Thursday, January 15, 2026

समर्थ को नहिं दोष गुसाईं (Don't blame Samarth)


 'भारत बुद्ध का देश है, युद्ध का देश नहीं।'यह कथन आधा अधुरा ही नहीं अपितु भारतीय नेताओं की कमजोर मानसिकता का परिचायक है।इस धरती पर ऐसा कोई समय नहीं रहा,जब युद्ध नहीं हो रहे हों।ऐसा कोई समय नजर नहीं आता,जब विभिन्न देश युद्धों में नहीं उलझे हुये हों। इस धरती पर युद्ध,आतंक, तोड़फोड़, उग्रवाद और वैमनस्य सदैव मौजूद रहे हैं।भारत हो या अन्य कोई देश हो, युद्ध सदैव अपरिहार्य रहे हैं। ध्यान रहे कि जो देश लड़ना छोड़ देंगे,वो गुलाम होकर बर्बाद हो जायेंगे। अतीत में यह हजारों बार हुआ है। बाहरी या भीतरी किसी भी कारण से जिन देशों ने लडना छोड़ दिया,वो गुलाम हो गये। ऐसे देशों पर विदेशी हमलावरों द्वारा क्रूर अत्याचार किये गये। सैकड़ों वर्षों तक वहां की सभ्यता, संस्कृति, धर्म, जीवन-मूल्यों और पूजास्थलों को बर्बाद कर दिया गया। भारत ऐसे हमलावरों का सर्वाधिक शिकार रहा है।यवन,मंगोल,हुण,तातार,मुगल,डच, डैनिस, पुर्तगाली,अंग्रेज आदि हमलावर बुद्ध की करुणा और युद्धविरोधी सोच के कारण भारत पर दो हजार वर्षों से हमले कर -करके भारत को लूटते रहे, बर्बाद करते रहे तथा यहां की पुरातन समृद्ध विरासत को बर्बाद करते रहे।इसके बावजूद यह कहना कि भारत बुद्ध का देश है, युद्ध का नहीं - एक प्रवंचना ही कहा जायेगा। कबूतर के आंखों को बंद कर लेने से बिल्ली का होना खत्म नहीं हो जाता है। कबूतर के लिये खतरे के रूप में बिल्ली कबूतर के आंखों को बंद कर लेने पर भी वही मौजूद होती है।बुद्ध बुद्ध रटने से करुणा और शांति का जन्म नहीं होता है। किसी के द्वारा कुछ भी नैतिक या धार्मिक या करुणामय दोहराने से आसन्न खतरे कम नहीं हो जाते हैं। बल्कि इस प्रकार की जीवन-शैली से तो दुश्मन द्वारा हार जाना और भी अधिक सहज हो जाता है। चाणक्य,चंद्रगुप्त मौर्य, पुष्यमित्र शुंग,समुद्रगुप्त, चंद्रगुप्त द्वितीय,सातवाहन आदि अखिल वृहद् भारतीय राजाओं तक भारत की सैन्य तैयारियां विश्व में सबसे मजबूत और अभेद्य होती आई थीं।इनके पश्चात् आठवीं नौवीं सदी तक भी भारत की सीमाओं की तरफ देखने की किसी की हिम्मत नहीं होती थीं। ज्यों -ज्यों बौद्ध मत के क्षणभंगवाद,शून्यवाद, वज्रयान मतों तथा अद्वैत वेदांत का एकतरफा प्रभाव बढ़ने से संसार विरोध की प्रवृत्ति में बढ़ोतरी हुई, त्यों -त्यों भारत कमजोर होता गया।इसके फलस्वरूप भारत पर विदेशी हमलावरों की वक्र दृष्टि का प्रकोप बढ़ता गया।डेरियस, सिकंदर आदि विदेशी हमलावरों का भारतीय राजाओं ने जो बुरा हाल किया था,उसकी मिसाल दुनिया में कहीं नहीं मिलेगी। सिकंदर के हमले के एक हजार वर्षों तक भारत पर किसी भी हमलावर ने हमला करने की हिम्मत नहीं की। 

