यदि किसी को हर मुश्किल समय के बाद रोने का हूनर आता है,तो सच मानिये कि वह कैसी भी मुसीबत आने पर न तो उस मुसीबत से भागेगा,न हताश और निराश होगा तथा आत्महत्या नहीं करेगा।रोने से नकारात्मक ऊर्जा का रेचन हो जाता है। जैसे कूकर में सब्जी बनाते समय पीक बिंदु आते ही भांप का निकलना होता है।ठीक वैसे ही जब -जब कोई व्यक्ति किसी दुख, परेशानी, प्रताड़ना, ज़ुल्म, हताशा, कुंठा, तनाव आदि के दौरान ऊर्जा के अतिरेक से भर जाता है,तब -तब किसी समय पर उस ऊर्जा के अतिरेक से एकत्र हुई ऊर्जा को रोने के माध्यम से निकाल दिया जाये,तो बहुत अधिक राहत मिलती है।भविष्य के लिये जीने का आधार तैयार हो जाता है। लेकिन यह रोना किसी को दिखाने के लिये न होकर यदि एकांत में हो जाये,तो नकारात्मक ऊर्जा का रेचन शीघ्रता से हो जाता है।रोने के साथ हंसना भी इसमें सहायक हो सकता है। लेकिन हंसने की क्रिया अकेले में नहीं होनी चाहिये। इसके लिये मित्र, प्यारे,दोस्त,संगे, संबंधी, सहपाठी, सहयात्री आदि कोई भी हो सकते हैं कि जिनके संग हंसना चाहिये। रोना अकेले में और हंसना सबके बीच में। रोना भीड़-भाड़ से दूर होकर एकांत में तथा हंसना बिल्कुल लोगों के मध्य में। रोना और हंसना ये दोनों बहुत गहरे व्यायाम हैं,जिनका प्रभाव भौतिक शरीर,प्राणिक शरीर, मनस् शरीर और भाव शरीर तक होता है।पुरुष वर्ग नेज्ञअपमान के भय से रोना छोड़ दिया है, इसलिये उनमें गुस्सा और चिड़चिड़ापन भी बहुत अधिक मिलता है तथा आत्महत्या की औसत नारी वर्ग से अधिक है। पुरुषों पर नारी -वर्ग की बेवजह की प्रताड़ना, झूठे मुकदमों और नारी के लिये भेदभावपूर्ण एकतरफा अत्यधिक कानूनी अधिकार मिलने के कारण पिछले एक दशक के दौरान तो पुरुष -वर्ग ने विवाह -संस्था से भी किनारा कर लिया है। क्योंकि रोने को पुरुष- वर्ग की शान के खिलाफ माना जाता रहा है, इसलिये पुरुष- वर्ग ने अपना इंतजाम विवाह संस्था से दूरी बनाकर कर लिया है। हालांकि इससे भविष्य में सामाजिक ढांचे का तहश ननहश होकर सामाजिक अव्यवस्था का बढना शुरू हो जायेगा।इसका प्रभाव दिखने भी लगा है। मोबाइल, टीवी, वेश्याघर आदि भी कब तक पुरुष -वर्ग को राहत देने में सफल हो पायेंगे।इनकी भी अपनी एक सीमा होती है। एकांत में खुलकर रोना और अपने कहे जाने वालों के मध्य में हंसना ही जीवन जीने का एकमात्र रास्ता बचता है।क्रोध, बदले की भावना, कामुकता,वासना, अपमान, विफलता, तनाव, हताशा आदि के समय पर जब नकारात्मक ऊर्जा का अतिरेक महसूस हो, उसके कुछ समय के पश्चात् ही एकांत में खुलकर रोने से आंसुओं के माध्यम से सहजता को उपलब्ध किया जा सकता है। राजनीतिक, धार्मिक, व्यापारिक, शैक्षणिक आदि का सिस्टम तो इतना विकृत हो गया है कि कहीं भी सुख,शांति,संतुलन,संतुष्टि, तृप्ति का अहसास मिलने की संभावना न के बराबर है। ऐसे में जीवन जीने के लिये कुछ तो चाहिये,कि जिससे जीने का सहारा मिल जाये। ऐसे में रोना और हंसना सबसे उपयुक्त औषधि सिद्ध होते हैं।तो अब के पश्चात् जब भी किसी दुख,दर्द,धोखाधड़ी, विश्वासघात, अपमान आदि में सब कुछ फीका लगने लगे या आत्महत्या का विचार आने लगे या संसार से पलायन कर जाने का मन करे तो रोने और हंसने को अवश्य आजमाकर देखना। इसका प्रैक्टिकल करना आवश्यक है।
