Sunday, February 15, 2026

'वैलेंटाइन डे' की आड़ में उच्छृंखल अनैतिक धींगामस्ती ठीक नहीं है

 'वैलेंटाइन डे' की आड़ में उच्छृंखल अनैतिक धींगामस्ती  ठीक नहीं है 
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 रोम के राजा क्लोडिअस ने युवाओं को विवाह करने से इसलिये वंचित कर दिया था ,क्योंकि विवाहित युवा अच्छे सैनिक बनने में असमर्थ रहते थे! वैलेंटाइन नामक व्यक्ति ने इसका पुरजोर विरोध करके युवाओं के सामुहिक विवाह करवाने का प्रयास किया! इसके फलस्वरूप राजा ने क्रोधित होकर वैलेंटाइन को मौत की सजा दे दी थी! कहते हैं कि उसी की याद में वैलेंटाइन दिवस मनाया जाना शुरू हुआ!आज वैलेंटाइन दिवस का जो भी प्रारुप प्रचलित है ,उसका
कई सदियों पूर्व के विवाह समारोह से कोई भी संबंध जुडता हुआ नहीं लगता है! आजकल नये युवाओं और युवतियों के जोडे यहाँ -वहाँ पर अर्धनग्न होकर उच्छृंखल यौन -क्रियाओं को करते हुये सरेआम विचरण करते पाये जाते हैं!इस तरह से उन्मुक्त और  अर्धनग्न युवक युवतियों का आवारा होकर घूमने का वैलेंटाइन से क्या संबंध है? इनको विवाह करने से किसने रोका है? पहले वह योग्यता अर्जित करो, जिसके सहारे भविष्य के जीवन की मूलभूत जरूरतें पूरी हो सकें! फिर अपनी मर्जी से या घरवालों की सहमति से विवाह कर लेना! ऐसा करने से हमारे युवकों और युवतियों को कोई नहीं रोक रहा है! लेकिन वास्तविकता तो यह है कि अधिकांश ऐसे युवाओं और युवतियों को भविष्य के गृहस्थ जीवन की कोई आर्थिक,सामाजिक, नैतिक, शैक्षणिक जिम्मेदारी लेना ही नहीं है!कोई जिम्मेदारी लिये बगैर ही इनको अपनी कामुकता को शांत करना है!इसके फलस्वरूप युवकों और युवतियों के सामने जो समस्याएं उत्पन्न होती हैं, उनका इनके पास क्या समाधान है?
माता -पिता, बड़े -बुजुर्ग,समाज और धर्म को युवकों और युवतियों द्वारा अपनी कामुकता की पूर्ति किये जाने में कोई आपत्ति नहीं है! आपत्ति यदि है तो कामुक संबंध बनाने के फलस्वरूप पैदा होने वाली वर्तमान और भविष्य की जिम्मेदारियों से पलायन करने के संबंध में है!सनातन धर्म और संस्कृति में इसी समस्या के समाधान हेतु चार आश्रमों ब्रह्मचर्य , गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास आश्रम की व्यवस्था की गई थी!यदि आपको काम का सुख चाहिये तो उसके फलस्वरूप उठने वाली समस्याओं की जिम्मेदारियों को भी अपने ऊपर लीजिये!सुख चाहते हो तो जिम्मेदारी भी तो स्वीकार करो।कर्म करो और उसका फल नहीं मिले,यह कैसे हो सकता है?सुख का भोग कर लिया लेकिन समस्या आते ही भाग खड़े हुये।इस प्रकार से संसार नहीं चलता है। यदि सभी इस प्रकार का व्यवहार करने लगे तो पूरा संसार बर्बाद हो जायेगा। और फिर किसी काम के भावी फल पर विचार करके ही तो उस काम को किया जाता है। मनुष्य मननशील प्राणी है।उसे ऐसा ही करना चाहिये। लेकिन कामुक और प्रेम संबंधों के बारे में ऐसा नहीं हो रहा है।न लड़की जिम्मेदारी लेने को तैयार है तथा न ही लडका।कुछ समय साथ रहे,मन भर गया और एक दूसरे के विरोध में न्यायालय में खड़े हो गये।