आद्य शंकराचार्य को विश्व के दार्शनिक क्षेत्र में सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। शंकराचार्य के जीवन और कार्यक्षेत्र के संबंध में उनके शिष्यों ने अनेकों ग्रंथों की रचना की है। विदेशी हमलावरों का मुख्य लक्ष्यों में से एक यह भी होता था कि सनातन धर्म और संस्कृति की पहचान के हरेक प्रतीक को नष्ट किया जाये, इसलिये उनके द्वारा अनेकों महत्वपूर्ण ग्रंथ नष्ट कर दिये गये। अंग्रेजी और उनके अंधानुयायी भारतीय लेखकों द्वारा भारतीय धर्म, संस्कृति, दर्शनशास्त्र, इतिहास आदि के संबंध में संदेहों को समाप्त करने की बजाय उनको बढ़ाने पर जोर अधिक दिया जाता रहा है। ऐसे लेखकों के संबंध में षड्दर्शनशास्त्र के भाष्यकार आचार्य उदयवीर शास्त्री ने कहा है कि पाश्चात्य ईसाई विद्वानों द्वारा इस विषय में किये गये निराधार मिथ्या प्रलापों को पत्थर की लकीर समझकर निश्चिंत बैठे हैं। उन्हीं के हाथों में आज वह शक्ति है, जिसके द्वारा कोई विचार प्रसार पा जाते हैं। शंकराचार्य के संबंध में उनके एक शिष्य पद्मपाद ने 'विजयडिंडिम' नामक ग्रंथ लिखा था,जो कि आज उपलब्ध नहीं है। शंकराचार्य के जीवन के संबंध में अन्य ग्रंथों में आनंदगिरि की शंकरविजय,राजचूडामणि रचित शंकर अभ्युदय,आनंदतीर्थ की शंकर आचार्य अवतार कथा, रामकृष्ण की शंकर अभ्युदय काव्य, व्रजराज की शंकर दिग्विजय सार,चित्सुख की वृहत् शंकर दिग्विजय, नीलकंठ भट्ट की शंकरमंदारसौरभ आदि पठनीय ग्रंथ हैं।
आचार्य उदयवीर शास्त्री के अनुसार शंकराचार्य का अयुमान 32 वर्ष,6 महीने,10 दिन का था।2631 युधिष्ठिर सम्वत् बताया है। युधिष्ठिर सम्वत् कलि सम्वत् से 38 वर्ष पहले शुरू होता है।इसका प्रारंभ युधिष्ठिर का राज्यारोहण काल है। युधिष्ठिर ने 36 वर्ष तक शासन किया था। उसके दो वर्ष बाद कलि सम्वत् शुरू हुआ था।इस तरह से ईस्वी सन् शुरू होने से 509 वर्ष पूर्व शंकराचार्य का जन्मकाल आता है तथा उनका देहावसान काल ईसापूर्व 477 में पड़ता है। ध्यान रहे कि वर्तमान कलि सम्वत् का प्रारंभ ईस्वी सन् से 3102 वर्ष पहले हुआ था।
शारदापीठ के विवरणानुसार शंकराचार्य ने सर्वप्रथम ज्योतिर्मठ की स्थापना 497 ईसापूर्व में की थी। इसका पश्चात् शारदामठ 492 ईसापूर्व में, फिर शृंगेरी 492 ईसा पूर्व में तथा अंत में गोवर्धनमठ की स्थापना 485 ईसापूर्व में की। उन्होंने शारदामठ के अध्यक्ष पद पर सर्वप्रथम सुरेश्वराचार्य को बैठाया था।वो इस पद पर 42 वर्षों तक रहे। उनके पश्चात् चित्सुख,सर्वज्ञान,ब्रह्मानंद तीर्थ,स्वरूपाभिज्ञान, मंगलमूर्ति, भास्कर, प्रज्ञान आदि आचार्य अध्यक्ष पद पर विराजमान रहे।
गोवर्धनमठ की परंपरा में प्रथम आचार्य का नाम पद्मपाद आता है। उनके पश्चात् शूलपाणि, नारायण,विद्यारण्य,वामदेव,पद्मनाभ, जगन्नाथ,मधुरेश्वर, गोविंद,श्रीधर आदि आते हैं।
