Saturday, November 19, 2022

 कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में आयोजित राष्ट्रीय कांफ्रैंस में आचार्य शीलक राम के वृहद् ग्रन्थ ‘दर्शनामृत’ का विमोचन (Release of Acharya Shilak Ram's big book 'Darshanamrit' in the national conference organized in Kurukshetra University.)


    सांसारिक जीवन परस्पर आदान-प्रदान, लेन-देन, सहभागिता, सौहार्द, भाईचारे एवं सेवाभाव से चलता है । मानव प्राणी के साथ-साथ पशु-पक्षी, जलचर, थलचर, नभचर, पेड़-पौधे, जंगल आदि भी परस्पर सहभागिता एवं आदान-प्रदान से अपना जीवन-यापन करते हैं । यहां तक कि पहाड़, नदियां, झीलें, झरने, तालाब आदि भी परस्पर लेन-देन पर चलते हैं । पंचभूतों के इस संसार में कुछ भी ऐसा नहीं हैं जो अस्तित्व से टूटा हुआ अकेला हो । जड़-चेतन जगत् सब कुछ एक माला के मनकों की तरह अस्तित्व के धागे में पिरोया हुआ होता है । जहां भी व जिस भी समय इस कड़ी में कोई व्यवधान या रूकावट या टूटन आई तो वहीं पर शोषण, विकार व कमियां प्रवेश करना शुरू कर देंगी । समकालीन युग में यदि ध्यान से चहुंदिशि नजर दौड़ाई जाए तो मानव प्राणी ने अपनी स्वार्थपूर्ति, उन्मुक्तभोग एवं पद-प्रतिष्ठा की तृष्णा को पूरा करने के लिए शाश्वत सनातन जीवन-मूल्यों को तोड़ना शुरू कर दिया है । आधुनिकता एवं विकास की अंधी दौड़ ने मानव प्राणी को इतना स्वार्थी एवं यूज एण्ड थ्रो की विचारधारा वाला बना दिया है कि इसको अपने सिवाय किसी का भी हित दिखलाई नहीं पड़ता है । मानव की इस कभी पूरी नहीं होने वाली अन्धी तृष्णा की चिकित्सा सिर्फ हमारे आदरणीय योगियों, महर्षियों, सन्तों एवं धर्मगुरुओं के पास है - बशर्ते ये वास्तविक योगी, महर्षि, सन्त व धर्मगुरु होने चाहिएं । हरियाणा में धर्मनगरी के नाम से प्रसिद्ध गीता की उपदेश-स्थली कुरुक्षेत्र के चूहड़माजरा गांव में एक ऐसे ही सनातनी सन्त ने जन्म लिया था । सम्पूर्ण भारत में आपको जगद्गुरु स्वामी ब्रह्मानंद कुरुक्षेत्री के नाम से जाना जाता है । आपकी वाणियों को केन्द्र में रखकर इनकी सार्वभौमिक महत्ता को ध्यान में रखते हुए दर्शन-विभाग, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ. शीलक राम ने एक वृहद्काय ग्रन्थ ‘दर्शनामृत’ का लेखन किया है । प्रस्तुत इसी ग्रन्थ ‘जगद्गुरु स्वामी ब्रह्मानन्द वाणी दर्शनामृत’ का लोकार्पण आज दर्शन-विभाग कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरुक्षेत्र में आयोजित राष्ट्रीय कांफ्रैंस के दौरान किया गया । इस अवसर पर विश्वविद्यालय डीन एकेडेमिक अफेयर्स प्रो॰ मंजूला चैधरी, प्रसिद्ध दार्शनिक प्रो॰ हिम्मत सिंह सिन्हा, आईसीपीआर के पूर्वाध्यक्ष एस॰ आर॰ भट्ट, प्रो॰ पंकज श्रीवास्तव, पंजाब विश्वविद्यालय से प्रो॰ सैबेस्टियन, दर्शन-विभागाध्यक्षा प्रो॰ अनामिका गिरधर, प्रो॰ सुरेन्द्र कुमार, डीडीई से प्रो॰ कुलदीप, प्रो॰ अशोक कुमार, प्रो॰ सचिन, देश-प्रदेश से आए हुए शोधार्थी एवं छात्र उपस्थित रहे । प्रस्तुत वृहद्काय 800 पृष्ठ के इस ग्रंथ में जगद्गुरु स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती के जीवन एवं जीवन-दर्शन को विस्तार से समझाया गया है । आचार्य शीलक राम की इससे पहले 47 पुस्तकों का प्रकाशन हो चुका है ।


Thursday, August 11, 2022

घूंघट

 

घूंघट भारत देश की,

परम्परा पहचान।,

इससे सुंदरता बढ़े,

बढे प्यार की आन।।,,

 

संस्कार इससे जुड़े,

नारी लगे सुजान,,

गीता वेद पुराण में,

इसका है गुणगान।।

 

घूंघट जो नारी करे,

वह पाए सम्मान।

वह समाज में देश में,

पाए हर इक आन।।

 घूंघट में आंखें लगें,

सुंदर तीखे तीर,

होंठों की मुस्कान से

हार जाय शमशीर।।

 