यह किस प्रकार का प्यार है? यदि वास्तव में ही हुआ है तो उसे निभाकर दिखलाओ। धन दौलत में अमीर युरोपीयन और अमेरिकन अब्राहमिक कल्चर में यह सब चल जाता होगा लेकिन भारत में यह बर्बादी का कारण बनेगा। भारत जैसे बदहाल और गरीब राष्ट्र में आखिर प्रेम संबंध टूटने के पश्चात् उत्पन्न संतानों का भरण -पोषण कौन करेगा?भारत में भारतीय जीवन मूल्यों के पालन से ही काम चलेगा। युरोपीयन और अमेरिकन उच्छृंखलता भारत में काम नहीं आयेगी। यहां तो यह पूरे सामाजिक ढांचे को तहश नहश कर डालेगी।लिव इन रिलेशनशिप, समलिंगी विवाह, समान गोत्र विवाह कानूनसम्मत तो बना दिये गये हैं लेकिन भारत जैसे गरीब, बेरोजगार और बदहाल राष्ट्र में यह कैसे हो पायेगा? इसके लिये कोई भी प्रबंध नहीं किया गया है।
ऐसा नहीं हो सकता कि अधिकार तो ले लिये जायें लेकिन कर्तव्यों से पलायन कर दिया जाये! ऐसे तो व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र और धर्म की सारी व्यवस्था भंग होकर अव्यवस्था फैल जायेगी! यूरोपीयन राष्ट्रों और अमरीका जैसे राष्ट्रों में पिछली 
कई शताब्दियों से यही तो हो रहा है! वहाँ तो युवकों और युवतियों के विवाहपूर्व अवैध काम संबंध से उत्पन्न संतान का पालन पोषण करने की सरकारी व्यवस्था मौजूद है! भारत में इन अवैध संतानों की जिमेदारी कौन लेगा? युवक और युवतियां तो भाग खड़े होते हैं! आखिर उनकी गलतियों का दंड उनके माता- पिता, समाज और राष्ट्र को क्यों मिलना चाहिये? भारत में यही हो रहा है! हमारे यहां सुख और सुविधाएं तो सभी को चाहियें लेकिन कोई भी जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं है।
 जीवन में कामवासना अकेली जरूरत या भूख नहीं है! हमारे शास्त्रकारों ने प्राणियों की चार प्रकार की जरूरतों का जिक्र किया है!'हितोपदेश' के अनुसार आहार, निद्रा ,भय और मैथुन आदि चारों मनुष्य सहित सभी पशु और पक्षियों में भी पाये जाते हैं!मनुष्य मनुष्य तभी बनता है, जब वह धर्माचरण करता है! धर्माचरण के बगैर मनुष्य पशु के समान है!आहार, निद्रा, भय और मैथुन तो अन्य जीवों में भी होते हैं!आज से छह हजार वर्षों पहले महर्षि कणाद ने 'वैशेषिक दर्शनशास्त्र' में 'धर्म' उसको कहा है, जिसके सहाय से सांसारिक हित और आध्यात्मिक कल्याण हो सके?धर्म का कर्मकाण्ड- पक्ष, नैतिक -पक्ष, दार्शनिक- पक्ष और आध्यात्मिक-पक्ष आदि सभी का महत्व है!एक पक्ष को ही संपूर्ण मान लेना सही नहीं है! आजकल कर्मकाण्ड धर्म तक ही सीमित होकर रह गया है!
 जीवन में कामवासना अकेली जरूरत या भूख नहीं है! हमारे शास्त्रकारों ने प्राणियों की चार प्रकार की जरूरतों का जिक्र किया है!'हितोपदेश' के अनुसार आहार, निद्रा ,भय और मैथुन आदि चारों मनुष्य सहित पशुओं में भी पाये जाते हैं!धर्म का आध्यात्मिक-पक्ष मूल सत्ता का साक्षात्कार करना चाहता है!धर्म का दार्शनिक-पक्ष धर्म को तार्किकता प्रदान करता है! धर्म का नैतिक-पक्ष मनुष्य के आचरण में सही -गलत का निर्धारण करता है! धर्म का कर्मकाण्डपरक अर्थ धर्म के रहस्यों को विविध कर्मकांडों के माध्यम से अभिव्यक्त करता है!
