Sunday, February 15, 2026

'वैलेंटाइन डे' की आड़ में उच्छृंखल अनैतिक धींगामस्ती ठीक नहीं है

 'वैलेंटाइन डे' की आड़ में उच्छृंखल अनैतिक धींगामस्ती  ठीक नहीं है 
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 रोम के राजा क्लोडिअस ने युवाओं को विवाह करने से इसलिये वंचित कर दिया था ,क्योंकि विवाहित युवा अच्छे सैनिक बनने में असमर्थ रहते थे! वैलेंटाइन नामक व्यक्ति ने इसका पुरजोर विरोध करके युवाओं के सामुहिक विवाह करवाने का प्रयास किया! इसके फलस्वरूप राजा ने क्रोधित होकर वैलेंटाइन को मौत की सजा दे दी थी! कहते हैं कि उसी की याद में वैलेंटाइन दिवस मनाया जाना शुरू हुआ!आज वैलेंटाइन दिवस का जो भी प्रारुप प्रचलित है ,उसका
कई सदियों पूर्व के विवाह समारोह से कोई भी संबंध जुडता हुआ नहीं लगता है! आजकल नये युवाओं और युवतियों के जोडे यहाँ -वहाँ पर अर्धनग्न होकर उच्छृंखल यौन -क्रियाओं को करते हुये सरेआम विचरण करते पाये जाते हैं!इस तरह से उन्मुक्त और  अर्धनग्न युवक युवतियों का आवारा होकर घूमने का वैलेंटाइन से क्या संबंध है? इनको विवाह करने से किसने रोका है? पहले वह योग्यता अर्जित करो, जिसके सहारे भविष्य के जीवन की मूलभूत जरूरतें पूरी हो सकें! फिर अपनी मर्जी से या घरवालों की सहमति से विवाह कर लेना! ऐसा करने से हमारे युवकों और युवतियों को कोई नहीं रोक रहा है! लेकिन वास्तविकता तो यह है कि अधिकांश ऐसे युवाओं और युवतियों को भविष्य के गृहस्थ जीवन की कोई आर्थिक,सामाजिक, नैतिक, शैक्षणिक जिम्मेदारी लेना ही नहीं है!कोई जिम्मेदारी लिये बगैर ही इनको अपनी कामुकता को शांत करना है!इसके फलस्वरूप युवकों और युवतियों के सामने जो समस्याएं उत्पन्न होती हैं, उनका इनके पास क्या समाधान है?
माता -पिता, बड़े -बुजुर्ग,समाज और धर्म को युवकों और युवतियों द्वारा अपनी कामुकता की पूर्ति किये जाने में कोई आपत्ति नहीं है! आपत्ति यदि है तो कामुक संबंध बनाने के फलस्वरूप पैदा होने वाली वर्तमान और भविष्य की जिम्मेदारियों से पलायन करने के संबंध में है!सनातन धर्म और संस्कृति में इसी समस्या के समाधान हेतु चार आश्रमों ब्रह्मचर्य , गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास आश्रम की व्यवस्था की गई थी!यदि आपको काम का सुख चाहिये तो उसके फलस्वरूप उठने वाली समस्याओं की जिम्मेदारियों को भी अपने ऊपर लीजिये!सुख चाहते हो तो जिम्मेदारी भी तो स्वीकार करो।कर्म करो और उसका फल नहीं मिले,यह कैसे हो सकता है?सुख का भोग कर लिया लेकिन समस्या आते ही भाग खड़े हुये।इस प्रकार से संसार नहीं चलता है। यदि सभी इस प्रकार का व्यवहार करने लगे तो पूरा संसार बर्बाद हो जायेगा। और फिर किसी काम के भावी फल पर विचार करके ही तो उस काम को किया जाता है। मनुष्य मननशील प्राणी है।उसे ऐसा ही करना चाहिये। लेकिन कामुक और प्रेम संबंधों के बारे में ऐसा नहीं हो रहा है।न लड़की जिम्मेदारी लेने को तैयार है तथा न ही लडका।कुछ समय साथ रहे,मन भर गया और एक दूसरे के विरोध में न्यायालय में खड़े हो गये।यह किस प्रकार का प्यार है? यदि वास्तव में ही हुआ है तो उसे निभाकर दिखलाओ। धन दौलत में अमीर युरोपीयन और अमेरिकन अब्राहमिक कल्चर में यह सब चल जाता होगा लेकिन भारत में यह बर्बादी का कारण बनेगा। भारत जैसे बदहाल और गरीब राष्ट्र में आखिर प्रेम संबंध टूटने के पश्चात् उत्पन्न संतानों का भरण -पोषण कौन करेगा?भारत में भारतीय जीवन मूल्यों के पालन से ही काम चलेगा। युरोपीयन और अमेरिकन उच्छृंखलता भारत में काम नहीं आयेगी। यहां तो यह पूरे सामाजिक ढांचे को तहश नहश कर डालेगी।लिव इन रिलेशनशिप, समलिंगी विवाह, समान गोत्र विवाह कानूनसम्मत तो बना दिये गये हैं लेकिन भारत जैसे गरीब, बेरोजगार और बदहाल राष्ट्र में यह कैसे हो पायेगा? इसके लिये कोई भी प्रबंध नहीं किया गया है।