विदेशी लेखकों ने भारतीय इतिहास लेखन में अनेक प्रकार की छेड़छाड़ और मिलावटे करके उसे पूरी तरह से विकृत करके प्रस्तुत किया है। भारत का इतिहास हारों का इतिहास नहीं अपितु युद्धभूमि पर अजेय योद्धाओं की तरह लड़कर विजयी होने का शानदार इतिहास है।ईसा पूर्व और ईसा पश्चात् की इतिहास की अवधारणा बेतुकी, मनघड़ंत, पूर्वाग्रहग्रस्त और कपोल-कल्पित है। सम्राट अशोक जब तक सनातन धर्मी बना रहा,तब तक वह एशिया महाद्वीप में अजेय रहा था। लेकिन ज्यों ही जीवन के अंतिम दिनों में उसने और उसके उत्तराधिकारियों का झुकाव बौद्ध मत की तरफ हुआ, त्यों ही विदेशी हमलावरों ने भारत पर हमले करने की योजनाएं बनानी शुरू कर दी थीं। बौद्ध मत का अनुकरण करने वाले राजाओं का कार्यकाल अशांति, असुरक्षा और उथल-पुथल भरा रहा था। ऊपर से सनातनी दिखलाते हुये भी महापद्मनंद छिपा हुआ बौद्ध था। विदेशी और स्वदेशी लेखकों ने इनको नाई जाति से संबंधित बतलाकर क्षत्रिय विनाशक विचार का समर्थक भी कहा है। लेकिन इस तरह की बातें बढ़ा चढ़ाकर कहीं गई लगती हैं।उस समय पर किसी प्रकार का कोई जातिवाद नहीं था।हां,लोग अपनी पसंद का काम अवश्य करते थे।अंतिम बौद्ध राजा वृहद्रथ के संबंध विदेशी हमलावरों से थे। सनातन धर्म और संस्कृति के विरोध में उन्होंने विदेशी राजाओं की मदद लेने की भी कोशिश की थीं।इसी विश्वासघात के फलस्वरूप उन्हीं के सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने उनकी हत्या करके विदेशी हमलावरों और बौद्ध राजाओं से भारत की सीमाओं को सुरक्षित किया था। 

भारत के अधिकांश राजाओं का इतिहास लड़कर विजय प्राप्त करने या लड़ते हुये वीरगति प्राप्त करने का इतिहास रहा है।इसके मात्र कुछ अपवाद हो सकते हैं।सूर्यवंशी,चंद्रवंशी आदि वंशों से संबंधित क्षत्रिय वर्गों राजपूत,जाट,सिख,गोरखा, मराठा आदि सभी का इतिहास गौरवशाली रहा है।और तो और आजकल जिन्हें आदिवासी, दलित, पिछड़े आदि वर्गों से संबोधित किया जाता है,वो भी मुगलकाल और अंग्रेजी काल तक क्षत्रिय योद्धा वर्ग से संबंध रखते थे। सर्वप्रथम अंग्रेजों ने भारत में जातिवाद के  विष की वृहद् स्तर पर खेती की थी।जो भी लड़ाकू वर्ग थे, उन्हीं को अपराधी जातियां वर्गीकृत करके धड़ल्ले से झूठी पुस्तकें और दस्तावेज तैयार करवाये गये।जिस प्रकार की जातियों की गणना अंग्रेजी लेखकों ने की है,वह भारतीय ग्रंथों में कहीं भी वर्णित नहीं है। इतना सब प्रपंच रचा ही इसलिये था, ताकि भारत को कमजोर कर दिया जाये।लडने वाले विभिन्न वर्गों को अपराधी वर्गों की श्रेणी में सूचीबद्ध करके उनको बर्बाद कर दिया। उनको हर तरफ से तथा हर तरह से अपमानित किया जाता रहा है।भील,निषाद आदि वर्गों का इस्तेमाल क्षत्रिय वर्गों का वीरतापूर्ण इतिहास रहा है। और तो और प्रथम और द्वितीय महायुद्धों में भी भारतीय सैनिकों का विश्व प्रसिद्ध वीरता, युद्ध कौशल और बलिदानों का इतिहास रहा है। 

सन् 1947 ईस्वी में आजादी के पश्चात् भारत का जिस तरह से सैनिकीकरण होना चाहिये था तथा जिस तरह से स्वदेशी सैनिक साजो- सामान बनाने के लिये एक पूरा ढांचा निर्मित होना चाहिये था,वह नहीं हो पाया। अंग्रेजों ने जानबूझकर 'लाईट आफ एशिया' जैसी पुस्तकें लिखकर भारत को कमजोर करने के लिये इसे बुद्ध के देश होने की तोतारटंत शुरू करवा दी।इस षड्यंत्र को सफल करने के लिये सैकड़ों विदेशी लेखकों और बीसियों विश्वविद्यालयों ने सक्रिय भूमिका निभाई है। मैक्समूलर,रीज डैविड, श्रीमती रिज डैविड,ऐनी बेसेंट,कर्नल अल्काट,टी. एस. सुजूकी,अनागारिक धर्मपाल, स्चेरवात्सकी बर्नौफ,बैचनर,हर्मन हैस आदि इसी श्रेणी में आते हैं कमाल की बात है कि साम्यवादी कहलवाने वाले भारतीय लोग भी बौद्धवादी साम्यवादी चीन के हर प्रकार के युद्ध कौशल की प्रशंसा करते रहते हैं, जबकि भारत को बुद्ध का देश कहकर पंचशील और सर्वपंथसमभाववादी आदि के झूठे नारों में उलझाकर सैनिक रुप से कमजोर करते आये हैं।