 फरवरी महीने में वैलेंटाइन नाम से सात दिन तक रोज डे, प्रपोज डे, चाकलेट डे, टैडी डे, हग डे,किस डे, 
वैलेंटाइन डे आदि मनाये जाते हैं!उच्छृंखल भारतीय युवक -युवतियों को धूर्तता और छल से अपना कूड़ा- कर्कट रुपी बेचने वाली विदेशी  बहुराष्ट्रीय ने खूब बेवकूफ बना रखा है!हरेक भारतीय पर्व, उत्सव और त्यौहार को बहुराष्ट्रीय कंपनियों और सीरियल निर्माताओं ने अपने व्यापार का साधन बना लिया है!इनमें पूरी तरह से पाश्चात्य उन्मुक्त भोगवाद घुस चुका है! सांस्कृतिक, धार्मिक और आध्यात्मिक रंग फीका पडता जा रहा है तथा पाश्चात्य रंग गहरा होता जा रहा है!साधु, महात्मा और धर्मगुरु चुपचाप तमाशा देख रहे हैं! विभिन्न धर्मसंसदों में इस वैलेंटाइन की उच्छृंखल अनैतिक धींगामस्ती पर भी कोई फरमान जारी होना चाहिये ! क्या हमारे धर्माचार्यों का यह कर्तव्य नहीं बनता कि वो सनातनियों को सनातनी जीवनमूल्यों की सीख लेकर उन्हें सदाचारी बनायें?और अब तो वैलेंटाइन डे के सात दिनों को चौदह दिनों में बदल दिया गया है! वैलेंटाइन डे के बाद थप्पड़ डे, घूस्सा डे, गाली गलौज डे,विदाई डे आदि भी शुरू कर दिये हैं!पता नहीं कहाँ तक पतन के गड्ढों में गिरेंगे! शिक्षा -संस्थानों में इन दिनों मनचले युवाओं और युवतियों की धींगामस्ती चरम पर है!और महाकुम्भ आदि के अवसरों पर हमारे तथाकथित साधु -संत धर्मसंसद लगाकर कुछ हिन्दुओं को हिंदू धर्म से निष्कासित करने की एकतरफा चेतावनी दे रहे हैं!काश इस तरह की चेतावनी एपस्टीन फाईल में फंसे हुये  बडबोले और अय्यास नेताओं को भी दे देते। लगता है कि सारी नैतिकता आम आदमी के पालन करने को है, जबकि धनी -मानी लोगों को कुछ भी अनैतिक, गैरकानूनी और अधार्मिक करने का अधिकार मिला हुआ हो। हमारे धर्मगुरुओं के निठल्लेपन, नाकारापन,अय्याशी, महत्वाकांक्षा, पाखंड  और ढोंग के कारण आज सनातन धर्म और संस्कृति उपहास का विषय बनते जा रहे हैं! श्रीराम, श्रीकृष्ण और मनुस्मृति का अपमान करने वाले मुफ्तखोरों के विरुद्ध भी ऐसी ही चेतावनियों को जारी करने की हिम्मत दिखलाओ! भारतीय बच्चों और युवा- वर्ग को शिक्षा- संस्थानों में सनातन धर्म, संस्कृति, दर्शनशास्त्र और नीतिशास्त्र की सीख देने की कोई व्यवस्था नहीं है!नई शिक्षा नीति हो या पहले वाली शिक्षा नीति हो, दोनों में ही सिर्फ आदर्श की बातें ही बातें हैं! धरातल पर कुछ भी सृजनात्मक हो नहीं रहा है!झूठ,कपट,छल, धोखाधड़ी,शोषण,पद, प्रतिष्ठा,अय्याशी के जुगाड़ के लिये सभी दीवाने हुये लगते हैं!यह सब करने के लिये पहले के सत्ताधारी सैक्युलरिजम आदि की आड लेते थे! आज वालों ने हिन्दू, हिंदुत्व, हिंदी, गाय, गंगा, गीता,राष्ट्रवाद आदि की आड लेकर भारत और भारतीयों के साथ कुछ भी करने की ज़िद्द को जारी रखा है।
सत्यनिष्ठ,प्रेमनिष्ठ,करुणानिष्ठ होने के आदेश कोई भी नेता, धर्मगुरु, सुधारक जारी नहीं करता है।
