Saturday, December 9, 2023

राष्ट्र्भाषा चिन्तन

              बीसवीं एवं इक्कीसवीं सदी का सबसे बड़ा एवं विडंबनापूर्ण आश्चर्य यदि किसी घटना को कहना हो तो वह यह है कि भारत सन् 1947 ई॰ में स्वतंत्र हो गया था तथा वह आज एक स्वतंत्र राष्ट्र है । ‘स्वतंत्र’ शब्द इतना कठिन नहीं है कि इसके अर्थ को भलि तरह से न समझा जा सके । स्वतंत्र का अर्थ है अपने तंत्र में जीना । लेकिन हमारे यहां अपना तंत्र कहा है? हम जिस तंत्र में जी रहे हैं। क्या वह हमारा अपना है? हमने जिस तंत्र को 26 जनवरी 1950 को स्वीकार किया था तथा जिस तंत्र के तहत अंग्रेजों ने हमें­ आजादी प्रदान की थी, उस तंत्र में हमारा क्या है? कोई आठवीं पढ़ा छात्र भी यह बता देगा कि उस तंत्र में­ हमारा कुछ भी नहें है । भारत सरकार अधिनियम 1935 तथा जिस संविधान को हमने 26 जनवरी 1950 ई॰ को भारत में­ स्वीकार किया है - उन दोनों को पढ़ कर किसी अनपढ़ व्यक्ति को भी सुना दो, तो वह भी यही कहेगा कि ये दोना­ तो एक ही हैं । इन दोनों­ में­ कोई अंतर है ही नहें । भारत सरकार अधिनियम 1935 में­ जो व्यवस्थाएं की गई हैं वे सारी की सारी भारत को और भी कई शादिया­ तक गुलाम बनाए रखने के लिए की गईं थी । उसके अंतर्गत सारे कानून ब्रिटेन के शासन को बनाए रखने, मजबूती प्रदान करने एवं पाश्चात्य विचारधारा से प्रेरित हैं। भारतभूमि से जुड़ा हुआ, भारतीय जीवनमूल्यों से प्रेरित एवं निर्देशित, भारतीय जीवनशैली में­ सुधार हेतु या भारत के कल्याण हेतु उसमें­ कुछ भी नही है । उन सब कानूनों में­ भारतीयता है ही नहीं। भारतीय चेतना का स्पंदन उसम­ कहीं भी नहीं होता है । पूर्ण आजादी की, देश की अस्मिता की, देश की आन-बान-शान की, मातृभाषा की, भारतीय सनातन जीवन- मूल्यों ­ की, भारतीय सनातन संस्कृति की, शिक्षा पद्धति की, औषधिशास्त्र की, चाल-चलन की तथा भारतीय विज्ञान की इन्ह­ कोई भी चिंता नहीं  थी। ये तो येन-केन-प्रकारेण किसी मात्रा में ­ऐसी आजादी चाहते थे जिसके अंतर्गत इनको मंत्रीपद मिल जाएं। क­द्रीय सत्ता बेशक अंग्रेजों­ के साथ रहे-इन्हें इसमें­ कोई आपत्ति नही थी। अंग्रेज पहले की तरह इस राष्ट्र को लूटकर इसके धन को ब्रिटेन में ले जाते रहे-इन्हें इसमें­ कोई आपत्ति नहीं थी