नकारात्मक ऊर्जा की अधिकता व्यक्ति के शरीर, प्राण,मन, बुद्धि, भावना आदि सभी स्तरों पर अव्यवस्था उत्पन्न कर देती है। व्यक्ति सतर्क रहे, इसके लिये झटका लगना आवश्यक है। लेकिन अधिक समय तक नकारात्मक ऊर्जा के प्रभाव में रहना व्यक्तित्व को असंतोष से भर देता है।रोना ऐसी अवस्था में राहत देने का काम करता है।यह रोना भीतर से होना चाहिये,दिखावे के लिये नहीं।ऐसी धारणा बनी हुई है कि रोना तो नारी का गुण है। पुरुषों के लिये रोना शोभा नहीं देता।जैविक दृष्टि से इसमें कुछ सच्चाई हो सकती है, लेकिन जो भी व्यक्ति किसी आवेग,संवेग या अति से ग्रस्त होता है, उसके लिये रोना औषधि का काम करता है।नर या नारी होने से कोई फर्क नहीं पड़ता। हां,यह आवश्यक है कि यदि सबके सामने रोना शुरू कर दोगे,तो यह उतना प्रभावी नहीं हो सके। इससे रोने को किसी व्यक्ति की कमजोरी मानकर उसके संबंध में गलत निर्णय लिये जा सकते हैं। और फिर सबके सामने खुलकर रोया भी नहीं जा सकता है। एकांत में यह क्रिया से आसानी से संपन्न होती है। एकांत में रोयें और खुलकर रोयें। देखें आप एकदम से कितना हल्का,निर्भार और ऊर्जावान महसूस करते हैं। प्रसिद्ध दार्शनिक और अध्यात्मिक महापुरुष आचार्य रजनीश ने तो इसके लिये एक ध्यान विधि ही बना रखी है।इस विधि को उन्होंने 'मिस्टिक रोज' नाम दिया है।एक घंटा खुलकर हंसना,एक घंटा खुलकर रोना तथा एक घंटा विश्राम करना।यह विधि काफी प्रभावी है। उन्होंने हंसने की क्रिया को दैवीय कृत्य कहकर इसकी भूरि -भूरि प्रशंसा की है। उदासी को उन्होंने आजकल के नकली धर्माचार्यों की विशेषता कहा है,तो हंसने को आध्यात्मिक गुण की संज्ञा प्रदान की है। व्यक्ति द्वारा दमित किये गये क्रोध, बदले की भावना, कामुकता, अतृप्ति, असंतोष, अपमान आदि की द्वारा बनी हुई ग्रंथियों को पिघलाने के लिये हंसना और रोना कारगर राहत का काम करते हैं। पाश्चात्य मनोविज्ञान ने भी इस पर काम किया है।
व्यक्ति जब पैदा होता है तो रोने को जीवन का चिन्ह माना जाता है। यदि बच्चा रोये नहीं तो सभी के लिये मुश्किल खड़ी हो जाती है। इसलिये जन्म के पश्चात् नवजात को हिला,डुला और थपथपाकर रुलाने की कोशिश की जाती है। नौ महीने के पश्चात् एकदम से माता के गर्भ में मौजूद सुरक्षित वातावरण से बाहरी अनजान वातावरण में आना बच्चे के लिये काफी कष्टकारी होता है। बाहरी परिवेश में संतुलन बनाने के लिये तकलीफ और संघर्ष करना पड़ता है। इससे उत्पन्न दुख, पीड़ा,भय आदि के आघात से मुक्ति पाने के लिये रोना आवश्यक है।इसका अर्थ है कि बच्चे ने संघर्ष को स्वीकार कर लिया है।जो बच्चे इस संघर्ष को स्वीकार नहीं करते हैं,वो पैदा होने से ठीक पहले, पैदा होते समय या पैदा होने के बाद में मर जाते हैं।पुरातन आयुर्वेद के ग्रंथों सुश्रुत,चरक, वागभट्ट आदि संहिताओं ने रोने को त्रिदोष के अंतर्गत वातप्रधान लक्षण माना है। भावनात्मक असंतुलन से उत्पन्न असंतोष के कारण वात के सहयोग से जल तत्व आंसुओं से बाहर निकलता है। इससे विजातीय विष को बाहर निकालने में सहायता मिलती है। व्यक्ति शांत,निर्भार और सहज महसूस करता है। मनोवैज्ञानिक फ्रायड रोने को दमित भावनाओं का लक्षण कहता है।एडलर इसे हीनभावना या सामाजिक जुडाव की कमी से जोड़कर देखते हैं।जुंग इसे अचेतन और चेतन मन के बीच संघर्ष तथा सामुहिक अचेतन मन से आनेवाले भावनात्मक दबावों के मुक्ति पाने की क्रिया के रूप में देखता है।
