इससे यह भी चमत्कार हो सकता है कि हम स्वयं का सम्मान करने में ही दूसरों का सम्मान करने के रहस्य में पारंगत हो सकेंगे।जब इस सच्चाई को समझने से लोग दूर भागते हैं तो वहीं से उनके जीवन में दोगलापन शुरू हो जाता है।
सांसारिक जीवन में किसी भी व्यक्ति के लिये सर्वप्रथम अपनी निजता की सुरक्षा,अपना निजी हित या स्वार्थ पूरा करना महत्वपूर्ण होता है।
दूसरों से संपर्क में आने पर मन के गहरे तलों में यही विचार और भावना महत्वपूर्ण होते हैं कि स्वयं को कैसे स्थापित किया जाये या स्वयं के सम्मान की रक्षा कैसे की जाये या स्वयं को चहुंओर के परिवेश में कैसे दूसरों के सामने बड़ा दिखलाया जाये।
सच्चाई कभी भी कड़वी नहीं होती है अपितु हमने सच्चाई का सामना करना छोड़ दिया है, इसलिये सच्चाई कड़वी लगती है। यह एक कड़वी सच्चाई है कि जहां तक भौतिक संसार की बात है मित्रता, दोस्ती,प्यार,प्रेम,स्नेह, दांपत्य जीवन, राष्ट्रप्रेम, बलिदान,शहादत,मजहबी विश्वास आदि सभी में व्यक्ति का स्वयं का सम्मान, स्वयं का होना, स्वयं का स्थान मुख्य होता है।
लेकिन सभी व्यक्ति दिखावा यह करते हैं कि वो अपने दोस्तों के लिये, अपनी प्रेमिका के लिये, अपने प्रेमी के लिये, अपने मजहब के लिये, अपने राष्ट्र के लिये, अपनी संतान के लिये, अपने माता-पिता के लिये, अपने गुरुओं के लिये सम्मान की भावना रखते हैं। इसके लिये वो कुछ भी करने को तत्पर रहते हैं, इसके लिये वो कोई भी बलिदान कर सकते हैं।
वास्तव में यह सफेद झूठ है। कोई किसी के लिये कुछ नहीं करता है अपितु सभी अपने खुद के लिये कर रहे हैं। दूसरों के प्रति प्रेम, सेवा, सम्मान, इज्जत, सुरक्षा,बलिदान, भक्ति आदि करके वास्तव में वो भविष्य के लिये अपनी खुद की सुरक्षा, खुद के सम्मान और खुद की इज्जत का जुगाड कर रहे होते हैं।
दूसरों से मदद लेने पर, दूसरों द्वारा सम्मान किये जाने पर या दूसरों द्वारा इज्जत दिये जाने पर मन में एक हीनता की भावना घर बना लेती है।इस हीनता की भावना के साथ व्यक्ति खुद को छोटा महसूस करने लगता है। ऐसे में वह अवसर की तलाश में रहता है कि कैसे वह अपने आपको दूसरों की नजरों में बड़ा, सम्मानित और सर्वोच्च सिद्ध कर सकता है।
यहां कोई किसी से छोटा बनकर नहीं रह सकता है। ऐसा हो ही नहीं सकता।।आर्थिक,सामाजिक , राजनीतिक या शैक्षिक आदि क्षेत्रों में छोटा बनकर रहने की उसकी विवशता होती है;यह अलग बात है।
सभी खुद को स्थापित करने में लगे हुये हैं। कोई राजनीति से, कोई शिक्षा से, कोई ताकत से, कोई अपराध से, कोई भोग से, कोई बड़े मकान से, कोई बड़ी गाड़ी से, कोई सेवा से तथा कोई बलिदान करके खुद को बड़ा सिद्ध करने में लगे हुये हैं। तर्क के बल से विचार करके देखो -सांसारिक मनुष्य की वास्तविकता यही है।
दर्शनशास्त्र विषय आपको यह सब करने की दृष्टि प्रदान करता है। बशर्ते आप दर्शनशास्त्र विषय को पढकर तार्किक ढंग से सोचने, विचारने और निर्णय लेने में निष्ठा से लग सको।
लेकिन फिर वही बात सामने आ जाती है। व्यक्ति यदि यहां पर भी अपने आपको केंद्र में रखकर तार्किक चिंतन करके निर्णय लेगा तो सारा दर्शनशास्त्र व्यर्थ हो जायेगा।पूर्व हो या पश्चिम हो-ऐसा ही हो रहा है। शिक्षा के केन्द्र विश्वविद्यालय विशेष रूप से दर्शनशास्त्र-विभागों के शिक्षक इसक सर्वाधिक शिकार हैं।
भारत और भारत से बाहर
दर्शनशास्त्र विषय को केंद्र में रखकर कितने विभाग,कितनी अकादमियां,कितनी परिषदें, कितने शोध केंद्र, कितने क्लब आदि बने हुये हैं -निष्पक्षता से अवलोकन करके देखो,जानो और निर्णय लो। वहां पर क्या हो रहा? दर्शनशास्त्र तो शायद ही कहीं पर होगा। तार्किक चिंतन तो शायद ही कहीं पर मौजूद होगा।
Acharya Shilak Ram The Writer
आर्यावर्त चिंतन भारतीय दर्शन, सांस्कृतिक विमर्श और राष्ट्रचेतना पर केंद्रित एक वैचारिक एवं शोधपरक डिजिटल मंच है। यह मंच आचार्य शीलक राम जी के वैदिक-दार्शनिक चिंतन, सांस्कृतिक विश्लेषण और समकालीन सामाजिक-राजनीतिक प्रश्नों पर आधारित दृष्टिकोण को सुव्यवस्थित रूप में प्रस्तुत करता है। यहाँ प्रस्तुत सामग्री में — * भारतीय दार्शनिक परंपराओं का विश्लेषणात्मक अध्ययन * आधुनिक शिक्षा और नैतिक विमर्श का आलोचनात्मक परीक्षण * राष्ट्र और समाज से संबंधित जटिल प्रश्नों का तर्कसंगत विवेचन * परंपरा और आधुनिकता
Saturday, November 7, 2026
'तर्क' से 'विचार' करके निष्पक्षता से देखो तो (If you look at it objectively, with 'reason' and 'think'...)