ज्योतिर्मठ की आचार्य परंपरा के अनुसार शंकराचार्य ने बद्रीनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार करके वहां पर मठ की स्थापना की। वहीं पर निवास करके उन्होंने विभिन्न ग्रंथों पर भाष्य लिखे।यह के अध्यक्ष पद पर सर्वप्रथम तोटकाचार्य विराजमान हुये थे। कुछ को छोड़कर यहां के अन्य आचार्यों की पूरी सूची अनुपलब्ध है। श्रृंगेरी मठ के आचार्यों में सर्वप्रथम स्थान तो स्वयं आद्य शंकराचार्य का ही आता है। उनके पश्चात् हस्तमलकाचार्य को अध्यक्ष बनाया गया।
शारदामठ की परंपरा अनुसार ज्योतिष्मठ के प्रथम शंकराचार्य त्रोटकाचार्य,शारदमठ के प्रथम शंकराचार्य सुरेश्वराचार्य,शृंगेरी मठ के प्रथम शंकराचार्य हस्तमलकाचार्य तथा गोवर्धनमठ के प्रथम शंकराचार्य पद्मपादाचार्य थे। परंपरा यह कहती है कि स्वयं आद्य शंकराचार्य किसी भी मठ के शंकराचार्य बनकर नहीं रहे थे
शंकराचार्य द्वारा स्थापित व्यवस्था के अंतर्गत दशनामी संन्यासियों की परंपरा है।ज्योतिर्मठ के अंतर्गत गिरि, पर्वत और सागर आते हैं। श्रृंगेरी मठ की परंपरा में सरस्वती,भारती और पुरी आते हैं। गोवर्धन मठ की परंपरा में वन और अरण्य आते हैं।शारदामठ की परंपरा में तीर्थ और आश्रम आते हैं।इस प्रकार से दशनामी संन्यासियों में गिरि,पर्वत, सागर, सरस्वती,भारती,पुरी,वन,अरण्य, तीर्थ और आश्रम आते हैं।
उड़ीसा जगन्नाथपुरी में स्थित मठ का का संबंध 'ऋग्वेद' से है। कर्नाटक में स्थित श्रृंगेरी मठ का 'यजुर्वेद' से है। गुजरात में स्थित शारदामठ का संबंध 'सामवेद' से है। उत्तराखंड में स्थित ज्योतिर्मठ का संबंध 'अथर्ववेद' से है।इस मठ के वर्तमान आचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी वर्तमान भ्रष्ट व्यवस्था पर अपनी निष्पक्ष,बेबाक और सत्यनिष्ठ टिप्पणियों के लिये जाने जाते हैं। श्रृंगेरी मठ के वर्तमान शंकराचार्य भारती तीर्थ हैं। गोवर्धन मठ के वर्तमान शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद जी हैं।शारदामठ के वर्तमान शंकराचार्य स्वामी सदानंद जी हैं।
भारत की चार दिशाओं में शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार मठों की स्थापना का उद्देश्य दार्शनिक,सांस्कृतिक, राष्ट्रीय,धार्मिक, आध्यात्मिक और राजनीतिक सभी कुछ था। चारों मठों की स्थापना का यह प्रयास आज से 2500 वर्षों पहले उत्पन्न हुये एक महापुरुष की दुरदर्शी, दूरवर्ती और गहन -गूढ़ सोच का परिचायक है।