 सनातनी जीवन- मूल्यों को तो जैसे जमीन में दफना ही दिया गया है!जब नेता, धर्मगुरु, सुधारक और इनके करीबी लोग ही भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हुये होंगे तथा बलात्कारियों तक को अभयदान दे दिया जाता रहेगा, तो जनजीवन में जीवन- मूल्यों का कोई महत्व नहीं रह जायेगा!अपनी राजनीति को बचाने के लिये व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक,आर्थिक, शैक्षणिक,नैतिक, धार्मिक, यौगिक, राजनीतिक मूल्यों की धज्जियाँ उडाना राष्ट्रहित में नहीं है! इन राक्षसी प्रवृत्ति के लोगों पर रोक लगाने की बजाय इनको सरंक्षण दिया जा रहा है!नैतिकता और कानून किसी की हैसियत, राजनीतिक दल ,आर्थिक हालत और जुगाड़ को देखकर निर्धारित किये जा रहे हैं! सत्यवादी, निष्पक्ष, प्रतिभाशाली और मेहनतकश लोग अहंकारी सत्ता के खौफ के कारण एकांत कोनों में छिपे बैठेंगे तो भारत राष्ट्र को विश्वगरीब बनने से कोई भी ताकत नहीं रोक सकती है। अपनी सभ्यता, अपनी संस्कृति, अपने जीवन- मूल्य, अपनी शिक्षा, अपनी माटी, अपनी जमीन, अपने लोग तथा इन सबसे उपजा हुआ सनातन का ज्ञान।इन सबसे बढ़कर हमारे लिये कुछ भी नहीं है।बस समय रहते समझ,विवेक,संवेदनशीलता, जागरुकता और कर्तव्यनिष्ठता को समझना आवश्यक है। यदि पर्व/उत्सव/त्यौहार ही मनाने हैं तो बसंत पंचमी से लेकर होली तक लगातार चालीस दिनों तक चलने वाले मस्ती और उल्लास से भरे हुये सनातनी त्यौहार होलिकोत्सव,फागोत्सव,कामोत्सव को मनाओ। लेकिन यह सब मर्यादा, शुचिता, समझदारी और धैर्य से होना चाहिये।
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डॉ.शीलक राम आचार्य 
दर्शनशास्त्र -विभाग
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय
कुरुक्षेत्र -136119

एपस्टीन फाईल

 *एपस्टीन फाईल में जिन हजारों लोगों का नाम मौजूद है, ध्यान रहे कि वो सभी लोग वही हैं, जिनकी जनमानस पूजा करता आ रहा है।ये वही तथाकथित हमारे महापुरुष हैं जिनकी हम मिलकर जय जयकार करते आ रहे हैं। यही है हमारा आधुनिक धार्मिक, नैतिक , सामाजिक और वैज्ञानिक विकास। एपस्टीन फाईल में जिनका नाम मौजूद है, उनमें से कोई भी व्यक्ति साधारण व्यक्ति नहीं है। सभी के सभी राजनीति, व्यापार,मजहब,मत,वाद, संप्रदाय, प्रबंधन, विज्ञान, शिक्षा क्षेत्र के धुरंधर हैं।एक से बढ़कर एक प्रसिद्धि प्राप्त तथाकथित महापुरुष। आधुनिक वैज्ञानिक विकसित युग में जिनको महापुरुष, आदरणीय, बड़ा और पूज्यनीय माना जाता है और जिनकी जनता -जनार्दन पूजा करता है - सारे के सारे वही बड़े लोग एपस्टीन फाईल में मौजूद हैं।इस महा भ्रष्टाचार का भांडाफोड होने पर आज हम सब स्तब्ध हैं लेकिन किसी को भी अपनी निजी सोच और निर्णयों पर संदेह नहीं हो रहा है। क्यों हम ऐसे अय्याश,महाभोगी, कामवासना के कीड़ों को अपना आदरणीय मान लेते हैं? क्यों ऐसे उन्मुक्त भोगी राक्षसों को हम अपना आदर्श मानकर उन्हें सिर पर चढ़ाकर रखते हैं?जब हमारे आदरणीय आदर्श ही इतने अय्याश, उन्मुक्त भोगी, मनुष्यों का मांस खाने वाले और राक्षसी दरिंदे होंगे तो एक समता, समानता और संवेदनशील विश्व का निर्माण करने के सभी दावे खोखले और झूठे ही होंगे।हम आज भी वही पशुओं के तल पर खड़े हैं - कोई विकास वगैरह नहीं हुआ है। विकास आज का सबसे बड़ा झूठ है।हमारा पतन हुआ है और हो रहा है।