            भारत को स्वतंत्र हुआ तब कहा जाता जबकि इसका अपना कोई स्वयं का तंत्र हो । सारे संसार से उधार में­ लिए तंत्र को यदि हम अपना कह­ तो यह किसी भी तरह से ठीक नहीं है । जिस तंत्र के अंतर्गत हम­ आजादी दी गई है, जिस तंत्र के कानून हमारे भारत में­ पिछले साढ़े छह दशक से लागू हैं तथा जो तंत्र अंग्रेजों ने हमें­ दिया है वह सारा का सारा उधारा एवं विभिन्न देशों से चुराया गया है । हमारा तंत्र, हमारा संविधान, हमारे कानून आदि सब हमारी भूमि, हमारे राष्ट्र, हमारे जीवन-मूल्यों एवं हमारी सभ्यता-संस्कृति के अनुकूल होने चाहिएं । अमरीका, जर्मनी, रूस, आयरलैंड, आस्ट्रेलिया आदि देशों के संविधानों से कुछ धाराएं चुराई गई तथा इनको अंग्रेजों द्वारा निर्मित भारत सरकार अधिनियम 1935 से जोड़ दिया गया । हमारे सारे के सारे कानून विदेशी हैं । उन कानूनों­ को हमारे सिर पर रखकर हम­ आजादी देने का ढों­ग कर दिया गया । अंग्रेजी सभ्यता में­ पले-बढ़े, शिक्षित-दीक्षित एवं उसी को भारत हेतु कल्याणकारी एवं वरदानस्वरूप मानने वाले दादा भाई नौरोजी, गोपाल कृष्ण गोखले, मोतीलाल नेहरू, गांधी, नेहरू आदि ने कभी भी भारत की आत्मा को स्पर्श करने का प्रयास किया ही नहीं । लंगोटी लगाने से या अहिंसा, सेवादि की बातें करने से ही कोई व्यक्ति भारतीय नहीं हो जाता । इनमें  से किसने भारत की राष्ट्रभाषा, भारत के जीवन- मूल्यों ­, भारत के दर्शनशास्त्र, भारत के कानून, भारत के औषधशास्त्र, भारत की न्याय-व्यवस्था, भारत के खान-पान, भारत के पहनावे एवं भारत के विज्ञान को बचाने एवं उसे भारत हेतु आवश्यक बताने का प्रयास किया? किसी ने भी नहीं । सब के सब अंग्रेजी पढ़े-लिखे, अंग्रेजी जीवन-शैली को सर्वश्रेष्ठ मानने वाले, अंग्रेजी जीवन-मूल्यों को भारत हेतु कल्याणकारी मानने वाले, अंग्रेजी भाषा के समर्थक तथा भारत को सांप-सपेरा­ का देश मानने वाले थे । कहने का तात्पर्य यह है कि ये सारे के सारे लार्ड मैकाले द्वारा निर्देशित थे । यदि भारत को नष्ट करना है तो इसकी संस्कृति के मूल स्तंभा­ पर कुठाराघात करो - इस सोच के शिकार होकर ये लोग कार्य कर रहे थे । इसी षड्यंत्र का दुष्परिणाम है कि भारत की आजादी के साढे छह दशक बाद भी गुलामी के सभी प्रतीक भारत की राजधानी दिल्ली समेत पूरे राष्ट्र में­ मौजुद हैं । हम­ शर्म आती होगी लेकिन उनको नहीं आती है ।

