Thursday, January 15, 2026

खुलकर हंसना और रोना भी स्वास्थ्य के लिये आवश्यक है (Laughing and crying openly is also essential for health.)


यदि किसी को हर मुश्किल समय के बाद रोने का हूनर आता है,तो सच मानिये कि वह कैसी भी मुसीबत आने पर न तो उस मुसीबत से भागेगा,न हताश और निराश होगा तथा आत्महत्या नहीं करेगा।रोने से नकारात्मक ऊर्जा का रेचन हो जाता है। जैसे कूकर में सब्जी बनाते समय पीक बिंदु आते ही भांप का निकलना होता है।ठीक वैसे ही जब -जब कोई व्यक्ति किसी दुख, परेशानी, प्रताड़ना, ज़ुल्म, हताशा, कुंठा, तनाव आदि के दौरान ऊर्जा के अतिरेक से भर जाता है,तब -तब किसी समय पर उस ऊर्जा के अतिरेक से एकत्र हुई ऊर्जा को रोने के माध्यम से निकाल दिया जाये,तो बहुत अधिक राहत मिलती है।भविष्य के लिये जीने का आधार तैयार हो जाता है। लेकिन यह रोना किसी को दिखाने के लिये न होकर यदि एकांत में हो जाये,तो नकारात्मक ऊर्जा का रेचन शीघ्रता से हो जाता है।रोने के साथ हंसना भी इसमें सहायक हो सकता है। लेकिन हंसने की क्रिया अकेले में नहीं होनी चाहिये। इसके लिये मित्र, प्यारे,दोस्त,संगे, संबंधी, सहपाठी, सहयात्री आदि कोई भी हो सकते हैं कि जिनके संग हंसना चाहिये। रोना अकेले में और हंसना सबके बीच में। रोना भीड़-भाड़ से दूर होकर एकांत में तथा हंसना बिल्कुल लोगों के मध्य में। रोना और हंसना ये दोनों बहुत गहरे व्यायाम हैं,जिनका प्रभाव भौतिक शरीर,प्राणिक शरीर, मनस् शरीर और भाव शरीर तक होता है।पुरुष वर्ग नेज्ञअपमान के भय से रोना छोड़ दिया है, इसलिये उनमें गुस्सा और चिड़चिड़ापन भी बहुत अधिक मिलता है तथा आत्महत्या की औसत नारी वर्ग से अधिक है। पुरुषों पर नारी -वर्ग की बेवजह की प्रताड़ना, झूठे मुकदमों और नारी के लिये भेदभावपूर्ण एकतरफा अत्यधिक कानूनी अधिकार मिलने के कारण पिछले एक दशक के दौरान तो पुरुष -वर्ग ने विवाह -संस्था से भी किनारा कर लिया है। क्योंकि रोने को पुरुष- वर्ग की शान के खिलाफ माना जाता रहा है, इसलिये पुरुष- वर्ग ने अपना इंतजाम विवाह संस्था से दूरी बनाकर कर लिया है। हालांकि इससे भविष्य में सामाजिक ढांचे का तहश ननहश होकर सामाजिक अव्यवस्था का बढना शुरू हो जायेगा।इसका प्रभाव दिखने भी लगा है। मोबाइल, टीवी, वेश्याघर आदि भी कब तक पुरुष -वर्ग को राहत देने में सफल हो पायेंगे।इनकी भी अपनी एक सीमा होती है। एकांत में खुलकर रोना और अपने कहे जाने वालों के मध्य में हंसना ही जीवन जीने का एकमात्र रास्ता बचता है।क्रोध, बदले की भावना, कामुकता,वासना, अपमान, विफलता, तनाव, हताशा आदि के समय पर जब नकारात्मक ऊर्जा का अतिरेक महसूस हो, उसके कुछ समय के पश्चात् ही एकांत में खुलकर रोने से आंसुओं के माध्यम से सहजता को उपलब्ध किया जा सकता है। राजनीतिक, धार्मिक, व्यापारिक, शैक्षणिक आदि का सिस्टम तो इतना विकृत हो गया है कि कहीं भी सुख,शांति,संतुलन,संतुष्टि, तृप्ति का अहसास मिलने की संभावना न के बराबर है। ऐसे में जीवन जीने के लिये कुछ तो चाहिये,कि जिससे जीने का सहारा मिल जाये। ऐसे में रोना और हंसना सबसे उपयुक्त औषधि सिद्ध होते हैं।तो अब के पश्चात् जब भी किसी दुख,दर्द,धोखाधड़ी, विश्वासघात, अपमान आदि में सब कुछ फीका लगने लगे या आत्महत्या का विचार आने लगे या संसार से पलायन कर जाने का मन करे तो रोने और हंसने को अवश्य आजमाकर देखना। इसका प्रैक्टिकल करना आवश्यक है।

नकारात्मक ऊर्जा की अधिकता व्यक्ति के शरीर, प्राण,मन, बुद्धि, भावना आदि सभी स्तरों पर अव्यवस्था उत्पन्न कर देती है। व्यक्ति सतर्क रहे, इसके लिये झटका लगना आवश्यक है। लेकिन अधिक समय तक नकारात्मक ऊर्जा के प्रभाव में रहना व्यक्तित्व को असंतोष से भर देता है।रोना ऐसी अवस्था में राहत देने का काम करता है।यह रोना भीतर से होना चाहिये,दिखावे के लिये नहीं।ऐसी धारणा बनी हुई है कि रोना तो नारी का गुण है। पुरुषों के लिये रोना शोभा नहीं देता।जैविक दृष्टि से इसमें कुछ सच्चाई हो सकती है, लेकिन जो भी व्यक्ति किसी आवेग,संवेग या अति से ग्रस्त होता है, उसके लिये रोना औषधि का काम करता है।नर या नारी होने से कोई फर्क नहीं पड़ता। हां,यह आवश्यक है कि यदि सबके सामने रोना शुरू कर दोगे,तो यह उतना प्रभावी नहीं हो सके। इससे रोने को किसी व्यक्ति की कमजोरी मानकर उसके संबंध में गलत निर्णय लिये जा सकते हैं। और फिर सबके सामने खुलकर रोया भी नहीं जा सकता है। एकांत में यह क्रिया से आसानी से संपन्न होती है। एकांत में रोयें और खुलकर रोयें। देखें आप एकदम से कितना हल्का,निर्भार और ऊर्जावान महसूस करते हैं। प्रसिद्ध दार्शनिक और अध्यात्मिक महापुरुष आचार्य रजनीश ने तो इसके लिये एक ध्यान विधि ही बना रखी है।इस विधि को उन्होंने 'मिस्टिक रोज' नाम दिया है।एक घंटा खुलकर हंसना,एक घंटा खुलकर रोना तथा एक घंटा विश्राम करना।यह विधि काफी प्रभावी है। उन्होंने हंसने की क्रिया को दैवीय कृत्य कहकर इसकी भूरि -भूरि प्रशंसा की है। उदासी को उन्होंने आजकल के नकली धर्माचार्यों की विशेषता कहा है,तो हंसने को आध्यात्मिक गुण की संज्ञा प्रदान की है। व्यक्ति द्वारा दमित किये गये क्रोध, बदले की भावना, कामुकता, अतृप्ति, असंतोष, अपमान आदि की द्वारा बनी हुई ग्रंथियों को पिघलाने के लिये हंसना और रोना कारगर राहत का काम करते हैं। पाश्चात्य मनोविज्ञान ने भी इस पर काम किया है।

व्यक्ति जब पैदा होता है तो रोने को जीवन का चिन्ह माना जाता है। यदि बच्चा रोये नहीं तो सभी के लिये मुश्किल खड़ी हो जाती है। इसलिये जन्म के पश्चात् नवजात को हिला,डुला और थपथपाकर रुलाने की कोशिश की जाती है। नौ महीने के पश्चात् एकदम से माता के गर्भ में मौजूद सुरक्षित वातावरण से बाहरी अनजान वातावरण में आना बच्चे के लिये काफी कष्टकारी होता है। बाहरी परिवेश में संतुलन बनाने के लिये तकलीफ और संघर्ष करना पड़ता है। इससे उत्पन्न दुख, पीड़ा,भय आदि के आघात से मुक्ति पाने के लिये रोना आवश्यक है।इसका अर्थ है कि बच्चे ने संघर्ष को स्वीकार कर लिया है।जो बच्चे इस संघर्ष को स्वीकार नहीं करते हैं,वो पैदा होने से ठीक पहले, पैदा होते समय या पैदा होने के बाद में मर जाते हैं।पुरातन आयुर्वेद के ग्रंथों सुश्रुत,चरक, वागभट्ट आदि संहिताओं ने रोने को त्रिदोष के अंतर्गत वातप्रधान लक्षण माना है। भावनात्मक असंतुलन से उत्पन्न असंतोष के कारण वात के सहयोग से जल तत्व आंसुओं से बाहर निकलता है। इससे विजातीय विष को बाहर निकालने में सहायता मिलती है। व्यक्ति शांत,निर्भार और सहज महसूस करता है। मनोवैज्ञानिक फ्रायड रोने को दमित भावनाओं का लक्षण कहता है।एडलर इसे हीनभावना या सामाजिक जुडाव की कमी से जोड़कर देखते हैं।जुंग इसे अचेतन और चेतन मन के बीच संघर्ष तथा सामुहिक अचेतन मन से आनेवाले भावनात्मक दबावों के मुक्ति पाने की क्रिया के रूप में देखता है।

