'दर्शनशास्त्र' की किसी भी थ्योरी, सिद्धांत,मत या वाद पर वाद- विवाद करते हुये यह ध्यान रखा जाना आवश्यक है कि वह थ्योरी, सिद्धांत, मत और मत जीवन की विभिन्न सामाजिक, शारीरिक, व्यक्तिगत,पारिवारिक,प्राणिक, वैचारिक, मानसिक, भावनात्मक, आत्मिक आवश्यकताओं को किस सीमा तक संतोष प्रदान करता है।केवल तार्किक रुप से किसी घटना, व्यक्ति, वस्तु, स्थान, परिस्थिति को जांचना सही नहीं है।उस तार्किकता के साथ जीवन की विभिन्न आवश्यकताओं को भी समझना है। विभिन्न थ्योरीज़, सिद्धांत आदि जीवन और जगत् के लिये होते हैं,जीवन थ्योरीज और जगत् के लिये नहीं होता है। सामान्यतः बुद्धिमान लोग जीवन जीना भूल जाते हैं लेकिन थ्योरीज़ आदि का याद रखते हैं। विभिन्न थ्योरीज़ के लिये अपने जीवन को बर्बाद करने वाले इन तथाकथित बुद्धिजीवियों के कारण दुनिया में अनेक युद्ध तक हो चुके हैं।जिसकी जो थ्योरी है,वह इसके विरोध में कोई भी तर्क या प्रमाण मानने को तैयार नहीं होता है।इस प्रकार की कट्टरता और अंधभक्ति दर्शनशास्त्र जैसे विषय के लिये शर्म, अपमान और उपहास की बात है।पश्चिम में फिलासफी के अंतर्गत भौतिकवाद,परमाणुवाद,परिवर्तनवाद,अज्ञेयवाद, संदेहवाद, बुद्धिवाद,अनुभववाद, समीक्षावाद, प्रत्ययवाद, इन्द्रियानुभववाद, वस्तुस्वातंत्र्यवाद,नारीवाद, मार्क्सवाद, विकासवाद,बहुसंस्कृतिवाद, उच्छृंखल भोगवाद, अवसरवाद, बांटो और शासन करो, इस्तेमाल करो और फेंक दो आदि सैकड़ों थ्योरीज़, सिद्धांत,वाद,मत, विचारधाराएं पिछले 2500 वर्षों के कालखंड में अस्तित्व में आये हैं। इनमें से कयी थ्योरीज को आधार बनाकर यूरोपियन देशों ने समस्त धरा के देशों पर समय- समय पर आक्रमण करके उनको लूटा, वहां पर नरसंहार किये, मतांतरण करवाया तथा तानाशाही से शासन भी किया है।एकेश्वरवाद,पैगंबरवाद,खलीफावाद आदि की थ्योरीज से अरब जगत् प्रभावित रहा है। और इसकी आड़ में अनेक अरबी कबीलों के खूंखार सरदारों ने एशिया, यूरोप और अफ्रीका के बहुत से देशों में अपना दमन,मतांतरण और तानाशाही कुचक्र कायम किया।ये सारे के सारे बेशक अनपढ़, मूर्ख,उज्जड,जंगली और पाशविक थे, लेकिन फिर भी किसी न किसी थ्योरी या मत या विचारधारा या जीवनशैली को कट्टरता के साथ लेकर चल रहे थे।जिसको जैसा अच्छा लगता हो,वह वैसा ही करे, लेकिन इसे दूसरों पर जबरदस्ती करके,तलवार के भयाक्रांत करके,पवित्र पुस्तक का प्रलोभन देकर और किसी पैगंबर के नाम पर थोपना मानवता नहीं अपितु जंगलीपना और राक्षसपना है।भारत में बौद्ध,कापालिक,तांत्रिक आदि ने भी कुछ समय के लिये ऐसा कुकृत्य करने का प्रयास किया था और सनातन भारतीय धर्म और संस्कृति को बहुत नुक्सान भी पहुचाया था, लेकिन उस समय पर मौजूद सनातनी मंडननमिश्र,कुमारिलभट्ट, गौडपादाचार्य,शंकराचार्य आदि के आगे वो अधिक आगे तक सफल नहीं हो पाये थे। बौद्ध मत को छोड़कर किसी ने भी विदेशी धरती पर शासन या आक्रमण या मतांतरण या कन्वर्जन या अत्याचार या विध्वंस आदि नहीं किये थे। दुनिया की सबसे पुरानी ज्ञान पुस्तक वेद में ही केवल सृष्टि उत्पत्ति के संबंध में ही बारह सिद्धांत मौजूद हैं, लेकिन वो परस्पर झगडे झांसे या अत्याचार या दमन या मतांतरण आदि का कारण नहीं बने। ऋग्वेद के नासदीय और पुरुष सूक्तों के आधार पर प्रसिद्ध वैदिक विचारक मधुसूदन ओझा ने सृष्टि उत्पत्ति के संबंध में ही दस सिद्धांत बतलाये हैं। बाकी विषयों के संबंध में भी सिद्धांतों की भरमार है।एक बार सृष्टि सिद्धांतों को देखिये -
सद्सद्वाद,रजोवाद,व्योमवाद, अपरवाद, आवरणवाद, अम्भोवाद, अमृतमृत्युवाद, अहोरात्रवाद, दैववाद, संशयवाद।
यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि इस धरती पर विभिन्न थ्योरीज, सिद्धांत,वाद,मत आदि के कट्टर समर्थकों ने जितना विध्वंस,विनाश, मतांतरण, ज़ुल्म, अत्याचार किया है,उतना शायद किसी ने नहीं किया होगा। अब्राहमिक मतवादी इसमें शिरोमणि कहलाते हैं। और तो और विज्ञान भी पिछले 250 वर्षों के दौरान इनकी इसी कट्टरता और अंधभक्ति के कारण विध्वंस,विनाश और भेदभाव का कारण बनता जा रहा है।
डॉ. शीलक राम आचार्य
दर्शनशास्त्र-विभाग
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र
(हरियाणा)