            भारत की गुलामी को स्थायित्व एवं दृढ़ता देने के लिए जहां पर गुलामी के सबसे मजबूत प्रतीक अंग्रेजी भाषा को पिछले दशकों से जो महत्त्व व सम्मान दिया जाता रहा है - वह एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है । उस रणनीति का एक तार हमारे सत्ता के लोभी पूर्व व वर्तमान के नेताओं  से होते हुए लार्ड मैकाले तक जा जुड़ता है, जबकि दूसरा तार एक षड्यंत्र के तहत देश के अधिकांश संसाधनों­ पर कुछ ही लोगों का कब्जा बनाए रखने से जा जुड़ता है । देश का नागरिक पिसता रहे, मरता रहे या अन्य कोई जुल्म उन पर होता रहे - इन्ह­ इससे कोई मतलब नहीं है । सर्वसाधनसंपन्न यह राष्ट्र भिखारियों  ­का राष्ट्र, सर्वशक्तिमान यह देश कायर व पलायनवादी, सर्वप्रतिभावान यह देश नकलची एवं तोतारटंत, सर्व तर्कवान यह देश अंधविश्वासी एवं विश्वगुरु यह देश अनपढ़ो का राष्ट्र वैसे ही नहीं  बन गया । इस सबके पीछे एक गहरा षड्यंत्र काम कर रहा है । यह षड्यंत्र कई सदी पुराना है । इस षड्यंत्र का हिस्सा मुगल, मंगोल, इस्लामी हमलावर, पुर्तगाली, अंग्रेज एवं उनकी भारतीय संतान­ हमारे तथाकथित कुछ महान नेता - सभी के सभी हैं । आज भी यह षड्यंत्र चल रहा है । यदि यह षड्यंत्र नहीं चल रहा होता तो कोई थोड़ी सी बुद्धि वाला व्यक्ति बता चलता है कि हमारे पास विश्वभाषा संस्कृत एवं हिंदी होने के बावजूद भी क्या­ नहीं उन्हें राष्ट्रभाषा का महत्त्व प्रदान किया जा रहा है? क्या­ भारतीय भाषाओं को अंग्रेजी का गुलाम बना दिया गया है? क्या­ नहीं भारतीय विश्वविद्यालयों­ में­ विज्ञान, प्रबंधन एवं चिकित्सा-विज्ञान की शिक्षा हिंदी मे या अन्य भारतीय भाषाआ­ में­ करवाई जा रही है? क्या­ नहीं हमारे न्याय के मंदिरों  में­ हम­ न्याय हमारी मातृभाषा में मिलता है? हमारे बारे में­ निर्णय होता है लेकिन हम­  ही नहीं समझ में­ आता कि क्या बोला जा रहा है । हमारे भाग्य का फैसला होता है और हमें उसे समझ नहीं पाते हैं । हमारे भाग्य का फैसला एक ऐसी विदेशी भाषा में­ होता है जिसको इस देश के 1% लोग ही मुश्किल से समझ पाते हैं । क्या­ नहीं  हमारे देश के कर्णधार कहलाने वाले नेता देश की राष्ट्रभाषा को महत्त्व दे रहे हैं? क्या हासिल करना चाहते हैं वे इससे? देश के सत्ता-लोलुप नेता वोट तो मांगते हैं राष्ट्र की भाषाओं में­ लेकिन जब संसद एवं विधान सभाओं­ में­ देश की समस्याओं पर बहस होती है तो वह एक विदेशी भाषा अंग्रेजी में­ होती है । जिन भाषाशास्त्रियों ने हमें­ 200 वर्ष तक गुलाम बनाए रखा, हमारे राष्ट्र को जमकर लूटा, हमारी सभ्यता व संस्कृति को नष्ट करने हेतु अनेक घृणित कुकृत्य किए - उनकी ही की भाषा हम पर लादे जा रही है । पहले यह कार्य अंग्रेज कर रहे थे लेकिन अब यही कार्य हमारे हिंदुस्तानी भाई कर रहे हैं । धार्मिक, नैतिक, दार्शनिक सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक एवं आध्यात्मिक जो क्षति इन्हा­ने इस राष्ट्र की है तथा अब भी बेखौफ होकर कर रहे हैं - इसका जितना विरोध किया जाए, उतना ही कम है । दुनिया की सर्वाधिक बोली जाने वाली दूसरी भाषा हिंदी की उपेक्षा कहीं विदेश में­ हो तो बात समझ में­ आती है परंतु जब भारतीय ही इसका विनाश करने पर तुले हा­ तो किसे क्या कहा जाए? इनकी यह सोच व जीवन-शैली देशद्रोह से कम नहीं है ।