रोना और हंसना किसी भी प्रकार की मानसिकता, सामाजिक, नैतिक, आध्यात्मिक और दार्शनिक काउंसलिंग में सहायक क्रिया सिद्ध हो सकती है।बस, आवश्यक यह है कि इसके लिये सतत् अभ्यास, अनुशासन और अनुभव आवश्यक हैं। अधकचरी जानकारी लाभ की बजाय नुकसान का कारण बन सकती है। आजकल विभिन्न प्रकार की काउंसलिंग को वो लोग कर रहे हैं,जो स्वयं बिमार हैं। इन्हें स्वयं खुद को ही काउंसलिंग की त्वरित आवश्यकता है।रोने और हंसने को किसी असामान्य व्यक्ति की काउंसलिंग करने की एक सहायक क्रिया के रूप में प्रयोग किया जा सकता है। इनकी मदद से भावनात्मक ज्वार आंसुओं के माध्यम से या फिर हंसने के दौरान ठहाकों के माध्यम से बाहर निकल जाता है। व्यक्ति तरोताजा होकर किसी भी परिस्थिति का पूरी ऊर्जा से सामना करने के लिये तैयार हो जाता है। हरियाणवी क्षत्रिय जीवन- शैली में रोने को तो कोई स्थान नहीं है लेकिन परस्पर हंसी,मजाक, ठिठोली और ठहाकों को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है।शायद संसार में इतना हंसी मजाक कहीं भी नहीं होता होगा। उच्छृंखल एकतरफा पाश्चात्य भौतिकवादी जीवन-शैली का अंधानुकरण करने के कारण पिछले दो दशक से हरियाणवी जनमानस में हंसना,मजाक करना, चुटकुले आदि सुनना -सुनाना कम हो चुका है। लोगों की सहनशक्ति बहुत कम हो गई है। परस्पर वैमनस्य, बदले की भावना, टांगखिंचाई और ईर्ष्या की भावना में बढ़ोतरी होना विकास का नहीं अपितु पिछड़ेपन की निशानी है। ऐसे में हमें फिर से हंसी, ठिठोली और मजाक करने की जीवन-शैली पर वापस लौटना ही होगा।

 लंबे- लंबे,उदास  और गंभीर चेहरों से खुशी गायब हो जाती है।माना कि संसार में परेशानियां बहुत अधिक हैं। माना कि राजनीतिक सिस्टम ने हमें बर्बाद कर दिया है।माना कि हमारे यहां पाखंड, ढोंग, दिखावा और भ्रष्टाचार बहुत बढा हुआ है।माना कि हमारी शिक्षा - व्यवस्था दुनिया में सर्वाधिक पिछडी हुई है।माना कि बेरोजगारी ने युवावर्ग की कमर तोड दी है। लेकिन इन सबके बावजूद हम रोना और हंसना तो नहीं छोड़ सकते हैं। यदि हमें जीवित रहना है,तो अपनी शारीरिक - मानसिक जरुरत अनुसार हंसने और रोने को अपनी दिनचर्या में स्थान अवश्य दें। हंसना और रोना दोनों हमें गहरे तल तक प्रभावित करते हैं।बस, ध्यान यह रखें कि रोना कहीं घर के किसी कोने में या खेत में या कहीं भी एकांत में। जहां तक हंसने की बात है,जहां भी उचित मौका मिले, वहां पर अवश्य हंसना। लेकिन किसी के दुख,दर्द, परेशानी,टोटे,मौत या बुरे वक्त में बिल्कुल मत हंसना। सामाजिक दायित्व निभाना सबकी जिम्मेदारी है। समाज में आज भी किसी के  रोने को कमजोरी और हंसने को लड़कपन की निशानी मानते हैं। परस्पर संबंधों में धोखाधड़ी प्रचुरता से मौजूद है। पारिवारिक संबंधों में खटास है।पती पत्नी में भी अनबन रहती है।संतान भी धोखा देने के लिये तैयार है।तलाक की औसत हर साल बढ रही है।लिव इन रिलेशनशिप में बढ़ोतरी हो रही है।साल- छह महीने साथ व्यतीत करके जोडे कोर्ट में मुकदमे कर रहे हैं।नकली दहेज के मुकदमे दर्ज हो रहे हैं।राजनीतिक, प्रशासनिक,धार्मिक, आर्थिक,शैक्षिक, व्यापारिक, रोजगार,खेती-बाड़ी आदि की हालत बहुत खराब है। ऐसे विषम हालात में आपको प्रतिपल हंसने और रोने के लिये तैयार रहना चाहिये। जीने का यही एकमात्र आधार आपको विषम परिस्थितियों में जीवनेच्छा प्रदान करने में समर्थ है। वरना सांसारिक संघर्ष की चक्की में पिसते- पिसते बर्बाद हो जाओगे या फिर ऐसे ही असमय मर जाओगे।

............
डॉ. शीलक राम आचार्य 
दर्शनशास्त्र- विभाग 
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय 
कुरुक्षेत्र-136119

Saturday, December 6, 2025

दर्शनशास्त्र और जीवन : वैचारिक कट्टरता का विनाशकारी इतिहास (Philosophy and Life: The Disastrous History of Ideological Fanaticism)


'दर्शनशास्त्र' की किसी भी थ्योरी, सिद्धांत,मत या वाद पर वाद- विवाद करते हुये यह ध्यान रखा जाना आवश्यक है कि वह थ्योरी, सिद्धांत, मत और मत जीवन की विभिन्न सामाजिक, शारीरिक, व्यक्तिगत,पारिवारिक,प्राणिक, वैचारिक, मानसिक, भावनात्मक, आत्मिक आवश्यकताओं को किस सीमा तक संतोष प्रदान करता है।केवल तार्किक रुप से किसी घटना, व्यक्ति, वस्तु, स्थान, परिस्थिति को जांचना सही नहीं है।उस तार्किकता के साथ जीवन की विभिन्न आवश्यकताओं को भी समझना है। विभिन्न थ्योरीज़, सिद्धांत आदि जीवन और जगत् के लिये होते हैं,जीवन थ्योरीज और जगत् के लिये नहीं होता है। सामान्यतः बुद्धिमान लोग जीवन जीना भूल जाते हैं लेकिन थ्योरीज़ आदि का याद रखते हैं। विभिन्न थ्योरीज़ के लिये अपने जीवन को बर्बाद करने वाले इन तथाकथित बुद्धिजीवियों के कारण दुनिया में अनेक युद्ध तक हो चुके हैं।जिसकी जो थ्योरी है,वह इसके विरोध में कोई भी तर्क या प्रमाण मानने को तैयार नहीं होता है।इस प्रकार की कट्टरता और अंधभक्ति दर्शनशास्त्र जैसे विषय के लिये शर्म, अपमान और उपहास की बात है।पश्चिम में फिलासफी के अंतर्गत भौतिकवाद,परमाणुवाद,परिवर्तनवाद,अज्ञेयवाद, संदेहवाद, बुद्धिवाद,अनुभववाद, समीक्षावाद, प्रत्ययवाद, इन्द्रियानुभववाद, वस्तुस्वातंत्र्यवाद,नारीवाद, मार्क्सवाद, विकासवाद,बहुसंस्कृतिवाद, उच्छृंखल भोगवाद, अवसरवाद, बांटो और शासन करो, इस्तेमाल करो और फेंक दो आदि सैकड़ों थ्योरीज़, सिद्धांत,वाद,मत, विचारधाराएं पिछले 2500 वर्षों के कालखंड में अस्तित्व में आये हैं। इनमें से कयी थ्योरीज को आधार बनाकर यूरोपियन देशों ने समस्त धरा के देशों पर समय- समय पर आक्रमण करके उनको लूटा, वहां पर नरसंहार किये, मतांतरण करवाया तथा तानाशाही से शासन भी किया है।एकेश्वरवाद,पैगंबरवाद,खलीफावाद आदि की थ्योरीज से अरब जगत् प्रभावित रहा है। और इसकी आड़ में अनेक अरबी कबीलों के खूंखार सरदारों ने एशिया, यूरोप और अफ्रीका के बहुत से देशों में अपना दमन,मतांतरण और तानाशाही कुचक्र कायम किया।ये सारे के सारे बेशक अनपढ़, मूर्ख,उज्जड,जंगली और पाशविक थे, लेकिन फिर भी किसी न किसी थ्योरी या मत या विचारधारा या जीवनशैली को कट्टरता के साथ लेकर चल रहे थे।जिसको जैसा अच्छा लगता हो,वह वैसा ही करे, लेकिन इसे दूसरों पर जबरदस्ती करके,तलवार के भयाक्रांत करके,पवित्र पुस्तक का प्रलोभन देकर और किसी पैगंबर के नाम पर थोपना मानवता नहीं अपितु जंगलीपना और राक्षसपना है।भारत में बौद्ध,कापालिक,तांत्रिक आदि ने भी कुछ समय के लिये ऐसा कुकृत्य करने का प्रयास किया था और सनातन भारतीय धर्म और संस्कृति को बहुत नुक्सान भी पहुचाया था, लेकिन उस समय पर मौजूद सनातनी मंडननमिश्र,कुमारिलभट्ट, गौडपादाचार्य,शंकराचार्य आदि के आगे वो अधिक आगे तक सफल नहीं हो पाये थे। बौद्ध मत को छोड़कर किसी ने भी विदेशी धरती पर शासन या आक्रमण या मतांतरण या कन्वर्जन या अत्याचार या विध्वंस आदि नहीं किये थे। दुनिया की सबसे पुरानी ज्ञान पुस्तक वेद में ही केवल सृष्टि उत्पत्ति के संबंध में ही बारह सिद्धांत मौजूद हैं, लेकिन वो परस्पर झगडे झांसे या अत्याचार या दमन या मतांतरण आदि का कारण नहीं बने। ऋग्वेद के नासदीय और पुरुष सूक्तों के आधार पर प्रसिद्ध वैदिक विचारक मधुसूदन ओझा ने सृष्टि उत्पत्ति के संबंध में ही दस सिद्धांत बतलाये हैं। बाकी विषयों के संबंध में भी सिद्धांतों की भरमार है।एक बार सृष्टि सिद्धांतों को देखिये -