यहां कोई किसी के लिये नहीं रोता
यहां कोई किसी के लिये नहीं रोता है। संसारीजन अपने सुख,सुविधाओं और सुरक्षा का रोना रोते हैं। माता-पिता,भाई -बहन, पति-पत्नी आदि में से किसी के भी बिमार होने, मरणासन्न होने या फिर देहावसान होने पर लोगों का रोने -धोने का ड्रामा देखने लायक होता है।वो आंसू और रोना -धोना केवल अपने लिये होते हैं।वो आंसू और रोना स्वार्थ से भरे हुये होते हैं।
कितने ही परिवारों में किसी के माता-पिता के गंभीर रूप से बिमार होने या देहांत हो जाने पर जमीन, जायदाद,मकान, बैंक बैलेंस,जेवर आदि के लिये निकटतम संबंधियों को लड़ते, झगड़ते,सिर फुटौव्वल करते और कोर्ट कचहरी करते हुये देखा जा सकता है।
औलाद के स्वार्थी व्यवहार से प्रताड़ित होकर अनेक घरों में बूढ़े माता-पिता वृद्धाश्रमों में रहने को विवश होते हैं। अनेक माता- पिता ऐसे हैं ,जो वृद्धाश्रमों में भी नहीं जा पाते हैं लेकिन अपमानित होते, भूखे प्यासे और बात- बात पर गाली -गलौज को सहन करते हुये घरों में ही रहने को विवश होते हैं। जायें तो जायें कहां?
ऐसे माता- पिता के मरने पर भी संतानें रोने -धोने का नाटक करती
हैं। जीते जी माता -पिता को अच्छी तरह खाना नहीं खिलाया और मरने के बाद मृत्यु भोज का आयोजन होता है।यह सब भी औलादें माता -पिता के लिये नहीं अपितु अपने खुद के सम्मान, बड़ाई और प्रसिद्धि के लिये करती हैं।
जितनी घृणित सच्चाई किसी औलाद के बारे में है, उतनी ही घृणित सच्चाई माता -पिता के संबंध में भी है। माता-पिता भी संतानोत्पत्ति खुद की सेवा करवाने, बुढ़ापे में सहारा बनने,वंश आगे बढ़ाने और निज तृप्ति के लिये करते हैं।
यदि उन्हें पहले ही यह मालूम हो जाये कि उनकी संतान किसी भी हालत में बुढ़ापे में उनका सहारा नहीं बनेगी,सारी संपत्ति को बेच खायेगी तथा उन द्वारा वंश बेल बढ़ाने का कोई औचित्य नहीं है;तो कोई भी माता -पिता संतानोत्पत्ति नहीं करेंगे।विवाह तो कामवासना की पूर्ति के लिये करेंगे लेकिन संतानोत्पत्ति से बचकर रहेंगे।
संसार स्वार्थ आधारित है।सब अपने स्वार्थ के लिये पुरुषार्थ कर रहे हैं।वह स्वार्थ किसी भी रूप में हो सकता है।वह स्वार्थ निज संतुष्टि और तृप्ति भी हो सकता है।इसीलिये यह कहना सच है कि कोई किसी के लिये नहीं रोता है, अपितु सभी अपने लिये रो रहे हैं।बात सुनने में अहंकार को ठेस पहुंचाने वाली है, लेकिन पूरी तरह से वास्तविक है।
संसारियों का यह संसार प्रेम से नहीं अपितु स्वार्थ के धागे से जुड़ा हुआ है।जिस डोर ने संसारियों को परस्पर बांधा हुआ है,वह डोर स्वार्थ से निर्मित है।
संसार में कितने व्यक्ति ऐसे हैं,जो प्रेमवश और करुणावश एक -दूसरे पर अत्याचार करने से बचते हैं? एक- दूसरे का सामान चोरी करने से बचते हैं।एक दूसरे की बहन -बेटी का सम्मान करते हैं।ऐसे संवेदनशील व्यक्ति बहुत कम मिलेंगे। ऐसे व्यक्ति विरले ही होते हैं। यदि आपकी नजर कोई ऐसा व्यक्ति हो तो उसके पास बैठकर उससे जीवन की सीख अवश्य ले लेना।उसका सत्संग अवश्य करना।
इनके सिवाय सभी व्यक्ति स्वार्थवश या भयवश एक दूसरे के काम आते हैं।एक -दूसरे का ख्याल रखते हैं। मुसीबतों में एक- दूसरे की मदद करते हैं। मैं किसी के काम आऊंगा तो दूसरे मेरे काम आयेंगे।यह एक शुद्ध सौदा है। जीने के लिये यह आवश्यक है।
समाज -दर्शन में इसी को तो 'समाज' कहा गया है। संसारियों के लिये समाज एक समझौता होता है। इसमें अध्यात्म आदि को घुसेड़ना मूल समस्या से मुंह चुराना कहा जायेगा। आचारशास्त्र में इसका खूब गुणगान हुआ है। इथिक्स आचारशास्त्र का ही विकृत रूप है।