आज भी दुनिया की बागडोर पाशविक राक्षसी दरिंदों के हाथों में मौजूद है। एपस्टीन फाईल की पूरी सच्चाई यदि सामने आ जाये तो राजनीति, मजहब, संप्रदाय, व्यापार, प्रबंधन, शिक्षा , विज्ञान, मीडिया आदि सभी क्षेत्रों की पोल खुल जायेगी। लेकिन विडंबना यह है कि आज का पूरा सिस्टम इन्हीं राक्षसी दरिंदों के हाथों में मौजूद है।ये अपनी सच्चाई को बाहर आने से हर हाल में रोकने के सारे प्रयास करेंगे और कर भी रहे हैं।*
डॉ. शीलक राम आचार्य

Wednesday, February 4, 2026

आधुनिक विकास में 'नैतिकता' का पतन (The decline of 'morality' in modern development)

 आज संसार में अस्तित्व के संबंध में जानकारी प्राप्त करने के लिये जो विचारधाराएं मौजूद हैं, उनमें पहली यह मानती है कि 'चेतन' से 'जड़' की उत्पत्ति होती है। इसके अंतर्गत भारत में वेद, ब्राह्मण,आरण्यक,उपनिषद्, योग वाशिष्ठ,अष्टावक्र, शंकराचार्य आदि मौजूद रहे हैं। पश्चात् जगत् में इस सिद्धांत को मानने वालों में पारमेनाईडिज,हीगल, ब्रैडले,ग्रीन आदि आते हैं। इन्होंने एक सत् तत्व को ही मुख्य माना है।
दूसरी विचारधारा को मानने वाले 'जड' से 'चेतन' की उत्पत्ति मानते हैं।भारत में इस संबंध में वेदों से लेकर आज तक अनेक सूचनाएं मौजूद हैं। वेद, ब्राह्मण, आरण्यक,उपनिषद् आदि में पूर्व पक्ष के रूप में इसके छूटपुट संदर्भ मिल जाते हैं। इसके अतिरिक्त पुरोचन,बृहस्पति,चार्वाक,आजीवक आदि इस विचारधारा के कट्टर समर्थक मौजूद रहे हैं। पाश्चात्य जगत् में इस सिद्धांत को मानने वालों में थैलिज,ईपिकुरियस, डैमोक्रिटस,हाब्स,पोलबाक फ्यूहरबाक,मार्क्स एंजेल्स तथा अधिकांश भौतिकवादी वैज्ञानिक आदि आते हैं।
तीसरी विचारधारा उन विचारकों की है जो तीन मौलिक तत्वों ईश्वर,आत्मा और प्रकृति को मानते हैं। इनके अनुसार कोई तत्व किसी से उत्पन्न नहीं होता है।सब खेल तीन तत्वों का है। सनातन धर्म और संस्कृति में इस सिद्धांत को मानने वालों में अधिकतर भारतीय विचारक और ग्रंथ आते हैं।वेद, ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद्, दर्शनशास्त्र, स्मृति,पुराण, महाकाव्य आदि में इसी विचारधारा को मुख्यतः स्वीकार किया गया है। आधुनिक युग में इस विचारधारा के प्रबल पोषक महर्षि दयानंद सरस्वती रहे हैं।यह विचारधारा सर्वाधिक सटीक, उचित और संतोषजनक है।इस विचारधारा के अनुसार दर्शनशास्त्र,फिलासफी, धर्म और विज्ञान की अधिकांश समस्याओं का समाधान हो जाता है।
यहां पर यह ध्यातव्य है कि भारतीयों ने अपने सनातन धर्म,संस्कृति, दर्शनशास्त्र , जीवनमूल्यों और महापुरुषों के विरोध में अपने विरोधियों से बहुत कुछ सुना हुआ है लेकिन विडंबना है कि स्वयं भारतीय अपने धर्म, संस्कृति, दर्शनशास्त्र , जीवनमूल्यों और दर्शनशास्त्र के संबंध में बहुत कम पढ़े -लिखे होते हैं। अधिकांश सनातनधर्मी लोग अपने धर्म,संस्कृति, दर्शनशास्त्र, जीवनमूल्यों और महापुरुषों के संबंध के संबंध में विदेशी हमलावर विचारकों, लेखकों और फिलासफर से जानकारी हासिल किये हुये होते हैं।