सद्सद्वाद,रजोवाद,व्योमवाद, अपरवाद, आवरणवाद, अम्भोवाद, अमृतमृत्युवाद, अहोरात्रवाद, दैववाद, संशयवाद।
यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि इस धरती पर विभिन्न थ्योरीज, सिद्धांत,वाद,मत आदि के कट्टर समर्थकों ने जितना विध्वंस,विनाश, मतांतरण, ज़ुल्म, अत्याचार किया है,उतना शायद किसी ने नहीं किया होगा। अब्राहमिक मतवादी इसमें शिरोमणि कहलाते हैं। और तो और विज्ञान भी पिछले 250 वर्षों के दौरान इनकी इसी कट्टरता और अंधभक्ति के कारण विध्वंस,विनाश और भेदभाव का कारण बनता जा रहा है।

डॉ. शीलक राम आचार्य
दर्शनशास्त्र-विभाग
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र
(हरियाणा)

शरीर के उत्सव में खोती आत्मा (The soul lost in the celebration of the body)

अब्राहमिक फैमीनीज्म से प्रेरित और पल्लवित अभिनेत्रियां,योग -शिक्षिकाएं,एयर होस्टेस,रिसैप्निस्ट, प्रबंधन क्षेत्र में कार्यरत युवतियां, नृतकियां, विश्वविद्यालयीन लड़कियां, सोशल मीडिया पर अर्धनग्न होकर रील बनाकर डालने वाली लड़कियां बोल्डनैस का मतलब नग्न होना मानती हैं। जिसके शरीर पर जितने कम कपड़े होंगे, उसे उतना ही अधिक बोल्ड माना जाता है।

बोल्डनैस को नग्नता,उघाडेपन और अंग -प्रदर्शन से जोड़ दिया गया है। बोल्डनैस को शरीर की कामुक मुद्राओं से आंका जा रहा है।नारी के शरीर पर जितने कम वस्त्र होंगे,वह उतनी ही अधिक बोल्ड, सुंदर और बोल्ड दिखेगी।
यदि इस प्रकार के अंग-प्रदर्शन,उघाडेपन और कामुक मुद्राओं को ही बोल्डनैस माना जायेगा तो फिर पुरुषों को भी ऐसा ही करना चाहिये। पुरुषों को भी ऐसा ही करना चाहिये। पुरुषों को भी बोल्ड क्यों नहीं होना चाहिये?बोल्डनैस का पैमाना लड़कियों और लड़कों के लिये भिन्न भिन्न क्यों है? 
क्या पुरुषों के पास नग्न और उघाडा होकर दिखाने के लिये कुछ भी नहीं है?यह आश्चर्यजनक है कि यदि कोई लड़का उघाड़ा होता है,तो वह असभ्यता और फूहड़ता माना जाता है लेकिन लड़कियों के संबंध में इसका बिल्कुल विपरीत है। लड़कियों के लिये नग्नता और उघाडापन सौंदर्य का प्रतीक बन गया है।
लड़की हो या लडका हो-उघाडा होकर वो क्या दिखाना और क्या छिपाना चाहते हैं? इसका क्या रहस्य है? कुछ तो ऐसा जरूर है, जिस पर कोई भी खुलकर बोलना नहीं चाहता है। यदि कोई बोलने का दुस्साहस करे भी तो उस पर सभी नग्नता समर्थक और नैतिकता समर्थक टूट पड़ते हैं। लगता है कि ये दोनों वर्ग इस नग्नता की आड़ लेकर अपनी दमित ऊर्जा का रेचन करके राहत महसूस करने पर लगे हुये हैं।
सोचने की बात यह भी है कि यदि नग्नता और उघाडापन ही सौंदर्य या बोल्डनैस या प्रतिभा का आंकलन है,तो ऐसे में तो गधे, कुत्ते, बिल्ली, सुअर, भैंस, झोटे आदि पशु अधिक बोल्ड, सुंदर और प्रतिभाशाली हैं।
लगता है कि अपने खालीपन, अपने अकेलेपन, अपने तनाव,अपनी हताशा और अपनी चिंता को युवाशक्ति -वर्ग अपनी और अन्यों की कामुकता को उत्तेजित करके उससे राहत पाना चाहते हैं। इन सबके आगे, पीछे,ऊपर, नीचे और बीच में सर्वत्र उच्छृंखल कामुकता प्रधान हो गई है।आहार निद्रा,भय और मैथुन किसी भी प्राणी के लिये आवश्यक होते हैं, लेकिन इस तरह से इन्हीं में डूबकर जीवन जीना पशुओं के लिये सही कहा जा सकता है, मनुष्य प्राणी के लिये नहीं।
पिछले कुछ दशकों से यह इस प्रकार की जीवन- शैली अवगुण की जगह  गुण में परिवर्तित हो गई है।इसे फैशन या आधुनिकता या आजादी या समान अधिकार कहकर महिमान्वित किया जा रहा है।
 व्यापार, राजनीति, उद्योग- धंधों,कोरपोरेट -घरानों,होटल- व्यवसाय, फिल्म -उद्योग, धर्म,योग,कथा, सत्संग, जागरण, शिक्षा, परिवहन और विज्ञापन आदि सभी क्षेत्रों के चालाक लोगों ने महिला- वर्ग की इस नग्नता और उघाडेपन को अपने व्यापारिक हित साधने का जरिया बना लिया है।
आज किसी को कुछ भी बेचना हो तो वह विज्ञापन के रूप में महिलाओं की नग्नता और उघाडेपन का सहारा लेता है। चतुर और धूर्त लोग रुपया कमा रहे हैं लेकिन बहुसंख्यक जनमानस का जमकर शोषण हो रहा है। नैतिकता,जीवन-मूल्य, सात्विकता, सरलता,सहजता,संयम, अनुशासन आदि जायें भाड़ में।


डॉ. शीलक राम आचार्य
दर्शनशास्त्र- विभाग
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र (हरियाणा)

Saturday, November 8, 2025

सनातन धर्म, संस्कृति और दर्शनशास्त्र को सबसे बड़ा खतरा (The biggest threat to Sanatan Dharma, culture and philosophy)

 सनातन धर्म, संस्कृति और दर्शनशास्त्र को सबसे बड़ा खतरा 
सनातन धर्म और संस्कृति को फिलहाल सबसे बड़ा खतरा हिंदुओं से ही है। जरथुष्ट्र से लेकर मूसा,ईसा, मुहम्मद, सिद्धार्थ गौतम आदि के अनुयायियों और अब हिंदू हितकारी कहे जाने इन ढोंगियों तथा साम्यवादियों और नवयानियों से खतरा बना रहता आया है।साईरस, सिकंदर,कासिम,गौरी, गजनी, अब्दाली, चंगेज, नादिर,बाबर, हुमायूं, शाहजहां, औरंगजेब, अकबर, कार्नवालिस, मैकाले आदि अब्राहमिक हमले पिछले 3000 वर्षों से होते आ रहे हैं। उपरोक्त सभी अब्राहमिक मजहबी थे तथा अब्राहमिक मजहबों के प्रचार-प्रसार के लिये तथा आर्थिक लूट के लिये हमले किये गये थे। फिलहाल भारत पर और सनातन धर्म और संस्कृति पर हो रहे हमले करने वाले कोई बाहरी हमलावर ने होकर हिंदू हितकारी कहे जाने वाले अंधानुयायी हैं। इन्होंने अपनी पहचान को छिपा दिया है।भारत, सनातन धर्म और सनातन संस्कृति को अब्राहमिक कहे जाने बाहरी हमलावर तो पूरी तरह से बर्बाद नहीं कर पाये थे। लेकिन फिलहाल जो खतरा सनातन धर्म और संस्कृति पर हो रहा है,वह पहले वाले हमलों से भी घातक है। इस समय अपने आपको सनातनी कहकर ही सनातन को बर्बाद करने मे लगे हुये हैं। सनातन धर्म और संस्कृति पर हो रहे इस हमले को सनातनी जनमानस भी समझ नहीं पा रहा है। आर्यसमाज से थोडी आशा थी कि वह ढाल बनकर खड़ा होगा लेकिन महर्षि दयानंद सरस्वती के कुछ समर्पित शिष्यों को छोड़कर यह संगठन भी इन नकली हिंदू हितकारियों के झांसे में फंसकर रह गया है।इन नकली हिंदू हितकारियों का साथ एक तरफ तो अब्राहमिक मजहब दे रहे हैं, दूसरी तरफ भारत के कुछ अमीर घराने सहयोग कर रहे हैं तथा तीसरी तरफ अनेक नकली शंकराचार्य, महामंडलेश्वर, स्वामी, संन्यासी, सद्गुरु आदि सहयोग कर रहे हैं। सामुहिक रूप से कोई भी संगठन सनातन धर्म और संस्कृति के रक्षार्थ फिलहाल प्रस्तुत नहीं है। हां, व्यक्तिगत रूप से अनेक विचारक, सुधारक, विद्वान, दार्शनिक तथा कुछ छोटे स्तर के संगठन अवश्य प्रयासरत हैं।वो सभी अपनी जान पर खेलकर प्रयासरत हैं।इसी क्रम में महर्षि दयानंद सरस्वती, स्वामी श्रद्धानंद, सुभाष चन्द्र बोस, बिस्मिल, भगतसिंह, अशफाक,राजीव भाई दीक्षित जैसे कयी महापुरुष अपना बलिदान दे चुके हैं। वांगचुक जैसे राष्ट्रवादी लोग भी राष्ट्रभक्त होने की सजा भुगत रहे हैं।