आज से पच्चीस सदी पहले जैन, बौद्ध, चार्वाक और वाममार्गियों जैसे कयी संप्रदायों द्वारा उत्पन्न दार्शनिक,राष्ट्रीय, सांस्कृतिक,धार्मिक, राजनीतिक ख़तरों से बचाव के लिये शंकराचार्य द्वारा किये गये प्रयास भारत के हजारों लाखों वर्षों के इतिहास में सदैव सदैव के लिये स्मरण रखे जायेंगे। पूर्वाग्रहग्रस्त पाश्चात्य लेखकों और उनके अंध- प्रशंसक भारतीय लेखकों ने आजादी के पश्चात् के सात दशकों के दौरान आद्य शंकराचार्य के योगदान को कमतर करके आंका है। भारतीय इतिहास पर छाये हुये इस धूंधलके को हटाना आवश्यक है। राजनीतिक और शैक्षिक स्तर पर सत्यनिष्ठा और निष्पक्षता से जो प्रयास किये जाने चाहिये थे,वो अब तक हो नहीं पाये हैं। कुछ गिने-चुने भारतीय विद्वानों यथा आचार्य उदयवीर शास्त्री, पंडित भगवद्दत, पुरुषोत्तम नागेश ओक,वैंकटचललैय्या आदि ने इस संबंध में महत्वपूर्ण शोध प्रस्तुत किये हैं।
गोवर्धन मठ का आदर्श वाक्य 'प्रज्ञानम् ब्रह्म' है।श्रृंगेरी मठ का का आदर्श वाक्य 'अहंं ब्रह्मास्मि' है।शारदा मठ का आदर्श वाक्य 'तत्वमसि' है।जगन्नाथपुरी मठ का आदर्श वाक्य 'अयमात्मा ब्रह्म' है।वर्तमान में 'गोवर्धन मठ' के 145 वें शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद जी हैं।वर्तमान में 'श्रृंगेरीमठ' के 36 वें शंकराचार्य भारती कृष्ण तीर्थ हैं।वर्तमान में 'शारदा मठ' के 80 वें शंकराचार्य सदानंद जी जी हैं।वर्तमान में 'ज्योतिर्मठ' के शंकराचार्य होने के संबंध में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी का सर्वोच्च न्यायालय में मुकदमा विचाराधीन है।
पाश्चात्य लेखकों और उनके समर्थक भारतीय लेखकों ने आद्य शंकराचार्य का काल आठवीं सदी में माना है।यह उनकी भ्रांति , पूर्वाग्रह और संकुचित सोच का परिचायक है। भारतीय विश्वविद्यालयों में संस्कृत साहित्य, दर्शनशास्त्र और भारतीय ज्ञान परंपरा के विभागों में पिछले 75 वर्षों से यही रटवाया और पढ़ाया जाता रहा है।यह बिल्कुल गलत है। आद्य शंकराचार्य का सही काल 509 ईसापूर्व है,न कि आठवीं सदी। बौद्ध मत के जिस गौतम (छठी सदी ईसापूर्व) के नाम से आज बौद्ध मत प्रचलित है, उसके तुरंत पश्चात् आद्य शंकराचार्य का जन्मकाल आता है। उनके बौद्ध मत, जैन मत, चार्वाक मत और वाममार्ग आदि के कारण भारत में जो सांस्कृतिक खालीपन,राजनीतिक अव्यवस्था,धार्मिक पाखंड, सांप्रदायिक थोथा कर्मकांड, उन्मुक्त यौनाचार और नैतिक मान्यताओं की उच्छृंखलता की शुरुआत हुई थी,उनको समाप्त करने में मंडन मिश्र और शंकराचार्य का महत्वपूर्ण योगदान था। मंडन मिश्र का ही संन्यास नाम सुरेश्वराचार्य था,जिनको स्वयं शंकराचार्य ने शारदा मठ का अध्यक्ष बनाया था।
