्वार्थ के लिये पुरुषार्थ कर रहे हैं।वह स्वार्थ किसी भी रूप में हो सकता है।वह स्वार्थ निज संतुष्टि और तृप्ति भी हो सकता है।इसीलिये यह कहना सच है कि कोई किसी के लिये नहीं रोता है, अपितु सभी अपने लिये रो रहे हैं।बात सुनने में अहंकार को ठेस पहुंचाने वाली है, लेकिन पूरी तरह से वास्तविक है।

संसारियों का यह संसार प्रेम से नहीं अपितु स्वार्थ के धागे से जुड़ा हुआ है।जिस डोर ने संसारियों को परस्पर बांधा हुआ है,वह डोर स्वार्थ से निर्मित है।

संसार में कितने व्यक्ति ऐसे हैं,जो प्रेमवश और करुणावश एक -दूसरे पर अत्याचार करने से बचते हैं? एक- दूसरे का सामान चोरी करने से बचते हैं।एक दूसरे की बहन -बेटी का सम्मान करते हैं।ऐसे संवेदनशील व्यक्ति बहुत कम मिलेंगे। ऐसे व्यक्ति विरले ही होते हैं। यदि आपकी नजर कोई ऐसा व्यक्ति हो तो उसके पास बैठकर उससे जीवन की सीख अवश्य ले लेना।उसका सत्संग अवश्य करना।

इनके सिवाय सभी व्यक्ति स्वार्थवश या भयवश एक दूसरे के काम आते हैं।एक -दूसरे का ख्याल रखते हैं। मुसीबतों में एक- दूसरे की मदद करते हैं। मैं किसी के काम आऊंगा तो दूसरे मेरे काम आयेंगे।यह एक शुद्ध सौदा है। जीने के लिये यह आवश्यक है।

समाज -दर्शन में इसी को तो 'समाज' कहा गया है। संसारियों के लिये समाज एक समझौता होता है। इसमें अध्यात्म आदि को घुसेड़ना मूल समस्या से मुंह चुराना कहा जायेगा। आचारशास्त्र में इसका खूब गुणगान हुआ है। इथिक्स आचारशास्त्र का ही विकृत रूप है।

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