ऐसा नहीं हो सकता कि अधिकार तो ले लिये जायें लेकिन कर्तव्यों से पलायन कर दिया जाये! ऐसे तो व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र और धर्म की सारी व्यवस्था भंग होकर अव्यवस्था फैल जायेगी! यूरोपीयन राष्ट्रों और अमरीका जैसे राष्ट्रों में पिछली 
कई शताब्दियों से यही तो हो रहा है! वहाँ तो युवकों और युवतियों के विवाहपूर्व अवैध काम संबंध से उत्पन्न संतान का पालन पोषण करने की सरकारी व्यवस्था मौजूद है! भारत में इन अवैध संतानों की जिमेदारी कौन लेगा? युवक और युवतियां तो भाग खड़े होते हैं! आखिर उनकी गलतियों का दंड उनके माता- पिता, समाज और राष्ट्र को क्यों मिलना चाहिये? भारत में यही हो रहा है! हमारे यहां सुख और सुविधाएं तो सभी को चाहियें लेकिन कोई भी जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं है।
 जीवन में कामवासना अकेली जरूरत या भूख नहीं है! हमारे शास्त्रकारों ने प्राणियों की चार प्रकार की जरूरतों का जिक्र किया है!'हितोपदेश' के अनुसार आहार, निद्रा ,भय और मैथुन आदि चारों मनुष्य सहित सभी पशु और पक्षियों में भी पाये जाते हैं!मनुष्य मनुष्य तभी बनता है, जब वह धर्माचरण करता है! धर्माचरण के बगैर मनुष्य पशु के समान है!आहार, निद्रा, भय और मैथुन तो अन्य जीवों में भी होते हैं!आज से छह हजार वर्षों पहले महर्षि कणाद ने 'वैशेषिक दर्शनशास्त्र' में 'धर्म' उसको कहा है, जिसके सहाय से सांसारिक हित और आध्यात्मिक कल्याण हो सके?धर्म का कर्मकाण्ड- पक्ष, नैतिक -पक्ष, दार्शनिक- पक्ष और आध्यात्मिक-पक्ष आदि सभी का महत्व है!एक पक्ष को ही संपूर्ण मान लेना सही नहीं है! आजकल कर्मकाण्ड धर्म तक ही सीमित होकर रह गया है!
 जीवन में कामवासना अकेली जरूरत या भूख नहीं है! हमारे शास्त्रकारों ने प्राणियों की चार प्रकार की जरूरतों का जिक्र किया है!'हितोपदेश' के अनुसार आहार, निद्रा ,भय और मैथुन आदि चारों मनुष्य सहित पशुओं में भी पाये जाते हैं!धर्म का आध्यात्मिक-पक्ष मूल सत्ता का साक्षात्कार करना चाहता है!धर्म का दार्शनिक-पक्ष धर्म को तार्किकता प्रदान करता है! धर्म का नैतिक-पक्ष मनुष्य के आचरण में सही -गलत का निर्धारण करता है! धर्म का कर्मकाण्डपरक अर्थ धर्म के रहस्यों को विविध कर्मकांडों के माध्यम से अभिव्यक्त करता है!
 फरवरी महीने में वैलेंटाइन नाम से सात दिन तक रोज डे, प्रपोज डे, चाकलेट डे, टैडी डे, हग डे,किस डे, 
वैलेंटाइन डे आदि मनाये जाते हैं!उच्छृंखल भारतीय युवक -युवतियों को धूर्तता और छल से अपना कूड़ा- कर्कट रुपी बेचने वाली विदेशी  बहुराष्ट्रीय ने खूब बेवकूफ बना रखा है!हरेक भारतीय पर्व, उत्सव और त्यौहार को बहुराष्ट्रीय कंपनियों और सीरियल निर्माताओं ने अपने व्यापार का साधन बना लिया है!इनमें पूरी तरह से पाश्चात्य उन्मुक्त भोगवाद घुस चुका है! सांस्कृतिक, धार्मिक और आध्यात्मिक रंग फीका पडता जा रहा है तथा पाश्चात्य रंग गहरा होता जा रहा है!साधु, महात्मा और धर्मगुरु चुपचाप तमाशा देख रहे हैं! विभिन्न धर्मसंसदों में इस वैलेंटाइन की उच्छृंखल अनैतिक धींगामस्ती पर भी कोई फरमान जारी होना चाहिये ! क्या हमारे धर्माचार्यों का यह कर्तव्य नहीं बनता कि वो सनातनियों को सनातनी जीवनमूल्यों की सीख लेकर उन्हें सदाचारी बनायें?और अब तो वैलेंटाइन डे के सात दिनों को चौदह दिनों में बदल दिया गया है! वैलेंटाइन डे के बाद थप्पड़ डे, घूस्सा डे, गाली गलौज डे,विदाई डे आदि भी शुरू कर दिये हैं!