Saturday, December 6, 2025

दर्शनशास्त्र और जीवन : वैचारिक कट्टरता का विनाशकारी इतिहास (Philosophy and Life: The Disastrous History of Ideological Fanaticism)


'दर्शनशास्त्र' की किसी भी थ्योरी, सिद्धांत,मत या वाद पर वाद- विवाद करते हुये यह ध्यान रखा जाना आवश्यक है कि वह थ्योरी, सिद्धांत, मत और मत जीवन की विभिन्न सामाजिक, शारीरिक, व्यक्तिगत,पारिवारिक,प्राणिक, वैचारिक, मानसिक, भावनात्मक, आत्मिक आवश्यकताओं को किस सीमा तक संतोष प्रदान करता है।केवल तार्किक रुप से किसी घटना, व्यक्ति, वस्तु, स्थान, परिस्थिति को जांचना सही नहीं है।उस तार्किकता के साथ जीवन की विभिन्न आवश्यकताओं को भी समझना है। विभिन्न थ्योरीज़, सिद्धांत आदि जीवन और जगत् के लिये होते हैं,जीवन थ्योरीज और जगत् के लिये नहीं होता है। सामान्यतः बुद्धिमान लोग जीवन जीना भूल जाते हैं लेकिन थ्योरीज़ आदि का याद रखते हैं। विभिन्न थ्योरीज़ के लिये अपने जीवन को बर्बाद करने वाले इन तथाकथित बुद्धिजीवियों के कारण दुनिया में अनेक युद्ध तक हो चुके हैं।जिसकी जो थ्योरी है,वह इसके विरोध में कोई भी तर्क या प्रमाण मानने को तैयार नहीं होता है।इस प्रकार की कट्टरता और अंधभक्ति दर्शनशास्त्र जैसे विषय के लिये शर्म, अपमान और उपहास की बात है।पश्चिम में फिलासफी के अंतर्गत भौतिकवाद,परमाणुवाद,परिवर्तनवाद,अज्ञेयवाद, संदेहवाद, बुद्धिवाद,अनुभववाद, समीक्षावाद, प्रत्ययवाद, इन्द्रियानुभववाद, वस्तुस्वातंत्र्यवाद,नारीवाद, मार्क्सवाद, विकासवाद,बहुसंस्कृतिवाद, उच्छृंखल भोगवाद, अवसरवाद, बांटो और शासन करो, इस्तेमाल करो और फेंक दो आदि सैकड़ों थ्योरीज़, सिद्धांत,वाद,मत, विचारधाराएं पिछले 2500 वर्षों के कालखंड में अस्तित्व में आये हैं। इनमें से कयी थ्योरीज को आधार बनाकर यूरोपियन देशों ने समस्त धरा के देशों पर समय- समय पर आक्रमण करके उनको लूटा, वहां पर नरसंहार किये, मतांतरण करवाया तथा तानाशाही से शासन भी किया है।एकेश्वरवाद,पैगंबरवाद,खलीफावाद आदि की थ्योरीज से अरब जगत् प्रभावित रहा है। और इसकी आड़ में अनेक अरबी कबीलों के खूंखार सरदारों ने एशिया, यूरोप और अफ्रीका के बहुत से देशों में अपना दमन,मतांतरण और तानाशाही कुचक्र कायम किया।ये सारे के सारे बेशक अनपढ़, मूर्ख,उज्जड,जंगली और पाशविक थे, लेकिन फिर भी किसी न किसी थ्योरी या मत या विचारधारा या जीवनशैली को कट्टरता के साथ लेकर चल रहे थे।जिसको जैसा अच्छा लगता हो,वह वैसा ही करे, लेकिन इसे दूसरों पर जबरदस्ती करके,तलवार के भयाक्रांत करके,पवित्र पुस्तक का प्रलोभन देकर और किसी पैगंबर के नाम पर थोपना मानवता नहीं अपितु जंगलीपना और राक्षसपना है।भारत में बौद्ध,कापालिक,तांत्रिक आदि ने भी कुछ समय के लिये ऐसा कुकृत्य करने का प्रयास किया था और सनातन भारतीय धर्म और संस्कृति को बहुत नुक्सान भी पहुचाया था, लेकिन उस समय पर मौजूद सनातनी मंडननमिश्र,कुमारिलभट्ट, गौडपादाचार्य,शंकराचार्य आदि के आगे वो अधिक आगे तक सफल नहीं हो पाये थे। बौद्ध मत को छोड़कर किसी ने भी विदेशी धरती पर शासन या आक्रमण या मतांतरण या कन्वर्जन या अत्याचार या विध्वंस आदि नहीं किये थे। दुनिया की सबसे पुरानी ज्ञान पुस्तक वेद में ही केवल सृष्टि उत्पत्ति के संबंध में ही बारह सिद्धांत मौजूद हैं, लेकिन वो परस्पर झगडे झांसे या अत्याचार या दमन या मतांतरण आदि का कारण नहीं बने। ऋग्वेद के नासदीय और पुरुष सूक्तों के आधार पर प्रसिद्ध वैदिक विचारक मधुसूदन ओझा ने सृष्टि उत्पत्ति के संबंध में ही दस सिद्धांत बतलाये हैं। बाकी विषयों के संबंध में भी सिद्धांतों की भरमार है।एक बार सृष्टि सिद्धांतों को देखिये -