अब्राहमिक सोच का अंधानुकरण करने वाले नकली हिंदू हितकारियों ने पिछले दशक में पता नहीं कितने समकालीन वैदिक स्वामी दयानंद सरस्वती, राष्ट्रवादी इतिहासकार धर्मपाल, स्वदेशी राजीव भाई दीक्षित को छीन लिया है। वैसे तो आजादी के पश्चात् ही यह दुष्ट परंपरा साम्यवाद और नवयान की आड़ में शुरू हो गई थी लेकिन पिछले एक दशक के दौरान  सनातन धर्म और संस्कृति पर जो हमले हुये हैं, उन्होंने अब्राहमिक,नवयानी और साम्यवादियों के सम्मिलित रुप को भी पीछे छोड़ दिया है।बचे खुचे सनातन धर्म और संस्कृति को बर्बाद करके अपनी सत्ता कायम करने के लिये इन्होंने नकली शंकराचार्य,ढोगी संत,शोषक स्वामी, कपटी संन्यासी और व्यापारी योगाचार्य पैदा कर दिये पैदा हैं। विश्वविद्यालयों के शीर्ष पर अनपढ़ और पाखंडी लोगों को बैठा दिया है। सरकार सहायता प्राप्त अकादमियों और पीठों द्वारा जी- हुजूरी और चापलूसी करने वाले सम्मानित हो रहे हैं और मौलिक प्रतिभाशाली विचारक उपेक्षित किये जा रहे हैं।मुगल दरबारी चारण और भाटों के समकक्ष चापलूसों की पुस्तकें पुरस्कृत हो रही हैं जबकि जमीनी वास्तविकता को अभिव्यक्ति देने वाली राष्ट्रवादी पुस्तकों को रद्दी की टोकरी में फेंक दिया जा रहा है। ऐसे सनातन धर्म और संस्कृति विरोधी कुकृत्य करके भारत को विश्वगुरु बनाने का ढिंढोरा पीटा जा रहा है। यदि कोई इन कुकृत्यों का विरोध करे तो उसे देशद्रोही और सनातनद्रोही कहकर गालियां दी जा रही हैं। जाति, क्षेत्र, भाषा के नाम से भारत को बांटने के जितने घृणित प्रयास इस समय चल रहे हैं,इतने घृणित प्रयास शायद सभी अब्राहमिक संगठनों ने मिलकर पिछले 3000 वर्षों के दौरान किये होंगे।

 सर्वधर्मसमभाव क्या है? सर्वमतसमभाव क्या है?'धर्म' के साथ सर्व लगाना अपने आपमें महामूर्खता है।धर्म अनेक थोडे ही होते हैं। धर्म तो एक ही होता है। यदि सर्वमतसमभाव सही है तो यह सबके लिये यानी पारसी, यहुदी, ईसाई, इस्लाम, जैन,बौद्ध के लिये भी है या केवल हिन्दू मतानुयायियों के लिये ही है?सच तो यह है कि इस अवधारणा का सबसे अधिक नुकसान हिंदू को ही हुआ है। पारसी, यहुदी, ईसाई, इस्लाम, जैन,बौद्ध आदि को इसका अधिक नुकसान नहीं हुआ है। हिंदू को छोड़कर सभी मत हमलावर मन :स्थिति के रहे हैं।पूरी दुनिया को फतेह करके अपने अपने मत में दीक्षित करके अपना सांप्रदायिक,मजहबी और राजनीतिक साम्राज्य स्थापित करना इनका एकमात्र लक्ष्य रहा है। पिछले 3000 वर्षों से आर्यधर्मी रक्षात्मक होकर जीवन जी रहे हैं।आज भी स्थिति में कोई अधिक बदलाव नहीं हुआ है।इसीलिये आज भी आर्यधर्मी या सनातनधर्मी या वैदिकधर्मी सर्वाधिक असुरक्षित है।जब से इन्होंने हमलावर और रक्षात्मक शक्तियों में संतुलन बनाना बंद करके एकतरफा सर्वमतसमभाव का जीवन जीना शुरू किया है तभी से ये रक्षात्मक होकर रह गये हैं।ऐसी विषम स्थिति में सनातन या आर्य या वैदिक धर्म तो बचेगा लेकिन इसको आचरण में उतारने वाला इस धरती पर कोई नहीं बचेगा। सीधा सा तर्क है कि यदि यदि सभी मत समान हैं तो फिर आपको पारस, यहुदी, ईसाई, इस्लामी, जैन, बौद्ध आदि अपने अपने मतानुसार आज तक दूसरे देशों पर जो भी आक्रमण,हिंसा,मारकाट, नरसंहार , मतांतरण, युद्ध, बलात्कार, लूटपाट आदि करते आये हैं,उस सबको आपको जायज मानना होगा। क्यों? क्योंकि यह सब करने उनके मतानुसार सही है।उन द्वारा किये गये हरेक अमानवीय कृत्य को आपको मानना ही होगा, क्योंकि आप सर्वमतसमभाव को मानते हो।हां, यदि आप भीतर से कुछ और बाहर से कुछ अन्य हो,तो फिर आप कुछ भी कर सकते हो। लेकिन यह तो धर्मानुसार नहीं है।यह दुर्व्यवहार संप्रदाय अनुसार या मजहब अनुसार या मत अनुसार ठीक हो सकता है लेकिन धर्मानुसार नहीं। धर्म तो भीतर और बाहर से एक समान व्यवहार की सीख देता है।इसीलिये सर्वमतसमभाव की अवधारणा में फंसकर हिंदू ने अपने पैरों पर खुद ही कुल्हाड़ी से वार करके अपने ही पैरों को काट डाला है। भारत में विवेकानंद, प्रभुपाद, गांधी, परमहंस योगानंद, हेडगेवार आदि लोग तथा आजकल के अधिकांश शंकराचार्य, महामंडलेश्वर, स्वामी, संन्यासी, मुनि, योगाचार्य, सुधारक , राजनीतिक दल और नेता लोग आदि सभी इस सर्वमतसमभाव के भंवरजाल में फंसकर सनातन धर्म, दर्शनशास्त्र और संस्कृति को लुप्तप्राय: करने में सहयोगी बन रहे हैं।

 भारत में सनातन से ही 'मत' या 'संप्रदाय' बनाने की परंपरा धर्मानुसार रही है। लेकिन इस परंपरा को खंडित करने का कार्य सर्वप्रथम शंकराचार्य के शिष्यों ने उपनिषदों,ब्रह्मसूत्र, श्रीमद्भगवद्गीता को प्रस्थानत्रयी घोषित करके शुरुआत की। उन्होंने यह सिद्ध करने के लिये कि केवल अद्वैतवाद सही है और बाकी सब कुछ गलत है, हजारों ग्रंथों की रचना कर डाली। इसकी प्रतिक्रियास्वरूप विचारकों ने विशिष्टाद्वैतवाद, शुद्धाद्वैतवाद,द्वैताद्वैत वाद, अचि़त्ंयभेदाभेदवाद, शक्त्याद्वैतवाद, ध्वन्याद्वैतवाद आदि मत खडे हो गये तथा हरेक ने उपरोक्त तीन ग्रंथों उपनिषदों, ब्रह्मसूत्र और श्रीमद्भगवद्गीता से अपने अपने मतों को सही तथा बाकी को गलत सिद्ध करना शुरू कर दिया। इनकी इस वैचारिक कबड्डी में सनातन धर्म, दर्शनशास्त्र और संस्कृति के मूल स्रोत ग्रंथों वेदादि को बिल्कुल भूला दिया गया।हरेक संप्रदाय खुद को सही और बाकी को गलत कहकर परस्पर सभी को गलत ही सिद्ध करने का प्रयास कर रहा था।इस दुषित परंपरा ने आर्य या वैदिक या सनातन धर्म,दर्शनशास्त्र और संस्कृति को भारतीयों के जीवन से ओझल कर दिया है। भारत में सभी स्थानों पर पाखंडी,शोषक और पद- प्रतिष्ठा के लोभी बाबाओं की बाढ़ आई हुई है। नेता और अमीर घराने अपने लाभ के लिये इन बाबाओं का खूब दुरुपयोग कर रहे हैं। भारत के अधिकांश बाबा अपने आपको परमात्मा मानकर पूजा करवा रहे हैं। व्यक्तिवादी अनेक परमात्मा उत्पन्न हो गये हैं।ये पहले तो अब्राहमिक मजहबों की तरह मजहबी बने तथा बाद में अपने आपको ही परमात्मा मानने लगे हैं।ये सारे मिलकर सनातन धर्म,दर्शनशास्त्र,संस्कृति से ही उपदेश चुराते हैं और फिर इसी में कमियां निकालकर गालियां देने लगते हैं। पारसी, यहुदी, ईसाई और इस्लाम पहले ही सनातन धर्म, संस्कृति, दर्शनशास्त्र के साथ अतीत में ऐसा कर चुके हैं लेकिन अब तो खुद हिंदू भी ऐसा ही करने पर उतारू हैं।इस समय के ही नहीं अपितु पिछले 150 वर्षों के दौरान पैदा हुये अधिकांश धर्मगुरु अब्राहमिक मजहबों की तरह सनातन धर्म,संस्कृति,दर्शनशास्त्र के साथ दुश्मनी निभा रहे हैं। महर्षि दयानंद सरस्वती ने कुमारिल , मंडन मिश्र,शंकराचार्य के पश्चात् सनातन धर्म,संस्कृति, दर्शनशास्त्र के लिये सर्वाधिक प्रामाणिक, प्रशंसनीय और वास्तविक प्रयास किया था लेकिन उनकी असमय हत्या कर दी गई।हत्या करने वाले कोई और नहीं अपितु अब्राहमिक मजहबों के विचारक और शंकराचार्य के शिष्यों द्वारा गलत परंपरा को शुरू करने के फलस्वरूप पैदा हुये विभिन्न सांप्रदायिक विचारक ही थे।इस समय राजीव भाई दीक्षित भी इन्हीं के षड्यंत्र का शिकार हुये हैं।यह सबको पता है।