ध्यान रहे कि भारत एकतरफा न तो कभी शांति का राष्ट्र रहा है तथा न ही भारत की ऐसी कोई परंपरा रही है।भारत की परंपरा रही है ,पहले शांति और यदि दुश्मन इसे नहीं मानते तो युद्ध और क्रांति। इतिहास लेखकों को महाभारत के युद्ध से ही कुछ सीख ले लेना चाहिये थी। भगवान् श्रीराम ने तो रावण से युद्ध करते समय कभी घोषणा नहीं की कि भारतवर्ष एकतरफा रुप से अहिंसा, शांति और समर्पण का देश है।भगवान् श्रीकृष्ण ने तो कभी नहीं कहा कि भारत केवल पतंजलि की योग साधना के अंतर्गत यम और नियमों के पालन का देश है। सच तो यह है कि आजादी के पश्चात् भारत को बुद्ध और गांधी का देश कहकर पुकारना भारत की सबसे बड़ी कमजोर रही है।भारत यदि बुद्ध और गांधी का देश है ,तो भारत श्रीराम, श्रीकृष्ण, अर्जुन,भीम, चंद्रगुप्त मौर्य, चंद्रगुप्त विक्रमादित्य, पुष्यमित्र शुंग, समुद्रगुप्त, हेमचंद विक्रमादित्य, हर्षवर्धन,सातवाहन,शिवाजी,राणा प्रताप,राणा सांगा, बप्पा रावल, गुरु गोविंद सिंह,लक्ष्मीबाई,सुभाष चन्द्र बोस और पटेल का देश भी है।यह ध्यान रहे। 

यदि आजादी के पश्चात् हम इस नीति पर चलते तो आज भारत को अपनी अस्सी प्रतिशत सैन्य तैयारियां के लिये रुस,अमरीका,फ्रांस, इजरायल पर निर्भर नहीं रहना पड़ता। और इसके पश्चात् भी कोई भारत को बुद्ध और गांधी का देश मानने की जिद्द करता है,तो फिर भारतीय सेना और पुलिस के लिये लाखों करोड़ रुपए खर्च क्यों किये जा रहे हैं?हिम्मत है तो भारत को सेना विहीन, पुलिस विहीन और हथियार रहित घोषित कर दो। पाखंड करने की क्या आवश्यकता है? यदि भारत अपनी सैन्य क्षमता में आत्मनिर्भर होता तो कभी का पीओके को भारत में शामिल कर लेता। बांग्लादेश में मारे जा रहे हिन्दू इस तरह से नहीं मारे जाते। श्रीलंका, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल जैसे वभारत के पडौसी देश अमरीका और चीन के प्रभाव में आकर भारत को आंखें नहीं दिखलाते।जिस बांग्लादेश को स्वतंत्र करवाने में भारत ने अपने 4000 जवानों का बलिदान दिया था,आज वही बांग्लादेश भारत को आंखें दिखला रहा है।

सच तो यह है कि हम बुद्ध और गांधी का देश होने की बहुत बड़ी कीमत चुका रहे हैं।अब तो संभल जाओ। छोड़ो भारत को बुद्ध और गांधी का देश कहना और सैनिक रुप से भारत को आत्मनिर्भर बनाने पर त्वरित काम करो। तभी भारत विश्वगुरू और विश्व महाशक्ति बन पायेगा।संसार में सदैव ही समर्थ, शक्तिशाली, ताकतवर और धनसंपन्न देशों का ही विकास हुआ है।आज भी संसार में केवल शक्ति, शौर्य,ताकत, लक्ष्मी और वीरता की ही तूती बोल रही है।समर्थ को नहिं दोष गुसाईं। कोई राष्ट्र जब भी विदेशी हमलावरों की वक्र दृष्टि का शिकार होता है,तो उसके मुख्य कारणों में विदेशी हमलावरों का छल और कपटाचरण, स्वयं उस देश के विपक्षी नेताओं की गद्दारी तथा सेना के उच्च- अधिकारियों का लोभ में आकर विदेशियों के हाथों में बिक जाना आदि होते हैं।जिस देश में ये कमियां नहीं होंगी,उस देश को कोई बाहरी शक्ति गुलाम नहीं बना सकती है। पांचवीं सदी ईसापूर्व से लेकर उन्नीसवीं सदी ईसा पश्चात् तक जब- जब भारत विदेशी शक्तियों का गुलाम हुआ, उसके मूल में बाहरी हमलावरों का छल और कपटाचरण, भारतीय शासकों का प्रलोभन में आकर विदेशी शक्तियों के हाथों बिक जाना और सैन्य अधिकारियों द्वारा किया गया विश्वासघात ही रहा है।इसकी शुरुआत महापद्मनंद और वृहद्रथ जैसे शासकों से हुई थी। यदि भारत के पूरी तरह से गुलाम होने की बात की जाये तो उसकी कहानी भी ऐसी ही है।