सद्सद्वाद,रजोवाद,व्योमवाद, अपरवाद, आवरणवाद, अम्भोवाद, अमृतमृत्युवाद, अहोरात्रवाद, दैववाद, संशयवाद।
यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि इस धरती पर विभिन्न थ्योरीज, सिद्धांत,वाद,मत आदि के कट्टर समर्थकों ने जितना विध्वंस,विनाश, मतांतरण, ज़ुल्म, अत्याचार किया है,उतना शायद किसी ने नहीं किया होगा। अब्राहमिक मतवादी इसमें शिरोमणि कहलाते हैं। और तो और विज्ञान भी पिछले 250 वर्षों के दौरान इनकी इसी कट्टरता और अंधभक्ति के कारण विध्वंस,विनाश और भेदभाव का कारण बनता जा रहा है।

डॉ. शीलक राम आचार्य
दर्शनशास्त्र-विभाग
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र
(हरियाणा)

शरीर के उत्सव में खोती आत्मा (The soul lost in the celebration of the body)

अब्राहमिक फैमीनीज्म से प्रेरित और पल्लवित अभिनेत्रियां,योग -शिक्षिकाएं,एयर होस्टेस,रिसैप्निस्ट, प्रबंधन क्षेत्र में कार्यरत युवतियां, नृतकियां, विश्वविद्यालयीन लड़कियां, सोशल मीडिया पर अर्धनग्न होकर रील बनाकर डालने वाली लड़कियां बोल्डनैस का मतलब नग्न होना मानती हैं। जिसके शरीर पर जितने कम कपड़े होंगे, उसे उतना ही अधिक बोल्ड माना जाता है।

बोल्डनैस को नग्नता,उघाडेपन और अंग -प्रदर्शन से जोड़ दिया गया है। बोल्डनैस को शरीर की कामुक मुद्राओं से आंका जा रहा है।नारी के शरीर पर जितने कम वस्त्र होंगे,वह उतनी ही अधिक बोल्ड, सुंदर और बोल्ड दिखेगी।
यदि इस प्रकार के अंग-प्रदर्शन,उघाडेपन और कामुक मुद्राओं को ही बोल्डनैस माना जायेगा तो फिर पुरुषों को भी ऐसा ही करना चाहिये। पुरुषों को भी ऐसा ही करना चाहिये। पुरुषों को भी बोल्ड क्यों नहीं होना चाहिये?बोल्डनैस का पैमाना लड़कियों और लड़कों के लिये भिन्न भिन्न क्यों है? 
क्या पुरुषों के पास नग्न और उघाडा होकर दिखाने के लिये कुछ भी नहीं है?यह आश्चर्यजनक है कि यदि कोई लड़का उघाड़ा होता है,तो वह असभ्यता और फूहड़ता माना जाता है लेकिन लड़कियों के संबंध में इसका बिल्कुल विपरीत है। लड़कियों के लिये नग्नता और उघाडापन सौंदर्य का प्रतीक बन गया है।
लड़की हो या लडका हो-उघाडा होकर वो क्या दिखाना और क्या छिपाना चाहते हैं? इसका क्या रहस्य है? कुछ तो ऐसा जरूर है, जिस पर कोई भी खुलकर बोलना नहीं चाहता है। यदि कोई बोलने का दुस्साहस करे भी तो उस पर सभी नग्नता समर्थक और नैतिकता समर्थक टूट पड़ते हैं। लगता है कि ये दोनों वर्ग इस नग्नता की आड़ लेकर अपनी दमित ऊर्जा का रेचन करके राहत महसूस करने पर लगे हुये हैं।
सोचने की बात यह भी है कि यदि नग्नता और उघाडापन ही सौंदर्य या बोल्डनैस या प्रतिभा का आंकलन है,तो ऐसे में तो गधे, कुत्ते, बिल्ली, सुअर, भैंस, झोटे आदि पशु अधिक बोल्ड, सुंदर और प्रतिभाशाली हैं।
लगता है कि अपने खालीपन, अपने अकेलेपन, अपने तनाव,अपनी हताशा और अपनी चिंता को युवाशक्ति -वर्ग अपनी और अन्यों की कामुकता को उत्तेजित करके उससे राहत पाना चाहते हैं। इन सबके आगे, पीछे,ऊपर, नीचे और बीच में सर्वत्र उच्छृंखल कामुकता प्रधान हो गई है।आहार निद्रा,भय और मैथुन किसी भी प्राणी के लिये आवश्यक होते हैं, लेकिन इस तरह से इन्हीं में डूबकर जीवन जीना पशुओं के लिये सही कहा जा सकता है, मनुष्य प्राणी के लिये नहीं।
पिछले कुछ दशकों से यह इस प्रकार की जीवन- शैली अवगुण की जगह  गुण में परिवर्तित हो गई है।इसे फैशन या आधुनिकता या आजादी या समान अधिकार कहकर महिमान्वित किया जा रहा है।
 व्यापार, राजनीति, उद्योग- धंधों,कोरपोरेट -घरानों,होटल- व्यवसाय, फिल्म -उद्योग, धर्म,योग,कथा, सत्संग, जागरण, शिक्षा, परिवहन और विज्ञापन आदि सभी क्षेत्रों के चालाक लोगों ने महिला- वर्ग की इस नग्नता और उघाडेपन को अपने व्यापारिक हित साधने का जरिया बना लिया है।
आज किसी को कुछ भी बेचना हो तो वह विज्ञापन के रूप में महिलाओं की नग्नता और उघाडेपन का सहारा लेता है। चतुर और धूर्त लोग रुपया कमा रहे हैं लेकिन बहुसंख्यक जनमानस का जमकर शोषण हो रहा है। नैतिकता,जीवन-मूल्य, सात्विकता, सरलता,सहजता,संयम, अनुशासन आदि जायें भाड़ में।


डॉ. शीलक राम आचार्य
दर्शनशास्त्र- विभाग
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र (हरियाणा)