 संप्रदाय,मत या वाद वहीं तक सही होते हैं ,जहां तक वे सनातन धर्म,संस्कृति और दर्शनशास्त्र का समर्थन करता हों।जब भी वो इस सीमा का उल्लंघन करने लगें तो उन पर लगाम कसना आवश्यक होता है। शंकराचार्य के बाद वह लगाम बिल्कुल ढीली छोड़ दी गई है। शंकराचार्य के शिष्यों ने अतीत में एकतरफा अद्वैतवाद के रूप में खूब धींगामुश्ती की है। बाकी विचारक भी उन्हीं के पदचिन्हों पर चलकर वैचारिक कबड्डी खेलने का काम करते रहे हैं। सभी को यह आश्चर्यजनक लगेगा कि समय और परिस्थिति अनुसार खुद चार्वाक,आजीवक,महावीर, सिद्धार्थ गौतम आदि ने अपने अपने समय पर आई विकृतियों को दूर करके सनातन धर्म,संस्कृति, दर्शनशास्त्र के प्रचार-प्रसार के लिये प्रयास किये लेकिन शिष्यों - प्रशिष्यों को यह सब अपनी आजीविका और अहंकार के अनुकूल नहीं लगा। और परिणामस्वरूप अनेक मजहब उत्पन्न ही नहीं हुये अपितु खूनी संघर्ष भी खूब हुये हैं। बौद्ध राजाओं और भिक्षुओं द्वारा सनातन धर्म,संस्कृति, दर्शनशास्त्र को नष्ट करने करने के लिये अपनी पूरी शक्ति लगा दी थी।इसीलिये आज भी नवयानी बौद्ध अपने आपको सनातन धर्म, संस्कृति, दर्शनशास्त्र के समीप न कहकर ईसाईयत और इस्लाम के समीपस्थ महसूस करते हैं। राधास्वामी,रामकृष्ण मिशन, ब्रह्माकुमारीज, इस्कान,राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ,पतंजलि योगपीठ,सच्चा सौदा,धन धन सतगुरु,योग वेदांत समीति ,ईशा फाउंडेशन, ओशो धाम आदि सैकड़ों धार्मिक कहे जाने वाले संगठन सर्वमतसमभाव की आड़ में खुद तो अरबपति खरबपति बन बैठे हैं लेकिन ये सारे मिलकर सनातन धर्म, संस्कृति, दर्शनशास्त्र की बेतुकी और अमर्यादित आलोचना करते रहते हैं। और तो और हमें जो संवैधानिक व्यवस्था सन् 1947 ईस्वी के बाद मिली है,वह भी सनातन के विरोध और सर्वमतसमभाव के नकली सिद्धांत पर खडी हुई है।इस नकली सिद्धांत पर चलने के लिये सिर्फ हिन्दू को ही विवश किया जाता है। हिंदू को छोड़कर सभी मजहबों को उच्छृंखल आजादी प्रदान की गई है। इसलिये रामकृष्ण मिशन जैसे संगठनों ने तो अपने आपको सनातन धर्म से अलग करने के लिये न्यायालय तक की शरण ली थी। कितना विचित्र और हृदयविदारक है यह सब कि जिन मतों, संप्रदायों और वाद आदि का कर्तव्य सनातन धर्म,संस्कृति, दर्शनशास्त्र, नैतिकता, आचरण आदि को सुरक्षा कवच प्रदान करना था, पिछली कयी सदियों से वो सारे मिलकर इसी सनातन के विभिन्न घटकों पर प्रहार करने का कोई भी अवसर नहीं चूकते हैं।

...........
आचार्य शीलक राम 
दर्शनशास्त्र- विभाग 
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय 
कुरुक्षेत्र -136119

भागों नहीं अपितु सामना करो

सत्यनिष्ठा,कर्त्तव्यपरायणता, विश्वसनीयता आदि नैतिक जीवन मूल्यों के साथ साथ अपनी संतान को इतनी तिकड़मबाजी, चापलूसी और झूठ बोलना अवश्य सिखला देना कि वो भ्रष्टाचार,कपट,छल और रिश्वतखोरी के परिवेश में सफलता की सीढ़ियां चढ सकें। जिनके हाथों में सिस्टम की बागडोर है,सच जानिये कि वो सभी के सभी परले दर्जे के भ्रष्टाचारी, झूठे, कपटी, चापलूस और गिरगिटिया चरित्र के स्वामी हैं। ऐसे दुषित सिस्टम और गले सड़े परिवेश में नैतिक जीवन-मूल्यों को पूछने वाला कोई भी नहीं है। जिनके हाथों में सिस्टम है वो सभी अपनी संतानों को बढ़िया शिक्षा के लिये विदेशी विश्वविद्यालयों में पढ़ने के लिये भेज देते हैं और बाकी बचे भारतीयों को नैतिकता, राष्ट्रवाद, राष्ट्रप्रेम और स्वदेशी पर चलकर तथा भारत के ही सडे गले विश्वविद्यालयों में शिक्षा लेने को विवश करते हैं।कुछ धूर्तों ने कपटाचरण करके आरक्षण के द्वारा अपने निशुल्क भोजन, पानी, औषधि और शिक्षा की व्यवस्था कर ली है तो नेता,धर्मगुरु, प्रशासनिक अधिकारी और अमीर घरानों के हाथों में राजसत्ता, धर्मसत्ता और धनसत्ता की बागडोर है। इन्होंने अपने जीवन में हर प्रकार की खुशहाली की भरपूर व्यवस्था कर ली है। बाकी बचे हुये भारतीयों के पल्ले में गरीबी,कुशिक्षा, बदहाली,शोषण, प्रताड़ना , ज़ुल्म के सिवाय कुछ नहीं है।अब भी संभल जाओ। यहां पर तो राष्ट्रवाद के सपने दिखलाने वाले नेता ही सबसे बडे देशविरोधी हैं। स्वदेशी के नारे लगाने वाले नेता और धर्मगुरु विदेशी सामान का उपभोग करके अय्याशी कर रहे हैं। धर्म और नैतिकता की दुहाई देने वाले धर्मगुरु,संत,संन्यासी,स्वामी और गुरु लोग सबसे बड़े अधार्मिक और अनैतिक हैं।सच तो यह है कि हमारे भारत के अधिकांश नेता, धर्मगुरु, योगाचार्य,संत, स्वामी, संन्यासी,सद्गुरु और सुधारक आदि सबसे अधिक भ्रष्ट,कामुक, झूठे, कपटी,छली, धूर्त, विदेशी सामान के उपभोक्ता और अनैतिक हैं।

 विश्वविद्यालयीन अध्ययन अध्यापन के दौरान पिछले डेढ दशक के दौरान हमने भी बेतहाशा ज़ुल्म, प्रताड़ना, अपमान, भेदभाव, जातिवाद और आर्थिक अभाव को झेला है। लेकिन हमने तो आत्महत्या नहीं की।हम तो डटे भी रहे हैं तथा जीवित भी रहे हैं।एक आईपीएस अधिकारी,उसकी आईएएस पत्नी, विदेश में बच्चे भी पढ़ रहे हैं,महंगे मकानों में रह रहे हैं तथा सरकार में पहुंच भी बहुत अधिक है - फिर भी प्रैसर को नहीं झेल पाये। काहे के आईपीएस और आईएएस अधिकारी हैं? इनकी यही ट्रैनिंग होती है कि प्रैसर आये तो आत्महत्या कर लेना? यहां विश्वविद्यालय में देखो - पीएचडी किये हुये हैं,कयी कयी विषयों में स्नातकोत्तर हैं। सैकड़ों रिसर्च पेपर प्रकाशित हो चुके हैं, पचासों पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं,साथ में आयु और अनुभव के साथ एक चौथाई तनख्वाह भी नहीं मिल रही तथा सेवानिवृत्त होने पर भिखारी हो जाना पड़ेगा।इतने प्रैसर, अपमान, प्रताड़ना, भेदभाव और जातिवाद के बावजूद अपने शैक्षणिक कर्तव्य का नियमित निर्वहन कर रहे हैं।हम तो जीवित हैं,हम तो नहीं मरे, हमने तो आत्महत्या नहीं की।