Thursday, November 5, 2026
तार्किक बनो, अंधभक नहीं (Be logical, not blind)
मैनीफैस्टेशन करने और करवाने वालों की सोशल मीडिया पर भीड़ लगी हुई है। इसके माध्यम से जीवन और जगत् में कुछ भी भौतिक, मानसिक और आध्यात्मिक मिलने के लिये प्रलोभन दिये जा रहे हैं। मैनीफैस्टेशन किया और चमत्कार हो गया - ऐसी तसल्ली दी जा रही है। हालांकि यदि यह बात पूरी तरह से सच होती तो सर्वप्रथम मैनीफैस्टेशन करवाने वाले अपने आपको ही करोड़पति/अरबपति बना लेते।जिस तरह से मैनीफैस्टेशन के संबंध में प्रचार किया जा रहा है,अब तक उसका अभ्यास करके ये खुद ही विधायक, सांसद, कुलपति, एसपी, आईएएस बन जाते। इसके अभ्यास द्वारा ये खुद ही दयानंद, विवेकानंद,ओशो, कृष्णमूर्ति,प्रभुपाद, श्रीराम शर्मा आचार्य, जग्गी वासुदेव, रामदेव आदि बन जाते। दूसरे टाटा, बिड़ला,अडानी, अंबानी, गोदरेज,जिंदल आदि को पैदा करके सिद्ध करो। गांधी, नेहरू, सुभाष,पटेल, इंदिरा आदि को बनाकर दिखलाओ। मैनीफैस्टेशन के माध्यम से नये- नये आविष्कार करने का दावा करने वाले पाश्चात्य जगत् ने अनेक दूसरे मैस्मर, निकोला टेस्ला, मर्फी एटकिंसन ,गोडार्ड, हिल, वाटेल्स, हार्नेल, बर्न, हिक्स, डिस्पेंजा,वेन,प्राक्टर,डायर आदि पैदा क्यों नहीं कर लिये? मैनीफैस्टेशन के द्वारा दूसरे डार्विन,आइंस्टीन, मैक्स प्लांक, न्यूटन, क्यूरी, पाश्चर आदि पैदा करके दिखलाओ।जिस प्रकार से मैनीफैस्टेशन को प्रचारित किया जा रहा है,वह धंधा अधिक और सृजन कम है। यदि यह सब करना संभव नहीं है तो मैनीफैस्टेशन से चमत्कार संभव करने वालो को पकड़ो और उन पर कार्रवाई करवाओ। एकाग्रता से हिप्नोसिस या निर्विचारता आदि पैदा करके मैनीफैस्टेशन से अस्तित्व को पुकार लगाकर चमत्कार करके दिखलाओ। यदि अपने आपको तार्किक चिंतन, तार्किक बुद्धि, वैज्ञानिक बुद्धि और तार्किक सोच का समर्थक और प्रचारक कहते हो,तो मैनीफैस्टेशन के द्वारा यह सब सिद्ध करके दिखलाओ। आज तक जो बड़े-बड़े दार्शनिक, विचारक, वैज्ञानिक, काउंसलर , मनोवैज्ञानिक, साहित्यकार, आविष्कारक, अन्वेषक, नेता, सुधारक, धर्माचार्य,संत, मुनि , योगी आदि हुये हैं; वो हो सकता है कि किन्हीं अन्य कारणों से प्रसिद्धि को प्राप्त हुये हों।हो सकता है कि उन्होंने मैनीफैस्टेशन की बजाय अपने जीवन में प्रसिद्धि की ऊंचाई को किन्हीं अन्य योग्यताओं, संभावनाओं और विशेषताओं से अर्जित किया हो।
मैनीफैस्टेशन के रहस्य को श्रीमद्भगवद्गीता से जानें (Learn the secret of manifestation from the Bhagavad Gita)
श्रीमद्भगवद्गीता के इस श्लोक को यदि ध्यान से समझ लिया जाये तो सोशल मीडिया पर मौजूद मैनीफैस्टेशन करवाने वालों की भीड़ का भांडाफोड हो जाये। लेकिन हमारे यहां तो पाश्चात्य कूड़ा-कर्कट पर अंधभक्ति करने का बुखार चढ़ा हुआ है। श्लोक का अवलोकन कीजिये -
सत्त्वानुरुपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत।
श्रद्धामय: अयं पुरुषो यो यच्छृद्ध: स एव स:।।(17/3)
