Thursday, January 15, 2026

'दर्शनशास्त्र' विषय स्थापित अव्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह लगाने का हौंसला देता है (The subject of 'Philosophy' gives courage to question the established order)

लूटेरे फिरंगियों से आजादी के पश्चात् भारत में सभी संप्रदायों में खुद को परस्पर एक -दूसरे संप्रदाय से पुराना सिद्ध करने की प्रतियोगिता चल रही है।जैसा पुराना होना सत्य होने की गारंटी बन गई हो। जैसे पुराना होना प्रामाणिक होने की कसौटी बन गई हो।जो जितना पुराना,वह उतना ही प्रामाणिक और प्रासंगिक।इस प्रकार की बेवकूफी जोरों से चल रही है। इनमें से अधिकांश को जीवनमूल्यों को आचरण में उतारने से कोई मतलब नहीं है।इनको अपने अनुयायियों के चरित्र,चाल, चेहरे, आचरण, व्यवहार से कोई भी लेना -देना नहीं है।बस, संख्या बल और पुराना होने का महत्व रहा गया है।जो जितना पुराना तथा जिसके पास जितनी अधिक संख्या हो,वह उतना ही अधिक प्रामाणिक और स्वीकार करने योग्य है। विभिन्न प्रकार के प्रमाणों को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत करने में अधिकांश संप्रदायों ने अनेकों व्यक्तियों को लगा रखा है।इनको भारी भरकम फीस दी जाती है।झूठे, भेदभावपूर्ण, पूर्वाग्रहग्रस्त और मनघड़ंत आंकडों को तैयार करके अंधभक्तों को सौंप दिया जाता है।ये अंधभक्त बिना कोई पारिश्रमिक लिये सोशल मीडिया पर इस तैयार बकवास की जुगाली करते रहते हैं।इन पर कोई रोक-टोक नहीं होती है। सनातन धर्म,संस्कृति,दर्शनशास्त्र, इतिहास,नीतिशास्त्र, तर्कशास्त्र,समाजशास्त्र,
चिकित्साशास्त्र, ज्योतिषशास्त्र,गणितशास्त्र,शिक्षा,पुरातन ग्रंथों और महापुरुषों के संबंध में अनाप-शनाप कुछ भी सोशल मीडिया पर परोसा जा रहा है। सिस्टम को क्योंकि सिर्फ अपने वोट बैंक से मतलब है - वह इस कुकर्म को होने दे रहा है। सिस्टम की निष्ठा सुशासन,स्वशासन और गुणशासन में न होकर लंबे समय तक खुद को सत्तासीन बनाये रखना है। जिन वायदों को चुनाव पूर्व में बार बार दोहराकर सिस्टम सत्ता पर कब्जा करने में सफल रहा था,सत्ता मिलने पर जानबूझकर उन वायदों की घोर उपेक्षा होती रही है। तथाकथित बड़े और विभिन्न संप्रदायों के अगुआ कहलवाने लोग हर तरह से भ्रष्ट  सिस्टम से समझौता कर लेते हैं।हम तुम्हें थोक में अपने अंधभक्तों के वोट  दिलवायेंगे और तुम हमें खुलकर भोग- विलास के साधन प्रदान कर देना। राष्ट्र, धर्म, संस्कृति,सुशासन, स्वशासन, स्वभाषा, नैतिकता, आचरण, सुरक्षा,शिक्षा, रोजगार आदि जायें भाड़ में।महाआश्चर्य तो तब होता है जब कल पैदा हुये कोई संप्रदाय के गुरु खुद को दुनिया का सबसे पुरातन संप्रदाय बताने लगते हैं। ध्यान रहे कि राजसत्ता,मजहबसत्ता और धनसत्ता का मजबूत समझौता भारत सहित पूरे एशिया महाद्वीप को बर्बाद किये दे रहा है।या तो आप इस गठबंधन के गठबंधन में सम्मिलित हो जाओ या फिर चुप बैठे रहो। यदि आपने इसका विरोध किया तो आपकी खैर नहीं है। किसी को पता नहीं आपके साथ क्या दुर्व्यवहार किया जायेगा। किसी को मालूम नहीं कि आपको कहां अधमरा करके फेंक दिया जायेगा।