पता नहीं कहाँ तक पतन के गड्ढों में गिरेंगे! शिक्षा -संस्थानों में इन दिनों मनचले युवाओं और युवतियों की धींगामस्ती चरम पर है!और महाकुम्भ आदि के अवसरों पर हमारे तथाकथित साधु -संत धर्मसंसद लगाकर कुछ हिन्दुओं को हिंदू धर्म से निष्कासित करने की एकतरफा चेतावनी दे रहे हैं!काश इस तरह की चेतावनी एपस्टीन फाईल में फंसे हुये  बडबोले और अय्यास नेताओं को भी दे देते। लगता है कि सारी नैतिकता आम आदमी के पालन करने को है, जबकि धनी -मानी लोगों को कुछ भी अनैतिक, गैरकानूनी और अधार्मिक करने का अधिकार मिला हुआ हो। हमारे धर्मगुरुओं के निठल्लेपन, नाकारापन,अय्याशी, महत्वाकांक्षा, पाखंड  और ढोंग के कारण आज सनातन धर्म और संस्कृति उपहास का विषय बनते जा रहे हैं! श्रीराम, श्रीकृष्ण और मनुस्मृति का अपमान करने वाले मुफ्तखोरों के विरुद्ध भी ऐसी ही चेतावनियों को जारी करने की हिम्मत दिखलाओ! भारतीय बच्चों और युवा- वर्ग को शिक्षा- संस्थानों में सनातन धर्म, संस्कृति, दर्शनशास्त्र और नीतिशास्त्र की सीख देने की कोई व्यवस्था नहीं है!नई शिक्षा नीति हो या पहले वाली शिक्षा नीति हो, दोनों में ही सिर्फ आदर्श की बातें ही बातें हैं! धरातल पर कुछ भी सृजनात्मक हो नहीं रहा है!झूठ,कपट,छल, धोखाधड़ी,शोषण,पद, प्रतिष्ठा,अय्याशी के जुगाड़ के लिये सभी दीवाने हुये लगते हैं!यह सब करने के लिये पहले के सत्ताधारी सैक्युलरिजम आदि की आड लेते थे! आज वालों ने हिन्दू, हिंदुत्व, हिंदी, गाय, गंगा, गीता,राष्ट्रवाद आदि की आड लेकर भारत और भारतीयों के साथ कुछ भी करने की ज़िद्द को जारी रखा है।
सत्यनिष्ठ,प्रेमनिष्ठ,करुणानिष्ठ होने के आदेश कोई भी नेता, धर्मगुरु, सुधारक जारी नहीं करता है।
 सनातनी जीवन- मूल्यों को तो जैसे जमीन में दफना ही दिया गया है!जब नेता, धर्मगुरु, सुधारक और इनके करीबी लोग ही भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हुये होंगे तथा बलात्कारियों तक को अभयदान दे दिया जाता रहेगा, तो जनजीवन में जीवन- मूल्यों का कोई महत्व नहीं रह जायेगा!अपनी राजनीति को बचाने के लिये व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक,आर्थिक, शैक्षणिक,नैतिक, धार्मिक, यौगिक, राजनीतिक मूल्यों की धज्जियाँ उडाना राष्ट्रहित में नहीं है! इन राक्षसी प्रवृत्ति के लोगों पर रोक लगाने की बजाय इनको सरंक्षण दिया जा रहा है!नैतिकता और कानून किसी की हैसियत, राजनीतिक दल ,आर्थिक हालत और जुगाड़ को देखकर निर्धारित किये जा रहे हैं! सत्यवादी, निष्पक्ष, प्रतिभाशाली और मेहनतकश लोग अहंकारी सत्ता के खौफ के कारण एकांत कोनों में छिपे बैठेंगे तो भारत राष्ट्र को विश्वगरीब बनने से कोई भी ताकत नहीं रोक सकती है। अपनी सभ्यता, अपनी संस्कृति, अपने जीवन- मूल्य, अपनी शिक्षा, अपनी माटी, अपनी जमीन, अपने लोग तथा इन सबसे उपजा हुआ सनातन का ज्ञान।इन सबसे बढ़कर हमारे लिये कुछ भी नहीं है।बस समय रहते समझ,विवेक,संवेदनशीलता, जागरुकता और कर्तव्यनिष्ठता को समझना आवश्यक है। यदि पर्व/उत्सव/त्यौहार ही मनाने हैं तो बसंत पंचमी से लेकर होली तक लगातार चालीस दिनों तक चलने वाले मस्ती और उल्लास से भरे हुये सनातनी त्यौहार होलिकोत्सव,फागोत्सव,कामोत्सव को मनाओ। लेकिन यह सब मर्यादा, शुचिता, समझदारी और धैर्य से होना चाहिये।
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डॉ.शीलक राम आचार्य 
दर्शनशास्त्र -विभाग
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय
कुरुक्षेत्र -136119

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