इसमें कहा गया है कि हरेक मनुष्य की श्रद्धा उसके अंतःकरण के अनुरूप होती है। जैसे संस्कार उसके चित् पर मौजूद हैं, उसके अनुरूप उस व्यक्ति की श्रद्धा निर्मित होती है। मनुष्य का निर्माण उसकी श्रद्धा यानी उसके स्वभाव यानी उसके संस्कारों के अनुसार होता है।जैसे संस्कार, वैसा ही व्यक्ति।जैसे संस्कार,वैसी श्रद्धा। जैसे संस्कार, वैसा व्यक्तित्व। फिर आगे उस श्रद्धा को महर्षि वेदव्यास ने सात्विक, राजसिक और तामसिक प्रकार की कथन किया है।इस श्लोक की व्याख्या करते हुये शंकराचार्य,रामानुजाचार्य, श्री अरविन्द, ओशो रजनीश आदि सभी ने यह कहा है कि मनुष्य जो कुछ भी आज है; वह अपने संस्कारों, भावनाओं, विचारों, अनुभवों, स्मृतियों आदि का संग्रहमात्र है। और ये सब उस मनुष्य के चित्त के गहरे तलों पर मौजूद हैं। इनसे स्वतंत्र होकर सोचना,विचारना, चिंतन करना,भाव करना, कल्पना करना तथा मैनीफैस्टेशन आदि करना इतना सरल नहीं है, जितना सरल सोशल मीडिया पर मौजूद मैनीफैस्टेशन करवाने वाले, काउंसलर,हीलर, हिप्नोटिस्ट और मनोचिकित्सक बतला रहे हैं।निज प्रकृति के विरोध में जाकर कुछ भी करना इतना सहज नहीं होता है। मनुष्य अपनी प्रकृति को साथ में लेकर जन्मता है। प्रकृति के बंधन को तोड़कर इसकी कारागार से बाहर आना केवलमात्र गहरे योगाभ्यास से ही संभव हो सकता है।ऐसा नहीं है कि श्वास को धीमा करके, किसी भी अनाप-शनाप विचार का रिपीटेशन करके, कल्पना करके,विज्युलाईजेशन करके और इसके साथ स्वयं के अहसास को जोड़ने से यह संभव हो जायेगा। यदि यह सब करना इतना सरल और सहज होता तो कोई भी ऐसा करके कुछ भी सफलता, पद, प्रतिष्ठा, प्रसिद्धि आदि पा लेता। इसके विज्ञान को यदि श्रीमद्भगवद्गीता, योग वाशिष्ठ, अष्टावक्र गीता और योगसूत्र के अनुसार समझा जाये,तो अनेक रहस्यों का उद्घाटन हो सकता है।
दर्शनशास्त्र दर्शनशास्त्र होता है (Philosophy is Philosophy)
Wednesday, November 4, 2026
पतंजलि, गोरखनाथ, स्वात्माराम, घेरंड और श्रीनिवासभट्ट द्वारा प्रदत्त प्राणायाम का बिगडता स्वरूप : एक विवेचना
1.)योगाभ्यास की हरेक परंपरा में प्राण के महत्व को स्वीकार किया है।प्राण की उपेक्षा करके योगाभ्यास की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। विभिन्न संप्रदायों में योगाभ्यास की सैकड़ों पद्धतियां विद्यमान हैं। अब्राहमिक कल्चर के अंतर्गत पारसी, यहुदी,ईसायत, इस्लाम तथा इनसे प्रेरित विभिन्न मतों में योगाभ्यास की अवधारणा मौजूद नहीं है।भारत में भी पिछले 100-150 वर्षों के दौरान केवल किसी गुरु द्वारा नामदान आदि से मुक्ति की अवधारणा पर चलने वाले पचासों मत पैदा हो गये हैं। इनके लिये किसी अनुशासन,संयम,तप, योगाभ्यास,आहार -विहार आदि की कोई आवश्यकता नहीं है।बस किसी ढोंगी, अपराधी,जेल की सजा काट रहे तथाकथित स्वघोषित संत से नामादि ले लो। फिर कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं है। इनमें से हरेक स्वघोसित संत के लाखों की संख्या में चेले -चेलियां मौजूद हैं। इन्होंने खुद को परमात्मा मानकर पूजवाना शुरू कर दिया है।
2.)सनातन- धर्म में ऐसा कभी भी नहीं होता है। इसमें आचरण,संयम, त्याग, तपस्या, अनुशासन, आहार- विहार,निद्रा,दिनचर्या,ऋतुचर्या आदि सबका महत्व होता है। भारत में अब्राहमिक शैली पर चलने वाले पचासों मत पैदा हो गये हैं।ये वास्तव में सभी के सभी नास्तिक हैं।ये संसार को संचालित करने वाली किसी शक्ति को न मानकर बस अपने गुरु को ही परमात्मा मानते हैं।