पता नहीं आपकी कब किसी सड़क दुर्घटना में मौत हो जाये। अपने मजहब, अपने संप्रदाय, अपने मत और अपने विश्वास को अंधविश्वास में बदलकर उसे सबसे पुराना और वैज्ञानिक सिद्ध करने पर पूरा जोर लगा दो। किसी की भी मत सुनो।एक ही झूठ को बार -बार दोहराओ। अपने वर्ग,जाति और विश्वास के लोगों का माईंड वाश करने का इससे बढ़िया कोई तरीका नहीं है।आपके ऊपर धनवर्षा,आशीर्वचन वर्षा और भोगसामग्री की मूसलाधार वर्षा होने लगेगी। यदि वास्तव में आपमें प्रतिभा, बुद्धि, तार्किकता, संवेदनशीलता और बुराई का विरोध करने की क्षमता है,तो सच मानिये कि मौजूदा व्यवस्था में आपकी बर्बादी सुनिश्चित है।
 किसी व्यक्ति, वस्तु,स्थान,पूजा- स्थल,संस्था, संगठन,खेल पुरस्कार,खेल मैदान आदि का नाम बदलने मात्र से कोई आमूल बदलाव या क्रांति या परिवर्तन या सृजनात्मक परिणाम आ जायेगा? अच्छे,भले, सदाचारी, नैतिक, आदर्शवादी नाम रखने का अपना महत्व होता है, इससे मना करना भी बेवकूफी होगी। लेकिन केवलमात्र नाम को बदलने या अच्छा नाम रखने मात्र से भी तो सब कुछ नहीं हो जानेवाला है।नाम के अनुकूल कर्म भी तो करने चाहियें। काम तो कोई करना नहीं,बस अच्छे नाम रखकर ही अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लो। इससे कुछ भी सार्थक परिणाम नहीं आयेगा।हां,भ्रम में रहना जरुर शुरू हो जायेगा।नाम बड़े और दर्शन छोटे,सारे आचरण खोटे ही खोटे। जनमानस को बेवकूफ बनाने, जमीनी समस्याओं से जनमानस का ध्यान हटाने तथा वाहियात के कार्यों में जनमानस की ऊर्जा को व्यर्थ गंवाने के लिये यदि पुराने नामों की जगह पर नये नाम रखे जायेंगे,तो इसे धोखाधड़ी ही कहा जायेगा। इसे राष्ट्रघात ही कहा जायेगा। जनता -जनार्दन को यह लगते रहना चाहिये कि सिस्टम कुछ न कुछ विकास के काम कर रहा है। केवल इसके लिये भवनों, इमारतों,कार्यालयों,खेल मैदानों,खेल पुरस्कारों,साहित्यिक पुरस्कारों, संगठनों,विश्वविद्यालयों आदि के नाम बदलना राष्ट्र की जनता के साथ विश्वासघात है। अब्राहम की जगह पर मनु,जरथुष्ट्र की जगह पर श्रीराम,ईसा की जगह पर श्रीकृष्ण,महापद्मनंद की जगह पर चंद्रगुप्त मौर्य,सिकंदर की जगह पर समुद्रगुप्त,बाबर की जगह पर महाराणा सांगा, औरंगजेब की जगह पर शिवाजी, मैकाले की जगह पर ऋषि दयानंद, मैक्समूलर की जगह पर श्री अरविन्द तो होना ही चाहिये। लेकिन मनु,श्रीराम, श्रीकृष्ण, चंद्रगुप्त मौर्य,समुद्रगुप्त, महाराणा सांगा, शिवाजी, ऋषि दयानंद और श्री अरविन्द जैसे काम भी तो करके दिखलाओ।केवल खोखले वायदे करने और नाम बदलने से किसी प्रकार का कोई भी विकास नहीं होने वाला है। हां, कुछ समय के लिये जनमानस को बेवकूफ अवश्य बनाया जा सकता है।रावण का नाम राम करने से क्या रावण राम बन जायेगा?सूअर का नाम गाय रखने से क्या सूअर गाय बन जायेगा? बर्बादी का नाम विकास रख़ने से क्या बर्बादी विकास बन जायेगी?कालू नाम के व्यक्ति का नाम गौरा रखने से क्या कालू गौरा बन जायेगा?