दो दशक पहले यह जानकारी भारतीय शिक्षा संस्थानों में मौजूद मैकाले,मैक्समूलर,मोनियर विलियम और जेम्स  मिल द्वारा समर्थित  शिक्षा पद्धति से मिलती थी।अब दस पंद्रह वर्ष से यह जानकारी सोशल मीडिया से मिल रही है। सोशल मीडिया के सभी समूहों पर अब्राहमिक कल्चर का कब्जा है।वो जैसी कपोल-कल्पित और मनघड़ंत जानकारी हमें देना चाहते हैं, उसे धड़ल्ले से दे रहे हैं। हमारे शिक्षा संस्थानों में पिछले सात दशकों से यही चल रहा है।इस पर कोई रोक-टोक नहीं है। स्नातकोत्तर स्तर के विद्यार्थियों को भारतीय सनातन धर्म, संस्कृति, दर्शनशास्त्र, योग, अध्यात्म, समाज-सुधार, नैतिकता, पुरातन ग्रंथों और महापुरुषों के संबंध में प्रामाणिक जानकारी देने में कितनी कठिनाईयां आती हैं,इसे मैं स्वयं पिछले बीस वर्षों के विश्वविद्यालयीन शैक्षणिक अनुभव से महसूस करता आया हूं।जो भी विद्यार्थी योग डिप्लोमा, काउंसलिंग डिप्लोमा, श्रीमद्भगवद्गीता डिप्लोमा और विश्वविद्यालय की स्नातकोत्तर कक्षाओं में प्रवेश लेते हैं,वो अधिकांशतः पाश्चात्य पद्धति की सनातन भारतीय विरोधी शिक्षा पद्धति से पूरी तरह रंगे हुये होते हैं।उनका पूरी तरह से माईंड वाश हो चुका होता है। उन्हें सत्य जानकारी देना टेढी खीर होती है। कक्षाओं में जब हमारे विद्यार्थी कुछ भी बोलते हैं, जिज्ञासा करते हैं या शंका समाधान करते हैं तो उनमें से मैकाले, मैक्समूलर, मोनियर विलियम, जेम्स मिल, मार्क्स आदि अब्राहमिक कल्चर के विचारक बोल रहे होते हैं।
 यहां पर यह जान लेना भी दिलचस्प है कि शुरू शुरू में अधिकांश पाश्चात्य विचारक यह मानते थे कि वेदों में अनेकेश्वरवाद या हीन अनेकेश्वरवाद मौजूद है तथा वहां पर शुद्ध एकेश्वरवाद उपलब्ध नहीं होता है। वास्तव में यह धारणा पूरी तरह से मिथ्या है।आर्यसमाजी विचारकों ने इस प्रकार की विचारधारा का पुरजोर खंडन करके वैदिक साहित्य से शुद्ध एकेश्वरवाद की पुष्टि की है तथा पाश्चात्य विचारकों द्वारा फैलाये भ्रम के बादलों को छिन्न-भिन्न किया है।
तीन अब्राहमिक मजहबों में एकेश्वरवाद की अवधारणा को आधे- अधूरे ढंग से पारसी मजहब और शंकराचार्य के अद्वैतवादी दर्शनशास्त्र से लिया गया है। 'ब्रह्म सत्य जगत् मिथ्या'  शंकराचार्य की अवधारणा है। जरथुष्ट्र द्वारा प्रेरित 'पारसी मजहब' और उनकी पवित्र पुस्तक 'जेंद अवेस्ता' टूटी- फूटी वेदों की नकलमात्र है।
 भारतीय गांव देहात में एक कहावत है कि आप भैंस को तालाब पर लेकर जा सकते हैं लेकिन उसको जबरदस्ती करके पानी नहीं पिला सकते।जब उसको प्यास लगेगी,तभी वह पानी पीयेगी। दर्शनशास्त्र विषय के संबंध में में यह बात पूरी तरह से सच है।आप किसी व्यक्ति को दर्शनशास्त्र विषय पढा सकते हो, लेकिन अपने प्रयास से उसको जबरदस्ती करके दर्शनशास्त्री नहीं बना सकते। भारतीय विश्वविद्यालयों में तो हालात इससे भी अधिक बदतर हो चुके हैं। यहां पर तो सही तरीके से दर्शनशास्त्र विषय को पढ़ाने वाले शिक्षकों का ही अकाल पड़ा हुआ है।बस, अधिकांश अपना समय व्यतीत कर रहे हैं।हर महीने मोटी तनख्वाह मिल जाती है।यह मोटी तनख्वाह अच्छी तरह पढ़ायेंगे तो भी मिलेगी तथा नहीं पढ़ायेंगे तो भी मिलेगी। हमारे वाले शिक्षक नहीं पढ़ाने वाले आप्शन का चयन करते हैं।