 सरकार और सिस्टम द्वारा प्रचारित कर्त्तव्यपरायणता और सत्यनिष्ठा का हमारे लिये कोई पारिश्रमिक नहीं है।इस तरह की बातें सिर्फ कागजों तक सीमित हैं।जिसको भी मौका मिलता है,वह सारी मर्यादाओं को ताक पर रखकर जमकर धन दौलत को एकत्र कर रहा है।इसीलिये तो मैं बार बार कह रहा हूं कि थोडा बहुत आचार्य कौटिल्य को भी पढ लिया करो। अपनी संतान को आचार्य कौटिल्य से अवश्य अवगत करवाना तथा उनसे कहना कि भ्रष्ट राजनीतिक सिस्टम में कर्त्तव्यपरायणता, सत्यनिष्ठा, स्पष्टता, मेहनत और उचित पारिश्रमिक के लिये कोई स्थान नहीं है।आप,आपकी संतान और आपके निकट संबंधी तक भूखों मर जायेंगे। कोई भी पूछनेवाला नहीं होगा।यह दुनिया ऐसी ही है। यहां सभी उगते सूरज को सलाम करते हैं। मुसीबत पड़ने पर सबसे पहले वहीं मित्र साथ छोड़कर भागेंगे जिन्होंने हर हाल में साथ निभाने की कसमें खाईं थीं। यदि सिस्टम ठीक है तो आप भी ठीक रहना लेकिन यदि सिस्टम भ्रष्ट है तो फिर सिस्टम के साथ ही चलना बेहतर है।
यदि देह में कोई कमी आ जाये तो शुद्धि आदि करके उसको निरोग करना होता है,उस देह से अलग होकर उसको गालियां देना कोई समाधान नहीं है। और फिर यह ध्यान रहे कि महावीर, बौद्ध, चार्वाक आदि सभी सनातनी ही थे, उन्होंने किसी मजहब की स्थापना नहीं की थी। उनके देहावसान के पश्चात् यह दुकानदारी शुरू हुई थी।कुछ लोग अलग अलग नामों से यह दुकानदारी आज भी कर रहे हैं।एक ही पहलू से मत सोचो अपितु अन्य पहलुओं से भी सोचने का प्रयास करो। बाकी कुछ लोगों को गाली गलौज करने, कमियां निकालने और अपमान करने का संवैधानिक अधिकार मिला हुआ है।इस भेदभाव पर उनकी जबान पर ताले लग जाते हैं।आज जो लोग जातिवाद, सांप्रदायिकता, ऊंच-नीच और छुआछूत के नारे लगा रहे हैं,वो ही सबसे बडे जातिवादी, सांप्रदायिक, भेदभाव को प्रश्रय देने वाले और छुआछूत को बढ़ावा देने वाले हैं।

 कम या अधिक संख्या में स्वार्थी, निठल्ले और धूर्त लोग सदैव रहे हैं।आज भी हैं और आगे भी रहेंगे।एक बहुत बड़ा सवाल यह भी है कि जिनका अतीत में शोषण हुआ था,वो शोषण के विरोध में खड़े क्यों नहीं हुये? क्या इतने कमजोर थे कि आवाज भी न उठा पाये? ज्ञात इतिहास में विरोध का कोई उदाहरण उपलब्ध नहीं है। कहीं यह तो नहीं है कि कुछ लोगों को मुफ्त का खाने, पीने,रहने आदि की पहले से ही लत पडी हुई है। अपनी इस लत को स्वीकार न करके औरों पर दोषारोपण करके खुद को बचाकर निकल जाने का जुगाड करने के नये नये तरीके तलाश किये जा रहे हैं!
आज राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्य न्यायाधीश, हरियाणा के मुख्यमंत्री आदि सभी दबे कुचले वर्ग हैं लेकिन फिर भी गाली गलौज किया जा रहा है।अरे भाई और क्या चाहिए?अब तो शासन प्रशासन सब तुम्हारा है।अब भी भेदभाव, ऊंच-नीच और प्रताड़ना क्यों हैं?कभी अपने वर्ग के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और मुख्य न्यायाधीश के विरोध में धरना प्रदर्शन करो कि हमारे ऊपर अत्याचार क्यों हो रहे हैं? लेकिन नहीं करेंगे और अब भी गालियां देंगे ब्राह्मण, बनिया,जाट, राजपूत आदि को।

कमी कहीं और नहीं अपितु कमी खुद में है।वह तो स्वीकार हो नहीं रहा,बस दोषारोपण शुरू। और इसके लिये वर्ग विशेष को संवैधानिक अधिकार मिले हुये हैं।जो सनातन से बाहर गये थे, क्या उनमें कमी नहीं थी?उनको दूध के धूले क्यों मान रहे हो?सारे प्रश्न सनातनियों से ही क्यों?जो स्वार्थ में भागकर गये थे, उनसे भी तो पूछो।

 कमियां निकालकर गालियां देने का धंधा बन गया है।हर व्यवस्था में समय के साथ विकृतियां आना स्वाभाविक है लेकिन उनके सुधार और परिष्कार की जिम्मेदारी न उठाकर पूरी व्यवस्था को ही गालियां देना या गलत कहना ठीक नहीं है।और नयी व्यवस्थाएं जो बनी हैं, क्या उनमें कमियां नहीं हैं? फिर उनको भी छोड दो।

दलितों और पिछड़ों के साथ अन्याय की बातों को बढ़ा चढ़ाकर बताने के प्रयास अंग्रेजी काल की शुरुआत में हुये थे।दलित ही दलितों के विरोधी अधिक है।इस समय देख लो- राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और मुख्य न्यायाधीश दलित और पिछड़े वर्गों से हैं,इस समय पर दलित और पिछड़ों पर ज़ुल्म होने का कारण क्या दलित और पिछड़ों द्वारा शासित व्यवस्था नहीं है?लेकिन अब भी गालियां मनुस्मृति और ब्राह्मणों को दी जा रही हैं।मैं खुद पिछडे वर्ग से हूं। मुझे मेरे पिछड़े वर्ग वालों ने सदैव दबाकर रखने की कोशिश की है लेकिन मेरे ब्राह्मण,जाट आदि भाईयों ने मेरी सदैव मदद की है।हरियाणा में दलितों में भी दलित जातियों के दो दलित वर्ग बना दिए हैं। इसका विरोध सवर्ण नहीं अपितु खुद दलित ही कर रहे हैं तथा अपने ही अति दलित भाइयों को अधिकार नहीं देना चाहते।

जब खुद में कमी होती है तो दूसरे उसका फायदा उठाते हैं। दलितों में अपने खुद में भी कमियां रही हैं जिससे उन पर अत्याचार हुये तथा अब भी हो रहे हैं।पिछले 2500 वर्षों के कालखंड में अनेक दलित वर्ग के राजाओं ने राज किया है। दलित राजाओं के शासन में यदि दलितों पर अत्याचार होते रहे थे तो इसके लिए दलित ही जिम्मेदार अधिक हैं,सर्वण इतने जिम्मेदार नहीं थे। पिछले वर्षों के दौरान तथाकथित दलित वर्ग के लोग आये दिन सनातनी देवी देवताओं, मूल्यों, ग्रंथों, महापुरुषों को गालियां देकर अपमानित करते रहते हैं लेकिन इसके जुर्म के फलस्वरूप किसी पर भी प्राथमिकी दर्ज नहीं होती है। यदि कोई सवर्ण जातियों से संबंधित व्यक्ति दलितों के महापुरुषों, ग्रंथों या उनकी मान्यताओं पर जायज टिप्पणी भी कर देता है तो उस पर तुरंत एससी एसटी एक्ट के अंतर्गत प्राथमिकी दर्ज हो जाती है।यह भेदभाव क्या है? क्या समानता को मानने वाला संविधान इसकी इजाजत देता है? राजनीतिक दलों के नेता और दलित वर्गों के नेता अपनी राजनीति चमकाने के लिये भारत को जातीय संघर्ष की तरफ धकेल रहे हैं।यह किसी भी तरह से राष्ट्रहित में नहीं है। इससे न तो दलितों का हित हो रहा है तथा न ही सवर्ण कहे जाने वालों का।इस भेदभाव, ज़ुल्म और नये प्रकार के जातिवाद पर रोक कौन लगायेगा? मुद्दा तो अधिकांश में भ्रष्टाचार, बलात्कार, स्वार्थ और कुछ अन्य ही होता है लेकिन उसे तुरंत जातीय रुप देकर जनमानस को एक दूसरे के विरोध में खड़ा करके सामाजिक ढांचे को कमजोर किया जा रहा है। अंग्रेजों द्वारा प्रदत्त जातीय महामारी को आजादी के पश्चात् किसी भी राजनीतिक दल से समाप्त करने का प्रयास नहीं किया है। इस मामले जितनी दोषी भाजपा है उतनी ही दोषी कांग्रेस भी है। अपने राजनीतिक फायदे के लिये जहां भाजपा मनु और मनुस्मृति की आड़ लेकर सनातन धर्म और संस्कृति को कमजोर कर रही है वहीं पर कांग्रेस और उसके नेता राहुल गांधी मनु, मनुस्मृति और मनुवाद की आड़ लेकर सनातन धर्म और संस्कृति को गालियां दे रहे हैं। बाकी दल और नेता तो अपने फायदे के लिये पलटी मारकर कभी कांग्रेस में और कभी भाजपा के पाले में जाकर बैठ जाते हैं।इस राष्ट्रविरोधी घटिया खेल में ये और इनके साथी अमीर घराने तथा धर्माचार्य और सुधारक तो भरपूर अय्याशी कर रहे हैं लेकिन भारत, भारतीय और भारतीयता कमजोर होते जा रहे हैं।

...............
आचार्य शीलक राम 
दर्शनशास्त्र- विभाग 
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय 
कुरुक्षेत्र -136119