इनकी कोई न कोई बांसुरी या शब्द वाणी या पुस्तक या गुरु पूजन पद्धति या नामदान विधि या मंत्र या धुन या तीर्थ -स्थली आदि अवश्य होते हैं। इन सबने सनातन धर्म से ही कोई श्लोक या शिक्षा या पंक्ति चोरी करके अपने अपने पंथों का अलग से निर्माण किया हुआ है। क्योंकि अलग से अपनी पंथिक दुकानदारी चलाना है, इसलिये सनातन धर्म के विरोध में बोलना इन सबमें सामान्यतः पाया जाता है। बारहवीं से लेकर सत्रहवीं सदी के कालखंड में कबीर,दादू,नानक आदि संतों ने सनातन धर्म की रक्षा करने के लिये उत्तम प्रयास किये थे, लेकिन उन्नसवीं -बीसवीं सदी के कालखंड में इन्होंने संत, गुरु, सद्गुरु आदि पदवियों की आड़ लेकर सनातन -धर्म को तो कमजोर किया ही, इसके साथ राष्ट्रवासियों से उनके बल,पौरुष,क्षत्रियत्व और राष्ट्र -रक्षा के जज्बे भी समाप्त करने का काम किया है। इन्होंने उन धूर्त और विश्वासघाती विदेशी हमलावरों के साथ आये धर्मांध मिशनरियों के सामने एकतरफा प्रेम, सौहार्द और भाईचारे के गीत गाते रहकर भारतवर्ष को एक आसान टारगेट बनाने का काम किया है।आज भी ये वहीं कर रहे हैं। इनको दुश्मनों की पहचान बिल्कुल भी नहीं है।
3.)संत परंपरा के अधिकांश गुरुओं ने राजयोग,हठयोग,तंत्रयोग में मौजूद विभिन्न शुद्धिकरण योगाभ्यास आदि का खंडन इसलिये किया था, क्योंकि इसकी आड़ में शोषण शुरू हो गया था। वास्तव में उनके मन में इन सबके प्रति भरपूर सम्मान मौजूद था।बाद के तथाकथित नकली गुरुओं ने उपरोक्त संतों की आधी बात को पकड़ लिया और आधी को छोड़ दिया।आज भी यह पागलपन चल रहा है। कुछ अपवादों को छोड़कर बारहवीं सदी से लेकर इक्कीसवीं सदी के कालखंड में मौजूद रहे किसी भी सद्गुरु या संत या फकीर या नामदानी गुरु ने अफगान,तुर्क,मुगल,मंगोल, फ्रांसीसी,ब्रिटानी हमलावरों से यह पूछने का दुस्साहस नहीं किया कि आप अपने देश में जाकर क्यों नहीं रहते हो-आप हमारे देश में आकर शासन क्यों कर रहे हो -आप हमारे लाखों वर्षों पुरातन सनातन धर्म और संस्कृति को नष्ट करने पर क्यों लगे हो- हमारे भारत पर हम शासन करेंगे,तुम विदेशी नहीं? एकतरफा भाईचारे, सौहार्द,प्रेम, करुणा और भक्ति की पीपनी बजाते रहे। उनके पदचिन्हों पर चलने वाले आजादी के पश्चात् भारत में पचासों तथाकथित संत मौजूद हैं।इनकी विभिन्न सरकारों, पूंजीपतियों से सांठगांठ रहती आई है। ये नेताओं के लिये एकमुश्त वोट का इंतजाम करते हैं तो नेता इनके लिये जैड सुरक्षा सहित अनेक सुविधाएं प्रदान करते हैं।ये कभी भी किसान, मजदूर और बेरोजगार युवाओं के समर्थन में नहीं खड़े हुये हैं। इन्होंने कभी भी भ्रष्टाचार के विरोध में आंदोलन नहीं किये हैं।धर्म, नैतिकता, अनुशासन,विवेक, जागरुकता और होश जैसा इनके पास कुछ भी मौजूद नहीं होता है।ये पूरी तरह से करोड़ों लोगों का एक साथ माईंडवाश करके नेताओं के लिये वोट का जुगाड करने का साधन बनकर रह गये हैं। राष्ट्रभक्ति, राष्ट्रप्रेम और राष्ट्र बलिदान जैसा इनमें कुछ भी नहीं होता है।
4.) संत परंपरा के सैकड़ों गुरु लोग यदि राजयोग के प्राणायाम के साथ हठयोग के प्राणायाम की साधना को भी स्वीकार करके अपने अनुयायियों को तैयार करते तो भारत बहुत शीघ्र स्वतंत्र हो जाता। बौद्ध मतानुयायियों की विनाशकारी उन्मुक्त भोगवादी जीवन-शैली से भारतीयों को सावधान करके नाथ परंपरा के नाथों ने सनातन भारतीय योगानुसार मौजूद राजयोग के साथ हठयोग की प्राणायाम प्रणाली को भी भरपूर महत्व प्रदान करके भारत की युवाशक्ति को जहां सत्य योगाभ्यास में लगाया था, वहीं पर सैनिक शक्ति को खड़ा करने में भी मदद की थी। इन्होंने बलिष्ठ भुजदंड वाले राष्ट्ररक्षक लाखों सैनिकों को भी तैयार करने में मदद की थी। अपने दुश्मनों से एकतरफा शान्ति,सह- अस्तित्व, संतुलन,प्रेम, करुणा,सर्वपंथसमभाव और भाईचारे की बातें करने की प्रवृत्ति ने भारत को दुनिया का सबसे अधिक असुरक्षित राष्ट्र बनाने में सहायता की है।