ईसाई मत में नकली पोप नहीं बना सकते। बौद्ध मत में नकली दलाई-लामा नहीं बना सकते। इस्लाम में नकली पैगंबर नहीं बना सकते।सिख मत में नकली गुरु नहीं बना सकते। लेकिन यह नकली शंकराचार्य बनाने की बिमारी हिंदुओं में क्योंकर लग गई है? मूलतः तो शंकराचार्य चार ही होते हैं। लेकिन भारत में अपने आपको शंकराचार्य कहने वाले सैकड़ों धर्मगुरु घूम रहे हैं। इन सबने नकली गद्दियों, मठों, पीठों की स्थापना करके अपना ढोंग शुरू कर रखा है।भारत के हरेक शहर में कोई न कोई विश्वगुरु या जगत्गुरु या शंकराचार्य मिल जायेगा। हिंदुओं के साथ यह क्या हो रहा है? हिंदुओं को दिग्भ्रमित करने के लिये यह कौन-सा षड्यंत्र रचा जा रहा है? जिसको देखो वही शंकराचार्य, विश्वगुरु, जगतगुरु, महामंडलेश्वर,महायोगी, महावतार, पथप्रदर्शक आदि बना घूम रहा है। धार्मिक जगत् ये तथाकथित लोग जब स्वयं ही भटके हुये हैं,तो हिंदुओं का मार्गदर्शन कैसे करेंगे? अपने आपको शास्त्रों का मर्मज्ञ कहने वालों में इतनी तो समझ होनी ही चाहिये कि जब तुम स्वयं ही आपस में लड़-झगड़कर आये दिन कोई न कोई विवाद खड़ा कर रहे हो,तो हिंदुओं को क्या सिखलाओगे?
लगता है कि भारत में हिंदुओं के शंकराचार्य, धर्मगुरु, महामंडलेश्वर, योगाचार्य आदि बनने के स्थान पर विभिन्न राजनीतिक दलों के शंकराचार्य, धर्मगुरु, महामंडलेश्वर, योगाचार्य आदि बनने और बनाने की होड़ लगी हुई है। विभिन्न राजनीतिक दल मिलकर हिंदुओं के धर्मगुरुओं का खूब अपने राजनीतिक उद्देश्यों के लिये इस्तेमाल कर रहे हैं। एक वर्तमान शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती जी ने ठीक ही कहा है कि जब भारत में नकली राष्ट्रपति,प्रधानमंत्री, गृहमंत्री नहीं बन सकते हैं,तो नकली शंकराचार्य, धर्मगुरु, महामंडलेश्वर, जगतगुरु, विश्वगुरु क्यों बनाये जा रहे हैं? इसका अर्थ तो यह है कि नेताओं ने अपने स्वार्थ साधने के लिये धर्म को भी अपने कब्जे में कर लिया है। और हमारे धर्माचार्य किसी न किसी पद, प्रतिष्ठा,धन,दौलत, प्रसिद्धि पाने के मोह में सनातन धर्म और संस्कृति का बहुत बड़ा नुकसान कर रहे हैं। भारत, भारतीय और भारतीयता के लिये यह बहत घातक सिद्ध हो रहा है। इससे भारत का जनमानस जहां पर अधार्मिक, अनैतिक और चरित्रहीन होता जा रहा है, वहीं पर भारत राष्ट्र, सनातन धर्म और संस्कृति को भी हर प्रकार से पतन की ओर धकेलने के प्रयास सफल होते जा रहे हैं।
शंकराचार्य के सही काल का निर्धारण करने के लिये आचार्य उदयवीर शास्त्री और डॉ परमेश्वर नाथ मिश्र की पुस्तकें पढना चाहियें। इन्होंने इस संबंध में बहुत परिश्रम किया है। शंकराचार्य ने कांची कामकोटि में किसी पीठ की स्थापना नहीं की गई थी, लेकिन वहां पर कयी वर्ष तक निवास किया था। इसलिये कांची कामकोटि पीठ की अपनी प्रसिद्धि रही है। कामाक्षी देवी के प्रति भक्तिभाव होने की वजह से वहां पर निवास करते रहे थे, इसलिये वहां पर भी एक पीठ की तरह से ही संस्थान बन गया था।