सत्ता कभी भी विनम्र नहीं होती है। जनमानस के प्रति सत्ता सदैव से क्रूर रहती आई है। सत्ता का चाहे कोई भी स्वरुप हो, इससे फर्क नहीं पड़ता है। साम्यवादी, समाजवादी, पूंजीवादी या फिर लोकतांत्रिक - हर प्रकार की सत्ता क्रूर होती है। सत्ता जनमानस से भयभीत हो जाये, इससे पहले ही जनता जनार्दन को भयभीत करने के जुगाड कर लिये जाते हैं। सत्ता के पास फौज, पुलिस,पूंजी और मीडिया की ताकत होती है। बेशक जनता -जनार्दन अपने जमीनी मुद्दे उठाने का प्रयास करे, सत्ता उपरोक्त चारों शक्तियों के बल से उसे दबाकर रखती है। क्योंकि सत्ता को जनता जनार्दन की समस्यायों से अधिक अपनी सत्ता को बनाये रखने की अधिक चिंता होती है।सच को झूठ और झूठ को सच बनाने के सारे हथियार सत्ता के पास मौजूद होते हैं।कितनी भी जनविरोधी सत्ता हो,वह जनता के बीच से ही अपने समर्थन में जय जयकार करने वाला वर्ग तैयार कर ही लेती है।वह वर्ग भूखा-प्यासा रहकर भी जनविरोधी सत्ता के लिये सुरक्षा कवच का काम करता है।इस वर्ग को अंधभक्त वर्ग कहा जाता है। प्रचंड मूर्ख यह अंधभक्त वर्ग अपना और अपने राष्ट्र का नुकसान करके भी क्रूर सत्ता के साथ रहता है।यवन, मंगोल,मुगल, पुर्तगाली, अफगान और अंग्रेज आक्रमणकारियों के समय भी भारत में ऐसा अंधभक्त वर्ग मौजूद था।वह आंखों को बंद करके आततायी विदेशी आक्रमणकारियों के साथ खड़ा रहता था।इस तरह की गद्दारी करने वाला वर्ग लूटपाट में थोड़ा हिस्सा पाकर खुश हो जाता था।
संसार में किसी भी क्षेत्र में सफल और असफल होने वाले लोगों की लिस्ट बनाई जाये तो बहुमत उन लोगों का मिलेगा कि जिन्होंने चापलूसी, धोखाधड़ी,झूठ और तिकड़मबाजी के सहयोग पर सफलता पाई है। और उन लोगों की संख्या बहुत कम मिलेगी कि जिन्होंने सत्यनिष्ठा, पुरुषार्थ, मेहनत और प्रतिभा के बल पर सफलता पाई है। संसार के विभिन्न देशों में जो राजनीतिक , प्रशासनिक, आर्थिक और प्रबंधकीय सिस्टम फिलहाल चल रहा है, उसमें अच्छे लोगों की उपेक्षा और बुरे लोगों को पुरस्कृत किया जाता है।यह किसी एक क्षेत्र की नहीं अपितु हरेक क्षेत्र की सच्चाई है। केवलमात्र दिखावे के लिये ही प्रिंट मीडिया, इलैक्ट्रोनिक मीडिया और सोशल मीडिया पर अच्छाई की विजय और बुराई की पराजय की कहानियां सुनाई जाती हैं। हकीकत में ऐसा कहीं भी और कभी भी नहीं होता है।इस प्रकार का दुष्प्रचार नेताओं, धर्मगुरुओं और पूंजीपतियों द्वारा इसलिये किया जाता है ताकि जनता- जनार्दन को बेवकूफ बनाया जा सके तथा उपरोक्त तथाकथित बड़े लोगों का लूटपाट का धंधा बिना किसी रुकावट के चलता रहे। समस्त धरा पर यही हो रहा है। क्या विनाशकारी युद्धक हथियार बनाने वाली बडी -बडी कंपनियों के खरबपति स्वामी  सत्यनिष्ठ हैं? क्या कार,ट्रक,बस,बाईक, कंप्यूटर, लैपटॉप, मोबाइल आदि बनाने वाली कंपनियों के खरबपति स्वामी वास्तव मेहनतकश हैं?क्या एलोपैथिक दवाओं को बनाने वाली कंपनियों के खरबपति स्वामी करुणावान हैं?