            हमारे राष्ट्र के सभी नागरिक अपनी राष्ट्रभाषा में­ शिक्षा ग्रहण करके देश को प्रत्येक क्षेत्र में­ विकास की ऊंचाइया­ तक ले जाएं, हम सहजता से व सरलता से किसी भी संकाय की शिक्षा अपनी राष्ट्रभाषा में­ प्राप्त करके मनचाहे अवसरा­ का लाभ उठा सकें­ - यदि ऐसा हो जाए तो कितना अच्छा हो । यह सब हो सकता है । परंतु इसके रास्ते में­ बाधा है तो केवल हमारे नेताओं की गुलामी की मानसिकता तथा  साधारण जन गहरी निद्रा में­ सोए रहना है । नेता यदि प्रयास नहीं कर रहे तो साधारण जनता तो जाग ही सकती है । जागो भारत की जनता - जनार्दन ! राष्ट्रभाषा हिंदी को भारत के प्रत्येक क्षेत्र में­ लागू करने हेतु साधारण जन के जागने की जरूरत है । हिंदी भाषा में  अपना बल तो है ही जिसके बल वह आज तक जनभाषा बनी हुई है । घोर उपेक्षा के बावजूद भी हिंदी अपना विस्तार कर रही है - यह किसी चमत्कार से कम नहीं है । यह चमत्कार सनातन आर्य वैदिक हिंदू संस्कृति के भीतर निहित अद्वैत चेतना का प्रकटीकरण है । जिस भाषा के कनिष्ठ व वरिष्ठ शिक्षक भी उसमें­ हस्ताक्षर करने से डर­ व अपने को अपमानित महसूस कर­-उनकी मूढ़ता के बारे म­ क्या कहें­? हिंदी के साहित्यकार व प्रोफेसर हिंदी में­ हस्ताक्षर करने में­ शर्म महसूस कर­ तो इसे दोगलेपन एवं लालच की पराकाष्ठा ही कही जाएगी । हमारे भारत में­ यह हो रहा है। चमत्कार देखिए कि हर तरफ से घोर उपेक्षा के बावजूद भी हिंदी आगे बढ़ रही है । देशवासी यदि थोड़ा भी ध्यान दें तथा अपने नेताओं पर दबाव बनाएं तो वह शुभ दिन दूर नहीं होगा, जिस दिन हमारी न्याय-व्यवस्था, विज्ञान, चिकित्सा-विज्ञान, प्रबंधन एवं इंजीनियरिंग की शिक्षा हम अपनी राष्ट्रभाषा हिंदी में­ पाकर अपने एवं अपने राष्ट्र के जीवन को विकास व समृद्धि की नई ऊंचाईया­ पर ले जा सकेंगे । कोई महानायक भारत में अवश्य आएगा, जोकि ऊपर से हमारी व्यवस्था को ठीक करके राष्ट्र के प्रत्येक क्षेत्र में राष्ट्रवादी विचारा­ को जगाकर राष्ट्र के जीवन में­ प्राण फूंक देगा । राष्ट्रभाषा हिंदी का भविष्य उज्ज्वल है । इसके इस भविष्य के रास्ते में जिसने भी बाधाएं खड़ी की, उसका विनाश सुनिश्चित है। समस्त राष्ट्र को एक सूत्र में पिरोने का कार्य इस समय केवल राष्ट्रभाषा हिंदी ही कर सकती है। एक राष्ट्रभाषा हिंदी को सही मायनों में­ भारत में­ लागू करने से भारत की अनेक समस्याएं स्वयंमेव समाप्त हो जाएंगी । पूर्वकाल में­ यह भूमिका संस्कृत भाषा ने निभाई थी तथा आज यह भूमिका केवल मात्र हिंदी भाषा ही निभा सकती है । हिंदी के शिक्षकों­ पर भी बहुत बड़ा दायित्व है कि वे कुंभकरणी निद्रा से जाग­ तथा अन्यों­ को भी जगाएं ।

"आचार्य अकादमी चुलियाणा, रोहतक (हरियाणा) द्वारा 2023 के हिन्दी साहित्य पुरस्कारों की घोषणा"