बाद में इसकी अध्यक्षता एक अन्य पीठ के साथ- साथ सुरेश्वराचार्य को सौंप दी गई थी। इसकी प्रसिद्धि इतनी बढ़ी कि यहां पर विराजमान गुरु भी शंकराचार्य कहलाने लगे। परिणामस्वरूप श्रृंगेरी मठ की प्रतिष्ठा कम होती गई। कालांतर में यह विच्छिन्न हो गया।कयी सदियों तक यह आचार्यों से रहित ही रहा। संभवतः कांची कामकोटि पीठ के 37 वें शंकराचार्य विद्याघन के काल में इसका जीर्णोद्धार हुआ।ये यहां पर 759-788 ईस्वी तक विराजमान रहे थे। अपने शिष्य नित्यबोधघन (773-848 ईस्वी) को इस काम के लिये नियुक्त किया। श्रृंगेरी मठ के कयी शताब्दी के विलुप्त कार्यकाल का सही आंकलन नहीं कर पाने के कारण 38 वें शंकराचार्य अभिनव शंकर को ही आद्य शंकराचार्य मान लेने के कारण 788 ईस्वी को आद्य शंकराचार्य का प्रादुर्भावकाल स्वीकार कर लिया गया।कहा जाता है कि ये भी अपने समय के उच्च कोटि के विद्वान थे। श्रृंगेरी और कांची कामकोटि पीठों के परस्पर मनमुटाव से आद्य शंकराचार्य के काल के संबंध में लगभग 1300 वर्षों का अंतर आ गया है।यह तथ्य बाकी सभी पीठों के इतिहास अध्ययन से भी सिद्ध होता है। लेकिन लेखकों ने पूर्वाग्रहवश केवल श्रृंगेरी की विकृत और खंडित परंपरा को आधार मानकर बाकी पीठों में उपलब्ध साक्ष्यों की उपेक्षा करके आद्य शंकराचार्य के काल को तेरह सदी नया सिद्ध करने पर जोर लगाये रखा है। लगता है कि श्रृंगेरी मठ शंकराचार्य नित्यबोधघन के काल से पूर्व 800 वर्ष तक ध्वस्त रहा था। पाश्चात्य लेखकों और और उनके अंधभक्त भारतीय लेखकों की यह आदत रही है कि किसी भी तरह से पुरातन भारतीय इतिहास को प्रथम युनानी फिलासफर थैलीज, अब्राहमिक परंपरा और भारतीय सिद्धार्थ गौतम के बाद का सिद्ध किया जा सके। भारतीय काल गणना के संबंध में उनके द्वारा निर्धारित भारतीय शासकों, महानायकों, महापुरुषों, दार्शनिकों आदि के कालनिर्णय में पूर्वाग्रह, भेदभाव, कपोल-कल्पना और मनघड़ंत भेदभाव मौजूद हैं।
जो लेखक सिद्धार्थ गौतम और आद्य शंकराचार्य के काल में लगभग 1300 वर्षों का अंतराल मानते हैं, उन्हें यह ज्ञान होना चाहिये कि सनातन धर्म के शास्त्रों पर प्रहार करने वाले किसी भी सनातन विरोधी महापुरुष को उत्तर देने के लिये भारतीय महापुरुषों ने कभी इतनी प्रतीक्षा नहीं करवाई है। अपने ऊपर हुये किसी भी राजनीतिक,धार्मिक या दार्शनिक हमले का इन्होंने तुरंत प्रत्युत्तर दिया है। महावीर, सिद्धार्थ, चार्वाक और वाममार्गियों को जवाब देने में भी कोई देरी नहीं हुई और इनके तुरंत पश्चात् गौडपाद,गोविंदपाद,कुमारिलभट्ट, मंडन मिश्र,शंकराचार्य आदि दार्शनिकों ने जन्म लेकर अपना कर्तव्य पूरा किया था।
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डॉ. शीलक राम आचार्य
दर्शनशास्त्र- विभाग
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय
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