इस्ट इंडिया कंपनी जब भारत आई तो अपने व्यापारिक ठिकानों की सुरक्षा के लिये उसने कयी दशकों तक अपनी प्राइवेट आर्मी बनाये रखी थी। भारत पर कब्ज़ा करने के पश्चात् उसने अन्य आर्मी का निर्माण किया था,जो व्यापारिक ठिकानों की सुरक्षा के साथ भारतीय राज्यों के शासकों के साथ युद्ध लडकर उनसे मनमाना व्यवहार करके लूट-खसोट करने लगी थी।इसी लूट-खसोट के बल पर ब्रिटेन का आर्थिक ढांचा खड़ा किया गया तथा दुनिया के अनेक देशों में युद्ध अभियान संपन्न किये गये।इस प्रकार की प्राइवेट आर्मी अब दोबारा से खडी हो रही हैं। बड़े बड़े उद्योगपति और कोरपोरेट घरानों ने अपनी निजी सेनाएं सुरक्षा एजैंसियों के नाम पर खडी करना शुरू कर दिया है।भारत में भी यह परंपरा फिर से शुरू हो गई है। भारतीय उद्योगपति और कोरपोरेट इस प्रकार की निजी सुरक्षा एजेंसियां खडी कर रहे हैं।अनेक बड़े बड़े कारखाने, बंदरगाह, खदानें और शिक्षा संस्थानों पर इस प्रकार की सुरक्षा एजेंसियों की तैनाती को देखा जा सकता है।यह फिर से ईस्ट इंडिया कंपनी जैसी कंपनियों की शुरुआत लगती है।सच तो यह है कि उद्योगपति और कोरपोरेट घरानों के लिये व्यापार मुख्य होता है। इनके लिये राष्ट्रवाद, राष्ट्रसेवा, राष्ट्र विकास और मानवीयता जैसे शब्दों का कोई मतलब नहीं होता है। इन्हें सिर्फ और सिर्फ अपने व्यापारिक हितों की चिंता होती है।इन व्यापारिक हितों के रास्ते में जो भी आता है,ये उसकी आवाज को दबाने के लिये किसी भी सीमा तक जा सकते हैं।इन पर मैक्यावली,मैकाले, मैक्समूलर,मिल और बैंथम आदि की विचारधारा हावी रहती है।एक समय ऐसा आता है कि ये सरकारी निर्णयों को भी प्रभावित करने लगते हैं। सरकारें इनके संकेतों पर नाचने लगती हैं। ठीक को गलत और गलत को ठीक सिद्ध करने के लिये ऐसे धनाढ्य लोग लोकतंत्र के चौथे खंभे प्रैस को भी अपने प्रभाव में कर लेते हैं।प्रैस भी इनकी कारगुजारियों पर खुलकर कुछ भी नहीं लिख सकता है।एक अवसर ऐसा आता है कि ऐसे लोग लूटेरी इस्ट इंडिया कंपनी का रुप धारण कर लेते हैं। क्योंकि आधुनिक विकास की वजह से विज्ञान और तकनीक का चमत्कारी विकास हुआ है, अतः ये लोग इस्ट इंडिया कंपनी से भी हजारों गुना अधिक खु़ंखार,जुल्मी, लूटेरे, भ्रष्ट,अत्याचारी और राष्ट्रविरोधी सिद्ध होते हैं। ध्यान रहे कि गुलामी कभी भी पुरानी वेशभूषा में नहीं आती है।गुलामी हर बार नयी वेशभूषा और नये ढंगों से आकर अपना नंगा नाच दिखलाती है।अंधभक्ति के आवेश में आकर अंधभक्त स्वयं तो बर्बाद होते ही हैं, इसके साथ - साथ अन्यों को भी लेकर डूबते हैं।तीसरी दुनिया के देशों में ऐसे ही हालात उत्पन्न हो गये हैं। लूटपाट और भ्रष्टाचार का समर्थन करने वाले अंधभक्त लोगों को बहुत बाद में यह मालूम होता है कि वो गुलाम बन चुके हैं। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।जो बर्बादी होनी होती है,वह हो चुकी होती है।अब पछताये होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत?