आचार्य अकादमी चुलियाणा, रोहतक (हरियाणा) द्वारा 2023 के हिन्दी साहित्य पुरस्कारों की घोषणा कर दी गई है। श्रीमती हेमलता हिन्दी साहित्य (गद्य, पद्य) पुरस्कार के अंतर्गत 2100/-रुपये का प्रथम सांझा पुरस्कार डॉ. नीलिमा तिग्गा "नीलांबरी", अजमेर, राजस्थान की पुस्तक बलिवेदी पर व डॉ. अजीत कुमार जैन, आगरा, उत्तर प्रदेश की पुस्तक रसिक प्रणय को, 1500/- रुपये का द्वितीय सांझा पुरस्कार डॉ. पवनेश ठकुराठी, अल्मोडा, उत्तराखंड की पुस्तक आदमी कब जिंदा होता है व चंद्रेश कुमार छतलानी, उदयपुर, राजस्थान की पुस्तक हाल-ए-वक्त को तथा 1100/-रुपये का तृतीय सांझा पुरस्कार सारिका मूंन्दडा, पुणे महाराष्ट्र की पुस्तक यूं लगता है अब...., व बलवान सिंह सावी, कैथल, हरियाणा की पुस्तक तमाशा जारी है को दिया गया। इसी वर्ग में मंजू भारद्वाज कृष्णप्रिया, झारखंड की पुस्तक एहसासों का समंदर, अशोक व्यास, मध्य प्रदेश की पुस्तक टिकाऊ चमचों की वापसी, यशोधरा, देवास, मध्य प्रदेश की पुस्तक तरंगिणी,  डॉ. प्रवीण कुमार सक्सेना "उजाला"  कुशलगढ, राजस्थान की पुस्तक तन वतन के लिए, सच्चिदानंद तिवारी शलभ, लखनऊ, उत्तर प्रदेश की पुस्तक दलहन फ़िलहन चाउर पिसान, डॉ. बालकृष्ण रामभाऊ महाजन, नागपुर, महाराष्ट्र की पुस्तक आप मेरे सब कुछ, विनोद वर्मा "दुर्गेश", भिवानी, हरियाणा की पुस्तक पंटरबाज को सान्तवना पुरस्कार भी दिया गया। स्वामी दयानंद सरस्वती दर्शनशास्त्र, राष्ट्रवाद, सनातन वैदिक धर्म व संस्कृति के अंतर्गत 2100/-रुपये का प्रथम सांझा पुरस्कार राजीव आचार्य, लखनऊ, उत्तर प्रदेश की पुस्तक मेरी अयोध्या मेरा रघुवंश को, दत्तप्रसाद द. जोग, गोवा की पुस्तक गीत रामायण को, 1500/- रुपये का द्वितीय सांझा पुस्कार डॉ. सरोजिनी वेडंगि, विशाखापट्टम, आंध्र प्रदेश की पुस्तक दलित चेतना और दलित महिला कहानीकार को व डॉ. सुनीता बनसोड (भगत), चन्द्रपुर, महाराष्ट्र की पुस्तक भारतीय भाषाओं में अनूदित दलित साहित्य तथा 1100/-रुपये का तृतीय सांझा पुरस्कार डॉ. दीपक, होशियारपुर, पंजाब की पुस्तक नागार्जुन का काव्य, जीवन मूल्यों का संदर्भ को व डॉ. विनीत विद्यार्थी दर्शनशास्त्री, बरेली, उत्तर प्रदेश को दिया गया। चौधरी छोटूराम किसान, खेतीबाडी, मजदूरी व शिक्षा पुरस्कार के अंतर्गत 2100/-रुपये का प्रथम पुरस्कार डॉ. रणवीर सिंह, दिल्ली की पुस्तक वर्षा जल संचयन एवं जल संरक्षण, 1500/- रुपये का द्वितीय सांझा पुरस्कार विनय कंसल, आगरा की पुस्तक पर्यावरण अध्ययन, डॉ. संजीव कुमारी, हिसार, हरियाणा की पुस्तक को तथा 1100/-रुपये का तृतीय पुरस्कार डॉ दलीप सिंह बिष्ट, रुद्रप्रयाग, उत्तराखंड की पुस्तक उत्तराखंड विकास एवं आपदाएं (धर्म, आस्था, संस्कृति एवं परम्परायें) को दिया गया। बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर समानता व समानता पुरस्कार के अंतर्गत 2100/-रुपये का प्रथम सांझा पुरस्कार विजी. वी, एरणाकुलम, केरल की पुस्तक डॉ समकालिन साहित्य:विमर्श के आयाम को व रतन कुमारी वर्मा, इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश की पुस्तक स्त्री मुक्ति का संघर्ष सेवासदन, सौ साल बाद एक विश्लेषण, 1500/- रुपये का द्वितीय सांझा पुरस्कार डॉ. अजय कुमार मौर्य, सारनाथ, वाराणसी की पुस्तक चरियापिटक व गौतम इलाहाबादी, रेवाडी, हरियाणा की पुस्तक बेटी शीतल छांव सी को तथा 1100/-रुपये का तृतीय सांझा पुरस्कार डॉ. अखण्ड प्रकाश, कानपुर, उत्तर प्रदेश की पुस्तक शारदा शतक को व शशि पाण्डेय, नोएडा, उत्तर प्रदेश की पुस्तक बकौली गंज को दिया गया। इसी वर्ग में डॉ. मन्तोष कुमार भट्टाचार्य, जबलपुर, मध्य प्रदेश की पुस्तक आशीर्वाद को सांत्वना पुरस्कार भी दिया गया। राजीव भाई दीक्षित  भारतीय इतिहास, आयुर्वेद, स्वदेशी व राष्ट्रभक्ति पुरस्कार के अंतर्गत 2100/-रुपये का प्रथम सांझा पुरस्कार डॉ संदीप शर्मा, हमीरपुर, हिमाचल प्रदेश की पुस्तक माटी तुझे पुकारेगी को व विजय शंकर मिश्र "भाष्कर" लखनऊ, उत्तर प्रदेश की पुस्तक भए प्रगट कृपाला को, 1500/- रुपये का द्वितीय सांझा पुरस्कार डॉ. कमलकिशोर गुप्ता, नागपुर, महाराष्ट्र की पुस्त्क हिन्दी साहित्य : चिंतन के विविध आयाम व प्रवीण कुमार शर्मा, भरतपुर, राजस्थान की पुस्तक प्रेम का पुरोधा को तथा 1100/-रुपये का तृतीय सांझा पुरस्कार डॉ अशोक, पटना, बिहार की पुस्तक शेफालिका (लघुकथा) व प्रमोद शर्मा, सीहोर, मध्य प्रदेश की पुस्तक कार्यालयीन प्रक्रिया एवं पत्राचार को दिया गया। इसी वर्ग में सत्यवीर नाहडिया, रेवाडी, हरियाणा की पुस्तक हिन्दी पत्रकारिता के मसीहा, गुप्त जी गुडीयानी और गुमनामी की पीर को, अनिता मंदिलवार सपना, सरगुजा, छतीसगढ की पुस्तक स्वप्न सिदूंरी को, अंजनी द्विवेदी काव्या, उत्तर प्रदेश की पुस्तक मन के मोती को व रामजीमल शिक्षाविद, बरेली, उत्तर प्रदेश की पुस्तक काव्य संसार को सान्तवना पुरस्कार भी दिया गया। 5100 रुपये का पत्रकार किरण भूषण सम्मान 2023 जो कि किसी अलपसंख्यक विद्वान को दिया जाता है। इस वर्ष के विजेता है प्रोफेसर पठान रहीम खान (हिन्दी विभाग) उर्दू विश्वविद्यालय हैदराबाद। गौरवत्व है कि आचार्य शीलक राम के संचालन में आचार्य अकादमी चुलियाणा पिछले बारह वर्षों से साहित्य, संस्कृति, धर्म, दर्शन, योग व हिन्दी के प्रसार प्रचार के लिए लगातार कार्य व कर रही है। इसके साथ-साथ प्रमाण अन्तरराष्ट्रीय मुल्यांकित त्रैमासिक रिसर्च जर्नल (ISSN:2249-2976) व चिन्तन अन्तरराष्ट्रीय मुल्यांकित त्रैमासिक रिसर्च जर्नल (ISSN:2229-7227), हिन्दू अन्तर्राष्ट्रीय मुल्यांकित त्रैमासिक रिसर्च जर्नल्स (ISSN : 2348-0114), आर्य अन्तर्राष्ट्रीय मुल्यांकित त्रैमासिक रिसर्च जर्नल्स (ISSN: 2348 – 876X), द्रष्टा अन्तर्राष्ट्रीय मुल्यांकित त्रैमासिक रिसर्च जर्नल्स (ISSN: 2277-2480) व स्वदेशी हिन्दी साहित्य शोध पत्रिका (ISSN : 2319 – 703X)   का प्रकाशन भी लगातार कर रही है। आचार्य शीलक राम अध्यक्ष आचार्य अकादमी चुलियाणा की देखरख में हर साल खेल प्रतियोगिताओं का आयोजन भी करवा रही है। उपरोक्त सभी विजेताओं व प्रतिभागियों को आचार्य अकादमी के अध्यक्ष आचार्य शीलक राम व सभी सदस्यों की ओर से बहुत-बहुत बधाई। सभी विजेताओं को प्रमाण-पत्र, इनाम राशि का ड्राफ्ट व स्मृति-चिन्ह डाक द्वारा भेजे जाएंगे। सांत्वना पुरस्कार के लिए प्रमाण-पत्र व स्मृति-चिन्ह भेजे जाएंगे। तथा सभी प्रतिभागियों को प्रमाण-पत्र भी डाक द्वारा भेजे जाएंगे।