रोना और हंसना किसी भी प्रकार की मानसिकता, सामाजिक, नैतिक, आध्यात्मिक और दार्शनिक काउंसलिंग में सहायक क्रिया सिद्ध हो सकती है।बस, आवश्यक यह है कि इसके लिये सतत् अभ्यास, अनुशासन और अनुभव आवश्यक हैं। अधकचरी जानकारी लाभ की बजाय नुकसान का कारण बन सकती है। आजकल विभिन्न प्रकार की काउंसलिंग को वो लोग कर रहे हैं,जो स्वयं बिमार हैं। इन्हें स्वयं खुद को ही काउंसलिंग की त्वरित आवश्यकता है।रोने और हंसने को किसी असामान्य व्यक्ति की काउंसलिंग करने की एक सहायक क्रिया के रूप में प्रयोग किया जा सकता है। इनकी मदद से भावनात्मक ज्वार आंसुओं के माध्यम से या फिर हंसने के दौरान ठहाकों के माध्यम से बाहर निकल जाता है। व्यक्ति तरोताजा होकर किसी भी परिस्थिति का पूरी ऊर्जा से सामना करने के लिये तैयार हो जाता है। हरियाणवी क्षत्रिय जीवन- शैली में रोने को तो कोई स्थान नहीं है लेकिन परस्पर हंसी,मजाक, ठिठोली और ठहाकों को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है।शायद संसार में इतना हंसी मजाक कहीं भी नहीं होता होगा। उच्छृंखल एकतरफा पाश्चात्य भौतिकवादी जीवन-शैली का अंधानुकरण करने के कारण पिछले दो दशक से हरियाणवी जनमानस में हंसना,मजाक करना, चुटकुले आदि सुनना -सुनाना कम हो चुका है। लोगों की सहनशक्ति बहुत कम हो गई है। परस्पर वैमनस्य, बदले की भावना, टांगखिंचाई और ईर्ष्या की भावना में बढ़ोतरी होना विकास का नहीं अपितु पिछड़ेपन की निशानी है। ऐसे में हमें फिर से हंसी, ठिठोली और मजाक करने की जीवन-शैली पर वापस लौटना ही होगा।
लंबे- लंबे,उदास और गंभीर चेहरों से खुशी गायब हो जाती है।माना कि संसार में परेशानियां बहुत अधिक हैं। माना कि राजनीतिक सिस्टम ने हमें बर्बाद कर दिया है।माना कि हमारे यहां पाखंड, ढोंग, दिखावा और भ्रष्टाचार बहुत बढा हुआ है।माना कि हमारी शिक्षा - व्यवस्था दुनिया में सर्वाधिक पिछडी हुई है।माना कि बेरोजगारी ने युवावर्ग की कमर तोड दी है। लेकिन इन सबके बावजूद हम रोना और हंसना तो नहीं छोड़ सकते हैं। यदि हमें जीवित रहना है,तो अपनी शारीरिक - मानसिक जरुरत अनुसार हंसने और रोने को अपनी दिनचर्या में स्थान अवश्य दें। हंसना और रोना दोनों हमें गहरे तल तक प्रभावित करते हैं।बस, ध्यान यह रखें कि रोना कहीं घर के किसी कोने में या खेत में या कहीं भी एकांत में। जहां तक हंसने की बात है,जहां भी उचित मौका मिले, वहां पर अवश्य हंसना। लेकिन किसी के दुख,दर्द, परेशानी,टोटे,मौत या बुरे वक्त में बिल्कुल मत हंसना। सामाजिक दायित्व निभाना सबकी जिम्मेदारी है। समाज में आज भी किसी के रोने को कमजोरी और हंसने को लड़कपन की निशानी मानते हैं। परस्पर संबंधों में धोखाधड़ी प्रचुरता से मौजूद है। पारिवारिक संबंधों में खटास है।पती पत्नी में भी अनबन रहती है।संतान भी धोखा देने के लिये तैयार है।तलाक की औसत हर साल बढ रही है।लिव इन रिलेशनशिप में बढ़ोतरी हो रही है।साल- छह महीने साथ व्यतीत करके जोडे कोर्ट में मुकदमे कर रहे हैं।नकली दहेज के मुकदमे दर्ज हो रहे हैं।राजनीतिक, प्रशासनिक,धार्मिक, आर्थिक,शैक्षिक, व्यापारिक, रोजगार,खेती-बाड़ी आदि की हालत बहुत खराब है। ऐसे विषम हालात में आपको प्रतिपल हंसने और रोने के लिये तैयार रहना चाहिये। जीने का यही एकमात्र आधार आपको विषम परिस्थितियों में जीवनेच्छा प्रदान करने में समर्थ है। वरना सांसारिक संघर्ष की चक्की में पिसते- पिसते बर्बाद हो जाओगे या फिर ऐसे ही असमय मर जाओगे।
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डॉ. शीलक राम आचार्य
दर्शनशास्त्र- विभाग
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय
कुरुक्षेत्र-136119

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