चहरा लगता चांद सा,

लाल टमाटर गाल।

घूंघट के कारण बने,

गोरी माला माल।।

 

बृंदावन राय सरल सागर एमपी

मोबाइल 7869218525

कवि शायर साहित्यकार

94पोददार कालोनी राय भवन

सागर मध्यप्रदेश भारत

Tuesday, July 26, 2022

गीतोपदेश

     गीतोपदेश भी भय को केन्द्र में रखकर दिया गया उपदेश है। अर्जुन युद्ध के मैदान से भाग क्यांे जाना चाहता था? अर्जुन को ऐसा क्या हो गया था कि वह अपने बन्धु-बांधवों का युद्ध में सामना न करके संन्यासी हो जाने की जीवन-शैली को पंसद करने लगा? जिन बंधु-बांधवों को अर्जुन ने इससे पहले कई बार युद्धों में हराया था, आज महाभारत के युद्ध में अर्जुन उन्हीं बन्धु-बांधवों का सामना क्यों नहीं करना चाहता? पाण्डवों का सब कुछ छिन लिए जाने के बावजूद भी अर्जुन अपने सामने खड़े युद्ध-पिपासु धूर्त सगे-संबंधियों को क्षमा करके ज्ञानमार्ग, संन्यास, अहिंसा, करुणा, क्षमादि की बातें क्यों कर रहा है? अर्जुन जैसा विश्व-प्रसिद्ध महारथी स्वयं अपने, अपने भाईयों, अपने माता-पिता, अपने परिवार, अपने समाज, अपने राष्ट्र, अपने धर्म, अपनी सस्ंकृति के अपमान को होते हुए कैसे देख सकता है? अर्जुन के पैर कम्प रहे हैं- गला सुख गया - चक्कर आ रहे हैं - अंगों में पसीना आ रहा है- बुद्धि कार्य करना छोड़ चुकी है - वह खड़ा रहने में भी अशक्त है। इस सबका कारण भय ही तो है। निर्भयता को सिद्ध करने वाला अर्जुन आज युद्ध के मैदान पर भयभीत है। इससे अधिक अविश्वसनीय, अकल्पनीय, चिंतनीय अन्य क्या हो सकता है कि अर्जुन जैसे यद्धु-महारथी भी युद्ध के मैदान को छोड़ने के बहानों की तलाश करने लगे तथा इसी के चहुंदिशि एक पूरा दर्शनशास्त्र खड़ा करने की असफल कोशिश करे? अर्जुन की उस कोशिश को असफल इसलिए कहा गया है क्योंकि अर्जुन ने श्रीकृष्ण की मदद से उसको सफल नहीं होने दिया। जबकि गांधी-विनोबा जैसे लोग अपनी इस प्रकार की कोशिश में सफल नहीं हो पाए तथा भारत को एकतरफा अहिंसा, करुणा, सद्भाव, क्षमा, भाईचारे, दब्बूपन एवं भीरूता के गड्ढों में धकेल दिया। गांधी-विनोबा को योग्य गुरु नहीं मिले लेकिन अर्जुन सौभाग्यशाली था कि उन्हें गुरु या सखा के रूप में स्वयं श्री कृष्ण जैसी
    विराट चेतना का साहचर्य उपलब्ध हुआ। वैसे कुछ भी हो लेकिन अपने लोगों से हिंसक लड़ाई सिर्फ राजा-महाराजा ही लड़ सकते हैं। किसान-मजदूर के लिए तो सबसे भला रास्ता गांधी-विनोबा का अहिंसक रास्ता ही है। पिछले दस महीने से किसान ऐसा ही कर रहे है हैं। पूरा का पूरा गीतोपदेश भय व अभय, भयभीत व निर्भयता, पलायन और डटकर मुकाबला करने, भीरूता व जुझारूपन, भाग जाने व दो-दो हाथ करने, कबूतर की तरह आंखें बंद कर लेने व आंखें खोलकर मौजुदा परिस्थितियों का मुकाबला करने पर केन्द्रित है। यदि अर्जुन भय, मोह, संदेह, संशेय व राग में पड़कर युद्ध से पलायन किए जाने की बातें न करता तो श्रीकृष्ण को अठारह अध्याययुक्त गीतोपदेश देने की जरूरत ही क्यों पड़ती? अर्जुन को यह भय हुआ और श्रीकृष्ण ने गीतोपदेश दिया जो कि आज समस्त विश्व के सामने है। लेकिन यदि वास्तव में ही अर्जुन श्रीकृष्ण के ‘निष्काम-कर्म’ के गीतोपदेश को न मानकर युद्ध के मैदान को छोड़कर चले जाते तो क्या फिर भी गीतोपदेश हमारे लिए व समस्त विश्व के लिए उतना ही महत्त्वपूर्ण होता, जितना कि आज है? शायद बिल्कुल भी नहीं। अर्जुन का भय, मोह, संदेह, रागादि अर्जनु के साथ ही मौजदु रहते तथा अर्जुन व उनके पारिवारिक जन को कहीं का भी नहीं छोड़ते। ‘अभय’ हो जाने को भगवान् श्री कृष्ण ने गीता में (16/1) दैवी-सम्पदा का स्वामी होना माना है।
##आचार्य शीलक राम##