Sunday, November 19, 2023

चौथी अखिल भारतीय हिंदी साहित्य पुरस्कार प्रतियोगिता

 

*आचार्य अकादमी चुलियाणा, रोहतक (हरियाणा)* (पंजीकृत)

*चौथी अखिल भारतीय हिंदी साहित्य पुरस्कार प्रतियोगिता*

भारत की प्रसिद्ध दार्शनिक, साहित्यिक, धार्मिक, राष्ट्रवादी, हिन्दी के प्रचार-प्रसार को समर्पित व चिन्तन अन्तर्राष्ट्रीय मुल्यांकित त्रैमासिक रिसर्च जर्नल्स (ISSN: 2229-7227) प्रमाण अन्तर्राष्ट्रीय मुल्यांकित त्रैमासिक रिसर्च जर्नल्स (ISSN: 2249-2976), हिन्दू अन्तर्राष्ट्रीय मुल्यांकित त्रैमासिक रिसर्च जर्नल्स (ISSN : 2348-0114), आर्य अन्तर्राष्ट्रीय मुल्यांकित त्रैमासिक रिसर्च जर्नल्स (ISSN: 2348 – 876X) व द्रष्टा अन्तर्राष्ट्रीय मुल्यांकित त्रैमासिक रिसर्च जर्नल्स (ISSN: 2277-2480) प्रकाशित करने वाली संस्था `आचार्य अकादमी चुलियाणा, रोहतक (हरियाणा) द्वारा राष्ट्रभाषा हिन्दी में अग्रलिखित विषयों/संकायों की मौलिक पुस्तकें विभिन्न वार्षिक पुरस्कारों हेतु आमन्त्रित की जाती हैं-