Friday, October 31, 2025

भारतीय ज्ञान परंपरा के परिप्रेक्ष्य म्हं 'दर्शनशास्त्र' की कहाणी


इस दुनिया म्हं पहला 'दर्शनशास्त्र' भारत नैं दिया था।जै किसै कै कोये शक संदेह हो तै ऋग्वेद का नासदीय सूक्त और  पुरुष सूक्त पढकै देख ल्यो।ज्यब या सृष्टि पैदा हुई, परमात्मा हैं हर तरहां का ज्ञान चार वेदां म्हं छंद रश्मियां के रूप म्हं दे दिया था।ब्यना ज्ञान के सृष्टि पैदा करण का कोये मतलब कोन्यां होत्ता।बस,इस्सै नैं ध्यान म्हं रखकै परमात्मा नैं सब तरहां का ज्ञान माणस सृष्टि बणाण के बख्त दे दिया था।वेद आज के कोन्यां।आज तैं एक अरब छाणवैं करोड़ आठ लाख तरेपन हजार एक सौ पच्चीस साल पहल्यां वेद दिये गये थे।सोच्चण,समझण अर किस्सै निर्णय पै पहोंचण खात्यर दर्शनशास्त्र का ज्ञान सबतैं जरूरी सै। परमपिता नैं जो वेद दिये थे,वै सबतैं पहल्यां चार ऋषि अग्नि, वायु,आदित्य अर अंगिका नैं साक्षात् करकै कट्ठे करकै एक जगहां पै बांधण का काम करया था।वै चारुं ऋषि दुनिया के सबतै पहले दार्शनिक थे।उन ऋषियां नैं अर उनके पाच्छै आज ताईं ब्रह्मा आदि हजारां ऋषियां नैं वेदां का प्रचार -प्रसार करकै सारी सृष्टि म्हं ज्ञान देवण का काम करया सै। तर्क करण, विचार करण, प्रमाण गैल्यां बात कहण, प्रश्न ठावण, बुद्धि तैं सोचकै निर्णय लेवण, समस्या की तह म्हं जाकै कारण नै टोहवण की परंपरा सारी दुनिया म्हं भारत के ऋषियां नैं फैलाई सै।आज अंग्रेजी शिक्षा कै प्रभाव म्हं कोये कुछ बी कहता रहवै,पर साच्ची बात याहे सै जो मनैं ऊप्पर बताई सै।
युनानी,रोमन,मिश्री,अरबी,चीनी, जापानी,अफ्रीकन जिसे सारे दर्शनां के मां,बाब्बू अर गुरु सब कुछ भारतीय दर्शनशास्त्र सै। युनानी थैलीज तैं लेकै सोफिस्ट,सुकरात, प्लेटो,अरस्तू ताईं, युनानी विचारकां के नक्शे-कदम पै चाल्लण आले अरबी विचारक, इस्लामी विचारक, यहुदी विचारक, ईरानी विचारक, ईसाई विचारक अंसेलम, बुद्धिवादी और अनुभववादी विचारक, युरोपीयन विचारक,अमेरिकी विचारक, आलोचनात्मक विचारक, अस्तित्ववादी विचारक, नारीवादी विचारक, समकालीन उच्छृंखल विचारक आदि सारे के सारे भारतीय दर्शनशास्त्र के ऋणी सैं। भारतीय दर्शनशास्त्र की किस्सै एक बात नैं पकडकै हनुमान की पूंछ की तरियां बढाकै दुनिया कै आग्गै धर देसैं।धन, दौलत अर प्रचार का जुगाड इन धोरै सैए। इसके हांगे तैं ये कुछ बी मनमाना करते आरे सैं अर इब बी करण लागरे सैं। 
 आज तैं 5000-6000 साल पहल्यां सृष्टि के मूल म्हं काम करण आले वेद सिद्धांत बतावण खात्यर छह दर्शनां का निर्माण करया गया था। मीमांसा दर्शनशास्त्र जैमिनी नैं,वैशेषिक दर्शनशास्त्र कणाद नैं, न्याय दर्शनशास्त्र गौतम नैं, सांख्य दर्शनशास्त्र कपिल नैं,योग दर्शनशास्त्र पतंजलि नैं अर वेदांत दर्शनशास्त्र बादरायण व्यास नैं ल्यक्खे थे।ये छहों दर्शनशास्त्र सूत्ररुप म्हं सैं।पाच्छै इनपै हजारां की संख्या म्हं भाष्य,टीका, व्याख्या आदि करे गये। भारतीय दर्शनशास्त्र के ये सारे ग्रंथ दुनिया के दर्शनशास्त्र के प्रेरणास्रोत रहे सैं।बस जरूरत सै इननैं पड्ढण,ल्यक्खण अर हर रोज के चालचलण म्हं उतारण की।ऊप्पर जिन छह दर्शनां का ज्यक्रा करया गया सै,उनम्हं कर्म कारण, उपादान कारण,प्रमाण कारण, सृष्टि बणावण की विधि अर प्रकृति पुरुष विवेक, योग-साधना कारण अर मूलनिमित्त कारण का भेद खोल्या गया सै। दुनिया के सारे दर्शनशास्त्र पाछले हजारां सालां तैं योए काम करण लागरे सैं।
अब्राहमिक संस्कृति क्योंके एकतरफा भोगवादी भौतिकवादी सै, इसलिये इसके दर्शनशास्त्र नैं फिलासफी कहवैं सैं।इस म्हं कोरे विचारां की कबड्डी घणी हो सै अर जीवन म्हं उतारकै उसै अनुसार जीवन जीण की कोये बी जरूरत ना समझी जाती।इसनैं इस्सै खात्यर भौतिकवादी फिलासफी बी कहवैं सैं।इननैं बाहरी संसार की सुख सुविधा तैं वास्ता खणा हो सै अर चेतना आदि लेणा देणा बहोत कम हो सै।अपणे स्वार्थ नैं पूरा करण खात्यर ये लोग किस्सै गैल्यां कुछ बी धोखाधड़ी अर विश्वासघात कर सकैं सैं।इस्सै उपयोगितावादी अर धोखाधड़ी की फिलासफी तैं प्रभावित होकै यवनां,अंग्रेजां,पुर्तगालियां,डच्चां,
डैनिसां,मंगोलां,मुगलां,अरबियां नैं दूसरे देशां म्हं जाकै खूब हमले करकै उन पै कब्जा करकै तानाशाही तैं हजारां सालां तै राज करया सै। दुनिया के इतिहास नैं पढकै कोये बी इस सच्चाई नैं जाण सकै सै। भारतीय दर्शनशास्त्र नैं कदे बी इसी घटिया, मारकाट मचाववण की, नरसंहार करण की ,बहन बेटियां की इज्जत आबरो नैं लूट्टण की,पूजा स्थलां नैं बर्बाद करण की अर ज्ञान के केंद्रा नैं जलावण की सीख कोन्यां दी सै। भारतीय दर्शनशास्त्र अर युनानी फिलासफी का यो भेद बहोत बड्डा सै।यो आज बी चालरया सै।
सही बात तैं या सै अक भारतीय दर्शनशास्त्र सदा तैं जीवण दर्शनशास्त्र रहया सै अर युनानी फिलासफी सदा तैं कोरे विचारां की कबड्डी रही सै। भारत म्हं दर्शनशास्त्र की जितणी बी शाखा प्रशाखा सैं,सारियां के मान्नण आले अनुयायियां की करोडां म्हं संख्या रही सै। युनानी अर युनानी फिलासफी तैं जन्मी पाश्चात्य फिलासफी म्हं या बात देक्खण नैं कोन्यां म्यलती। इस्सै खात्यर हजारां लाक्खां साल पुराणा भारतीय दर्शनशास्त्र आज बी दुनिया का सबतैं बढ़िया, सृजनात्मक, रचनात्मक,कृण्वंतो विश्वमार्यम् ,वसुधैव कुटुंबकम् नैं मान्नण जाणन आला दर्शनशास्त्र सै। दुनिया म्हं शांति,सद्भाव,भाईचारे, समन्वय,प्रेम, करुणा नैं फलावण खात्यर केवलमात्र भारतीय दर्शनशास्त्र तैं आशा बचरी सै।यो काम जितणे तकाजे तैं होज्या उतणाए बढ़िया सै।
युनानी,मिश्री, रोमन,अरबी,चीनी फिलासफी का प्रेरणास्रोत तै भारतीय दर्शनशास्त्र रहा ए सै, इसके साथ म्हं खुद भारत म्हं बी भारतीय दर्शनशास्त्र तैं प्रेरणा लेकै घणेए दर्शनशास्त्र पैदा होये। उनम्हं बृहस्पति,चार्वाक,मक्खली गौशाला,संजय वेलट्टिपुत्त,प्रकुध कात्यायन,निर्ग्रंथ नाथपुत्त,सिद्धार्थ बुद्ध,गौतम बुद्ध,तंत्र की विभिन्न शाखाएं,भागवत्,त्रैतवाद,द्वैतवाद, अद्वैतवाद,विशिष्टाद्वैतवाद,
शुद्धाद्वैतवाद,द्वैताद्वैतवाद,
शब्दाद्वैतवाद,शक्त्याद्वैतवाद,अचि़त्यभेदाभेदवाद आदि दर्शनशास्त्र दुनिया म्हं प्रसिद्ध सैं। वर्तमान काल म्हं बी भारतीय दर्शनशास्त्र म्हं महर्षि दयानंद , विवेकानंद,अरविन्द,रमण महर्षि, रविन्द्र नाथ , गांधी, जिद्दू कृष्णमूर्ति, ओशो रजनीश,श्रीराम शर्मा आचार्य, राजीव भाई दीक्षित,आचार्य बैद्यनाथ शास्त्री, राधाकृष्णन, कृष्णचंद्र भट्टाचार्य ,सावरकर, अंबेडकर,आचार्य अग्निव्रत आदि सैकड़ों विचारकां अर दार्शनिकां नैं महत्वपूर्ण योगदान दिया सै।
 पहल्यां के समय पै सरकारी व्यवस्था धर्म, संस्कृति,योग, अध्यात्म, दर्शनशास्त्र,नैतिकता, तर्कशास्त्र,आयुर्वेद नैं घणाए महत्व दिया करती।पर इस समय भारत म्हं इनकी हालत बहोत खराब होरी सै।
महाभारत तैं पहल्यां के दार्शनिकां नैन जै छोड बी द्यां तै अर पाछले पांच छह हजार साल की बात करां तै भारतभूमि नैं हजारां प्रामाणिक दार्शनिक दिये सैं।उन म्हं जैमिनी, कणाद,गौतम,कपिल पतंजलि ,बादरायण व्यास, महर्षि वेदव्यास, गौड़पाद, गोविंदपाद,कुमारिल भट्ट, मंडन मिश्र, गौड़पादाचार्य, शंकराचार्य, प्रभाकर,नागार्जुन,धर्मकीर्ति, अश्वघोष,चंद्र कीर्ति,असंग,वसुबंधु, शान्तरक्षित, आर्यदेव, दिग्नाग,कुंदकुंदाचार्य, उमास्वाति, अकलंक,सिद्धसेन दिवाकर, हरिभद्र ,ईश्वर कृष्ण, विज्ञानभिक्षु, वाचस्पति मिश्र, वात्स्यायन,उद्योतकर,उदयन, जयंत भट्ट,गंगेश उपाध्याय,श्रीधर,,श्री हर्ष,प्रकाशानंद, रामानुजाचार्य,वेंकटनाथ, माध्वाचार्य, जयतीर्थ,व्यास देव, निंबार्क आचार्य, वल्लभाचार्य, वसुगुप्त, अभिनव गुप्त, भास्कराचार्य जिसे हजारां दार्शनिक होये सैं।इननैं संसार अर संसार तैं पार के विषयां पै उट्ठण आली सारी समस्यां पै गंभीरता तैं मात्थापच्ची करकै नये नये विचार ,सिद्धांत अर निष्कर्ष दुनिया के आग्गै रक्खे सैं।
भारतीय दर्शनशास्त्र म्हं एक दौर वो बी आया ज्यब चार्वाक अर तंत्र की आड़ लेकै घणेए इसे दर्शनशास्त्री पैदा होगे,जिननैं सनातन धर्म,संस्कृति अर दर्शनशास्त्र पै ए हमले शुरू कर दिये थे।इन सबनैं शास्त्रार्थ म्हं पराजित करकै दोबारा तैं सनातन धर्म,संस्कृति अर दर्शनशास्त्र नैं स्थापित करण का काम कुमारिल, मंडन मिश्र अर शंकराचार्य नै करया था।
भारतीय दर्शनशास्त्र दुनिया का एकमात्र इसा दर्शनशास्त्र सै,जिसम्हं वैचारिक आजादी मौजूद सै। बाकी के किसै बी दर्शनशास्त्र म्हं थोड़ी बहोत आजादी तै म्यलज्यागी,पर भारतीय दर्शनशास्त्र जितणी आजादी कितै बी कोन्यां म्यलती। युनानी फिलासफी म्हं बी आजादी कोन्यां दिखती।जै उडै वैचारिक आजादी होती तै सुकरात जहर देकै ना मारा जाता। भारत म्हं तै वैचारिक आजादी इतणी सै अक परमात्मा नैं नकारण आले बृहस्पति को गुरुआं का गुरु अर महर्षि कहया गया सै।खुद शंकराचार्य नैं साठ से अधिक संप्रदायां गैल्यां शास्त्रार्थ करया था। सिद्धार्थ बुद्ध के समय पै बी सैकडां मत अर संप्रदाय मौजूद थे।इस तरहां का यो विचारां,मतां अर संप्रदायां की स्थापना करकै फलण फूलण की आजादी भारत में पहल्यां बी थी,आज भी सै अर आग्गे बी रहण की आशा सै।पर वैचारिक आजादी का ज्यब ज्यब भारत की एकता अर अखंडता खात्यर दुरुपयोग होया तै उननैं उस समय के दार्शनिकां अर शासकां नैं दंड भी दिया था। अब्राहमिक मजहबां म्हं या आजादी आज बी कोन्यां म्यलरी सै।इस वैचारिक आजादी नैं कायम राखण खात्यर अधिकार अर कर्त्तव्यां म्हं संतुलन बहोत जरुरी सै।
........
आचार्य शीलक राम 
दर्शनशास्त्र- विभाग 
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय 
कुरुक्षेत्र -136119
मोबाइल -9813013065