यह वास्तविकता है कि जिनको भी किसी राष्ट्र पर लंबे समय तक शासन करना होता है,उनको जनता -जनार्दन से शिक्षा का अधिकार छीन लेना पड़ता है। उनको जनमानस से दार्शनिकीकरण,तार्किकता, जिज्ञासा, प्रश्न करने की शक्ति छीन लेना पड़ता है। यदि लोग दर्शनशास्त्र,तर्कशास्त्र और विज्ञान जैसे विषयों की पढ़ाई- लिखाई करके वर्तमान में व्याप्त राजनीतिक अव्यवस्था पर प्रश्न चिन्ह लगायेंगे तो किसी राजा का शासन लंबे समय तक चल पाना असम्भव हो जायेगा।बस,इसीलिये धुर्त, लूटेरे,शोषक और तानाशाह किस्म के शासक सर्वप्रथम जनमानस को उपलब्ध शिक्षा के ढांचे पर चोंट करते हैं।जब लोग शिक्षित ही नहीं होंगे तो वो प्रश्न ही नहीं उठायेंगे। ऐसे में लंबे समय तक शासन करना संभव हो जाता है।इसके लिये मजहब, संप्रदाय,मत, विश्वास,जाति,भाषा, क्षेत्र आदि को केंद्र में रखकर बहुसंख्यकों की भावनाओं से खिलवाड़ करने को भी माध्यम बनाया जाता है।
 संस्कृत में मनुष्य के लिये कहा गया है ' मननात् मनुष्य:' अर्थात् जो मनन करे,वह मनुष्य कहलाता है।जो मनन नहीं करता है, उसे मनुष्य नहीं कहा गया है।ऐसा व्यक्ति पशु समान है। ऐसा व्यक्ति क्योंकि अपने मन से मनन करके तथा बुद्धि से निर्णय करने की अपेक्षा दूसरे के संकेतों पर चलकर जीवन यापन करता है।इसीलिये उसे पशु कहा गया है।वह पाश से बंधा हुआ होता है।वह दूसरों के बतलाये गये,सुझाये रास्तों पर चलता है। जैसे पशु दूसरों के संकेतों पर गुलामी का जीवन जीता है।वेद की शिक्षा है कि 'मनुर्भव'। लेकिन ऐसे व्यक्ति तो मनुष्य बनने की राह से भटके हुये होते हैं।शोषक धर्माचार्यों, तानाशाह शासकों और सस्ते मजदूर चाहने वाले उद्योगपतियों को तार्किक विश्लेषण करके निर्णय पर पहुंचने वाले नागरिक नहीं चाहियें। ऐसे नागरिक राष्ट्र में किसी भी स्तर पर मौजूद कमियों और अव्यवस्था पर प्रश्न उठाते हैं।भारत सहित यूरोप,अमरीका,रुस,चीन आदि सभी देशों में मौजूद उपरोक्त तार्किक किस्म के लोग सदैव स्थापित भ्रष्ट राजसत्ता, मजहबसत्ता और धनसत्ता के लिये खतरा बने रहते हैं।
उन्नीसवीं सदी में धार्मिक स्तर पर व्याप्त पाखंड, ढोंग और गुरुडम पर प्रश्न उठाने पर ऋषि दयानंद के साथ कैसा दुर्व्यवहार किया गया? राजनीतिक, आर्थिक, व्यापारिक और चिकित्सीय स्तर पर व्याप्त भ्रष्टाचार और लूटपाट पर प्रश्न करने पर राजीव भाई दीक्षित के साथ क्या किया गया?योग,अध्यात्म,मजहब,संप्रदाय, राजनीति,शिक्षा,राष्ट्रवाद की आड़ में चल रहे छल,प्रपंच और दिखावे पर प्रश्नचिन्ह लगाने पर ओशो रजनीश के साथ भारत सहित समस्त संसार के देशों ने किस प्रकार से जुल्म किये? उपरोक्त उदाहरण अधिक पुराने नहीं हैं। प्रश्न उठाने वालों से सभी भय खाते हैं।इसीलिये एक विचारक,चिंतक या दार्शनिक के चारों तरफ कुछ भी निश्चित नहीं होता है। स्थापित व्यवस्था उसके कारण अस्त-व्यस्त हो जाती है।या तो संसार के धर्माचार्य, नेता और पूंजीपति सुधर जायें या फिर अव्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह लगाने वाले प्रबुद्ध लोग इसी तरह से असमय मारे जाते रहेंगे।
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डॉ. शीलक राम आचार्य 
दर्शनशास्त्र- विभाग 
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय 
 कुरुक्षेत्र-136119

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