1. *श्रीमती हेमलता* हिन्दी साहित्य (गद्य, पद्यादि) पुरस्कार

2. *स्वामी दयानन्द सरस्वती* दर्शनशास्त्र पुरस्कार, स्वदेशी, राष्ट्रवाद, सनातन

   वैदिक धर्म व संस्कृति पुरस्कार

3. *चौधरी छोटूराम* किसान, मजदूर और शिक्षा पुरस्कार

4. *बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर* समानता व समता पुरस्कार

5. *राजीव भाई दीक्षित*  भारतीय इतिहास, आयुर्वेद, स्वदेशी व राष्ट्रभक्ति पुरस्कार

नियम व शर्तें :

1. पुरस्कार हेतु अपनी प्रकाशित पुस्तक की दो प्रतियां अवश्य भेजें।

2. विभिन्न विषयों/ संकायों की पुरस्कार हेतु भेजी जाने वाली पुस्तकें राष्ट्रभाषा

   हिन्दी में ही लिखी हुई होनी चाहिए।

3. पुरस्कार प्रदान करने हेतु ‘आचार्य अकादमी’ का निर्णय अन्तिम होगा।

4. पुस्तकें आचार्य शीलक राम, आचार्य अकादमी, चुलियाणा, रोहज (रोहतक) हरियाणा-124501 के पते पर *30 मार्च 2023* तक registered/speed post द्वारा पहुंच जानी चाहिए।

5. पुरस्कृत रचनाओं के लेखकों को चारों विधाओं में प्रथम पुरस्कार 2100/-, द्वितीय पुरस्कार 1500/-, तृतीय पुरस्कार 1100/- प्रमाण-पत्र व स्मृति चिन्ह प्रदान किए जाएंगे।

6. अस्वीकृत रचनाएं वापिस नहीं भेजी जाएंगी।

7. लेखकों द्वारा लिखित व किसी भी प्रकाशक से प्रकाशित (ISBN सहित) पुस्तकें विवरणात्मक न होकर मौलिक, तार्तिक, आलोचनात्मक, समीक्षात्मक व राष्ट्रवादी भावनाओं से ओतप्रोत होनी चाहिए।

8. पुस्तकें  वर्ष 2020 से 2022 के बीच प्रकाशित होनी चाहिए।

9. किसी भी तरह के शंका समाधान हेतु आचार्य शीलक राम, आचार्य अकादमी चुलियाणा रोहज, (रोहतक) हरियाणा-124501, मोबाईल 9813013065 पर संपर्क करें या  e mail id shilakram9@gmail.com पर संपर्क करें।

10. उपरोक्त प्रतियोगिता निशूल्क है।

विनीत :

आचार्य शीलक राम

अध्यक्ष, आचार्य अकादमी

चुलियाणा, रोहतक (हरियाणा)

 

Monday, November 13, 2023

 आचार्य शीलक राम द्वारा संचालित आचार्य अकादमी चुलियाणा, रोहतक (हरियाणा) द्वारा आयोजित चौथी अखिल भारतीय हिंदी साहित्य पुरस्कार प्रतियोगिता 2023 का परिणाम घोषित कर दिया गया है। सभी विजेताओं को आचार्य अकादमी के अध्यक्ष आचार्य शीलक राम व सभी सदस्यों की ओर से बहुत-बहुत बधाई। सभी विजेताओं को प्रमाण-पत्र, इनाम राशि का ड्राफ्ट व स्मृति-चिन्ह डाक द्वारा भेजे जाएंगे। सांत्वना पुरस्कार के लिए प्रमाण-पत्र व स्मृति-चिन्ह भेजे जाएंगे। तथा सभी प्रतिभागियों को प्रमाण-पत्र भी डाक द्वारा भेजे जाएंगे।