5.)प्राणायाम करने की कुंभक वाली शैली और आते -जाते -रुकते प्राण को सिर्फ देखते रहने की शैली परस्पर जुड़ी हुई हैं।ये एक -दूसरे की विरोधी न होकर परस्पर पूरक हैं।बिना कुंभक किये प्राण को साक्षीभाव से देखते रहकर विचार,मन, अहंकार, बुद्धि,चित्त तक की यात्रा नहीं हो सकती। ऐसा व्यक्ति कभी भी अपने आत्मस्वरुप में स्थित नहीं हो सकता है। यदि देह में अस्थिरता या कोई किसी प्रकार की दिक्कत हो,तो व्यक्ति देह में ही अटका रहेगा। उसके लिये देह से पार जाना असंभव हो जाता है। ठीक इसी तरह यदि श्वास-, प्रश्वास में कोई दिक्कत हो,तो भी साधक का सर्वप्रथम अपने श्वास- प्रश्वास को ठीक करना आवश्यक होता है।इसको किये बगैर कोई भी साधक श्वास- प्रश्वास से आगे नहीं जा सकता।वह श्वास प्रश्वास पर ही अटका रहेगा। इससे उसकी देह भी अनेक रोगों से ग्रस्त हो जायेगी।भारत में देह को निरोग रखने के लिये आसन, व्यायाम और युद्धक कलाओं का विकास किया गया है।श्वास -प्रश्वास को ठीक करने के लिये प्राणायाम का विकास किया गया है।इन दोनों यानी देह और श्वास -प्रश्वास वाले हिस्सों को संतुलित,सही और आत्मस्थ होने के योग्य बनाने के लिये प्रयास और अप्रयास वाली विधियों का प्रयोग लाखों वर्षों से होता आ रहा है।केवल प्रयास या अप्रयास वाले हिस्से को पकड़कर बैठ जाना खतरनाक सिद्ध होता है।
6.)यदि कोई व्यक्ति शारीरिक व्यायाम, खेलकूद, परिश्रम,सैर या अन्य शारीरिक हरकतें नहीं करेगा,तो उसके शरीर का बिमारियों का घर बन जाना अवश्यंभावी है। केवल इसलिये योगाभ्यास के अंतर्गत विभिन्न प्रकार के आसनों और मार्शल आर्ट्स का विकास किया गया है। ठीक इसी तरह ही श्वास और प्राण के शरीर में भरपूर मात्रा मात्रा होने को सुनिश्चित करने के लिये विभिन्न प्रकार के प्राणायाम का विकास हुआ है।इन प्राणायामों में रेचक,पुरक के साथ कुंभक का सर्वाधिक महत्त्व होता है। योगाभ्यास करने के अनिच्छुक और चेले -चेलियों की भीड़-भाड़ बढ़ाने में रुचि रखने वाले तथाकथित गुरुओं ने प्राणायाम में 'कुंभक' का विरोध करके केवल श्वास- प्रश्वास को देखते रहने पर जोर दिया है।इसे किसी ने सहजयोग,किसी ने लययोग, किसी ने प्राणापान, किसी ने आनापानसति, किसी ने विपस्सना तथा किसी ने अन्य बेढंगे और अव्यावहारिक नामों से संबोधित किया है। स्वयं सिद्धार्थ बुद्ध ने कयी योगाचार्यों,सांख्याचार्यों और हठयोगाचार्यों के मार्गदर्शन में योगाभ्यास करके निर्वाण को प्राप्त किया था। लेकिन उनके देहावसान
के पश्चात् उनके अनुयायियों ने अज्ञानता या जानबूझकर वास्तविक योगाभ्यास को तिलांजलि देकर एकतरफा आनापान और विपस्सना जैसी विधियों पर जोर देकर युवाशक्ति के जोश को ठंडा करके सैनिक शक्ति के रूप में भारतवर्ष को कमजोर और आलसी बनाने में मदद की। भारतवर्ष सैनिक शक्ति के रूप में उसी समय से कमजोर होना शुरू हो गया था।सैनिक शक्ति के रूप में कायरता,भगौडेपन,पलाययनवाद की तरफ जाने का बीजवपन तभी हो गया था।हालांकि सनातनधर्मी और स्वयं बौद्ध शासकों ने इन शिक्षाओं की उपेक्षा करके सैनिक शक्ति के रूप में युवाशक्ति को इस प्रकार की एकतरफा योग विधियों से दूरी बनाने की कोशिशें जारी रखी थीं। लेकिन बाद में बौद्ध शासक भी इस बिमारी से नहीं बच पाये और इसी के परिणामस्वरूप विदेशी हमलावरों का सामना नहीं कर पाने की वजह से भारत में बौद्ध मत के विनाश का कारण भी बने। सनातनधर्मी शासकों ने इस प्रकार की बेतुकी शिक्षाओं से दूरी बनाकर रखी थी, इसलिये वो बहादुरी से विदेशी हमलावरों का आखिरी तक बहादुरी से सामना करते रहे थे। लेकिन जो नुकसान युवाशक्ति में पौरुष और बल को बढ़ाने वाली बौद्ध भिक्षुओं की आनापान,विपस्सना और उन्मुक्त भोग विलास की तांत्रिक विधियों ने किया था,उसका कुछ प्रभाव तो सनातनधर्मी शासकों और युवाशक्ति पर पड़ना ही था। आदि शंकराचार्य के पश्चात् उनके अद्वैतवादी आचार्यों में इस संसारविरोध की पलायनवादी बिमारी ने प्रवेश कर लिया।