Thursday, January 15, 2026

आज की नेतागिरी

 आज की नेतागिरी 
...….....
छल- प्रपंच न निज आये चरित्र में। 
इर्ष्या - द्वेष  नहीं  भरे  हों भीतर में।।
नेता  बनने  में सबसे  बड़ी बाधा है।
उपरोक्त गुणों को अभी नहीं साधा है।।

वायदों की झड़ी लगाने का दम हो।
झूठ  बोलने का  साहस  हरदम हो।।
कहीं गई बात से पलटने की कला।
ऐसा व्यक्ति नेता क्यों न बने भला।।

बात- बात पर  अहंकार प्रदर्शन हो।
कभी  पद्मासन, कभी शीर्षासन हो।।
कुटिल हंसी हंसने में पूरा प्रवीण हो।
चरित्र -चाल- चलन जीर्ण- शीर्ण हो।।

राजनीति  में प्रवेश  बेशक कर दो।
भूख- भय- बिमारी  भरपूर डर दो।।
गिरगिट से ले लो बस रंग बदलना।
शियार लोमड़ी से छलपूर्वक चलना।।

घाघ  नेता तुम शीघ्र  बन जाओगे।
राष्ट्रप्रसिद्ध अवश्य ही कहलाओगे।।
चलकर  आयेंगे  खुद ही पुरस्कार।
प्रतिभावानों की गर्दन होकर सवार।।

अभी  इतना जल्दी नहीं करना है।
पुलिस गीदड़ भभकी नहीं डरना है।।
धरना प्रदर्शन तोड़फोड़ भी जरुरी।
नेता बनने के लिये यह भी मजबूरी।।

खामखां के सभी मुद्दों को उठाओ।
जनता-जनार्दन भाषण भड़काओ।।
विरोधियों की कमियों को गिनाओ।
अपनी तो बस खुबियां ही बतलाओ।।

फिर  भी  लोग यदि नहीं आते हों।
तुम्हारे  पास  आने  से घबराते हों।।
जाति-मजहब की बारूद को लाओ।
वैमनस्य की उसमें अग्नि सुलगाओ।।

इससे भी काम यदि नहीं बनता हो।
 बातों को कोई  भी नहीं सुनता हो।।
पूजा-स्थलों  पर  मांस  फिंकवा दो।
एक दो मजहबी पुस्तक जलवा दो।।

एक ही झूठ को बार-बार दोहराओ।
सौ -सौ बार जोर-जोर से चिल्लाओ।।
भीड़  अवश्य ही  एकत्र होने लगेगी।
छुक छुक राजनीति की गाड़ी चलेगी।।

अभी  तो  तुम्हारी बस शुरुआत है।
ऐसी कोई विशेष बनी नहीं बात है।। 

बहुत दांव-पेंच अभी सीखने बाकी।
बड़े-बड़ों के नाक कान काटो ताकि।।

 धोखाधड़ी व आवश्यक चापलूसी।
मित्र,प्यारे और दुश्मन कानाफूसी।।
निज रहस्य किसी को न बतलाना।
दूसरों के रहस्य सबको ही जनाना।।

रुपवती नवयौवनाओं के संग-संग।
महसूस करना भोग-विलास-उमंग।।
भीतर,भीतर  ही यह सब करना है।
नैतिक रुप से कभी नहीं सुधरना है।।

मुंह फेर लेना काम निकालकर।
गरीब  की कभी न संभाल कर।।
धन-दौलत खर्च वैभव विलास।
बाप पर भी नहीं करना विश्वास।।

फ्री में किसी का काम न करना।
भ्रष्टाचरण  में  प्रतिदिन उभरना।।
कमीशनखोरी समझना अधिकार।
लूट-खसोट करते रहना हर प्रकार।।

करनी -कथनी में रखना भेदभाव।
शराब-शबाब-कबाब भोगना चाव।।
त्राहि-त्राहि जनता जनार्दन करती।
कल मरती है बेशक  आज मरती।।

मंचों  से  जनमानस  बरगलाना।
ऊंचे -ऊंचे सपने बहुत दिखलाना।।
धरातल पर कोई काम नहीं करना।
चलता रहेगा जन्मना मरते जाना।।

जब भी राजनीति धीमी पड़ जाये।
लोगों की रीढ खड़ी हो अकड़ जाये।।
नये-नये लोकलुभावन प्रपंच रचना।
अंधभक्तों  की  अंधभक्ति परखना।।

राजनीति कभी सेवा मत जानना।
भोली जनता टैक्स  भार तानना।।
माई़ंडवाश लोगों का करते जाना।
दुर्व्यवहार फिर कोई भी मनमाना।।

विधायक और सांसद तोड़फोड़।
अकड़ वालों की दूर करना मरोड़।।
जो कोई भी रस्ते की बनता बाधा।
काट- छांट कर करना उसे आधा।।

राजनीति,जंग,प्रेम में सब जायज।
होता नहीं यहां कुछ भी नाजायज।।
अंधेर नगरी और चोपट सा राजा।
टके सेर भाजी और टके सेर खाजा।।
.......
डॉ.शीलक राम आचार्य 
वैदिक योगशाला

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