बंगाल के स्वतंत्र अंतिम नवाब सिराजुद्दौला अपने चचेरे भाई शौकतगंज, सेनापति मीर जाफर तथा अन्य कमांडरों के विश्वासघात के कारण सन् 1757 ईस्वी के प्लासी युद्ध में अंग्रेजी वायसराय लार्ड क्लाइव से हार गये थे। सिराजुद्दौला की  बेरहमी से हत्या कर दी गई।ईस्ट इंडिया कंपनी का भारत पर कब्ज़ा हो गया। इससे पूरे भारतीय उपमहाद्वीप पर अंग्रेजी राज का रास्ता साफ हो गया।अंग्रेजों ने यह युद्ध शौर्य और वीरता से नहीं अपितु छल, कपट और धोखाधड़ी से जीता था। वास्तव में अंग्रेजों ने सभी युद्ध धोखाधड़ी से ही जीते थे।'फूट डालो और राज करो' तथा 'इस्तेमाल करो और फेंक दो' की नीतियों से ही उन्होंने भारत पर कब्ज़ा किया तथा लगभग पौने दो सौ वर्षों तक भारत पर शासन करके भारत को बर्बाद कर दिया। अंग्रेजों की यह छल, कपट, धोखाधड़ी और लूट-खसोट की कुनीति अब भी पूरे संसार में चल रही है। अमरीका,रुस, इजरायल, इंग्लैंड, फ्रांस आदि सभी देश इसी का अंधानुकरण कर रहे हैं। इनके लिये नैतिकता, धार्मिकता, करुणा, मानवता,अहिंसा,सह -अस्तित्व, सामंजस्य,प्रेम, प्यार आदि का कोई मतलब नहीं है।आज भी ये लोग'जिसकी लाठी, उसकी भैंस' वाली जीवनचर्या पर चल रहे हैं। अमरीका ने वैंजेयुवेला पर कब्जा सैनिक ताकत के बल पर नहीं अपितु धोखाधड़ी करके, देश के विपक्ष तथा वहां की सेना के कमांडरों और कुछ सांसदों को डालरों में खरीदकर किया है। वरना वैंजेयुवेला के पास भी बहुत बड़ी सेना, सुखोई जैसे युद्धक विमान, उच्च कोटि के राडार, टैंक आदि सब कुछ उपलब्ध हैं। लेकिन जब देश के भीतर ही गद्दार बैठे होंगे तो उच्च -कोटि के हथियार भी कहां काम आते हैं। सन् 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में कुछ रियासतों के राजाओं ने ऐसी ही गद्दारी करके अंग्रेजों का साथ दिया था,जिसके ईनाम स्वरूप अंग्रेजों ने उन गद्दारों को बड़े -बड़े जमीन के टुकड़े, पैंशन और भोग -विलास के लिये अंग्रेजी नवयुवतियां प्रदान की थीं।इसी प्रकार की गद्दारी सन् 1947 ईस्वी के भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान मुस्लिम लीग, हिंदू महासभा और संघ जैसे संगठनों ने की थी। और यदि आज से 2500 वर्षों पहले की बात करें तो महापद्मनंद,वृहद्रथ आदि बौद्ध राजाओं ने भी विदेशी शक्तियों से मिलकर भारत के विरोध में साजिशें रचीं थीं। इससे यह सिद्ध है कि किसी राष्ट्र के विकसित,स्वतंत्र और सुरक्षित होने के लिये सत्ताधारी और विपक्षी नेताओं का राष्ट्रभक्त होना,सेना के कमांडरों का राष्ट्र पर बलिदान होने वाले होना, स्वदेशी हथियार प्रणाली का होना तथा जनता -जनार्दन का स्वदेश प्रेमी और स्वाभिमानी होना आवश्यक है। इनके बगैर थोथे नारे लगाने मात्र से कोई राष्ट्र विकसित, समृद्ध, सुरक्षित, विश्वशक्ति तथा विश्वगुरु नहीं बन सकता है।

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डॉ शीलक राम आचार्य
दर्शनशास्त्र- विभाग 
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय 
कुरुक्षेत्र -136119

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