बाद में इसका प्रभाव बहुत से संतों पर भी पड़ा था। एकतरफा भिक्षुवाद के रूप में संसार विरोध,संन्यास,निवृत्तिवाद ,मायावाद आदि तथा अपने दुश्मनों को नहीं पहचानकर एकतरफा आदर्शवादी मूल्यों करुणा, सौहार्द,प्रेम और भाईचारे का प्रभाव ऊपर वर्णित पचासों समकालीन तथाकथित गुरुओं और भारतीय राजनीतिक परिवेश पर पूरी तरह से मौजूद है।
7.) योगाभ्यास में राजयोग, तंत्रयोग, हठयोग के अंतर्गत कुंभक की उपेक्षा करने और स्वाभाविक रूप से चल रही श्वास का अवलोकन करते रहने की एकतरफा शिथिलीकरण की विधियों ने भारत को नपुंसक, कमजोर, नाकारा और पाखंड बनाकर रख छोड़ा है।इस समय भी अधिकांश योगाचार्य, योग-शिक्षक,नामदानी तथाकथित गुरु तथा अष्टावक्र गीता,श्रीमद्भगवद्गीता और सांख्य को मानने वाले आचार्य लोग योगाभ्यास के अंतर्गत प्रामाणिक पातंजल प्राणायाम (बाह्यवृत्ति,आभ्यंतरवृत्ति,स्तंभ शवृत्ति, बाह्याभ्यन्तरविषयाक्षेपी) तथा प्रामाणिक हठयौगिक प्राणायाम
(रेचक पुरक कुंभक) की घोर उपेक्षा कर रहे हैं। इसलिये योगाभ्यास के कोई रुपांतरणकारी परिणाम नहीं आ पा रहे हैं। शारीरिक ,मानसिक और भावनात्मक तल पर बिमारियों और बिमारों की संख्या दिन दोगुनी और रात चोगुनी बढ़ोतरी हो रही है।'कुंभक' के माध्यम से शरीर में प्राण -ऊर्जा को बढ़ाकर जहां पर शरीर और मन को मजबूती प्रदान करना है, वहीं पर यह आत्मसाक्षात्कार में भी भूमिका तैयार करता है।हठयोगी श्रीनिवासन भट्ट हठरत्नावली में कहते हैं -
विचित्र कुंभकाभ्यासात् विचित्रां सिद्धिमाप्नुयात्।।(2/4)
अर्थात् कुंभक के अभ्यास से योगाभ्यास में ऊंचाईयां आनुभूत होती हैं।
8.) महर्षि घेरंड ने घेरंड संहिता में आठ प्राणायामों को कुंभक के भेद कहा है -
सहित: सूर्यभेदश्च उज्जायी शीतली तथा। भस्त्रिका भ्रामरी मूर्च्छा केवली चाष्टकुंभका:।।
अर्थात् सहित, सूर्यभेदी,उज्जायी,शीतली, भस्त्रिका, भ्रामरी,मूर्च्छा,केवली- ये आठ कुंभक हैं।
हठयोगप्रदीपिका में स्वात्माराम योगी कुंभक के महत्व को समझाते हुये कहते हैं -
तत्र सिद्धये विधानज्ञाश्छित्रान्कुर्वंति कुंभकान।
विछित्र कुंभकाभ्यासाद्विछित्रां सिद्धिमाप्नुयात्।।(2/43)
अर्थात् प्राणायाम के विधान को जानने वाले योगी योगाभ्यास में आगे बढ़ने के लिये विभिन्न प्रकार के कु़भकों का अभ्यास करते हैं।इन विचित्र प्रकार के कु़भकों के अभ्यास से योगी साधक योग में सिद्धि प्राप्त करते हैं।
9.)आज से साढ़े पांच हजार वर्षों पहले महर्षि पतंजलि 'योगसूत्र' में कुंभक के संबंध में कहते हैं -
बाह्याभ्यांतरस्तंभवृत्तिर्देशकालसंख्याभि: परिदृष्टो दीर्घसुक्ष्म:।।(2/50)
अर्थात् देश,काल, संख्या का ध्यान रखते हुये बाह्यवृत्ति, आभ्यंतरवृत्ति,स्तंभवृत्ति प्राणायाम के अभ्यास से प्राण सूक्ष्म,लंबा,सहज और शिथिल हो जाता है। इसके करने से मन शांत होने लगता है। विचारों के भंवर उठना बंद हो जाता है।इस सूत्र में बाह्य कुंभक,अंत: कुंभक और कहीं भी कुंभक को देश,काल,संख्या के गणित से करने के माध्यम से मन पर नियंत्रण को समझाया गया है।