क्या कोयला खदान, मकान निर्माण सामग्री निर्माता माइनिंग करने वाले तथा सड़क बनाने वाले खरबपति लोग ईमानदार हैं? क्या खेती-बाड़ी के लिये शंकर बीज बनाने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों के खरबपति स्वामी प्रेम से भरे हुये हैं?क्या प्रतिदिन लाखों पशुओं का क़त्ल करने वाले कत्लखानों के खरबपति स्वामी न्यायकारी हैं?क्या शिक्षा को व्यापार बनाकर खरबों रुपए लूटने वाले निजी शिक्षण संस्थाओं के स्वामी,शिक्षक, प्रोफेसर आदि प्रतिभाशाली हैं? क्या विभिन्न देशों के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, प्रशासनिक अधिकारी और पुलिस अधिकारी दूध के धुले हुये हैं?उपरोक्त सभी लोगों में ऐसे कौनसे गुण, योग्यता और प्रतिभा के चमत्कार मौजूद हैं, जोकि वास्तविक सत्यनिष्ठ, कर्तव्यनिष्ठ, करुणामय, बुद्धिमान, मेहनतकश और ईमानदार लोगों में नहीं हैं? यदि निष्पक्षता से निर्णय लिया जाये तो मालूम होगा कि संसार में किसी भी क्षेत्र में सफल लोगों का प्रतिशत लूटेरे,बेईमान,भ्रष्ट,चोर,हिंसक, तिकड़मबाज और चापलूस लोगों का अधिक है।
 ऐसे लूटपाट के परिवेश में कोई कुछ भी कहता रहे, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है।श्रीमद्भगवद्गीता 12/12 में भगवान् श्रीकृष्ण ने जो कहा है कि 'अभ्यास से ज्ञान श्रेष्ठ है। ज्ञान से ध्यान श्रेष्ठ है। ध्यान से कर्मफलत्याग श्रेष्ठ है। कर्मफलत्याग से ही शांति की अनुभूति होती है'- इस प्रकार के उपदेशों का कोई भी महत्व नहीं है। टेढी उंगली किये बगैर बर्तन से घी नहीं निकल सकता है। हां, यदि उंगली को टेढ़ा कर लिया जाये तो पूरा बर्तन घी से खाली किया जा सकता है।कुछ गिने-चुने दस प्रतिशत चालाक, धूर्त, लूटेरे, चापलूस, तिकड़मबाज, भ्रष्ट और हिंसक लोग उंगलियां टेढ़ी कर करके दुनिया की अधिकांश सुख सुविधाओं पर कब्जा किये बैठे हैं।
विष्णु शर्मा द्वारा लिखित 'हितोपदेश' नामक नीति ग्रंथ के 'मित्र लाभ' प्रकरण में कहा गया है -

विद्या विवादाय धनं मदाय खलस्य शक्तिः परपीडनाय।
साधोस्तु सर्वं विपरीतमेतद् ज्ञानाय दानाय च रक्षणाय॥

इसका अर्थ है कि दुष्ट की विद्या विवाद के लिए, धन अहंकार के लिए और शक्ति दूसरों को कष्ट देने के लिए होती है, इसके विपरीत सज्जनों की विद्या ज्ञान के लिए, धन दान के लिए और शक्ति दूसरों की रक्षा के लिये होती है।भारत पर अकारण हमले करने वाली विदेशी शक्तियों और विदेशी शासकों साईरस,डेरियस, सिकंदर,मंगोल,हूण,डच, डैनिश, पुर्तगाली और अंग्रेजों ने आखिर ऐसा क्यों किया था?इन आक्रमणों के पीछे उनकी कौनसी मानसिकता थी? शताब्दियों तक धर्माचार्यों और सैनिकों की सेना लेकर भारत पर आक्रमण करने के पीछे उनकी कौनसी कामना थी,जो पूरी हो जाती?अकारण किसी संप्रभु राष्ट्र पर आक्रमण करके उसके धन -दौलत, संपदा,वैभव, शिक्षा, नैतिक -मूल्यों सभ्यता, संस्कृति और धर्म को बर्बाद करना कौनसा कल्याणकारी कृत्य है?यह एक आसुरी और राक्षसी कृत्य है।
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डॉ शीलक राम आचार्य 
दर्शनशास्त्र -विभाग 
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय 
कुरुक्षेत्र -136119