Tuesday, October 21, 2025

दिवाली के शुभ अवसर पर तृतीय दौड़ प्रतियोगिता का आयोजन (Third race competition organized on the auspicious occasion of Diwali)

 

धर्म, दर्शन, साहित्य, राष्ट्रवाद, हिन्दी भाषा के प्रचार-प्रसार को समर्पित, शोध के क्षेत्र में कार्य करने वाली तथा आचार्य शीलक राम जी द्वारा संचालित आचार्य अकादमी चुलियाणा (पंजी.) द्वारा होली के शुभ अवसर पर तृतीय दौड़ प्रतियोगिता का सफल आयोजन रवि भारद्वाज द्वारा संचालित मास्टर धर्मपाल क्रिकेट अकादमी दिमाना में किया गया। इस प्रतियोगिता में चुलियाणा व दिमाना  के गावों के 150 से ज्यादा लडके व लडकियों ने पांच अलग-अलग आयु वर्ग में भाग लिया। सभी प्रतिभागियों को आचार्य अकादमी की तरफ से रिफरैसमेंट व सभी विजेताओं को स्मृति चिन्ह तथा नकद ईनाम राशि भी प्रदान की गई। इस अवसर पर मुख्य अतिथि डॉ देवेंद्र हुड्डा जी पूर्व प्राचार्य राजकीय महाविद्यालय सांपला रहे। उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि ग्रामीण क्षेत्र में आचार्य शीलक राम व आचार्य आकादमी चुलियाणा द्वारा इस प्रकार के आयोजन करना बहुत ही गर्व की बात है। आज जबकि नवयुवक नशे जैसी बुराईयों की ओर जा रहे हैं तो उनका मुकाबला करने के लिए इस प्रकार के आयोजन होते रहने चाहिए। प्रोफेसर रोशन लाल रोहिल्ला ने अपने संबोधन में कहा कि आचार्य शीलक राम व आचार्य अकादमी चुलियाणा द्वारा यह एक बहुत ही अच्छी पहल है तथा आगे भी इस प्रकार के सफल आयोजन करने के लिए बधाई दी। प्रोफेसर पवन कुमार व सुश्री श्रुति डबास ने भी सभी प्रतिभागियों को आशीर्वाद दिया। डॉ. सुरेश जांगडा ने बताया कि आचार्य अकादमी द्वारा यह तृतीय दौड़ प्रतियोगिता है तथा भविष्य में भी प्रतिवर्ष होली व दिवाली के अवसर पर इस प्रकार की खेल प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाता रहेगा। इसके अलावा आचार्य अकादमी चुलियाणा कई बार क्रिकेट प्रतियोगिता का भी सफल आयोजन करवा चुकी है। उन्होंने यह भी बताया कि उपरोक्त प्रतियोगिता बिल्कुल निशूल्क करवाई गई है तथा आचार्य अकादमी चुलियाणा अपने चौदह साल के दौरान दो हजार से ज्यादा देश विदेश के कवियों, लेखकों, साहित्याकारों को सम्मानित भी कर चुकी है। उन्होंने यह भी बताया कि आचार्य अकादमी हर साल श्रीमती हेमलता हिन्दी साहित्य (गद्य, पद्यादि) पुरस्कार, राजीव भाई दीक्षित भारतीय इतिहास, आयुर्वेद, स्वदेशी व राष्ट्रभक्ति पुरस्कार, स्वामी दयानन्द सरस्वती दर्शनशास्त्र पुरस्कार, स्वदेशी, राष्ट्रवाद, सनातन वैदिक धर्म व संस्कृति पुरस्कार, चौधरी छोटूराम किसान, मजदूरी और शिक्षा पुरस्कार व बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर समानता व समता पुरस्कार हर साल प्रदान करती है। आचार्य अकादमी लगातार ग्यारह शोध अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं  का प्रकाशन भी कर रही है। जिनमे प्रमाण अंतरराष्ट्रीय मुल्यांकित त्रैमासिक शोध पत्रिका  (आईएसएसएन : 2249-2976), चिन्तन अंतरराष्ट्रीय मुल्यांकित त्रैमासिक शोध पत्रिका (आईएसएसएन :2229-7227), हिन्दू अंतरराष्ट्रीय मुल्यांकित त्रैमासिक शोध पत्रिका (आईएसएसएन:2348-0114), आर्य अंतरराष्ट्रीय मुल्यांकित त्रैमासिक शोध पत्रिका (आईएसएसएन: 2348876X) व द्रष्टा अंतरराष्ट्रीय मुल्यांकित त्रैमासिक शोध पत्रिका (आईएसएसएन: 2277-2480) प्रमुख है।