10.) आज भारत के सैकड़ों विश्वविद्यालयों में स्थित योग- विभागों, सैकड़ों प्रसिद्ध योग- आश्रमों तथा हजारों छोटे स्तर के योग -केंद्रों में जहां आसनों को व्यायाम और एक्सरसाइज की तरह किया और करवाया जा रहा है, वहीं पर विभिन्न प्राणायामों को डिप ब्रीदिंग की तरह किया और करवाया जा रहा है।इस प्रकार से आसनों और प्राणायामों का अभ्यास शास्त्रीय मर्यादा के प्रतिकूल है।इस तरह से अभ्यास करने से लाभ की बजाय हानि अधिक हो रही है।मन को शांत करने या मन को साक्षीभाव से देखना कभी भी संभव नहीं होगा। जो थोड़ा -बहुत इससे प्राण -ऊर्जा का जागरण होता है,वह भी जनमानस की नकारात्मकता में बढ़ोतरी करके हिंसक कृत्यों को बढ़ाने में सहयोगी बन रहा है।इस तरह के शास्त्रविरोधी योगाभ्यास से मनुष्य के शरीर,प्राण, विचार,मन,भाव आदि स्तरों पर विकृति उत्पन्न होकर उसे आत्मस्थ होने से रोक रहा है। इससे मानसिक तनाव,चिंता, घृणा, द्वेष, इर्ष्या, कामुकता, बदले की भावना और हिंसक वृत्तियों में वृद्धि होती जा रही है। शांति, संतुष्टि,संतुलन,सौहार्द, प्रेम,करुणा , भाईचारा और संवेदनशीलता को प्राप्त होना तो बहुत दूर की बात हो जाती है। इससे जहां पर जनमानस का आध्यात्मिक, भावनात्मक,आर्थिक शोषण हो रहा है; वहीं पर योगाश्रमों और योगाचार्यों के व्यापार में हजारों गुना बढ़ोतरी हो रही है। ऋषि प्रदत्त योग और योगाभ्यास की बदनामी का माध्यम उपरोक्त तंत्र बनता जा रहा है।इस रोकथाम होना चाहिये। इसके लिये शास्त्रीय मानकों पर आधारित योग और योगाभ्यास को प्रचलन में लाया जाना आवश्यक है।यह आश्चर्यजनक है कि शास्त्रीय योग और योगाभ्यास के प्रचार -प्रसार में उपरोक्त तथाकथित योगाचार्य और योगशिक्षक ही अधिक जिम्मेदार हैं।
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डॉ. शीलक राम आचार्य
दर्शनशास्त्र -विभाग
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय
कुरुक्षेत्र-136119
Monday, July 6, 2026
धर्म नियम सर्व सृष्टि
धर्म नियम सर्व सृष्टि
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यहां क्या नहीं धंधा
हर कोई बना अंधा।
सब धंधा कर रहे हैं
भ्रष्टाचरण दे कंधा।।
बड़ा धंधा काव्य है
अनर्गल संभाव्य है।
बेचने को उत्सुक
हवा हवाई वायव्य है।।
यहां बिक रही शिक्षा
धंधा हो चुकी परीक्षा।
शोध सरेआम बिकता
लुप्तप्राय है अन्वीक्षा।।
धंधा थिसिस लिखना
बिना किसी परखना।
उच्च-शिक्षित बिक रहे
कहीं भी नहीं है मना।।
प्यार प्रेम भी बिक रहे
बस धोखेबाज टिक रहे।
लिव-इन रिलेशनशिप
समलिंगी भी ठीक रहे।।
यहां क्या नहीं बिकाऊ
कोई संबंध नहीं टिकाऊ।
दोस्ती बिकती हर कदम
अधिकांश बने हुये खाऊ।।
हर कोने में दुकान है
बिक रहा श्मशान है।
कफ़न भी बना धंधा
सम्मान भी सामान है।।
राजनीति धंधा बनी
सबसे बड़े यही धनी।
सरेआम खरीदारी हो
खरीद लो देकर मनी।।
बिक रहे न्यायाधीश
न्याय मिले बख्शीश।
बोली लगती सरेआम
धन दौलत परवरिश।।
यौवन बिकता बाजार
पूरी मददगार सरकार।
जो चाहो वही मिलेगा
काला गौरा हर प्रकार।।
रिश्ते-नाते भी धंधा बने
रहें नजदीकी जले-भुने।
कौन नहीं बिका लालच
अहंकार भरे हुये अपने।।
धंधा बनी योग-साधना
भगवान् बन आराधना।
लेकिन 'योग' नहीं धंधा
विवेक होश जब जागना।।
गुण-दोष न्याय करना
तर्क प्रमाण पथ गुजरना।
सबको एक लाठी हांककर
मतना पाप का घट भरना।।
धर्म कभी धंधा न होता
सार्वभौमिक ऋत गोता।
धर्म की आड़ ले मजहब
पंथ, रिलीजन को ढोता।।
धर्म नियम सर्व -सृष्टि
न्यायपूर्णता की दृष्टि।
वाद,मत की कट्टरता
धंधा बांध निज मुष्टि।।
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डॉ. शीलक राम आचार्य
वैदिक योगशाला








